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Showing posts from January, 2023

वन्दे भक्त्या वन्दितां च मुनीन्द्रमनुमानवैः

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प्रथमं भारती नाम द्वितीयं च सरस्वती। तृतीयं शारदा देवी चतुर्थं हंसवाहिनी॥ पञ्चमं जगती ख्याता षष्ठं वागीश्वरी तथा। सप्तमं कुमुदी प्रोक्ता अष्टमं ब्रह्मचारिणी॥ प्रथमं भारती नाम द्वितीयं च सरस्वती। तृतीयं शारदा देवी चतुर्थं हंसवाहिनी॥ पञ्चमं जगती ख्याता षष्ठं वागीश्वरी तथा। सप्तमं कुमुदी प्रोक्ता अष्टमं ब्रह्मचारिणी॥ नवमं बुद्धिदात्री च दशमं वरदायिनी। एकादशं चन्द्रकान्तिर्द्वादशं भुवनेश्वरी॥ द्वादशैतानि नामानि त्रिसन्ध्यं यः पठेन्नरः। जिह्वाग्रे वसते नित्यं ब्रह्मरूपा सरस्वती ॥ दिन की तीनों सन्ध्याओं में, इनका पाठ करने से भगवती सरस्वती उस मनुष्य के जिह्वाग्र पर विराजमान हो जाती हैं। सरस्वतीं शुक्लवर्णां सस्मितां सुमनोहराम्॥ कोटिचन्द्रप्रभामुष्टपुष्टश्रीयुक्तविग्रहाम्। वह्निशुद्धां शुकाधानां वीणापुस्तकधारिणीम् ॥ रत्नसारेन्द्रनिर्माणनवभूषणभूषिताम्। सुपूजिता सुरगणैर्ब्रह्मविष्णुशिवादिभिः॥ वन्दे भक्त्या वन्दितां च मुनीन्द्रमनुमानवैः।

बालकाण्ड - ८

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शुक्रवार, 5 जुलाई 2013 बालकाण्ड - ८ गोस्वामी तुलसीदास श्री तुलसीदास रचित रामचरितमानस भावार्थ सहित (भावार्थ गीताप्रेस गोरखपुर से प्रकाशित श्रीरामचरिमानस से साभार) आकर चारि लाख चौरासी। जाति जीव जल थल नभ बासी॥ सीय राममय सब जग जानी। करउँ प्रनाम जोरि जुग पानी॥ चौरासी लाख योनियों में चार प्रकार के (स्वेदज, अण्डज, उद्भिज्ज, जरायुज) जीव जल, पृथ्वी और आकाश में रहते हैं, उन सबसे भरे हुए इस सारे जगत को श्री सीताराममय जानकर मैं दोनों हाथ जोड़कर प्रणाम करता हूँ। जानि कृपाकर किंकर मोहू। सब मिलि करहु छाड़ि छल छोहू॥ निज बुधि बल भरोस मोहि नाहीं। तातें बिनय करउँ सब पाही॥ मुझको अपना दास जानकर कृपा की खान आप सब लोग मिलकर छल छोड़कर कृपा कीजिए। मुझे अपने बुद्धि-बल का भरोसा नहीं है, इसीलिए मैं सबसे विनती करता हूँ। करन चहउँ रघुपति गुन गाहा। लघु मति मोरि चरित अवगाहा॥ सूझ न एकउ अंग उपाऊ। मन मति रंक मनोरथ राऊ॥ मैं श्री रघुनाथजी के गुणों का वर्णन करना चाहता हूँ, परन्तु मेरी बुद्धि छोटी है और श्री रामजी का चरित्र अथाह है। इसके लिए मुझे उपाय का एक भी अंग अर्थात्‌ कुछ (लेशमात्र) भी उपाय नहीं सूझता। मेरे मन और बुद्धि...

