नीति
अर्थनाशं मनस्तापं गृहे दुच्शरितानि च।
वच्चनं चापमानं च मतिमान् न प्रकाशयेत्।।
अर्थात :- एक बुद्धिमान व्यक्ति कभी भी धन की हानि, दुःख के समय, गृह क्लेश, धोखाधड़ी और अपमान के संबंध में बाते नहीं करते है।
That is to say, - A wise person never talks about loss of money, in times of sorrow, in relation to home grief, fraud and humiliation.
सन्तापाद् भ्रश्यते रुपं
सन्तापाद् भ्रश्यते बलम्।
सन्तापाद् भ्रश्यते ज्ञानं
सन्तापाद् व्याधिमृच्छत।
शोक करने से रूप-सौंदर्य नष्ट होता है
शोक से पौरुष नष्ट होता है ज्ञान नष्ट होता है
शोक से मनुष्य का शरीर दुःखो का घर हो जाता है,
अतः शोक करना त्याज्य है।
Manhood is destroyed by grief, knowledge is destroyed
Due to grief, the human body becomes a house of sorrows,
So mourning is worthless.
उत्सवे व्यसने चैव दुर्भिक्षे राष्ट्रविप्लवे।
राजद्वारे श्मशाने च चतिष्ठति स वान्धवः ।।
अर्थात:- सच्चा मित्र वही है जो प्रत्येक समय, सभी विपतियों में, सूखे में, दंगों में, युद्ध में, राजा के दरबार में और मृत्यु के बाद भी आपके साथ रहे अर्थात सदैव आपके और आपके परिवार का साथ दे।
A true friend is one who is with you at all times, in all disasters, in droughts, in riots, in war, in the king's court and even after death, that is, always support you and your family.
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| महात्मा विदुर फोटो |
परोक्षे कार्यहन्तारं प्रतक्षे प्रियवादिनम्।
वर्जयेत्तादृशं मित्रं विषकुम्भं पयोमुखम्।।
अर्थात:-
ऐसा मित्र जो आपके सामने तो मीठा बोलते है और आपके पीठ पीछे हानि पहुँचता है। ऐसे मित्र को उस पात्र के समान छोड़ देना चाहिए जिसमे नीचे कि ओर तो ज़हर भरा हो और ऊपर की तरफ दूध भरा हो।
A friend who speaks sweetly in front of you and ends up behind you. Such a friend should be left as a vessel that has poison on the bottom and milk on the top.
रमते तृषितो धनश्रिया रमते कामसुखेन बालिश:।
रमते प्रशमेन सज्जन: परिभोगान्परिभूय विद्यया॥
अर्थात:-
तृष्णावान व्यक्ति को धन सम्पत्ति में और मूर्ख को काम सुख में आनन्द मिलता है, किन्तु जो सज्जन है वह ज्ञान द्वारा भोगो को जीतकर शान्ति में रमण करता है।
A person who enjoys happiness in wealth and a fool enjoys pleasure in work, but a gentleman who conquers the pleasures by knowledge and delights in peace.
वाल्मिकी रामायण-
यदि शत्रु भी शरणमें आये और दीनभावसे हाथ जोड़कर दयाकी याचना करे तो उसपर प्रहार नहीं करना चाहिये।
If the enemy also comes to the shelter and pleads for mercy with folded hands, then he should not be attacked.
शत्रु दु:खी हो या अभिमानी, यदि वह अपने विपक्षीकी शरण में जाय तो शुद्ध हृदयवाले श्रेष्ठ पुरुषको अपने प्राणोंका मोह छोड़कर उसकी रक्षा करनी चाहिये।
If the enemy is sad or arrogant, if he goes to the shelter of his opposition, the best man with pure heart should give up his life and protect it.
यस्य नास्ति स्वयं प्रज्ञा, शास्त्रं तस्य करोति किं।
लोचनाभ्याम विहीनस्य, दर्पण:किं करिष्यति।।
अर्थ - जिस व्यक्ति के पास स्वयं का विवेक नहीं है। शास्त्र उसका क्या करेगा? जैसे नेत्रहीन व्यक्ति के लिए दर्पण व्यर्थ है।
A person who does not have his own conscience. What will the scripture do for him? Just like a mirror is meaningless to a blind person.
अपि मेरुसमं प्राज्ञमपि शुरमपि स्थिरम्।
तृणीकरोति तृष्णैका निमेषेण नरोत्तमम्।।
अर्थ - भले ही कोई व्यक्ति मेरु पर्वत की तरह स्थिर, चतुर, बहादुर दिमाग का हो, लालच उसे पल भर में घास की तरह खत्म कर सकता है।
Even if a person is of a stable, clever, brave mind like Mount Meru, greed can eliminate him like grass in a moment.
दुर्जन:स्वस्वभावेन परकार्ये विनश्यति।
नोदर तृप्तिमायाती मूषक:वस्त्रभक्षक:।।
अर्थ - दुष्ट व्यक्ति का स्वभाव ही दूसरे के कार्य बिगाड़ने का होता है। वस्त्रों को काटने वाला चूहा पेट भरने के लिए कपड़े नहीं कटता।
It is the nature of a wicked person to spoil the actions of another. The rat that cuts the clothes does not cut the clothes to fill the stomach.
अग्निना सिच्यमानोऽपि वृक्षो वृद्धिं न चाप्नुयात्।
तथा सत्यं विना धर्मः पुष्टिं नायाति कर्हिचित्।।
अर्थ — आग से सींचे गए पेड़ कभी बड़े नहीं होते। उसी प्रकार सत्य के बिना धर्म की स्थापना संभव नहीं है।
Trees that are watered by fire are never big. Similarly, the establishment of religion is not possible without truth.
