भगवान शिव की वंदना
Those who have black spot in the gorge, who are Kalamurti, Kalagni form and destroyer of Kaal, I bow down to Lord Shiva and salute him, what will death do to me?
औरउ एक गुपुत मत सबहि कहउँ कर जोरि। संकर भजन बिना नर भगति न पावइ मोरि॥ भावार्थ और भी एक गुप्त मत है, मैं उसे सबसे हाथ जोड़कर
कहता हूँ कि शंकरजी के भजन बिना मनुष्य मेरी भक्ति
नहीं पाता॥ There is another secret opinion,
I tell him with folded hands that
without Bhajan of Shankar ji,
man cannot attain my devotion.
अजात इत्येवं कश्चिद्भीरुः प्रपद्यते। रुद्र यत्ते दक्षिणं मुखं तेन मां पाहि नित्यम्।। (श्वेताश्वतरोपनिषद) अर्थात्
सबका संहार करनेवाले परमेश्वर ..! आप स्वयं अजन्मा हैं, अतः दूसरों को भी जन्म-मृत्यु से मुक्त कर देना आपका स्वभाव है - यह समझकर कोई जन्म-मरण के भय से डरा हुआ साधक इस संसार चक्र से छुटकारा पाने के लिए आपकी शरण लेता है। मैं भी इस संसार चक्र से छुटकारा पाने के लिए ही आपकी शरण में आया हूँ अतः जो आपका दाहिना मुख है,
अर्थात् जो आपका परम शान्त कल्याणमय स्वरूप है.
Hey Rudra ..! That is, God who destroys everyone ..! You yourself are unborn, so it is your nature to free others from birth and death - Assuming that there is a birth Fearful of fear, the seeker takes refuge in you to get rid of this world cycle. I have come to your shelter only to get rid of this world cycle. Therefore, which is your right face, that is, which is your ultimate peaceful welfare form.
सर्वदेवात्मको रुद्र सर्वे देवाः शिवात्मकाः। रुद्रात्प्रवर्तते बीजं बीजयोनिर्जनार्दनः।। यो रुद्रः स स्वयं ब्रह्मा यो ब्रह्मा स हुताशनः। ब्रह्मविष्णुमयो रुद्र अग्नीषोमात्मकं जगत्।
अर्थात - रूद्र ही ब्रह्रा, विष्णु है और सभी देवता रूद्र
अर्थात शिव का ही अंश है। सब कुछ रूद्र से ही जन्मा है।
कम शब्दों में कहा जाये तो सभी देवताओं की आत्मा रूद्र का ही अंश है और रूद्र ही स्वयंभू है।🙏
जरत सकल सुर बृंद बिषम गरल जेहिं पान किय।
तेहि न भजसि मन मंद को कृपाल संकर सरिस॥
- भावार्थ
जिस भीषण हलाहल विष से सब देवतागण जल रहे थे
उसको जिन्होंने स्वयं पान कर लिया, रे मन्द मन! तू
उन शंकर जी को क्यों नहीं भजता? उनके समान कृपालु
(और) कौन है?
All the gods, who were burning with
the horrific venom and poison, consumed
those who themselves, oh dear mind! Why
don't you worship those Shankar ji?
Who is kind (and) like
them?
एक बार गुर लीन्ह बोलाई। मोहि नीति बहु भाँति सिखाई॥
सिव सेवा कर फल सुत सोई। अबिरल भगति राम पद होई॥1॥
- भावार्थ
एक बार गुरु जी ने मुझे बुला लिया और बहुत प्रकार
से (परमार्थ) नीति की शिक्षा दी कि हे पुत्र! शिव जी की
सेवा का फल यही है कि
श्री राम जी के चरणों में प्रगाढ़ भक्ति हो॥
Once, Guruji called me and taught me
a lot of (Paramarth) policy that, O son!
The result of Shiv ji's service is that
there should be deep devotion at the feet
of Shri Ram ji.
कुन्दइन्दुदरगौरसुन्दरं अम्बिकापतिमभीष्टसिद्धिदम्। कारुणीककलकञ्जलोचनं नौमि शंकरमनंगमोचनम्॥
अर्थ:-
कुन्द के फूल, चंद्रमा और शंख के समान सुंदर गौरवर्ण,
जगज्जननी श्री पार्वतीजी के पति, वान्छित फल के देने वाले,
(दुखियों पर सदा), दया करने वाले, सुंदर कमल के
समान नेत्र वाले, कामदेव से छुड़ाने वाले (कल्याणकारी)
श्री शंकरजी को मैं नमस्कार करता हू।
Beautiful Gauravarna like Kunda
flowers, moon and conch,
Jagjajnani husband of Shri Parvatiji,
giver of desired fruit,
(everlasting on sorrows), compassionate,
beautiful lotus-like eye, redeemer from
Cupid (welfare) Shri Shankar I salute shiv
आदित्यसोमवरुणानिलसेविताय यज्ञाग्निहोत्रवरधूमनिकेतनाय।
ऋक्सामवेदमुनिभि:स्तुतिसंयुताय गोपाय गोपनमिताय नम:शिवाय॥
अर्थ:- जो सूर्य,चन्द्र,वरूण व पवनद्वारा सेवितहैंयज्ञ वअग्निहोत्र्धूममें
जिनका निवासहै ऋक-सामादि वेदमुनिजन जिनकीस्तुतिकरतेहैंउन
नन्दीश्वरपूजित गौओंका पालनकरनेवाले शिवजी को प्रणाम
करता हु।
Those served by Surya, Chandra,
Varun and Pawan are residing in the Yajna
and ignorance, whose Rites-Samaadi
Vedamunijans, who are praised by those who
follow the Nandeshwar-worshiped cows,
are Shivaji
भवानी शङ्करौ वन्दे श्रद्धा विश्वास रूपिणौ।
याभ्यां विना न पश्यन्ति सिद्धाःस्वान्तःस्थमीश्वरम्।।अर्थ:-
श्रद्धा रूपी माता भवानी और विश्वास रूपी भगवानशंकर को मै प्रणाम करता हूँ .
