भक्त हनुमानजी के वचन रामचरितमानस में
कह कपि ह्रदयं धीर धरू माता, सुमिरू राम सेवक सुखदाता। उर आनहु रघुपति प्रभुताई, सुनि मम वचन तजहु कदराई॥ अर्थ:- हनुमानजी ने कहा, हे माता! ह्रदय में धैर्य धारण करो और सेवकों को सुख देनेवाले श्रीराम का स्मरण करो।श्रीरघुनाथजी की प्रभुता को ह्रदय में लाओ और मेरे वचन सुनकर कायरता छोड़ दो। Hanumanji said, O mother! Be patient in the heart and remember Shri Ram, who gives happiness to the servants. Bring the sovereignty of Shri Raghunathji to the heart and leave the cowardice after listening to my words. अबहि मातु मैं आउं लवाई, प्रभु आवसु नहिं राम दुहाई। कछुक दिवस जननी धरू धीरा, कपिन्ह सहित अइहहि रघुवीरा॥ अर्थ:- हे माता ! मैं आपको अभी यहाँ से लिवा जाऊँ। पर श्रीरामचंद्रजी की शपथ है,मुझे प्रभू की आज्ञा नहीं है।अतः हे माता !कुछ दिन और धीरज धरो।श्रीरामचंद्रजी यहाँ आवेंगे॥ Hey mother! Let me get you out of here now. But the oath of Shriram Chandraji, I do not have the permission of God. बचन सुनत कपि मन मुसुकाना। भइ सहाय सारद मैं जाना॥ जातुधान सुनि रावन बचना। लागे रचैं मूढ...