न विना परवादेन रमते दुर्जनोजन:।
काक:सर्वरसान भुक्ते विनामध्यम न तृप्यति।।
अर्थ - लोगों की निंदा किये बिना दुष्ट व्यक्तियों को आनंद नहीं आता। जैसे कौवा सब रसों का भोग करता है। परंतु गंदगी के बिना उसकी तृप्ति नहीं होती।
Evil persons do not enjoy without condemning people. Just like a crow enjoys all the juices. But without dirt, it is not satisfied.
*आचारः कुलमाख्याति*
*देशमाख्याति भाषणम्l*
*सम्भ्रमः स्नेहमाख्याति*
*वपुराख्याति भोजनम्ll*
अर्थात - आचरण से व्यक्ति के कुल का परिचय मिलता है। बोली से देश का पता लगता है। आदर-सत्कार से प्रेम का तथा शरीर को देखकर व्यक्ति के भोजन का पता चलता है।
The person's clan is revealed by conduct. The country finds out from the dialect. Respect shows the love and food of a person by looking at the body.
न्यायार्जितस्य द्रव्यस्य
बोद्धव्यौ द्वावति क्रमौ।
अपात्रे प्रतिपत्तिश्च
पात्रे चाप्रतिपादनम्॥
न्याय और परिश्रम से अर्जित किये गये धन के दो दुरुपयोग कहे गए हैं- पहला "कुपात्र" को दान देना और दूसरा "सुपात्र" को आवश्यकता पड़ने पर भी दान न देना l
There have been two misuses of money earned through justice and hard work - first donating to "Kupatra" and secondly, "Donating" to Supatra even when needed.
मनसा चिन्तितं कार्यं वाचा नैव प्रकाशयेत्।
मन्त्रेण रक्षयेद् गूढं कार्य चापि नियोजयेत्॥
अर्थ:-
मन में सोचे हुए कार्य को किसी के सामने प्रकट न करें,मनन पूर्वक उसकी सुरक्षा करते हुए उसे कार्य में परिणत कर दें।
Do not reveal the thought in your mind to anyone, protect it carefully and transform it into work.
दरिद्रता धीरयता विराजते कुवस्त्रता स्वच्छतया विराजते।कदन्नता चोष्णतया विराजते कुरूपता शीलतया विराजते॥
भावार्थ
धीरज से निर्धनता और साफ रहने पर मामूली वस्त्र भी अच्छे लगते हैं,गर्म किये जाने पर बासी भोजन भी सुन्दर जान परता है और शील - स्वभाव से कुरूपता भी सुन्दर लगती है।श्रीराम
Poorness and cleanness with endurance make even modest clothes look good, stale food also turns out beautiful when heated and ugliness also looks beautiful with modesty.
क्रोधो हर्षश्च दर्पश्च ह्रीः स्तम्भो मान्यमानिता।
यमर्थान् नापकर्षन्ति स वै पण्डित उच्यते ॥
अर्थ
जो व्यक्ति क्रोध,अहंकार,दुष्कर्म,अति-उत्साह,स्वार्थ,उद्दंडता इत्यादि दुर्गुणों की और आकर्षित नहीं होते,वे ही सच्चे ज्ञानी हैं ।
Those people who are not attracted to the ravages of arrogance, arrogance, misdeeds, over-zeal, selfishness, arrogance, etc., are the true knowledgeers.
परस्य पीडया लब्धं,धर्मस्योल्लंघनेन च ।
आत्मावमानसंप्राप्तं,न धनं तत् सुखाय वै ।।
अर्थ:-
दूसरों को दु:ख देकर ,धर्म का उल्लंघन करके अथवा तो स्वयं का अपमान सहन करके प्राप्त हुए धन से, मनुष्य को कभी सुख प्राप्त नहीं होता।
Man never gets happiness by giving others sorrow, by violating religion or by the wealth received by tolerating insult to himself.
यस्य नास्ति स्वयं प्रज्ञा,शास्त्रं तस्य करोति किं।
लोचनाभ्याम विहीनस्य, दर्पण:किं करिष्यति।।
अर्थ - जिस व्यक्ति के पास स्वयं का विवेक नहीं है शास्त्र उसका क्या करेगा? जैसे नेत्रहीन व्यक्ति के लिए दर्पण व्यर्थ है,
What will the scripture do for a person who does not have his own conscience? Like a mirror is meaningless to the blind person.
गुणैरुत्तमतां याति नोच्चैरासनसंस्थितः।
प्रासादशिखरस्थोऽपि काकः किं गरुडायते॥
अर्थ:-
उत्तमता गुणों से आती है, न कि ऊँचे स्थान से।
कौआ महल के शिखर पर बैठकर गरुड नहीं बन जाता।
Excellence comes from qualities, not from a high place. The crow does not become an eagle, sitting on the summit of the palace.
पन्चाग्न्यो मनुष्येण परिचर्या: प्रयत्नत:।
पिता माताग्निरात्मा च गुरुश्च भरतर्षभ॥
अर्थ:-
माता,पिता,अग्नि,आत्मा और गुरु इन्हें पंचाग्नी कहा गया है। मनुष्य को इन पाँच प्रकार की अग्नि की सजगता से सेवा-सुश्रुषा करनी चाहिए।
Mother, father, fire, soul and guru are called Panchagni. A man should serve with the awareness of these five types of fire.
