[27/09, 9:31 pm] Viru Singh: कतहुँ मुनिन्ह उपदेसहिं ग्याना। कतहुँ राम गुन करहिं बखाना॥ जदपि अकाम तदपि भगवाना। भगत बिरह दु:ख दुखित सुजाना॥ चिदानन्द, सुख के धाम, मोह, मद और काम से रहित शिव जी सम्पूर्ण लोकों को आनंद देने वाले भगवान श्री हरि (श्री रामचन्द्रजी) को हृदय में धारण कर (भगवान के ध्यान में मस्त हुए) पृथ्वी पर विचरने लगे॥ वे कहीं मुनियों को ज्ञान का उपदेश करते और कही श्री रामचन्द्रजी के गुणों का वर्णन करते थे। यद्यपि सुजान श्रीशिव जी निष्काम हैं, तो भी वे भगवान अपने भक्त (सती) के वियोग के दुःख से दुःखी हैं॥ [27/09, 9:34 pm] Viru Singh: ल्याणानां निधानं कलिमलमथनं पावनं पावनानां पाथेयं यन्मुमुक्षोः सपदि परपदप्राप्तये प्रस्थितस्य। विश्रामस्थानमेकं कविवरवचसां जीवनं सज्जनानां बीजं धर्मद्रुमस्य प्रभवतु भवतां भूतये रामनाम॥ [27/09, 9:34 pm] Viru Singh: कल्याणोका स्थान, कलियुगके पापोका नाशक, पवित्र आत्माओको भी पवित्र करनेवाला, परमपदको प्राप्त करनेके लिये शीघ्र उद्यम करनेवाले मुमुक्षुके लिये पाथेयरूप, श्रेष्ठ कवियोकी वाणीके एकमात्र विश्रामस्थल, सहृदय व्यक्तियोका जीवनस्वरूप, धर्मरूपी वृक्षका...