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Showing posts from January, 2022

एकादशी के उपवास की महात्म्य

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प्रभासे च कुरुक्षेत्रे केदारे बदरिकाश्रमे ।  काश्यां च सूकरक्षेत्रे ग्रहणे चन्द्रसूर्ययोः ॥ सङ्क्रान्तीनां चतुर्लक्षं दानं दत्तं च यन्नरैः ।  एकादश्युपवासस्य कलां नार्हति षोडशीम् ॥           - -गर्गसंहिता, माधुर्यखण्ड अर्थात:- प्रभास, कुरूक्षेत्र, केदार, बदरिकाश्रम, काशी तथा सूकरक्षेत्र में चन्‍द्रग्रहण, सूर्यग्रहण तथा चार लाख संक्रान्तियों के अवसर पर मनुष्‍यों द्वारा जो दान दिया गया हो वह, भी एकादशी के उपवास की सोलहवीं कला के बराबर नहीं है। गर्ग संहिता   गर्ग  मुनि की रचना है। इस संहिता में मधुर  श्रीकृष्णलीला  परिपूर्ण है। इसमें  राधाजी  की माधुर्य-भाव वाली लीलाओं का वर्णन है।  श्रीमद्भगवद्गीता  में जो कुछ सूत्ररूप से कहा गया है, गर्ग-संहिता में उसी का बखान किया गया है। अतः यह भागवतोक्त श्रीकृष्णलीला का महाभाष्य है। भगवान श्रीकृष्ण की पूर्णाता के संबंध में गर्ग ऋषि ने कहा है: यस्मिन सर्वाणि तेजांसि विलीयन्ते स्वतेजसि। त वेदान्त परे साक्षात् परिपूर्णं स्वयम्।। जबकि श्रीमद्भागवत में इस संबंध में महर्ष...

धर्म के दश लक्षण (मनु के अनुसार)

मनुस्मृति के अध्याय 6 के श्लोक 92 में धर्म के दस लक्षण दिए गए हैं। यह लक्षण द्विजो के लिए निर्धारित किये गये थे , क्युकी आश्रम व्यवस्था सिर्फ द्विजो के लिए ही निर्धारित किया गया था और यह प्रकरण आश्रम धर्म से संबंधित है। यह विवरण इस प्रकार हैं - चतुर्मिरपि चैवैतैर्नित्यमाश्रमिमिर्द्विजैः । दशलक्षणको धर्मः सेवितव्यः प्रयत्नतः ॥ ९१ ॥ इन चारों आश्रम वाले द्विजातियोंको ( नीचे लिखा हुआ ) दस प्रकारका धर्म सदा यत्नपूर्वक करना चाहिये ॥ ९१ ॥ धृतिः क्षमा दमोऽस्तेयं शौचमिन्द्रियनिग्रहः । धीर्विद्या सत्यमक्रोधो दशकं धर्मलक्षणम् ॥ ९२ ॥ संतोष , क्षमा , मनको वशमें रखना , न्यायसे धन लेना , पवित्रता , इन्द्रियोंको वशमें करना , धुद्धि , विद्या , सत्य और अक्रोध ये धर्मके दश लक्षण है ॥ ९२ ॥ दश लक्षणानि धर्मस्य ये विप्राः समधीयते । अधीत्य चानुवर्तन्ते ते यान्ति परमां गतिम् ॥ ९३ ॥ धर्मके इन दश लक्षणों को जो ब्राह्मण पढ़ते हैं और पढ़कर करते हैं वे परम गतिको पाते हैं ॥ ९३ ॥ दशलक्षणकं धर्ममनुतिष्ठन्समाहितः । वेदान्तं विधिवच्छ्रुत्वा संन्यसेदनृणो द्विजः ॥ ९४ ॥ इन दस प्रकारके धर्मों को सावधान मनसे करके और विधिपूर...

परमहंस गीता(तत्व ज्ञान)

जड़ भरत का रहूगण को उपदेश- मन को जीवन और मोक्ष का कारण बताना, इंद्रियों मे आसक्त मन बंधन का कारण है। विषय हीन होने पर मोक्ष देता है। https://youtu.be/373ULYhQidE https://youtu.be/1iBf8KnxklM

महामुनि शुक देव को सनत्कुमार का उपदेश(ब्रम्ह चिंतन)

https://youtu.be/8P_Rw8LnMK0

पुत्र गीता (अपने कल्‍याण की इच्‍छा रखने वाले पुरुष का क्‍या कर्तव्‍य है)

