राम भक्ति में सहायक


प्रभु समरथ सर्बग्य सिव सकल कलागुन धाम।
जोग ग्यान बैराग्य निधि प्रनत कलपतरु नाम॥

भावार्थ-
हे प्रभो! आप समर्थ, सर्वज्ञ और कल्याणस्वरूप हैं। सब कलाओं और गुणों के निधान हैं और योग, ज्ञान तथा वैराग्य के भंडार हैं। आपका नाम शरणागतों के लिए कल्पवृक्ष है! 
 gist-
 Oh, Lord!  You are capable, omniscient and well-being.  All arts and qualities are rich and are the repositories of yoga, knowledge and disinterest.  Your name is Kalpavriksha(all think giver) for the refugees.
आपदामपहर्तारं दातारं सर्वसंपदाम्।
लोकाभिरामं श्रीरामं भूयो भूयो नमाम्यहम् ॥३५॥
भावार्थ-
मैं इस संसारके प्रिय एवं सुन्दर , उन भगवान् रामको बार-बार नमन करता हूं, जो सभी आपदाओंको दूर करनेवाले तथा सुख-सम्पति प्रदान करनेवाले हैं।
I salute the beloved and beautiful of this world, Lord Rama, who is the one to remove all disasters and provide prosperity.

ध्रुवँ सगलानि जपेउ हरि नाऊँ। पायउ अचल अनूपम ठाऊँ॥
सुमिरि पवनसुत पावन नामू। अपने बस करि राखे रामू॥

भावार्थ-

ध्रुव ने ग्लानि से हरि नाम को जपा और उसके प्रताप से अचल अनुपम स्थान प्राप्त किया। हनुमान ने पवित्र नाम का स्मरण करके राम को अपने वश में कर रखा है।

Dhruva chants Hari Naam with guile and gets immovable position from his majesty.  By remembering the holy name, Hanuman has kept Rama in his control.


सुर नर मुनि कोउ नाहिं जेहि न मोह माया प्रबल।

अस बिचारि मन माहिं भजिअ महामाया पतिहि।।

भावार्थ-

देवता, मनुष्य और मुनियों में ऐसा कोई नहीं है, जिसे भगवान की महान् बलवती माया मोहित न कर दे। मन में ऐसा विचारकर उस महामाया के स्वामी (प्रेरक)श्रीभगवान का भजन करना चाहिये।

There is no one among the gods, humans and sages, whom Maya, the great rebellion of God, does not fascinate.  Thinking like this in mind, the lord of that Mahamaya (motivator)One should worship Bhagavan.

प्रबिसि नगर कीजे सब काजा। हृदयँ राखि कोसलपुर राजा॥
गरल सुधा रिपु करहिं मिताई। गोपद सिंधु अनल सितलाई॥

भावार्थ:-

अयोध्यापुरी के राजा श्री रघुनाथजी को हृदय में रखे हुए नगर में प्रवेश करके सब काम कीजिए। उसके लिए विष अमृत हो जाता है, शत्रु मित्रता करने लगते हैं, समुद्र गाय के खुर के बराबर हो जाता है, अग्नि में शीतलता आ जाती है॥

Do all the work by entering the city with the heart of Ayodhyapuri King Shri Raghunathji.  For him, the poison becomes nectar, enemies begin to befriend, the sea becomes like the hoof of a cow, coldness comes in the fire.

उमा कहउँ मैं अनुभव अपना। सत हरि भजनु जगत् सब सपना॥ पुनि प्रभु गए सरोबर तीरा। पंपा नाम सुभग गंभीरा॥ 

भावार्थ

 हे उमा! मैं तुम्हें अपना अनुभव कहता हूँ- हरि का भजन ही सत्य है, यह सारा जगत् तो स्वप्न (की भाँति झूठा) है। फिर प्रभु श्री रामजी पंपा नामक सुंदर और गहरे सरोवर के तीर पर गए॥
Hey uma  Let me tell you my experience - only the hymn of Hari is true, this whole world is a dream (like a liar).  Then Prabhu went to the beautiful and deep lake named Ramji Pampa.