न विना परवादेन रमते दुर्जनोजन:।
काक:सर्वरसान भुक्ते विनामध्यम न तृप्यति।।
अर्थ - लोगों की निंदा किये बिना दुष्ट व्यक्तियों को आनंद नहीं आता। जैसे कौवा सब रसों का भोग करता है। परंतु गंदगी के बिना उसकी तृप्ति नहीं होती।
Evil persons do not enjoy without condemning people. Just like a crow enjoys all the juices. But without dirt, it is not satisfied.
महाजनस्य संसर्गः कस्य नोन्नतिकारकः।
पद्मपत्रस्थितं तोयं धत्ते मुक्ताफलश्रियम् ॥
भवार्थ:-
महापुरुषों का सामीप्य भला किसके लिये लाभदायक नहीं होता, कहा गया है कि कमल के पत्ते पर पड़ी हुई पानी की बूँद भी मोती जैसी ही शोभा प्राप्त कर लेती है।
For whom is it good for great men, for whom it is not beneficial, it has been said that even a drop of water lying on a lotus leaf attains the same beauty as a pearl.
शान्तिपर्व महाभारत-
जो मनुष्य बीते हुए मानसिक अथवा शारीरिक
दुःखके लिये बारंबार शोक करता है, वह एक दुःखसे दूसरे दुःखको प्राप्त होता है। उसे दो-दो अनर्थ भोगने पड़ते हैं।
अर्थ:-
A person who grieves again and again for past mental or physical grief, gets from one grief to another. He has to suffer two or two sins.
मनुष्य को भी दो प्रकार की व्याधियां होती है। एक शारीरिक और दूसरी मानसिक। इन दोनों की उत्पत्ति एक दूसरे के आश्रित है। एक के बिना दूसरी का होना संभव नहीं है। कभी शारीरिक व्याधि से मानसिक व्याधि होती है, और कभी मानसिक व्याधि से शारीरिक व्याधि।
अर्थ:-
Human beings also have two types of diseases. One is physical and the other is mental. The origin of these two is dependent on each other. It is not possible to have one without the other. Sometimes there is a mental illness from a physical disease, and sometimes a mental illness from a physical disease.
बहुत से मनुष्य केवल स्वाध्याय यज्ञ करके सिद्धि को प्राप्त हुए देखे जाते हैं। तपस्या में लगे हुए बहुतेरे मुनि ऐसे हो गए हैं जिन्हें सनातन लोकों की प्राप्ति हुई है।
अज, पृश्नि, सिकत, अरुण और केतु नामवाले ऋषिगणोने तो स्वाध्याय के द्वारा ही स्वर्ग प्राप्त कर लिया था।
Many humans are seen to have attained Siddhi only by performing self-sacrificial sacrifices. Many sages engaged in penance have become such that they have attained the eternal realms.
The sages named Aj, Prishni, Sikat, Arun and Ketu had attained heaven only through self-study.
संसार में जो अत्यंत मूर्ख हैं, अथवा जो बुद्धि से परे पहुँच गए हैं वे ही सुखी होते हैं। बीच वाले कष्ट ही उठाते हैं।
भवार्थ:-
Only those who are extremely foolish in the world, or who have reached beyond the intellect, are happy. Only the middle people suffer.
प्राप्त किये हुए धन का दान करना ही उचित बताया गया है। उसे भोग में लगाना या संग्रह करके रखना ठीक नहीं है।
भवार्थ:-
It is said to be appropriate to donate the money received. It is not right to put it in the enjoyment or store it.
अपने धर्म को त्याग देना और दूसरेके आचरण करना , यज्ञके अनधिकारी को यज्ञ कराना तथा अभक्ष्य भक्षण करना , शरणागतका त्याग करना और भरण करने योग्य व्यक्तियोंका भरण - पोषण न करना, पशु - पक्षियोंको मारना और शक्ति
रहते हुए भी अग्न्याधान आदि कर्मोको न करना ,ये सब कर्म। अकार्य बताए गए हैं।
अर्थ:-
Abandon your religion and conduct others, perform the yagna to the officer of the yajna, and perform devotional devotions, renounce shelter and non-maintenance of sustenance, kill animals and birds and power. Do not perform rituals, etc., even while you are living, all these actions are said to be non-action.
वनेऽपि सिंहा मॄगमांसभक्षिणो बुभुक्षिता नैव तॄणं चरन्ति ।
एवं कुलीना व्यसनाभिभूता न नीचकर्माणि समाचरन्ति ॥
अर्थ:-
जंगल मे मांस खानेवाले शेर भूख लगने पर भी जिस तरह घास नही खाते, उस तरह उच्च कुल मे जन्मे हुए व्यक्ति (सुसंस्कारित व्यक्ति) संकट काल मे भी नीच काम नही करते ।
The way the lion eating meat in the forest does not eat grass even when it is hungry, similarly the high-born person (well-respected person) does not work lowly even during the crisis.
यदि आरम्भ किया हुआ कार्य पूरा न हो सके अथवा उसमें बाधा पड़ जाय तो इसके लिये तुम्हें अपने मनमें दु:ख नहीं मानना चाहिये । तुम सदा अपने आपको पुरुषार्थ में ही लगाये रखो । यही राजाओंकी सर्वोत्तम नीति है ।-भीष्म
भवार्थ-
If the work started cannot be completed or there is an obstacle, then you should not feel sorrow in your mind for this. You should always keep yourself engaged in effort. This is the best policy of kings. - Bhishma
सर्वं परवशं दुःखं सर्वमात्मवशं सुखम्।
एतद् विद्यात् समासेन लक्षणं सुखदुःखयोः॥.
