ब्रह्म ज्ञान (वेदांत)
सो कि देह धरि होइ नर जाहि न जानत बेद॥
खोजइ सो कि अग्य इव नारी। ग्यानधाम श्रीपति असुरारी॥
अस संसय मन भयउ अपारा। होइ न हृदयँ प्रबोध प्रचारा॥
कहि नेति निगम पुरान आगम जासु कीरति गावहीं॥
सोइ रामु ब्यापक ब्रह्म भुवन निकाय पति माया धनी।
अवतरेउ अपने भगत हित निजतंत्र नित रघुकुलमनी॥
एहिं जग जामिनि जागहिं जोगी। परमारथी प्रपंच बियोगी॥ |
- भावार्थ
इस जगत् रूपी रात्रि में योगी लोग जागते हैं, जो परमार्थी हैं और प्रपंच (मायिक जगत) से छूटे हुए हैं। जगत् में जीव को जागा हुआ तभी जानना चाहिए, जब सम्पूर्ण भोग-विलासों से वैराग्य हो जाए॥
तन बिनु परस नयन बिनु देखा। ग्रहइ घ्रान बिनु बास असेषा॥
असि सब भाँति अलौकिक करनी। महिमा जासु जाइ नहिं बरनी॥
भावार्थ-
वह बिना शरीर (त्वचा) के ही स्पर्श करता है, आँखों के बिना ही देखता है और बिना नाक के सब गंधों को ग्रहण करता है (सूँघता है)। उस ब्रह्म की करनी सभी प्रकार से ऐसी अलौकिक है कि जिसकी महिमा कही नहीं जा सकती।
He touches without body (skin), sees without eyes and absorbs (smells) all smells without nose. To do that Brahman is in all ways supernatural, whose glory cannot be said.
ईश्वरः सर्वभोक्ता च चोरवत्तत्र संस्थितः ।
स एवं मूषकः प्रोक्तों मनुजानां प्रचालकः।
मायया गूढरूपः सन् भोगान् भुङ्क्ते हि चोरवत्॥
~मुद्गलपुराण
'मुद्गल पुराण' में मूषक को 'बृहदारण्यक- उपनिषद् ' में वर्णित 'ब्रह्म' का प्रतीक बताया है, जो समस्त सृष्टि में, शरीरों में अन्तर्यामी रूप से स्थित रहते हुए भी माया से गूढ़ होकर मूषकवत् चुपचाप भोगों को भोगा करता है, पर मोह, अविद्या व अज्ञान से युक्त प्राणी उसे नहीं जानते।
In the 'Mudgal Purana', Mushka has been described as a symbol of 'Brahma' mentioned in the 'Brihadaranyaka-Upanishads', who, despite being internally located in the body, is incoherent with Maya, and Mooktavat silently indulges the people, but fascination , Beings with ignorance and ignorance do not know him.
इदं कृतमिदं नेतिद्वंद्वैर्मुक्तं यदा मनः।
धर्मार्थकाममोक्षेषुनिरपेक्षं तदा भवेत्॥
अर्थ:-
यह करना चाहिए और यह नहीं जब मन इस प्रकार के द्वंद्वों से मुक्त होजाता है तब उसको धर्म,अर्थ,काम और मोक्ष की इच्छा नहीं रहती॥
It should be done and not when the mind is freed from such duality, then it has no desire for religion, meaning, work and salvation.
जामवंत अंगद दुख देखी। कहीं कथा उपदेस बिसेषी॥
तात राम कहुँ नर जनि मानहु। निर्गुन ब्रह्म अजित अज जानहु॥
हम सब सेवक अति बड़भागी। संतत सगुन ब्रह्म अनुरागी॥
भावार्थ:-
जाम्बवान् ने अंगद का दुःख देखकर विशेष उपदेश की कथाएँ कहीं। (वे बोले-) हे तात! श्री रामजी को मनुष्य न मानो, उन्हें निर्गुण ब्रह्म, अजेय और अजन्मा समझो। सब सेवक अत्यंत बड़भागी हैं, जो निरंतर सगुण ब्रह्म (श्री रामजी) में प्रीति रखते हैं॥
Jambavan, seeing Angad's grief, told stories of a special sermon somewhere. (He said-) O Tat! Do not consider Shri Ramji as a human being, consider him as Nirgun Brahm, invincible and unborn. All the servants are very big partners, who constantly have love in the virtuous Brahman (Shri Ramji).
देखी माया सब विधि गाढ़ी । अति सभीत जोरें कर ठाढ़ी ||
देखा जीव नचावइ जाही । देखी भगति जो छोरह ताही ॥
भवार्थ:-
सब प्रकार से बलवान माया को भगवान् के सामने अत्यन्त भयभीत कर हाथ जोड़े खडी देखी है। जीव को देखा, जिसे वह माया नचाती रहती है, और फिर भक्ति को देखा, जो उस जीव को माया से छुड़ा देती है॥
In all ways, the mighty Maya is seen standing in front of God in fear and with folded hands. Looked at the creature, which she keeps dancing Maya, and then saw devotion, which frees that creature from Maya.
प्रणवो धनुः शरो ह्यात्मा ब्रह्म तल्लक्ष्यमुच्यते।
अप्रमत्तेन वेद्धव्यं शरवत्तन्मयो भवेत।।
भवार्थ:-
इस संसार में जो कुछ भी दृश्यमान-कल्पित व भासित है वह ब्रह्म ही है।अर्थात चर-अचर, दृश्य-अदृश्य सत्ता के रूप में सर्वत्र परमात्मा ही अभिव्यक्त है। अतः सभी आदरणीय हैं।
In this world everything that is visible-imagined and devout is Brahm. That is, God is manifest everywhere in the form of variable, visible, invisible entity. Hence, all are respected.
बिस्वरूप रघुबंस मनि करहु बचन बिस्वासु।
लोक कल्पना बेद कर अंग अंग प्रति जासु॥
भवार्थ:-
मेरे इन वचनों पर विश्वास कीजिए कि ये रघुकुल के शिरोमणि राम (नारायण) ही विश्व रूप हैं और यह सारा विश्व उन्हीं का रूप है वेद जिनके अंग-अंग में लोकों की कल्पना करते हैं॥
Trust these words of mine that they are the world form of Raghukul's Shiromani Ram (Narayana) and this whole world is the form of him who imagines the people in his body.
अचिन्त्याव्यक्तरूपाय निर्गुणाय गुणात्मने
समस्त जगदाधारमूर्तये ब्रह्मणे नमः
अर्थात्
जो ब्रह्म अचिन्त्य, अव्यक्त, तीनो गुणो सत्व राजस तमस (जो सजीव,निर्जीव,स्थूल,सूक्ष्म में हैं) से रहित त्रिगुणात्मक और समस्त जगत का अधिष्ठान रूप है, उस परम हरि ब्रह्म को नमस्कार हो।
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