बंदउँ बालरूप सोइ रामू। सब सिधि सुलभ जपत जिसु नामू॥
मंगल भवन अमंगल हारी। द्रवउ सो दसरथ अजिर बिहारी॥

भावार्थ-

मैं उन्हीं राम के बाल रूप की वंदना करता हूँ, जिनका नाम जपने से सब सिद्धियाँ सहज ही प्राप्त हो जाती हैं। मंगल के धाम, अमंगल के हरनेवाले और दशरथ के आँगन में खेलने वाले (बालरूप) राम मुझ पर कृपा करें।

I worship the child form of the same Rama, whose chanting of his name can easily be achieved.  May the Lord of Dham, the destroyer of amangal and Ram (childlike) play in the courtyard of Dasaratha.

नाम  संकीर्तनं यस्य  सर्व पाप प्रणाशनम्।

प्रणामो दुःख शमनः तं नमामि हरिं परम्॥ 

अर्थ:-

मैं उन हरि को प्रणाम करता हूँ जिनका नाम संकीर्तन सभी पापों को समाप्त करता है और जिन्हें प्रणाम करने मात्र से सारे दुःखों का नाश हो जाता है। 

I salute those Hari whose name sankirtana eliminates all sins and those who destroy all sorrows just by paying obeisance. 

अजहुँ जासु उर सपनेहुँ काऊ। बसहुँ लखनु सिय रामु बटाऊ॥

राम धाम पथ पाइहि सोई। जो पथ पाव कबहु मुनि कोई॥

भावार्थ

आज भी जिसके हृदय में स्वप्न में भी कभी लक्ष्मण, सीता, राम तीनों बटोही आ बसें, तो वह भी श्री रामजी के परमधाम के उस मार्ग को पा जाएगा, जिस मार्ग को कभी कोई बिरले ही मुनि पाते हैं॥1

Even today, in whose heart Lakshman, Sita, Ram and all three travelers come to their dreams, then they too will find the path of the supreme abode of Shri Ramji, the path which is rarely found by any sage.

जय राम रूप अनूप निर्गुन सगुन गुन प्रेरक सही।
दससीस बाहु प्रचंड खंडन चंड सर मंडन मही॥
पाथोद गात सरोज मुख राजीव आयत लोचनं।
नित नौमि रामु कृपाल बाहु बिसाल भव भय मोचनं॥

भावार्थ:-

हे रामजी! आपकी जय हो। आपका रूप अनुपम है, आप निर्गुण हैं, सगुण हैं और सत्य ही गुणों के (माया के) प्रेरक हैं। दस सिर वाले रावण की प्रचण्ड भुजाओं को खंड-खंड करने के लिए प्रचण्ड बाण धारण करने वाले, पृथ्वी को सुशोभित करने वाले, जलयुक्त मेघ के समान श्याम शरीर वाले, कमल के समान मुख और (लाल) कमल के समान विशाल नेत्रों वाले, विशाल भुजाओं वाले और भव-भय से छुड़ाने वाले कृपालु श्री रामजी को मैं नित्य नमस्कार करता हूँ॥

 O Lord Rama!  Hail thee.  Your form is unique, you are nirguna, virtuous and truth is the motivator of qualities (of maya).  To sharpen the ten-headed Ravana's fierce arms, to hold a fierce arrow, to beautify the earth, to have a black body like a water cloud, to have a lotus-like face and (red) lotus-like big eyes, huge  I always greet the merciful Shri Ramji with arms and release from fear. 

मो सम दीन न दीन हित तुम्ह समान रघुबीर।
अस बिचारि रघुबंस मनि हरहु बिषम भव भीर॥

भावार्थ

हे श्री रघुवीर! मेरे समान कोई दीन नहीं है और आपके समान कोई दीनों का हित करने वाला नहीं है। ऐसा विचार कर हे रघुवंशमणि! मेरे जन्म-मरण के भयानक दुःख का हरण कर लीजिए॥

Hey Mr. Raghuveer!  There is no oppressed like me and no one like you is interested in the oppressed.  Raghuvanshmani, considering this!  Take away the terrible sorrow of my birth and death.

बार बार मागउँ कर जोरें। मनु परिहरै चरन जनि भोरें॥

सुनि बर बचन प्रेम जनु पोषे। पूरनकाम रामु परितोषे॥

अर्थ:-

मैं बार-बार हाथ जोड़कर यह माँगता हूँ कि मेरा मन भूलकर भी आपके चरणों को न छोड़े। जनक के श्रेष्ठ वचनों को सुनकर, जो मानो प्रेम से पुष्ट किए हुए थे, पूर्णेकाम राम संतुष्ट हुए।

I repeatedly ask with folded hands not to forget your mind and leave your feet.  Purnekam Rama was satisfied after listening to Janaka's best words, which were confirmed by love.

