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Showing posts from November, 2021

मोक्ष के साधन(विवेक, वैराग्य, षट-सम्पति और मुमुक्ष)

साधन चार हैं-विवेक, वैराग्य, षट-सम्पति और मुमुक्ष| १. विवेक. सत्य-असत्य और नित्य-अनित्य वस्तु के विवेचन का नाम विवेक हैं| विवेक इसका भलीभांति पृथ्थकरण कर देता हैं| विवेक का अर्थ हैं, तत्व का यथार्थ अनुभव करना| सव अवस्थाओं में और प्रत्येक वस्तु में प्रतिक्षण आत्मा-आनात्मा का विश्लेषण करते करते, यह सिध्दी प्राप्त होती हैं| २. वैराग्य. विवेक के द्वारा सत-असत और नित्य-अनित्य का पृथ्थकरण हो जाने पर असत और अनित्य से सहज ही राग हट जाता हैं, इसी का नाम वैराग्य हैं| मन में भोगो की अभिलाषायें बनी हुई हैं और वाह्य रूप में संसार से द्वेष और घृणा कर रहे हैं, इसका नाम वैराग्य नहीं हैं| वैराग्य में राग का सर्वथा आभाव होता हैं| वैराग्य यथार्थ में आभ्यंतरिक अनासक्ति का नाम हैं| ३. षट-सम्पति. इस विवेक और वैरग्य के फलस्वरूप साधक को छह विभागों वाली एक परिसंपति मिलती हैं, वह पूरी न मिले तब यह समझना चाहिए कि विवेक और वैराग्य में कसर हैं| विवेक और वैराग्य से संपन्न हो जाने पर ही साधक को इस सम्पति का प्राप्त होना सहज हैं| इस सम्पति का नाम षट-सम्पति हैं और इसके छह विभाग हैं:- (१)-शम. मन का पूर्ण रूप से निग...

धन की प्राप्ति के लिए चौपाई और दोहे

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श्री राम चरित मानस ॥ मंगलाचरण - अयोध्याकाण्ड ॥ ॥ श्लोक ॥ यस्यांके च विभाति भूधरसुता देवापगा मस्तके भाले बालविधुर्गले च गरलं यस्योरसि व्यालराट्। सोऽयं भूतिविभूषणः सुरवरः सर्वाधिपः सर्वदा शर्वः सर्वगतः शिवः शशिनिभः श्री शंकरः पातु माम्‌॥ (१) भावार्थ:- जिनकी गोद में हिमायल की पुत्री पार्वती जी, मस्तक पर गंगा जी, ललाट पर दूज का चन्द्रमा, कंठ में हलाहल विष और वक्षः स्थल पर सर्पराज शेष जी सुशोभित हैं, जो भस्म से विभूषित, देवताओं में श्रेष्ठ, सर्वेश्वर, भक्तों के पापहर्ता, सर्वव्यापक, कल्याण स्वरूप, चन्द्रमा के समान श्वेत वर्ण श्रीशंकर जी सदा मेरी रक्षा करें। (१) प्रसन्नतां या न गताभिषेकतस्तथा न मम्ले वनवासदुःखतः। मुखाम्बुजश्री रघुनन्दनस्य मे सदास्तु सा मंजुलमंगलप्रदा॥ (२) भावार्थ:- राजा रघु के कुल को आनंद देने वाले श्रीरामचन्द्र जी के मुखारविंद की जो शोभा राज्याभिषेक की बात सुनकर न तो प्रसन्नता को प्राप्त हुई और न वनवास के दुःख से मलिन हुई, ऎसे मुखकमल की छबि मेरे लिए सदैव मंगलकारी हो। (२) नीलाम्बुजश्यामलकोमलांग सीतासमारोपितवामभागम्‌। पाणौ महासायकचारुचापं नमामि रामं रघुवंशनाथम्‌॥ (३) भावार्थ:...

