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Showing posts from August, 2021

अट्टालसुन्दराष्टकम्

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ॐनमःशिवाय           ।। अट्टालसुन्दराष्टकम् ।। कल्याणाचलकोदण्डकान्तदोर्दण्डमण्डितम् । कबलीकृतसंसारं कलयेट्टालसुन्दरम् ।।१।। कालकूटप्रभाजालकलंकीकृतकन्धरम् । कलाधरं कलामौळिं कलयेट्टालसुन्दरम् ।।२।। कालकालं कलातीतं कलावन्तं च निष्कलम् । कमलापतिसंस्तुत्यं कलयेट्टालसुन्दरम् ।।३।।  कान्तार्धं कमनीयाङ्गं करुणामृतसागरम् । कलिकल्मषदोषघ्नं कलयेट्टालसुन्दरम् ।।४।। कदम्बकाननाधीशं कांक्षितार्थसुरद्रुमम् । कामशासनमीशानं कलयेट्टालसुन्दरम् ।।५।। सृष्टानि मायया येन ब्रह्माण्डानि बहूनि च । रक्षितानि हतान्यन्ते कलयेट्टालसुन्दरम् ।।६।। स्वभक्तजनसंताप पापापद्मङ्गतत्परम् । कारणं सर्वजगतां कलयेट्टालसुन्दरम् ।।७।। कुलशेखरवंशोत्थभूपानां कुलदैवतम् । परिपूर्णं चिदानन्दं कलयेट्टालसुन्दरम् ।।८।। अट्टालवीरश्रीशंभोरष्टकं वरमिष्टदम् । पठतां श‍ृण्वतां सद्यस्तनोतु परमांश्रियम् ।।९।।        । इति अट्टालसुन्दराष्टकम् ।

जटायु का प्रसंग, कबन्ध उद्धार

श्री रामजी का विलाप, जटायु का प्रसंग, कबन्ध उद्धार * जेहि बिधि कपट कुरंग सँग धाइ चले श्रीराम। सो छबि सीता राखि उर रटति रहति हरिनाम॥29 ख॥ भावार्थ:-  जिस प्रकार कपट मृग के साथ श्री रामजी दौड़ चले थे, उसी छवि को हृदय में रखकर वे हरिनाम (रामनाम) रटती रहती हैं॥29 (ख)॥ चौपाई : * रघुपति अनुजहि आवत देखी। बाहिज चिंता कीन्हि बिसेषी॥ जनकसुता परिहरिहु अकेली। आयहु तात बचन मम पेली॥1॥ भावार्थ:-  (इधर) श्री रघुनाथजी ने छोटे भाई लक्ष्मणजी को आते देखकर ब्राह्य रूप में बहुत चिंता की (और कहा-) हे भाई! तुमने जानकी को अकेली छोड़ दिया और मेरी आज्ञा का उल्लंघन कर यहाँ चले आए!॥1॥ * निसिचर निकर फिरहिं बन माहीं। मम मन सीता आश्रम नाहीं॥ गहि पद कमल अनुज कर जोरी। कहेउ नाथ कछु मोहि न खोरी॥2॥ भावार्थ:-  राक्षसों के झुंड वन में फिरते रहते हैं। मेरे मन में ऐसा आता है कि सीता आश्रम में नहीं है। छोटे भाई लक्ष्मणजी ने श्री रामजी के चरणकमलों को पकड़कर हाथ जोड़कर कहा- हे नाथ! मेरा कुछ भी दोष नहीं है॥2॥ * अनुज समेत गए प्रभु तहवाँ। गोदावरि तट आश्रम जहवाँ॥ आश्रम देखि जानकी हीना। भए बिकल जस प्राकृत दीना॥3॥ भावार्थ...

जय राम रमारमनं समनं

जय राम रमारमनं समनं। भवताप भयाकुल पाहि जनं॥  अवधेस सुरेस रमेस बिभो। सरनागत मागत पाहि प्रभो॥ हे राम! हे रमारमण (लक्ष्मीकांत)! हे जन्म-मरण के संताप का नाश करने वाले! आपकी जय हो, आवागमन के भय से व्याकुल इस सेवक की रक्षा कीजिए। हे अवधपति! हे देवताओं के स्वामी! हे रमापति! हे विभो! मैं शरणागत आपसे यही माँगता हूँ कि हे प्रभो! मेरी रक्षा कीजिए॥ दससीस बिनासन बीस भुजा।  कृत दूरि महा महि भूरि रुजा रजनीचर बृंद पतंग रहे।  सर पावक तेज प्रचंड दहे॥ हे दस सिर और बीस भुजाओं वाले रावण का विनाश करके पृथ्वी के सब महान्‌ रोगों (कष्टों) को दूर करने वाले श्री रामजी! राक्षस समूह रूपी जो पतंगे थे, वे सब आपके बाण रूपी अग्नि के प्रचण्ड तेज से भस्म हो गए॥ महि मंडल मंडन चारुतरं।  धृत सायक चाप निषंग बरं।  मद मोह महा ममता रजनी।  तम पुंज दिवाकर तेज अनी॥ आप पृथ्वी मंडल के अत्यंत सुंदर आभूषण हैं, आप श्रेष्ठ बाण, धनुष और तरकस धारण किए हुए हैं। महान्‌ मद, मोह और ममता रूपी रात्रि के अंधकार समूह के नाश करने के लिए आप सूर्य के तेजोमय किरण समूह हैं॥ मनजात किरात निपात किए।  मृग लोग कुभोग सरेन ...

