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Showing posts from March, 2022

shok ko door kerne ka upay from loss or death (Mahabharat)

https://youtu.be/NTZm4ZG_9I0

bhakt dhanurdas and vaishya (achary ramanujan)

https://youtu.be/L2yX1YGYVZ0

द्वादश पञ्जरिका स्तोत्र / Dwadash Panjarika Stotra

द्वादश पञ्जरिका स्तोत्र /  Dwadash Panjarika Stotra मूढ़ जहीहि धनागमतृष्णां कुरु सद्बुद्धिं मनसि वितृष्णाम् । यल्लभसे निजकर्मोपात्तं वित्तं तेन विनोदय चित्तम् ।।1।। भज गोविन्दं भज गोविन्दं गोविन्दं भज मूढ़मते ।। (ध्रुवपदम्) अर्थमनर्थं भावय नित्यं नास्ति तत: सुखलेश: सत्यम् । पुत्रादपि धनभाजां भीति: सर्वत्रैषा विहिता नीति: । भज. ।।2।। का ते कांता कस्ते पुत्र: संसारोऽयमतीव विचित्र: । कस्य त्वं क: कुत आयातस्तत्त्वं चिन्तय यदिदं भ्रात: । भज. ।।3।। मा कुरु धनजनयौवनगर्वं हरति निमेषात्काल: सर्वम् । मायामयमिदमखिलं हित्वा ब्रह्मपदं त्वं प्रविश विदित्वा । भज. ।।4।। कामं क्रोधं लोभं मोहं त्यक्त्वात्मानं भावय कोऽहम् । आत्मज्ञानविहीना मूढास्ते पच्यन्ते नरकनिगूढ़ा: । भज. ।।5।। सुरमन्दिरतरुमूलनिवास: शय्या भूतलमजिनं वास: । सर्वपरिग्रहभोगत्याग: कस्य सुखं न करोति विराग: । भज. ।।6।। शत्रौ मित्रे पुत्रे बन्धौ मा कुरु यत्नं विग्रहसंधौ । भव समचित्त: सर्वत्र त्वं वाञ्छस्यचिराद्यदि विष्णुत्वम् । भज. ।।7।। त्वयि मयि चान्यत्रैको विष्णुव्र्यर्थं कुप्यसि सर्वसहिष्णु: । सर्वस्मिन्नपि पश्यात्मानं सर्वत्रोत्स्रज भेद...

II निर्वाण षटकम्॥

II निर्वाण षटकम्॥ मनो बुद्ध्यहंकारचित्तानि नाहम् न च श्रोत्र जिह्वे न च घ्राण नेत्रे न च व्योम भूमिर् न तेजॊ न वायु: चिदानन्द रूप: शिवोऽहम् शिवॊऽहम् ॥ न च प्राण संज्ञो न वै पञ्चवायु: न वा सप्तधातुर् न वा पञ्चकोश: न वाक्पाणिपादौ न चोपस्थपायू चिदानन्द रूप: शिवोऽहम् शिवॊऽहम् ॥ न मे द्वेष रागौ न मे लोभ मोहौ मदो नैव मे नैव मात्सर्य भाव: न धर्मो न चार्थो न कामो ना मोक्ष: चिदानन्द रूप: शिवोऽहम् शिवॊऽहम् ॥ न पुण्यं न पापं न सौख्यं न दु:खम् न मन्त्रो न तीर्थं न वेदा: न यज्ञा: अहं भोजनं नैव भोज्यं न भोक्ता चिदानन्द रूप: शिवोऽहम् शिवॊऽहम् ॥ न मृत्युर् न शंका न मे जातिभेद: पिता नैव मे नैव माता न जन्म न बन्धुर् न मित्रं गुरुर्नैव शिष्य: चिदानन्द रूप: शिवोऽहम् शिवॊऽहम् ॥ अहं निर्विकल्पॊ निराकार रूपॊ विभुत्वाच्च सर्वत्र सर्वेन्द्रियाणाम् न चासंगतं नैव मुक्तिर् न मेय: चिदानन्द रूप: शिवोऽहम् शिवॊऽहम् ॥ English Transliteration: Mano Budhyahankaar Chitani Naaham, Na Cha Shrotra Jihve Na Cha Ghraana netre Na Cha Vyoma Bhumir Na Tejo Na Vayuh, Chidananda Rupah Shivoham Shivoham Na Cha Praana Sanjno Na Vai ...

