पुत्र गीता (अपने कल्‍याण की इच्‍छा रखने वाले पुरुष का क्‍या कर्तव्‍य है)

पिता के प्रति पुत्रद्वारा ज्ञान का उपदेश

महाभारत शान्ति पर्व के ‘मोक्षधर्म पर्व’ के अंतर्गत अध्याय 175 के अनुसार अपने कल्‍याण की इच्‍छा रखने वाले पुरुष का क्‍या कर्तव्‍य है, इस विषय में पिता के प्रति पुत्र द्वारा ज्ञान के उपदेश का वर्णन इस प्रकार है[1]-

पिता के प्रति पुत्रद्वारा ज्ञान का उपदेश

राजा युधिष्ठिर ने पूछा- पितामह! समस्त भूतों का संहार करने वाला यह काल बराबर बीता जा रहा है, ऐसी अवस्था में मनुष्‍य क्‍या करने से कल्‍याण का भागी हो सकता है? यह मुझे बताइये।

भीष्‍मजी ने कहा- युधिष्ठिर! इस विषय में ज्ञानी पुरुष पिता और पुत्र के संवादरूप इस प्राचीन इतिहास का उदाहरण दिया करते हैं। तुम उस संवाद को ध्‍यान देकर सुनो। कुन्‍तीकुमार, प्राचीनकाल में एक ब्राह्मण थे, जो सदा वेद–शास्त्रों के स्वाध्‍याय में तत्पर रहते थे। उनके एक पुत्र हुआ, जो गुण से तो मेधावी था ही नाम से भी मेधावी था। वह मोक्ष, धर्म और अर्थ में कुशल तथा लोकतत्त्व का अच्छा ज्ञाता था। ए‍क दिन उस पुत्र ने अपने स्वाध्‍याय परायण पिता से कहा।

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