मनु-शतरूपा तप एवं वरदान

मनु-शतरूपा तप एवं वरदान दोहा :* सो मैं तुम्ह सन कहउँ सबु सुनु मुनीस मन लाइ।रामकथा कलि मल हरनि मंगल करनि सुहाइ॥141॥भावार्थ:-हे मुनीश्वर भरद्वाज! मैं वह सब तुमसे कहता हूँ, मन लगाकर सुनो। श्री रामचन्द्रजी की कथा कलियुग के पापों को हरने वाली, कल्याण करने वाली और बड़ी सुंदर है॥141॥ चौपाई :* स्वायंभू मनु अरु सतरूपा। जिन्ह तें भै नरसृष्टि अनूपा॥दंपति धरम आचरन नीका। अजहुँ गाव श्रुति जिन्ह कै लीका॥1॥ भावार्थ:-स्वायम्भुव मनु और (उनकी पत्नी) शतरूपा, जिनसे मनुष्यों की यह अनुपम सृष्टि हुई, इन दोनों पति-पत्नी के धर्म और आचरण बहुत अच्छे थे। आज भी वेद जिनकी मर्यादा का गान करते हैं॥1॥ * नृप उत्तानपाद सुत तासू। ध्रुव हरिभगत भयउ सुत जासू॥लघु सुत नाम प्रियब्रत ताही। बेद पुरान प्रसंसहिं जाही॥2॥ भावार्थ:-राजा उत्तानपाद उनके पुत्र थे, जिनके पुत्र (प्रसिद्ध) हरिभक्त ध्रुवजी हुए। उन (मनुजी) के छोटे लड़के का नाम प्रियव्रत था, जिनकी प्रशंसा वेद और पुराण करते हैं॥2॥ * देवहूति पुनि तासु कुमारी। जो मुनि कर्दम कै प्रिय नारी॥आदि देव प्रभु दीनदयाला। जठर धरेउ जेहिं कपिल कृपाला॥3॥ भावार्थ:-पुनः देवहूति उनकी कन्या थी, जो...

जय राम सोभा धाम

जय राम सोभा धाम। दायक प्रनत बिश्राम।। धृत त्रोन बर सर चाप। भुजदंड प्रबल प्रताप।।1।। जय दूषनारि खरारि। मर्दन निसाचर धारि।। यह दुष्ट मारेउ नाथ। भए देव सकल सनाथ।।2।। जय हरन धरनी भार। महिमा उदार अपार।। जय रावनारि कृपाल। किए जातुधान बिहाल।।3।। लंकेस अति बल गर्ब। किए बस्य सुर गंधर्ब।। मुनि सिद्ध नर खग नाग। हठि पंथ सब कें लाग।।4।। परद्रोह रत अति दुष्ट। पायो सो फलु पापिष्ट।। अब सुनहु दीन दयाल। राजीव नयन बिसाल।।5।। मोहि रहा अति अभिमान। नहिं कोउ मोहि समान।। अब देखि प्रभु पद कंज। गत मान प्रद दुख पुंज।।6।। कोउ ब्रह्म निर्गुन ध्याव। अब्यक्त जेहि श्रुति गाव।। मोहि भाव कोसल भूप। श्रीराम सगुन सरूप।।7।। बैदेहि अनुज समेत। मम हृदयँ करहु निकेत।। मोहि जानिए निज दास। दे भक्ति रमानिवास।।8।। दे भक्ति रमानिवास त्रास हरन सरन सुखदायकं। सुख धाम राम नमामि काम अनेक छबि रघुनायकं।। सुर बृंद रंजन द्वंद भंजन मनुज तनु अतुलितबलं। ब्रह्मादि संकर सेब्य राम नमामि करुना कोमलं।। दोहा/सोरठा अब करि कृपा बिलोकि मोहि आयसु देहु कृपाल। काह करौं सुनि प्रिय बचन बोले दीनदयाल।।113।।