naam hi kaam ayega

https://youtu.be/WgeumIj_CSE

maharshi mudgle vishnu bhakt

https://youtu.be/ct3X5rOdCOU

लंकाकाण्ड मंगलाचरण(bhagvan Ram & shiv struti)

लंकाकाण्ड मंगलाचरण षष्ठ सोपान- मंगलाचरण  Descent Six - ManglaCharan श्लोक: Shlok: * रामं कामारिसेव्यं भवभयहरणं कालमत्तेभसिंहं योगीन्द्रं ज्ञानगम्यं गुणनिधिमजितं निर्गुणं निर्विकारम्। मायातीतं सुरेशं खलवधनिरतं ब्रह्मवृन्दैकदेवं वन्दे कन्दावदातं सरसिजनयनं देवमुर्वीशरूपम्॥1॥ भावार्थ:-  कामदेव के शत्रु शिवजी के सेव्य, भव (जन्म-मृत्यु) के भय को हरने वाले, काल रूपी मतवाले हाथी के लिए सिंह के समान, योगियों के स्वामी (योगीश्वर), ज्ञान के द्वारा जानने योग्य, गुणों की निधि, अजेय, निर्गुण, निर्विकार, माया से परे, देवताओं के स्वामी, दुष्टों के वध में तत्पर, ब्राह्मणवृन्द के एकमात्र देवता (रक्षक), जल वाले मेघ के समान सुंदर श्याम, कमल के से नेत्र वाले, पृथ्वीपति (राजा) के रूप में परमदेव श्री रामजी की मैं वंदना करता हूँ॥1|| English:  I adore Shri Ram, the supreme Deity, the object of worship even of Shiv (the Destroyer of Cupid), the Dispeller of the fear of rebirth, the lion to quell the mad  elephant in the form of Death, the Master of Yogis, attainable through immediate knowledg...

मानस के सिद्ध स्तोत्रों के अनुभूत प्रयोग

मानस के सिद्ध स्तोत्रों के अनुभूत प्रयोग मानस के सिद्ध स्तोत्रों के अनुभूत प्रयोग १॰ ऐश्वर्य प्राप्ति ‘माता सीता की स्तुति’ का नित्य श्रद्धा-विश्वासपूर्वक पाठ करें। “उद्भवस्थितिसंहारकारिणीं क्लेशहारिणीम्। सर्वश्रेयस्करीं सीतां नतोऽहं रामवल्लभाम्।।” (बालकाण्ड, श्लो॰ ५)” अर्थः- उत्पत्ति, स्थिति और संहार करने वाली, क्लेशों की हरने वाली तथा सम्पूर्ण कल्याणों की करने वाली श्रीरामचन्द्र की प्रियतमा श्रीसीता को मैं नमस्कार करता हूँ।। २॰ दुःख-नाश ‘भगवान् राम की स्तुति’ का नित्य पाठ करें। “यन्मायावशवर्तिं विश्वमखिलं ब्रह्मादिदेवासुरा यत्सत्वादमृषैव भाति सकलं रज्जौ यथाहेर्भ्रमः। यत्पादप्लवमेकमेव हि भवाम्भोधेस्तितीर्षावतां वन्देऽहं तमशेषकारणपरं रामाख्यमीशं हरिम्।।” (बालकाण्ड, श्लो॰ ६) अर्थः- सारा विश्व जिनकी माया के वश में है और ब्रह्मादि देवता एवं असुर भी जिनकी माया के वश-वर्ती हैं। यह सब सत्य जगत् जिनकी सत्ता से ही भासमान है, जैसे कि रस्सी में सर्प की प्रतीति होती है। भव-सागर के तरने की इच्छा करनेवालों के लिये जिनके चरण निश्चय ही एक-मात्र प्लव-रुप हैं, जो सम्पूर्ण कारणों से परे हैं, उन समर्थ, द...

vishnu chit bhakt ke updesh

https://youtu.be/Okrfm2CdPhk

bhagvan rishhabh dev updesh

https://youtu.be/BjGboeb-iyo