जातुधान बरूथ बल भंजन। मुनि सज्जन रंजन अघ गंजन॥
भूसुर ससि नव बृंद बलाहक। असरन सरन दीन जन गाहक॥

भावार्थ:-

आप राक्षसों की सेना के बल को तोड़ने वाले हैं। मुनियों और संतजनों को आनंद देने वाले और पापों का नाश करने वाले हैं। ब्राह्मण रूपी खेती के लिए आप नए मेघसमूह हैं और शरणहीनों को शरण देने वाले तथा दीन जनों को अपने आश्रय में ग्रहण करने वाले हैं॥

You are about to break the force of the army of demons.  The sages and saints are the pleasures and the destroyer of sins.  For the cultivation of Brahmin, you are the new cloud group and you are going to give shelter to the refugees and the poor people to your shelter.

सुनु मुनीस बर दरसन तोरें। अगमु न कछु प्रतीति मन मोरें॥

जो सुखु सुजसु लोकपति चहहीं। करत मनोरथ सकुचत अहहीं॥

अर्थ:-

हे मुनीश्वर! सुनिए, आपके सुंदर दर्शन से कुछ भी दुर्लभ नहीं है, मेरे मन में ऐसा विश्वास है। जो सुख और सुयश लोकपाल चाहते हैं; परंतु जिसका मनोरथ करते हुए सकुचाते हैं।

Hey munishvar!  Listen, nothing is rare with your beautiful vision, I believe so.  Those who want happiness and Suyesh Lokpal;  But the one who wishes to plead.


बार बार मागउँ कर जोरें। मनु परिहरै चरन जनि भोरें॥

सुनि बर बचन प्रेम जनु पोषे। पूरनकाम रामु परितोषे॥

अर्थ:-

मैं बार-बार हाथ जोड़कर यह माँगता हूँ कि मेरा मन भूलकर भी आपके चरणों को न छोड़े। जनक के श्रेष्ठ वचनों को सुनकर, जो मानो प्रेम से पुष्ट किए हुए थे, पूर्णेकाम राम संतुष्ट हुए। 

I repeatedly ask with folded hands not to forget your mind and leave your feet.  Purnekam Rama was satisfied after listening to Janaka's best words, which were confirmed by love.

श्याम तामरस दाम शरीरं।

जटा मुकुट परिधन मुनिचीरं॥

पाणि चाप शर कटि तूणीरं।

नौमि निरंतर श्रीरघुवीरं॥

भावार्थ

हे नीलकमल की माला के समान श्याम शरीरवाले! हे जटाओं का मुकुट और मुनियों के (वल्कल) वस्त्र पहने हुए, हाथों में धनुष-बाण लिए तथा कमर में तरकस कसे हुए श्री रघुवीर! मैं आपको निरंतर नमस्कार करता हूँ।॥

O black-bodied people like the rosary of Neelkamal!  O crown of jatas and wearing (Valkal) clothes of sages, holding bow and arrows in hands and tightened in waist, Shri Raghuveer!  I greet you constantly.


तात तीनि अति प्रबल खल काम क्रोध अरु लोभ।
मुनि बिग्यान धाम मन करहिं निमिष महुँ छोभ॥
लोभ कें इच्छा दंभ बल काम कें केवल नारि।
क्रोध के परुष बचन बल मुनिबर कहहिं बिचारि॥
भवार्थ:-
हे लक्ष्मण  काम क्रोध और लोभ- ये तीन अत्यंत दुष्ट हैं। ये विज्ञान के धाम मुनियों के भी मनों को पलभर में क्षुब्ध कर देते हैं॥ लोभ को इच्छा और दम्भ का बल है, काम को केवल स्त्री का बल है और क्रोध को कठोर वचनों का बाल है, श्रेष्ठ मुनि विचार कर ऐसा कहते हैं॥
O Lakshmana Kama anger and greed - these three are extremely wicked.  These ablutions of science make the minds of sages too angry in a moment.  Greed has the power of desire and strength, Kama has only the power of woman and anger has the hair of hard words, considering the best muni and saying so.

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