एकादशी के उपवास की महात्म्य
प्रभासे च कुरुक्षेत्रे केदारे बदरिकाश्रमे । काश्यां च सूकरक्षेत्रे ग्रहणे चन्द्रसूर्ययोः ॥ सङ्क्रान्तीनां चतुर्लक्षं दानं दत्तं च यन्नरैः । एकादश्युपवासस्य कलां नार्हति षोडशीम् ॥ - -गर्गसंहिता, माधुर्यखण्ड अर्थात:- प्रभास, कुरूक्षेत्र, केदार, बदरिकाश्रम, काशी तथा सूकरक्षेत्र में चन्द्रग्रहण, सूर्यग्रहण तथा चार लाख संक्रान्तियों के अवसर पर मनुष्यों द्वारा जो दान दिया गया हो वह, भी एकादशी के उपवास की सोलहवीं कला के बराबर नहीं है। गर्ग संहिता गर्ग मुनि की रचना है। इस संहिता में मधुर श्रीकृष्णलीला परिपूर्ण है। इसमें राधाजी की माधुर्य-भाव वाली लीलाओं का वर्णन है। श्रीमद्भगवद्गीता में जो कुछ सूत्ररूप से कहा गया है, गर्ग-संहिता में उसी का बखान किया गया है। अतः यह भागवतोक्त श्रीकृष्णलीला का महाभाष्य है। भगवान श्रीकृष्ण की पूर्णाता के संबंध में गर्ग ऋषि ने कहा है: यस्मिन सर्वाणि तेजांसि विलीयन्ते स्वतेजसि। त वेदान्त परे साक्षात् परिपूर्णं स्वयम्।। जबकि श्रीमद्भागवत में इस संबंध में महर्ष...