अर्थ:-
जो सब अन्यों के वश में होता है, वह दुःख है। जो सब अपने वश में होता है, वह सुख है। यही संक्षेप में सुख एवं दुःख का लक्षण है।
All that is under the control of others is sorrow. Everything that is under your control is happiness. This is in essence a symptom of happiness and sorrow.
नात्यन्तं सरलेन भाव्यं गत्वा पश्य वनस्थलीम्। छिद्यन्ते सरलास्तत्र कुब्जास्तिष्ठन्ति पादपाः॥
भवार्थ:-
कभी भी सीधे होने की कोशिश न करें। जंगलों में, पहले सीधे पेड़ काटे जाते हैं, लेकिन मुड़ते ही रहते हैं। इसी तरह सीधे लोगों पर सबसे पहले शिकंजा कसा जाता है और कुटिल दुनिया पर कब्जा कर लेता है।
Never try to be too straight. In forests, straight trees are cut first but twisted ones remain. Similarly straight people are screwed first & the crooked take over the world.
आत्मनो मुखदोषेण बध्यन्ते शुकसारिकाः।
बकास्तत्र न बध्यन्ते मौनं सर्वार्थसाधनम् ॥
अर्थ:-
तोता और मैना अपनी मधुर आवाज की वजह से (पिंजरे में) बंध जाते हैं, पर बगुला ऐसे बंधता नहीं (क्यों कि वह बोलता नहीं)। मौन ही सर्व अर्थ सिद्ध करने का साधन है।
Parrot and Maina are tied (in the cage) due to their sweet voice, but the heron does not bind like that (because he does not speak). Silence is the means to prove all meaning.
स्त्रीषु राजसु सर्पेषु स्वाध्यायप्रभुशत्रुषु।
भोगेष्वायुषि विश्वासं कः प्राज्ञः कर्तुर्महति ॥
भावार्थ :- बुद्धिमान लोगों को चाहिए कि वे स्त्री,राजा,सर्प,शत्रु, भोग,धातु तथा लिखी बात पर आँख मूँदकर भरोसा न करें।
Wise people should not blindly trust women, kings, snakes, enemies, indulgence, metal and written things.
#विदुर_नीति
उत्थायोत्थाय बोद्धव्यं किमद्य सुकृतं कृतम् ।
आयुषः खण्डमादाय रविरस्तं गमिष्यति ॥
अर्थात-:
रोज उठकर “आज क्या सुकृत्य किया” यह जान लेना चाहिए, क्यों कि सूर्य (हररोज) आयु का छोटा तुकडा लेकर अस्त होता है।
Everyday, you should know "what is done today," because the sun (hero) sets with a little rhyme of age.
अर्जयित्वाखिलान् अर्थान्भोगानाप्नोति पुष्कलान्।
न हि सर्वपरित्याजम-न्तरेण सुखी भवेत्॥
जगत के सभी पदार्थों को प्राप्त करके कोई बहुत से भोग प्राप्त कर सकता है पर उन सबका आतंरिक त्याग किये बिना सुखी नहीं हो सकता ॥
By obtaining all the substances of the world, one can get many enjoyments, but without sacrificing all of them internally, one cannot be happy.
यस्य पुत्रो वशीभूतो भार्या छन्दानुगामिनी।
विभवे यस्य सन्तुष्टिस्तस्य स्वर्ग इहैव हि ॥
अर्थ:- जिसका पुत्र वशीभूत हो,पत्नी वेदों के मार्ग पर चलने वाली हो और जो वैभव से सन्तुष्ट हो,उसके लिए यहीं स्वर्ग है।
For those whose son is subjugated, the wife is on the path of the Vedas and who is satisfied with the glory, this is the heaven for her.
#चाणक्य_नीति
सन्तोषामृततृप्तानां यत्सुखं शान्तिरेव च।
न च तद्धनलुब्धानामितश्चेतश्च धावाताम्॥
भावार्थ:-
सन्तोष के अमृत से तृप्त व्यक्तियों को जो सुख और शान्ति मिलता है, वह सुख- शान्ति धन के पीछे इधर-उधर भागनेवालों को नहीं मिलती ।
कर्ता कारयिता चैव प्रेरकश्चानुमोदकः।
सुकृते दुष्कृते चैव चत्वारस्समभागिनः॥
जो पुण्य या पाप कर्म को १.करता है, २.करवाता है, ३.करने को प्रेरित करता है,
४.साथ रहकर आनन्दित होता है- यह चार(४)उस (कार्य) में समान फल प्राप्त करते हैं।
One who 1. does virtuous or sinful action, 2. makes it happen, 3. inspires to do,