पिता के प्रति पुत्रद्वारा ज्ञान का उपदेश महाभारत शान्ति पर्व  के ‘मोक्षधर्म पर्व’ के अंतर्गत अध्याय 175 के अनुसार अपने कल्‍याण की इच्‍छा रखने वाले पुरुष का क्‍या कर्तव्‍य है, इस विषय में पिता के प्रति पुत्र द्वारा ज्ञान के उपदेश का वर्णन इस प्रकार है [1] - पिता के प्रति पुत्रद्वारा ज्ञान का उपदेश राजा युधिष्ठिर  ने पूछा-  पितामह ! समस्त भूतों का संहार करने वाला यह काल बराबर बीता जा रहा है, ऐसी अवस्था में मनुष्‍य क्‍या करने से कल्‍याण का भागी हो सकता है? यह मुझे बताइये। भीष्‍मजी  ने कहा-  युधिष्ठिर ! इस विषय में ज्ञानी पुरुष  पिता  और पुत्र के संवादरूप इस प्राचीन इतिहास का उदाहरण दिया करते हैं। तुम उस संवाद को ध्‍यान देकर सुनो। कुन्‍तीकुमार, प्राचीनकाल में एक  ब्राह्मण  थे, जो सदा  वेद– शास्त्रों  के स्वाध्‍याय में तत्पर रहते थे। उनके एक पुत्र हुआ, जो गुण से तो  मेधावी  था ही नाम से भी मेधावी था। वह  मोक्ष , धर्म और अर्थ में कुशल तथा लोकतत्त्व का अच्छा ज्ञाता था। ए‍क दिन उस पुत्र ने अपने स्वाध्‍याय परायण पिता से कहा।

पिंगला गीता क्या है जानिए 3 रहस्य(मृत्यु के शोक को कम करने के लिए)

पिंगला गीता क्या है जानिए 3 रहस्य महाभारत में श्रीमद्भागवत गीता के अलावा अनु गीता, हंस गीता, पराशर गीता, बोध्य गीता, विचरव्नु गीता, हारीत गीता, काम गीता, पिंगला गीता, वृत्र गीता, शंपाक गीता, उद्धव गीता, मंकि गीता, व्याध गीता जैसी अनेक गीताएं हैं। इसके अलावा गुरु गीता, अष्ट्रवक गीता, गणेश गीता, अवधूत गीता, गर्भ गीता, परमहंस गीता, कर्म गीता, कपिल गीता, भिक्षु गीता, शंकर गीता, यम गीता, ऐल गीता, गोपीगीता, शिव गीता और प्रणव गीता आदि गीताएं हैं। आओ जानते है पिंगला गीता के बारे में संक्षिप्त जानकारी।     1. पिंगला गीता पिंगला नाम की एक नाचने वाली लड़की को मिले ज्ञान और प्रबुद्धता का संदेश देती है। यह एक प्रसिद्ध गणिका थी।   2. पिंगला गीता का वर्णन महाभारत के शांति पर्व में मिलता है। यह गीता पितामह ‍भीष्म और युद्धि के बीच हुआ संवाद है। 3. इस गीता में धन संपत्ति के नष्ट होने अथवा किसी प्रियजन की मृत्यु होने पर उत्पन्न शोक के निवारण एक प्राचीन आख्‍यान के माध्यम से बताया गया है। यस्मान्नोद्विजते लोको लोकानोद्विजते च यः । हर्षामर्षभयोद्वेगैर्मुक्तो यः स च मे प्रियः ॥15॥ BG 12.15 ...

साच का अंग

साच का अंग अथ श्री दरियावजी महाराज की दिव्य वाणीजी का ”  साच का अंग  ” प्रारंभ । राम राम । उत्तम काम घर में करे, त्यागी सबको त्याग । दरिया सुमिरे राम को, दोनों ही बड़भाग (1) आचार्यश्री दरियावजी महाराज कहते हैं कि उत्तम काम करने वाला गृहस्थी भी साधु है तथा सबसे उत्तम कार्य तो ईश्वर भजन ही है । त्यागी को आध्यात्मिक जीवन में बाधा पहुँचाने वाले सभी विरोधी तत्वों का त्याग करके भगवद नामजाप करना चाहिए । इस प्रकार से गृहस्थी और त्यागी दोनों के ऐसे पावन आचरण हैं तो वे दोनों ही बड़भागी हैं । राम राम  ! मिधम काम घर में करे, त्यागी गृह  बसाय । जन दरिया बिन बंदगी, दोऊँ नरकां जाय (2) आचार्यश्री दरियावजी महाराज फरमाते हैं कि जो गृहस्थी , गृहस्थ में रहते हुए मिधम (अनिष्ट ) काम अर्थात पाप, अत्याचार-अनाचार करता है  वह नरक में जाएगा । इसी प्रकार जो त्याग धारण करके पुनः गृहस्थी जैसा ही हो जाता है, वह  त्यागी भी नरक में जाएगा । अतः ईश्वर की वन्दना किये बिना चाहे वह त्यागी हो अथवा गृहस्थी हो सभी नरक में जाएंगे । राम राम  ! दरिया गृहस्थी साध को, माया बिना न आब । त्यागी होय संग...

