शास्त्र

प्रवृत्तिर्वा निवृत्तिर्वा नित्येन कृतकेन वा ।
पुंसां येनोपदिश्येत तच्छास्त्रमभिधीयते ||'

 (श्लोकवार्तिक, शब्दपरिच्छेद, श्लोक 4)

‘जिससे मनुष्य को नित्यकर्म में प्रवृत्ति और कृतककर्म से निवृत्ति का उपदेश किया जाय उसको ‘शास्त्र' कहते हैं ।’

जीर्यन्ति जीर्यतः केशा दन्ता जीर्यन्ति जीर्यतः ।
जीविताशा धनाशा च जीर्यतोऽपि न जीर्यति ॥ 

'बूढ़े होनेवाले मनुष्य के बाल पक जाते हैं, उसके दाँत भी टूटने लगते हैं, परंतु धन और जीवनकी आशा उस मनुष्यके जीर्ण होनेपर भी जीर्ण ( शिथिल ) नहीं होती।

यच्च कामसुखं लोके यच्च दिव्यं महत्सुखम् ।
तृष्णाक्षयसुखस्यैते नार्हतः षोडशीं कलाम् ||

'संसारमें जो कामजनित सुख है तथा जो दिव्य महान् सुख हैं, वे सब मिलकर तृष्णा-क्षयसे होनेवाले सुखके सोलहवीं कलाके बराबर भी नहीं हो सकते'।
'खोटी बुद्धिवाले पुरुषोंद्वारा जिसका त्याग होना कठिन
है, जो मनुष्यके बूढ़े होनेपर भी स्वयं बूढ़ी नहीं होती
तथा जो प्राण-नाशक रोगके समान है, उस तृष्णाका त्याग
करनेवालेको ही सुख मिलता है।


न छन्दांसि वृजिनं तारयन्ति मायाविनं मायया वर्तमानम् ।
छन्दांस्येनं प्रजहत्यन्तकाले नीडं शकुन्ता इव जातपक्षाः ॥

परब्रह्म के स्वरूप को जानने पर भी जो कपटपूर्वक धर्म का आचरण करता है अर्थात् शरीराध्यासपूर्वक ही कर्मों को करता है, उस मिथ्याचारी का वेद पापों से उद्धार नहीं करते।
The Vedas do not save a liar from sins, even after knowing the nature of Parabrahman, who practices dharma in a fraudulent way, that is, performs actions only with physical meditation.


तत्त्वज्ञान इतना शीघ्र उपलन्ध होने वाला नहीं है। ब्रह्मतत्व तो तभी प्राप्त हो सकता है जबकि बुद्धिरूप गुहा में मन के विलीन हो जाने पर ब्रह्मचर्य पूर्वक उसका बार-बार चिन्तन किया जाय, अतः वह ब्रह्मविद् आचार्य की सन्निधि मैं ही हो सकता है ।

#सनत्सुजातीय


जगत में जब विद्वान् लोग सम्मान करते हैं, तो आदरणीय पुरुष
को समझना चाहिए कि नेत्र खुलने ओर बन्द होने के समान यह संसार की स्वाभाविक प्रकृति ही है । सन्त पुरुष सम्मान्य का आदर करते हैं एवं अभद्र पुरष अनादर । इससे न तो हानि ही है और न लाभ हो है । 

#सनत्सुजातीय


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