4. Rejoices by staying together - these four (4) get the same results in that (work).
परोपकारशून्यस्य धिक् मनुष्यस्य जीवितम् ।
जीवन्तु पशवो येषां चर्माप्युपकरिष्यति ॥
भवार्थ:-
( परोपकार रहित मानव के जीवन को धिक्कार है । वे पशु धन्य है, मरने के बाद जिनका चमडा भी उपयोग में आता है ।)
अमन्त्रमक्षरं नास्ति नास्ति मूलमनौषधम्
अयोग्यः पुरुषो नास्ति योजकस्तत्र दुर्लभः
भवार्थ:-
ऐसा कोई अक्षर नहीं जिसमें मन्त्रशक्ति ना हो
ऐसा कोई पौधा नहीं जिसमे औषधि गुण ना हो
ऐसा कोई भी व्यक्ति नहीं जिसमे कोई भी गुण ना हो
दुर्लभ हैं वह जो हर व्यक्ति में गुण देख कर उन्हें संघठित कर सके.।
बलवानप्यशक्तोऽसौ धनवानपि निर्धनः|
श्रुतवानपि मूर्खोऽसौ यो धर्मविमुखो जनः||
अर्थ:-
जो व्यक्ति अपने धर्म व देश के प्रति कर्तव्य से विमुख होता है, वह व्यक्ति बलवान् हो कर भी असमर्थ, धनवान् होकर भी निर्धन तथा ज्ञानी हो कर भी मूर्ख होता है।
यः पठति लिखति पश्यति परिपृच्छति पण्डितान् उपाश्रयति।
तस्य दिवाकरकिरणैः नलिनी दलमिव विस्तारिता बुद्धिः॥
जो पढ़ता है, लिखता है, देखता है, प्रश्न पूछता है, बुद्धिमानों का आश्रय लेता है, उसकी प्रज्ञा उसी प्रकार वर्धित होती है यथा सूर्य किरणों से कमल की पङ्खुड़ियाँ।
One who reads, writes, sees, asks questions, takes shelter of the wise, his wisdom is enhanced in the same way as the lotus petals by the rays of the sun.
श्रुताभिलषिता पीता स्पृष्टा दृष्टावगाहिता।
गङ्गा तारयते नृणामुभौ वंशौ विशेषतः॥
जो पुरुष गंगाजीका माहात्म्य सुनता, उनके तटपर
जानेकी अभिलाषा रखता, उनका दर्शन करता, जल पीता, स्पर्श करता तथा उनके भीतर गोते लगाता है, उसके दोनों कुलोंका भगवती गंगा विशेषरूपसे उद्धार कर देती हैं।
#Sanskrit #Chanakya
दुर्जनस्यच सर्पस्यवसपनदुर्जनः। सर्वोदेशतिकाले तुदुर्जनस्तुपदेपदे॥
दुर्जन और सर्प, इनमें सर्प दुर्जन से अच्छा ही है, इस कारण कि सांप काल आने पर काटता है और दुर्जन पद पद में।
~ चाणक्य नीति
*यत्र स्त्री यत्र कितवो*
*बालो यत्रानुशासिता।*
*मज्जन्ति तेऽवशा राजन्*
*नद्यामश्मप्लवा इव।
अर्थ:-
- राजन्! जहाँ का शासन
मूर्ख स्त्री,जुआरी और बालक के हाथ में होता है,
वहाँ के लोग नदी में पत्थर की नाव पर बैठने वालों की भाँति विवश होकर विपत्ति के समुद्र में डूब जाते हैं।
*।। स्वभावः।।*
*उपकर्तुं प्रियं वक्तुं*
*कर्तुं स्नेहमकृत्रिमम्।*
*सुजनानां स्वभावोऽयं*
*केनेन्दुः शिशिरी कृतः॥*
उपकार करना,प्रिय बोलना औरअकृत्रिम स्नेह करना ये तीन सज्जनों के स्वभाव के प्रमुख लक्षण हैं।चन्द्रमा को किस ने शीतल बनाया हैं ? वह तो उस का स्वभाव ही हैं।
बुद्धिर्यस्य बलं तस्य निर्बुद्धेस्तु कुतो बलम्।
वने सिंहो मदोन्मत्त: शशकेन निपातित: ।।
- चाणक्य नीति
जिसके पास बुद्धि है, उसके पास बल भी होता है, बुद्धिहीन व्यक्ति के पास शक्ति नहीं होती। जिस प्रकार जंगल में अपनी शक्ति के मद में मस्त सिंह को एक खरगोश ने मार डाला था।
दुर्जनेन समं सख्यं प्रीतिं चापि न कारयेत् |
उष्णो दहति चांगार: शीत: कृष्णायते करम् ||
भावार्थ - दुर्जनों की संगति कभी नहीं करनी चाहिए | उनका प्रेम कोयले के समान होता है | कोयला यदि गरम हो तो जला देता है और ठंडा होने पर अंग को काला कर देता है |
Meaning - One should never associate with the wicked. Their love is like coal. If the coal is hot, it burns and when it cools, it darkens the body.
आत्मनाऽत्मानमन्विच्छन्-
मनोबुद्धीन्द्रियैर्यतैः।
आत्मा ह्येवात्मनो बन्धु:
आत्मैव रिपुरात्मनः॥
अर्थात -
मन-बुद्धि तथा इंद्रियों को आत्म-नियंत्रित करके स्वयं ही अपने आत्मा को जानने का प्रयत्न करना चाहिए,
क्योंकि आत्मा ही हमारा हितैषी और आत्मा ही हमारा शत्रु है।
*षडेव तु गुणा: पुंसा*
*न हातव्याः कदाचन।*
*सत्यं दानमनालस्यम्*
*अनसूया क्षमा धृतिः॥*
अर्थात - व्यक्ति को कभी भी सच्चाई, दानशीलता, निरालस्य, द्वेषहीनता, क्षमाशीलता और धैर्य - इन छह गुणों का त्याग नहीं करना चाहिए।
That is, one should never give up these six qualities of truthfulness, charity, indifference, hatred, forgiveness and patience.
*दुराचारो हि पुरुषो*
*लोके भवति निन्दितः।*
*दुःखभागी च सततं*
*व्याधितोऽल्पायुरेव च।।*
अर्थात - दुष्ट आचरण करने वाला मनुष्य लोक में निन्दित होता है। वह निरन्तर दुःख भोगने वाला, रोगी और अल्पायु भी होता है।
That is, a person who does evil conduct is condemned in the world. He is a constant sufferer, sick and also short-lived.