इन दोनों के बिना सिद्ध लोगभी अपने ह्रदय में बसे ईश्वर को नहीं देख या
समझ सकते है.
Goddess Bhavani as faith and God as faith I bow to Shankar. Sant people without these two Can not see or understand the God in his
heart
नमामीशमीशान निर्वाणरूपं। विभुं व्यापकं ब्रह्मवेदस्वरूपम्।। निजं निर्गुणं निर्विकल्पं निरीहं। चिदाकाशमाकाशवासं भजेऽहं।। अर्थ:-
हे मोक्षस्वरूप, विभु, ब्रह्म और वेदस्वरूप,
ईशान दिशा के ईश्वर व सबके स्वामी श्री शिव जी!
मैं आपको नमस्कार करता हूँ। निजस्वरूप में स्थित
(अर्थात माया आदि से रहित), गुणों से रहित, भेद रहित,
इच्छा रहित, चेतन आकाशरूप एवं आकाश को ही
वस्त्र रूप में धारण करने वाले दिगम्बर आपको भजता हूँ।
O Mokshawaroopa, Vibhu, Brahma and
Vedaswaroop, God of the northeast and
Lord Shiva! I greet you Situated in
private form (ie devoid of Maya etc.),
devoid of qualities, without distinction,
without desire, conscious celestials and
the Digambaras who wear the sky as clothes,
send them to you.
नागेन्द्रहाराय त्रिलोचनाय भस्माङ्गरागाय महेश्वराय। नित्याय शुद्धाय दिगम्बराय तस्मै नकाराय नम: शिवाय॥
अर्थ:-
शिव नागराज वासुकि का हार पहिने हुए हैं
तीन नेत्रों वाले हैं तथा भस्म की राख को सारे शरीर
में लगाये हुए हैं, इस प्रकार महान् ऐश्वर्य सम्पन्न शिव
अविनाशी तथा शुभ हैं। दिशायें जिनके लिए वस्त्रों का कार्य
करती हैं, ऐसे निरवच्छिन्न उस
नकार स्वरूप शिव को मैं नमस्कार करता हूँ।
Shiva Nagaraja is wearing a necklace of
Vasuki, having three eyes and putting
the ashes of Bhasma all over the body,
thus Shiva, who is blessed with great wealth, is indestructible and auspicious. Directions for which clothes work, such uncontaminated I salute Shiva, the negative form.
वसिष्ठकुम्भोद्भवगौतमार्य मुनीन्द्रदेवार्चितशेखराय। चन्द्रार्क वैश्वानरलोचनाय तस्मै व काराय नमःशिवाय ॥
भवार्थ:- वसिष्ठ मुनि,अगस्त्य ऋषि और गौतम ऋषि तथा इन्द्र
आदि देवताओं ने जिनके मस्तक की पूजा कीहै,
चन्द्रमा,सूर्य और अग्नि जिनके नेत्र हैं ऐसे व कारस्वरूप
शिव को नमस्कार है।
Goddess Vasistha Muni, Agastya Rishi and
Gautama Rishi and Indra, who have worshiped
their forehead, Moon, Sun and Agni,
who have eyes and such a way,
salutations to Shiva.
सुनि कपीस बहु दूत पठाए। मुनिबर सकल बोलि लै आए॥
लिंग थापि बिधिवत करि पूजा। सिव समान प्रिय मोहि न दूजा॥
- भावार्थ
राम के वचन सुनकर वानरराज सुग्रीव ने बहुत-से दूत भेजे,
जो सब श्रेष्ठ मुनियों को बुलाकर ले आए। शिवलिंग की स्थापना
करके विधिपूर्वक उसका पूजन किया। (फिर भगवान बोले -)
शिव के समान मुझको दूसरा कोई प्रिय नहीं है।
Hearing Rama's words, Vanararaj Sugriva
sent many messengers, who called all the
best sages and brought them. Established
Shivling and worshiped it methodically.
(Then God said -)
I have no love like Shiva.

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