शिव-पार्वती संवाद

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शिव-पार्वती संवाद दोहा : * जटा मुकुट सुरसरित सिर लोचन नलिन बिसाल। नीलकंठ लावन्यनिधि सोह बालबिधु भाल॥106॥ भावार्थ:- उनके सिर पर जटाओं का मुकुट और गंगाजी (शोभायमान) थीं। कमल के समान बड़े-बड़े नेत्र थे। उनका नील कंठ था और वे सुंदरता के भंडार थे। उनके मस्तक पर द्वितीया का चन्द्रमा शोभित था॥106॥ चौपाई : * बैठे सोह कामरिपु कैसें। धरें सरीरु सांतरसु जैसें॥ पारबती भल अवसरु जानी। गईं संभु पहिं मातु भवानी॥1॥ भावार्थ:- कामदेव के शत्रु शिवजी वहाँ बैठे हुए ऐसे शोभित हो रहे थे, मानो शांतरस ही शरीर धारण किए बैठा हो। अच्छा मौका जानकर शिवपत्नी माता पार्वतीजी उनके पास गईं। * जानि प्रिया आदरु अति कीन्हा। बाम भाग आसनु हर दीन्हा॥ बैठीं सिव समीप हरषाई। पूरुब जन्म कथा चित आई॥2॥ भावार्थ:- अपनी प्यारी पत्नी जानकार शिवजी ने उनका बहुत आदर-सत्कार किया और अपनी बायीं ओर बैठने के लिए आसन दिया। पार्वतीजी प्रसन्न होकर शिवजी के पास बैठ गईं। उन्हें पिछले जन्म की कथा स्मरण हो आई॥2॥ *पति हियँ हेतु अधिक अनुमानी। बिहसि उमा बोलीं प्रिय बानी॥ कथा जो सकल लोक हितकारी। सोइ पूछन चह सैल कुमारी॥3॥ भावार्थ:- स्वामी के हृदय में (अपने...

इंद्र-बृहस्पति संवाद

इंद्र-बृहस्पति संवाद * देखि प्रभाउ सुरेसहि सोचू। जगु भल भलेहि पोच कहुँ पोचू॥ गुर सन कहेउ करिअ प्रभु सोई। रामहि भरतहि भेंट न होई॥4॥ भावार्थ:- भरतजी के (इस प्रेम के) प्रभाव को देखकर देवराज इन्द्र को सोच हो गया (कि कहीं इनके प्रेमवश श्री रामजी लौट न जाएँ और हमारा बना-बनाया काम बिगड़ जाए)। संसार भले के लिए भला और बुरे के लिए बुरा है (मनुष्य जैसा आप होता है जगत् उसे वैसा ही दिखता है)। उसने गुरु बृहस्पतिजी से कहा- हे प्रभो! वही उपाय कीजिए जिससे श्री रामचंद्रजी और भरतजी की भेंट ही न हो॥4॥ दोहा : * रामु सँकोची प्रेम बस भरत सप्रेम पयोधि। बनी बात बेगरन चहति करिअ जतनु छलु सोधि॥217॥ भावार्थ:- श्री रामचंद्रजी संकोची और प्रेम के वश हैं और भरतजी प्रेम के समुद्र हैं। बनी-बनाई बात बिगड़ना चाहती है, इसलिए कुछ छल ढूँढकर इसका उपाय कीजिए॥217॥ चौपाई : * बचन सुनत सुरगुरु मुसुकाने। सहसनयन बिनु लोचन जाने॥ मायापति सेवक सन माया। करइ त उलटि परइ सुरराया॥1॥ भावार्थ:- इंद्र के वचन सुनते ही देवगुरु बृहस्पतिजी मुस्कुराए। उन्होंने हजार नेत्रों वाले इंद्र को (ज्ञान रूपी) नेत्रोंरहित (मूर्ख) समझा और कहा- हे देवराज! माया के...

श्री गणपति संकटनाशनस्तोत्रं

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संकटनाशन_स्तोत्रं गणपति श्री गणपति संकटनाशनस्तोत्रं  नारदपुराण में चमत्कारिक श्री संकटनाशन गणपति स्तोत्र का  वर्णन है जो विद्या, धन, संतान और मोक्ष सभी कामनाओं को पूर्ण करने वाला है। 

क्या आप भी बिना अर्थ जाने पढ़ते हैं हनुमान चालीसा?

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क्या आप भी बिना अर्थ जाने पढ़ते हैं हनुमान चालीसा? शक्ति व बल के प्रतीक पवन पुत्र हनुमान, भगवान राम के परम भक्त थे. भक्तगण उन्हें भय और कष्ट से मुक्ति पाने के लिए पूजते हैं व उनकी अराधना में ‘हनुमान चालीसा’ का पाठ पढ़ते हैं. यह पाठ हमारे लिए किसी भी विकार व डर को दूर करने में सहायक होता है. लेकिन क्या आपने कभी हनुमान चालीसा के प्रत्येक अक्षर का अर्थ समझा है? यदि नहीं, तो आईए जानने की कोशिश करते हैं. December 23, 2014     Subscribe to Notifications दोहा: श्रीगुरु चरण सरोज रज ,  निज मनु मुकुर सुधारि। बरनउ रघुवर बिमल जसु ,  जो दायकु फल चारि॥ {"uid":0.5317152941671532,"hostPeerName":"https://m-jagran-com.cdn.ampproject.org","initialGeometry":"{\"windowCoords_t\":0,\"windowCoords_r\":360,\"windowCoords_b\":592,\"windowCoords_l\":0,\"frameCoords_t\":1260,\"frameCoords_r\":328,\"frameCoords_b\":1510,\"frameCoords_l\":28,\"posCoords_...