सत्याज्जायते , दयया दानेन च वर्धते |
क्षमायां तिष्ठति , क्रोधान्नश्यति ||
धर्मकी उत्पत्ति सत्यसे होती है, दया और दानसे वह बढ़ता है, क्षमामें वह निवास करता है और क्रोधसे उसका नाश होता है।
Dharma originates from truth, it grows by kindness and charity, it abides in forgiveness and it perishes by anger.
सन्मार्गेण गन्तव्यं लक्ष्यं भवतु दूरंगम्।
स्वे कुटुम्बे सदा स्थेयं वैरं भवतु यादृशम्।।
भावार्थ:-*
लक्ष्य भले ही दूर हो, परन्तु सन्मार्ग से ही जाना चाहिए और अपनों से कैसा भी वैर हो परन्तु अपने कुटुम्ब में ही रहना चाहिय।
The goal may be far away, but one should go through the right path and no matter how much enmity is with one's loved ones, one should stay in his family.
अदृढं च हतं ज्ञानं, प्रमादेन हतं श्रुतम्।
संदिग्धो हि हतो मंत्रो, व्यग्रचित्तो हतो जपः।।
अस्थिर ज्ञान मृत्यु के समान कष्ट देता है
आलस्य करके श्रवण की हुई बातें मृत्यु समान है।
अविश्वासयुक्त मन्त्र भी मृत्यु का कारण बनता है
व्यग्रचित्त से किया गया कार्यभी मृत्यु का कारणही बनता है
Unstable knowledge hurts like death
The words heard by laziness are like death.
Unbelieving mantra also causes death
Desperate work also causes
धनं सुखं च संसारे लभ्यते मानवेन हि l
न शान्ति: सुखवित्ताभ्यां सा तु स्वस्मिन् स्थिता सदा ।
भावार्थ:-
निश्चय ही संसार में मनुष्य को धन और सुख प्राप्त होता है, किन्तु उस सुख और धन द्वारा शान्ति प्राप्त नहीं हो सकती,क्योंकि वह शांति तो सदा अपने अंदर ही विद्यमान होती है।
Certainly, man gets wealth and happiness in the world, but peace cannot be attained by that happiness and wealth, because that peace always exists within himself.
व्यतीतः समयो लोके तिष्ठति कथनं सदा।
कस्मै कदापि कुत्रापि कटुवचांसि मा वद।।
अर्थात:-
समय बीत जाता है
और कहे हुए वचन वैसे ही रह जाते हैं।
इसलिए किसी को भी कभी भी और
कैसे भी कड़वे वचन नहीं बोलने चाहिएँ।
Time passes and the words spoken remain the same.
so anyone ever No matter how bitter words should be spoken.
उदारस्य तृणं वित्तं
शूरस्य मरणं तृणम्।
विरक्तस्य तृणं भार्या
निस्पृहस्य तृणं जगत्॥
उदार मनुष्य के लिए धन तृण के समान होता है
शूरवीर के लिए मृत्यु तृण के समान होता है
विरक्त के लिए भार्या तृण के समान होती है
निस्पृह-कामनारहित मनुष्य के लिए यह जगत् तृण के समान होता है।
Wealth is like grass to a generous man
For a warrior, death is like a straw
Weight is like a straw for the sick
For a person without a desireless desire, this world is like a straw.
संगत का असर
पश्य सत्संगमाहात्म्यं स्पर्शपाषाणयोदतः ।
लोहं च जायते स्वर्णं योगात् काचो मणीयते ॥
सत्संग का महत्व देखो, पाषाण के स्पर्श से लोहा सोना बनता है और सोनेके योग से काच मणी बनता है ।
Look at the importance of satsang, iron becomes gold by the touch of stone and glass gem is formed by the addition of gold.
लभेत् सिकतासु तैलमपि यत्नतः पीडयन्
पिबेच्चमृगतृष्णिकासु सलिलं पिपासार्दितः।
कदाचिदपि पर्यटञ्छशविषाणमासादयेत्
न तु प्रतिनिविष्टमूर्खजनचित्तमाराधयेत्॥
👆👆👆
अर्थ:- कठिन प्रयास करने से संभव है कि कोई बालू से भी तेल निकाल ले,जलहीन मरुस्थलीय क्षेत्र मे दृश्यमान मृगमरीचिका मे भी उसके लिए जल पाकर प्यास बुझाना मुमकिन हो जाए,और घूमते हुए खरगोश के सिर पर सींग भी मिल जाए,परंतु दुराग्रह-ग्रस्त मूर्ख को संतुष्ट कर पाना कदापि संभव नहीं है
The
Meaning:- By hard effort it is possible that one can extract oil from sand also, it is possible for him to quench his thirst by getting water even in a visible deer in a waterless desert area, and also get a horn on the head of a roaming rabbit, but indifference - It is never possible to satisfy a sick fool
*अष्टौ गुणा: पुरुषं दीपयन्ति*
*प्रज्ञासुशीलत्वदमौ श्रुतं च।* *पराक्रमश्चाबहुभाषिता च*
*दानं यथाशक्ति कृतज्ञता च॥*
अर्थात - आठ गुण पुरुष को सुशोभित करते हैं -
बुद्धि,
सुन्दर चरित्र,
आत्म-नियंत्रण,
शास्त्र-अध्ययन,
साहस,
मितभाषिता,
यथाशक्ति दान और कृतज्ञता।
काष्ठपाषाण धातुनां कृत्वा भावेन सेवनम्।
श्रद्धया च तथा सिद्धिस्तस्य विष्णोःप्रसादतः
~काष्ट,पाषण या धातुकी मूर्तियाें कीभी भावना और श्रद्धासे उपासना करनेपर भगवानकी कृपासे सिद्धि मिलजाती है।ईश्वर न काष्ट में हैं,न मिट्टीमें,न मूर्ति में।वह केवल भावनामें रहता है।अतःभावनाही मुख्य है!