अपने परेशानियों को दूर करने के लिए पढ़े रामचरित मानस की ये चौपाईयाँ

श्री राम चरितमानस एक ऐसा ग्रन्थ जिसे गोस्वामी तुलसीदास ने १६ वीं सदी में रचा था। जिसमें श्री राम के मर्यादा पुरुषोत्तम को दर्शाया गया है। कहा जाता है की इस के पाठ करने से सभी देवी-देवता प्रसन्न होते हैं। इसलिए घरों में लोग प्रतिदिन इसकी कुछ चौपाइयों को पढ़ते हैं। आज हम ऐसे ही कुछ चौपाइयों के बारे में जानेंगे, जिससे हमारे सभी मनोकामनाएं पूरी होंगी।   १) संकटमोचन के आशीर्वाद के लिए: सुमिरि पवनसुत पावन नामू। अपनें बस करि राखे रामू।।   २) यदि आपको नौकरी नहीं मिल रही हो तो: बिस्व भरण पोषण कर जोई। ताकर नाम भरत जस होई।।   ३) यदि घर में आर्थिक समस्या हो रही है या धन-संपत्ति की परेशानी हो रही हो: जे सकाम नर सुनहि जे गावहि। शुख संपत्ति नाना विधि पावहि।।   ४) यदि घर पे परेशानियाँ ज्यादा बढ़ रही हो तो इस चौपाई का जप करें। प्रनवउं पवन कुमार, खाल बन पावक ग्यान घन। जासु हृदयं आगार, बसहिं राम सर चाप धर।।   ५) यदि घर पे या घर के सदस्यों पे बुरी नजर का साया हो तो: स्याम गौर सुन्दर दोउ जोरी। निरखहिं छबि जननीं तृन तोरी।।   ६) यदि घर में किसी सदस्य के विवाह में अर्चन आ रही है तो:...

सुख-संपत्ति स्वयं चल कर आती है ऐसे लोगों के घर

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रामायण के बालकांड में सुख-संपत्ति पाने के लिए मंत्र दिया गया है- ''जिमि सरिता सागर महुं जाही।  जद्यपि ताहि कामना नाहीं।। तिमि सुख संपति बिनहिं बोलाएं।  धरमसील पहिं जाहिं सुभाएं।।'' अर्थात: नदियां बहती हुई सागर की तरफ जाती हैं, चाहे उनके मानसपटल पर उस ओर जाने की कामना हो या न हो वैसे ही सुख-संपत्ति भी बिना किसी चाह के धर्मशील और विचार योग्य लोगों के पास पंहुच ही जाती है।  पुराणों में कहा गया है की अपने लक्ष्य को पाने के लिए जो व्यक्ति लग्न और ईमानदारी से मेहनत करता है। देवी महालक्ष्मी अपना आशीर्वाद सदैव उस पर बनाई रखती हैं। भगवान को सदा अपने अंग-संग समझें और उनकी कृपा के लिए सदैव उन्हें धन्यवाद देते रहें।  करुणा को अपनाओ, असत्य का आश्रय न लो, सत्य-पथ को अपनाओ, पवित्रता से रहो, आहार-विहार को शुद्ध करो, सभी प्राणियों की सेवा करो, किसी भी प्राणी के साथ मन, वाणी और शरीर से किसी भी प्रकार का वैर न रखो, सबके साथ मैत्रीपूर्ण व्यवहार करो, द्वेष भाव को त्याग कर सबके कल्याण में रमे रहो, माता-पिता गुरुजनों की सेवा करो और काम को त्यागकर सबके कल्याण में रमे रहो, क...

देव्यपराधक्षमापनस्तोत्रम्

अथ देव्यपराधक्षमापनस्तोत्रम् ||श्री गणेशाय नमः|| हरि: ॐ न मन्त्रं नो यन्त्रं तदपि च न जाने स्तुतिमहो न चाह्वानं ध्यानं तदपि च न जाने स्तुतिकथाः। न जाने मुद्रास्ते तदपि च न जाने विलपनं परं जाने मातस्त्वदनुसरणं क्लेशहरणम् ॥१॥ विधेरज्ञानेन द्रविणविरहेणालसतया विधेयाशक्यत्वात्तव चरणयोर्या च्युतिरभूत्। तदेतत्क्षन्तव्यं जननि सकलोद्धारिणि शिवे कुपुत्रो जायेत क्वचिदपि कुमाता न भवति ॥२॥ पृथिव्यां पुत्रास्ते जननि बहवः सन्ति सरलाः परं तेषां मध्ये विरलतरलोऽहं तव सुतः। मदीयोऽयं त्यागः समुचितमिदं नो तव शिवे कुपुत्रो जायेत क्वचिदपि कुमाता न भवति ॥३॥ जगन्मातर्मातस्तव चरणसेवा न रचिता न वा दत्तं देवि द्रविणमपि भूयस्तव मया। तथापि त्वं स्नेहं मयि निरुपमं यत्प्रकुरुषे कुपुत्रो जायेत क्वचिदपि कुमाता न भवति ॥४॥ परित्यक्ता देवा विविधविधसेवाकुलतया मया पञ्चाशीतेरधिकमपनीते तु वयसि। इदानीं चेन्मातस्तव यदि कृपा नापि भविता निरालम्बो लम्बोदरजननि कं यामि शरणम् ॥५॥ श्वपाको जल्पाको भवति मधुपाकोपमगिरा निरातंको रंको विहरति चिरं कोटिकनकैः। तवापर्णे कर्णे विशति मनुवर्णे फलमिदं जनः को जानीते जननि जपनीयं जपविधौ ॥६॥ चिताभस्माल...