देवताओं की राम स्तुति

देवताओं की स्तुति, इंद्र की अमृत वर्षा दोहा : * बरषहिं सुमन हरषि सुर बाजहिं गगन निसान। गावहिं किंनर सुरबधू नाचहिं चढ़ीं बिमान॥109 क॥ भावार्थ:- देवता हर्षित होकर फूल बरसाने लगे। आकाश में डंके बजने लगे। किन्नर गाने लगे। विमानों पर चढ़ी अप्सराएँ नाचने लगीं॥109 (क)॥ * जनकसुता समेत प्रभु सोभा अमित अपार। देखि भालु कपि हरषे जय रघुपति सुख सार॥109 ख॥ भावार्थ:- श्री जानकीजी सहित प्रभु श्री रामचंद्रजी की अपरिमित और अपार शोभा देखकर रीछ-वानर हर्षित हो गए और सुख के सार श्री रघुनाथजी की जय बोलने लगे॥109 (ख)॥ चौपाई : * तब रघुपति अनुसासन पाई। मातलि चलेउ चरन सिरु नाई॥ आए देव सदा स्वारथी। बचन कहहिं जनु परमारथी॥1॥ भावार्थ:- तब श्री रघुनाथजी की आज्ञा पाकर इंद्र का सारथी मातलि चरणों में सिर नवाकर (रथ लेकर) चला गया। तदनन्तर सदा के स्वार्थी देवता आए। वे ऐसे वचन कह रहे हैं मानो बड़े परमार्थी हों॥1॥ * दीन बंधु दयाल रघुराया। देव कीन्हि देवन्ह पर दाया॥ बिस्व द्रोह रत यह खल कामी। निज अघ गयउ कुमारगगामी॥2॥ भावार्थ:- हे दीनबन्धु! हे दयालु रघुराज! हे परमदेव! आपने देवताओं पर बड़ी दया की। विश्व के द्रोह में तत्पर यह दुष...

।। श्री दिव्य दुर्गाष्टकम्।।

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        महर्षि व्यास द्वारा लिखा गया मां दुर्गा का यह स्त्रोत कल्याणकारी है. इसका पाठ करने से मनुष्य हर संकट से दूर रहता है मां भगवती की कृपा हमेशा बनी रहती ह... जय भगवति देवि नमो वरदे जय पापविनाशिनि बहुफलदे। जय शुम्भनिशुम्भकपालधरे प्रणमामि तु देवि नरार्तिहरे॥1॥ जय चन्द्रदिवाकरनेत्रधरे जय पावकभूषितवक्त्रवरे। जय भैरवदेहनिलीनपरे जय अन्धकदैत्यविशोषकरे॥2॥ जय महिषविमर्दिनि शूलकरे जय लोकसमस्तकपापहरे। जय देवि पितामहविष्णुनते जय भास्करशक्रशिरोवनते॥3॥  जय षण्मुखसायुधईशनुते जय सागरगामिनि शम्भुनुते। जय दु:खदरिद्रविनाशकरे जय पुत्रकलत्रविवृद्धिकरे॥4॥ जय देवि समस्तशरीरधरे जय नाकविदर्शिनि दु:खहरे। जय व्याधिविनाशिनि मोक्ष करे जय वाञ्छितदायिनि सिद्धिवरे॥5॥  एतद्व्यासकृतं स्तोत्रं य: पठेन्नियत: शुचि:। गृहे वा शुद्धभावेन प्रीता भगवती सदा॥6॥                                                                ...

महालक्ष्मीअष्टकम(Mahalakshmyashtakam)

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प्रस्तुत है इन्द्र द्वारा रचित महालक्ष्मी कृपा प्रार्थना स्तोत्र.....जिसमें श्री महालक्ष्मी की अत्यंत सुंदर उपासना की गई है। इस अष्टक लक्ष्मी मंत्र का जाप करने से आपको सभी कष्टो का निवारण होगा...। नमस्तेऽस्तु महामाये श्रीपीठे सुरपूजिते। शंखचक्रगदाहस्ते महालक्ष्मि नमोऽस्तु ते।।१।।  इन्द्र बोले–श्रीपीठ पर स्थित और देवताओं से पूजित होने वाली हे महामाये। तुम्हें नमस्कार है। हाथ में शंख, चक्र और गदा धारण करने वाली हे महालक्ष्मी! तुम्हें प्रणाम है।  नमस्ते गरुडारूढे कोलासुरभयंकरि। सर्वपापहरे देवि महालक्ष्मि नमोऽस्तु ते।।२।।  गरुड़ पर आरुढ़ हो कोलासुर को भय देने वाली और समस्त पापों को हरने वाली हे भगवति महालक्ष्मी तुम्हे प्रणाम है। सर्वज्ञे सर्ववरदे सर्वदुष्टभयंकरि। सर्वदु:खहरे देवि महालक्ष्मि नमोऽस्तु ते।।३।।  सब कुछ जानने वाली, सबको वर देने वाली, समस्त दुष्टों को भय देने वाली और सबके दु:खों को दूर करने वाली, हे देवि महालक्ष्मी! तुम्हें नमस्कार है।  सिद्धिबुद्धिप्रदे देवि भुक्तिमुक्तिप्रदायिनि। मन्त्रपूते सदा देवि महालनमोऽस्तु ते।।४।।  सिद्धि, बुद्धि, भोग और मोक्...