~ Worshiping even the idols of wood, stone or metal with spirit and reverence, one gets accomplishment by the grace of God. God is neither in the wood, nor in the soil, nor in the idol. He lives only in the feeling. So the feeling is the main
🔴दुनियां में लक्ष्मी, विद्या, प्रतिष्ठा, बल, पद, मैत्री, कीर्ति, ऐश्वर्य आदि को बड़ा फल माना जाता है, यह सब ज्ञान-रूपी वृक्ष के फल है, तृष्णा, चिंता, लोलुपता, कामुकता, उद्वेग, क्रोध, निराशा सरीखी भयंकर मानसिक अशांति ही जीवन को नारकीय बनाये रहती है तीनों लोकों की संपदा मिलने पर भी उपरोक्त अग्नियां बुझ नहीं सकती, उन्हें बुझाने वाला एकमात्र पदार्थ ज्ञान ही है, सांसारिक शांति की कुंजी ज्ञान ही है।
-आचार्य श्रीराम शर्मा
षड् दोषा: पुरुषेणेह हातव्या भूतिमिच्छता ।
निद्रा तन्द्रा भयं क्रोध आलस्यं दीर्घसूत्रता ।।
ऐश्वर्य या उन्नति चाहने वाले पुरुषों को निद्रा तन्द्रा डर क्रोध आलस्य तथा दीर्घसूत्रता ( जल्दी हो जाने वाले कार्यों में अधिक देर लगाने की आदत) इन छ: दुर्गुणों को त्याग देना चाहिए ।
Men who seek opulence or progress should give up these six vices, sleepiness, fear, anger, laziness and procrastination (the habit of delaying tasks that are done quickly).
तेजस्विनि क्षमोपेते नातिकार्कश्यमाचरेत्।
अतिनिर्मथनाद्वह्निश्चन्दनादपि जायते॥
अर्थात
तेजस्वी और क्षमाशील व्यक्ति से कभी भी
अतिकठोर आचरण नहीं करना चाहियें।
अति घर्षण से चन्दन की लकडी में भी
अग्नि उत्पन्न होती हैं।
श्रद्धया तपसा यत्नैरभ्यासेन च सेवया।*
स्वाध्यायेन च संगेन विद्यावान् भाति ना सदा।*
भावार्थ:-
श्रद्धा से,तप से,प्रयत्न से,बार बार अभ्यास से,सेवा से,स्वाध्याय से और सत्संग से सदा विद्यावान् मनुष्य की शोभा होती है।
By faith, by penance, by effort, by repeated practice, by service, by self-study and by satsang, one always beautifies a learned man.
यदि ईश्वर का पुत्र केवल शारीरिक सुखों का लिए जीवन धारण किए रहेगा, तो इस संसार में धर्म का राज्य कभी उदय न होगा, यदि अपने लिए ही जिया गया, तो मनुष्य पशुओं की अपेक्षा श्रेष्ठ कैसे बना रहेगा?
-आचार्य श्रीराम शर्मा
"राजा राष्ट्रकृतं पापं, राज्ञ: पापं पुरोहितः।
भर्ता च स्त्रीकृतं पापं, शिष्यपापं गुरुस्तथा।।"
(अर्थात):- "राष्ट्र द्वारा किए गए पाप को राजा, राजा द्वारा किए गए पाप को पुरोहित, स्त्री द्वारा किए गए पाप को पति तथा शिष्य द्वारा किए गए पाप को गुरु भोगता है।"
तावद् भयेषु भेतव्यं यावद्भयमनागतम्
आगतं तु भयं दृष्ट्वा प्रहर्तव्यमशंकया
संकट प्रत्येक मनुष्य पर आते हैं,परंतु बुद्धिमान व्यक्तियों को संकटों और आपत्तियों से तभी तक डरना चाहिए जब तक वे सिर पर न आ जाएं,दुख आने पर व्यक्ति को अपनी पूरी शक्ति से उसे दूर करने का प्रयत्न करना चाहिए।
असत्यागात् पापकृतामापापांस्तुल्यो दण्डः स्पृशते मिश्रभावात्।
शुष्केणार्दं दह्यते मिश्रभावात् तस्मात् पापैः सहसन्धि न कुर्यात्।।
--- विदुर नीति !!
( दुराचारी दुष्टों का परित्याग न करके उनके साथ मेल - जोल रखने से निर्दोष सज्जन पुरुषों को भी उनके समान ही दण्ड प्राप्त होता है,--जिस प्रकार सूखी लकड़ियों में मिलकर गीली लकड़ियों को भी जल जाना पड़ता है। अतः सज्जन व्यक्तियों को चाहिए कि दुष्ट व्यक्तियों के साथ कभी भी सम्पर्क न रखें।)
पापं कर्तुमृणं कर्तुं मन्यन्ते मानवाः सुखम्।
परिणामोऽतिगहनो महतामपि नाशकृत्॥
अर्थात-: मनुष्य पाप करने में तथा ऋण करने में सुख का अनुभव करता है, परन्तु उसका परिणाम इतना अति भयंकर होता है कि इससे बड़ों-बड़ों का नाश हो जाता है।
रोहते सायकैर्विद्धं वनं परशुना हतम्।
वाचा दुरुक्तं बीभत्सं न संरोहति वाक्क्षतम्॥
~बाणों से छलनी और फरसे से कटा गया जंगल पुनःहरा-भरा हो जाता है!लेकिन कटु-वचन से बना घाव कभी नहीं भरता !