धनप्रदायक - श्रीगणेश-लक्ष्मी स्तोत्र

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|| धनप्रदायक - श्रीगणेश-लक्ष्मी स्तोत्र || ॐ नमो विघ्नराजाय सर्वसौख्यप्रदायिने | दुष्टारिष्टाविनाशाय पराय परमात्मने || लम्बोदरं महावीर्यं नागयज्ञोपवीत शोभितं | अर्धचन्द्रधरं देवं विघ्नव्यूह विनाशनं || ॐ ह्रां ह्रीं ह्रूं ह्रैं ह्रौं ह्रः हेरम्बाय नमो नमः | सर्वसिद्धिप्रदोsसि त्वं सिद्धिबुद्धिप्रदोभव || चिन्तितार्थप्रदस्त्वं हि सततं मोदकप्रियः | सिन्दूरारुणवस्त्रेश्च पूजितो वरदायकः || इदं गणपतिस्तोत्रं यः पठेद भक्तिमान नरः | तस्य देहं च गेहं च स्वयं लक्ष्मीर्न मुञ्चति || ॐतत्सत् ॐतत्सत् ॐतत्सत् ।। स्तोत्रार्थ: - सम्पूर्ण सौख्य प्रदान करने वाले सत्चिदानद स्वरुप विघ्नराज गणेश को नमस्कार है | जो दुष्ट अरिष्टग्रहों का नाश करनेवाले परात्पर परमात्मा है उन गणपति को नमस्कार है | जो महापराक्रमी लम्बोदर,सर्पमय,यज्ञोपवीत से सुशोभित अर्धचंद्रधारी और सभी विघ्नो का विनाश करनेवाले है | उन गणपति की मैं वंदना करती हूं । ॐ ह्रां ह्रीं ह्रूँ ह्रैं ह्रौं ह्रः हेरम्ब को नमस्कार है | हे भगवान् आप ही सभी सभी सिद्धियों के दाता हो | आप हमारे लिये सिद्धि-बुद्धि दायक हो | आपको मोदक सदा सर्वप्रिय है | आप मन के द्व...

ram Raksha sutra

https://sanatan-dharm.com/ram-raksha-stotra-with-meaning/#:~:text=%E0%A4%B8%E0%A4%A8%E0%A5%8D%E0%A4%A8%E0%A4%A6%E0%A5%8D%E0%A4%A7%E0%A4%83%20%E0%A4%95%E0%A4%B5%E0%A4%9A%E0%A5%80%20%E0%A4%96%E0%A4%A1%E0%A5%8D%E0%A4%97%E0%A5%80%20%E0%A4%9A%E0%A4%BE%E0%A4%AA%E0%A4%AC%E0%A4%BE%E0%A4%A3%E0%A4%A7%E0%A4%B0%E0%A5%8B%20%E0%A4%AF%E0%A5%81%E0%A4%B5%E0%A4%BE,%E0%A4%B9%E0%A4%AE%E0%A4%BE%E0%A4%B0%E0%A5%87%20%E0%A4%AE%E0%A4%A8%E0%A5%8B%E0%A4%B0%E0%A4%A5%E0%A5%8B%E0%A4%82%20%E0%A4%95%E0%A5%80%20%E0%A4%B0%E0%A4%95%E0%A5%8D%E0%A4%B7%E0%A4%BE%20%E0%A4%95%E0%A4%B0%E0%A5%87%E0%A4%82%20%E0%A5%A5

(गरुड़ पुराण-१/११५/२०)

वश्यश्च पुत्रेऽर्थकरी च विद्या,अरोगिता सज्जनसङ्गतिश्च। इष्टा च भार्या वशवर्तिनी च,दुःखस्य मूलोद्धरणानि पञ्च॥ (गरुड़ पुराण-१/११५/२०) अनुकूल पुत्र,अर्थकरी विद्या,आरोग्य शरीर,सत्संगति तथा मनोनुकूल पत्नी-ये पांच पुरुष के दुःख को समूल नष्ट करने में सक्षम हैं।

dev raah baba (ram jap)

https://youtu.be/mprcBzXNypo