भक्त हनुमान जी का भगवान के प्रति प्रेम

एकतः सकला मन्त्रा एकतो ज्ञानकोटयः।
एकतो रामनाम स्यात् तदपि स्यान्न वै समम्॥
देशकालक्रियाज्ञानादनपेक्ष्यः स्वरूपतः।
अनन्तकोटिफलदो राममन्त्रो जगत्पतेः॥ 
अर्थात् :-
आदिरामायण में नल-नील को श्रीराम नाम का उपदेश देते हुए हनुमानजी कहते हैं ~
तराजू के एक पलड़े पर सभी महामन्त्रों के & कोटि कोटि ज्ञान-ध्यानादि सदनोंके पैरों को रखा जाय और दूसरे पलड़े पर केवल श्री रामनाम को ही रखा जाय तो भी सब मिलकर श्रीराम नामकी तुलना नहीं कर सकते।
In Sri Adiramayana, while teaching Nal-Neel the name of Shri Ram, Hanumanji says ~
 That is, on one pan of the scales, the fruits of all the great mantras and some knowledge and meditation tools should be placed, and on the other pan, if only Shri Ramnama is kept, then everyone cannot compare Sri Ram's name together.

बार बार प्रभु चहइ उठावा। प्रेम मगन तेहि उठब न भावा॥
प्रभु कर पंकज कपि कें सीसा। सुमिरि सो दसा मगन गौरीसा॥1॥

भावार्थ:-

प्रभु उनको बार-बार उठाना चाहते हैं, परंतु प्रेम में डूबे हुए हनुमान जी को चरणों से उठना सुहाता नहीं। प्रभु का करकमल हनुमान जी के सिर पर है। उस स्थिति का स्मरण करके शिव जी प्रेममग्न हो गए॥

Prabhu wants to raise them again and again, but Hanuman, immersed in love, does not like to get up from the feet.  The lord's hand is on Hanuman ji's head.  Shiva ji fell in love after remembering that situation.

राम चरन पंकज उर धरहू। लंका अचल राजु तुम्ह करहू॥ रिषि पुलस्ति जसु बिमल मयंका। तेहि ससि महुँ जनि होहु कलंका॥

भावार्थ:- 

हनुमान जी रावण से कहते है - तुम श्री राम जी के चरण कमलों को हृदय में धारण करो और लंका का अचल राज्य करो। ऋषि पुलस्त्यजी का यश निर्मल चंद्रमा के समान है। उस चंद्रमा में तुम कलंक न बनो॥

Hanuman ji says to Ravana- You should take the lotus feet of Shri Ram in your heart and make a permanent kingdom of Lanka.  The fame of sage Pulastyaji is similar to that of the Nirmal Moon.  Do not be a stigma in that moon.

ब्रह्म अस्त्र तेहि साँधा कपि मन कीन्ह बिचार।
जौं न ब्रह्मसर मानउँ महिमा मिटइ अपार॥19॥

भावार्थ

अंत में उसने ब्रह्मास्त्र का संधान (प्रयोग) किया, तब हनुमान जी ने मन में विचार किया कि यदि ब्रह्मास्त्र को नहीं मानता हूँ तो उसकी अपार महिमा मिट जाएगी॥

In the end, he practiced Brahmastra, then Hanuman Ji thought in his mind that if I do not believe Brahmastra, then his immense glory will be erased.

कहइ रीछपति सुनु हनुमाना। का चुप साधि रहेहु बलवाना॥
पवन तनय बल पवन समाना। बुधि बिबेक बिग्यान निधाना॥

भावार्थ:-

ऋक्षराज जाम्बवान ने श्री हनुमान जी से कहा- हे हनुमान्‌! हे बलवान्‌! सुनो, तुमने यह क्या चुप साध रखी है? तुम पवन के पुत्र हो और बल में पवन के समान हो। तुम बुद्धि-विवेक और विज्ञान की खान हो॥

Raksharaj Jambwan said to Shri Hanuman ji - O Hanuman!  Hey strong  Listen, what is this silent attitude you have kept?  You are the son of the wind and like the wind in strength.  You are the mine of wisdom, wisdom and science.

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