"अर्थनाशं मनस्तापं गृहे दुश्चरितानी च।
वञ्चनं चापमानं च मतिमान्न प्रकाशयेत।।
अर्थ:-
धन का नाश,मन का संताप,जीवनसाथी की चरित्रहीनता और ब्यक्तिगत अपमान की चर्चा किसी करीबी से भी नही करनी चाहिए।
Destruction of wealth, anger of mind, characterlessness of spouse and personal humiliation should not be discussed with anyone close to you.
लोग कभी दुख मे साथ नही देते लेकिन फायदा अवश्य उठाते है दूसरों की कमजोरियों का।
_नाऽस्ति कामसमो व्याधिर्नाऽस्ति मोहसमो रिपुः ।
नाऽस्ति कोपसमो वहनिर्नाऽस्ति ज्ञानात् परं सुखम्।।
कामवासना के समान कोई रोग नहीं
मोह से बड़ा कोई शत्रु नहीं.
क्रोध जैसी कोई आग नहीं
और ज्ञान से बढ़कर इस संसार में सुख देने वाली कोई वस्तु नहीं।
अधना धनमिच्छन्ति वाचं चैव चतुष्पदाः।
मानवाः स्वर्गमिच्छन्ति मोक्षमिच्छन्ति देवताः।।
धनहीन व्यक्ति और अधिक धन पाना चाहता है, चौपाये अर्थात चार पैर वाले पशु चाहते हैं कि वे बोल सकें, मनुष्य स्वर्ग चाहता है और देवता मोक्ष की कामना करते हैं।
उद्यमेन हि सिध्यन्ति कार्याणि न मनोरथैः।
न हि सुप्तस्य सिंहस्य प्रविशन्ति मुखे मृगा:।।
अर्थ – व्यक्ति के मेहनत करने से ही उसके काम पूरे होते हैं, सिर्फ इच्छा करने से उसके काम पूरे नहीं होते। जैसे सोये हुए शेर के मुंह में हिरण स्वयं नहीं आता, उसके लिए शेर को परिश्रम करना पड़ता है।
Meaning - Only by hard work of a person his works are completed, only by wishing his works are not completed. Just as a deer does not come into the mouth of a sleeping lion, the lion has to work hard for it.
पक्षिणां काकश्चाण्डालः पशूनां चैव कुक्कुरः।
मुनीनां कोपी चाण्डालः सर्वेषां चैव निन्दकः।।
पक्षियों में कौआ, पशुओं में कुत्ता, मुनियों में क्रोध करने वाला और सामान्यजन में दूसरे लोगों की निंदा करने वाला व्यक्ति दुष्ट और चाण्डाल होता है।
A crow among birds, a dog among animals, angry among sages and a person who slanders other people among common people is wicked and chandala.
।नित्यं ब्रह्मरसं पीत्वा तृप्तो यः परमात्मनि
इन्द्रं च मन्यते रंकं नृपाणां तत्र का कथा..!!
अर्थात्
हमेशा ब्रह्मरस का पान करके जो परमात्मा में तृप्त हो गया है वह इन्द्र को भी गरीब मानता है तो राजाओं की तो बात ही क्या..!!
सर्वं परवशं दुःखं सर्वमात्मवशं सुखम्।
एतद् विद्यात् समासेन लक्षणं सुखदुःखयोः॥
जो सब अन्यों के वश में होता है, वह दुःख है। जो सब अपने वश में होता है, वह सुख है। यही संक्षेप में सुख एवं दुःख का लक्षण है।
All that is in the control of others is sorrow. Everything that is under his control is happiness. In short, this is the symptom of happiness and sorrow.
*यथा ह्येकेन चक्रेण न रथस्य गतिर्भवति।*
*एवं पुरुषकारेण विना दैवं न सिद्धयति।*
*भावार्थ:-*
*जिस प्रकार एक पहिये से रथ नहीं चल सकता ,ठीक उसी प्रकार बिना पुरुषार्थ के भाग्य सिद्ध नहीं हो सकता।
Just as a chariot cannot move with one wheel, similarly luck cannot be accomplished without effort.
अनारम्भस्तु कार्याणां प्रथमं बुद्धिलक्षणम्।
आरब्धस्यान्तगमनं द्वितीयं बुद्धिलक्षणम्॥
कार्य शुरु न करना बुद्धि का पहला लक्षण है।
शुरु किये हुए कार्य को समाप्त करना बुद्धि का दूसरा लक्षण है।
Not starting work is the first sign of intelligence. The second sign of intelligence is to finish the work which has been started.
गाङ्गेयमिव तोयेषु पूज्येष्विव रघूत्तमः।
सरोजमिव पुष्पेषु शस्यते तुलसीदलम्।।
जलों में गंगा जल, पूजनीय देवों में श्रीराम (श्री हरि)और फूलों में कमल पुष्प व पत्रों में तुलसी दल प्रशस्त है।
There is Ganga water in the waters, Shri Ram (Shri Hari) in the worshiped gods and lotus flower in the flowers and Tulsi Dal in the letters.
दिवसेनैव तत् कुर्याद् येन रात्रौ सुखं वसेत्❗
यावज्जीवं च तत्कुर्याद् येन प्रेत्य सुखं वसेत्‼️
मनुष्य को दिन में वह कार्य करना चाहिए जिससे वह रात को सुख शांति से सो सकें और जब तक जीवित है तब तक वह कार्य करना चाहिए जिससे मरने के उपरांत भी सुख से रह जा सके।
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