ब्रह्म ज्ञान (वेदांत)

ब्रह्म जो ब्यापक बिरज अज अकल अनीह अभेद।
सो कि देह धरि होइ नर जाहि न जानत बेद॥
भावार्थ:-जो ब्रह्म सर्वव्यापक, मायारहित, अजन्मा, अगोचर, इच्छारहित और भेदरहित है और जिसे वेद भी नहीं जानते, क्या वह देह धारण करके मनुष्य हो सकता है? 
The Brahman, who is omnipresent, uninterested, unborn, unapproachable, wishless, and without distinction, and who does not even know the Vedas, can he be a human by holding the body?

* बिष्नु जो सुर हित नरतनु धारी। सोउ सर्बग्य जथा त्रिपुरारी॥
खोजइ सो कि अग्य इव नारी। ग्यानधाम श्रीपति असुरारी॥
भावार्थ:-देवताओं के हित के लिए मनुष्य शरीर धारण करने वाले जो विष्णु भगवान् हैं, वे भी शिवजी की ही भाँति सर्वज्ञ हैं। वे ज्ञान के भंडार, लक्ष्मीपति और असुरों के शत्रु भगवान् विष्णु क्या अज्ञानी की तरह स्त्री को खोजेंगे?॥
Vishnu, who holds a human body for the benefit of the gods, is also omniscient, just like Shiva.  Will they search for a woman like ignorant Lord Vishnu, the storehouse of knowledge, Lakshmipati and the enemy of Asuras?

* संभुगिरा पुनि मृषा न होई। सिव सर्बग्य जान सबु कोई॥
अस संसय मन भयउ अपारा। होइ न हृदयँ प्रबोध प्रचारा॥
भावार्थ:-फिर शिवजी के वचन भी झूठे नहीं हो सकते। सब कोई जानते हैं कि शिवजी सर्वज्ञ हैं। सती के मन में इस प्रकार का अपार संदेह उठ खड़ा हुआ, किसी तरह भी उनके हृदय में ज्ञान का प्रादुर्भाव नहीं होता था॥
Then even the words of Shivji cannot be false.  Everyone knows that Shiva is omniscient.  Such a great suspicion arose in Sati's mind, in some way there was no birth of knowledge in her heart.

मुनि धीर जोगी सिद्ध संतत बिमल मन जेहि ध्यावहीं।
कहि नेति निगम पुरान आगम जासु कीरति गावहीं॥
सोइ रामु ब्यापक ब्रह्म भुवन निकाय पति माया धनी।
अवतरेउ अपने भगत हित निजतंत्र नित रघुकुलमनी॥
भावार्थ:-
शिव जी कहते है- ज्ञानी मुनि, योगी और सिद्ध निरंतर निर्मल चित्त से जिनका ध्यान करते हैं तथा वेद, पुराण और शास्त्र 'नेति-नेति' कहकर जिनकी कीर्ति गाते हैं, उन्हीं सर्वव्यापक, समस्त ब्रह्मांडों के स्वामी, मायापति, नित्य परम स्वतंत्र, ब्रह्मा रूप भगवान् श्री रामजी ने अपने भक्तों के हित के लिए (अपनी इच्छा से) रघुकुल के मणिरूप में अवतार लिया है।
Shiv ji says - The knowledgeable sages, yogis and siddhas constantly meditate with the serene mind and sing the Vedas, Puranas and scriptures by saying 'Neti-neti', the same omnipresence, lord of all the universe, mayapati, eternal supremely independent, Lord Brahma as Lord Shri Ramji  Has incarnated (in his own will) in Raghukul's Maniroop for the benefit of his devotees.

हरि ब्यापक सर्बत्र समाना।
प्रेम तें प्रगट होहिं मैं जाना॥ 
देस काल दिसि बिदिसिहु माहीं।
कहहु सो कहाँ जहाँ प्रभु नाहीं॥
अर्थ:-
हे पार्वती उस समय मैं भी वहां था अवसर पाकर मैंने कहा " मैं तो यह जानता हूँ कि भगवान सब जगह समान रूप से व्यापक हैं, प्रेम से वे प्रकट हो जाते हैं, देश, काल, दिशा, विदिशा में बताओ, ऐसी जगह कहाँ है, जहाँ प्रभु न हों "
O Parvati, I was also there at that time, taking the opportunity, I said, "I know that God is equally wide everywhere, with love they appear, tell me in the country, time, direction, Vidisha, where is such a place  , Where God is not there "

ज्ञानरूपी अमृत से तृप्त हुआ योगी धन्य है, कृतकृत्य है । उसके लिए अब कुछ
भी करने को शेष नहीं रहता। यदि उसे कुछ करने की मनीषा होती है, तो वह अभी तत्त्ववेत्ता नहीं हुआ है। क्योंकि आत्मवेत्ताओं के लिए तीनों लोकों में कुछ भी करने को शेष रहता ही नहीं है।
-जाबालदर्शनोपनिषद्
Blessed with the nectar of knowledge, the yogi is blessed, thankful.  Something for him now

 There is no remaining to do either.  If he is interested in doing something, then he is not yet a hidden knowledge.  Because there is no remaining work for the souls in the three worlds.
श्रुति सेतु पालक राम तुम्ह जगदीस माया जानकी।
जो सृजति जगु पालति हरति रूख पाइ कृपानिधान की॥
जो सहससीसु अहीसु महिधरु लखनु सचराचर धनी।
सुर काज धरि नरराज तनु चले दलन खल निसिचर अनी॥
अर्थ:-
हे राम आप वेद की मर्यादा के रक्षक जगदीश्वर हैं और जानकी आपकी माया हैं जो आपका रुख पाकर जगत का सृजन पालन और संहार करती हैं।पृथ्वी को अपने सिर पर धारण करने वाले शेष लक्ष्मण हैं। देवताओं के कार्य के लिए आप राजा का शरीर धारण करके राक्षसों की सेना का नाश करने के लिए चले हैं।
O Ram, you are the protector of the dignity of the Vedas, Jagadishwar and Janaki is your illusion, who takes your stand, observes and destroys the creation of the world.  For the work of the gods, you have taken the body of the king and have gone to destroy the army of demons.
बैर न बिग्रह आस न त्रासा। सुखमय ताहि सदा सब आसा॥
अनारंभ अनिकेत अमानी। अनघ अरोष दच्छ बिग्यानी॥

भावार्थ:-
न किसी से वैर करे, न लड़ाई-झगड़ा करे, न आशा रखे, न भय ही करे। उसके लिए सभी दिशाएँ सदा सुखमयी हैं। जो कोई भी आरंभ (फल की इच्छा से कर्म) नहीं करता, जिसका कोई अपना घर नहीं है (जिसकी घर में ममता नहीं है), जो मानहीन, पापहीन और क्रोधहीन है, जो (भक्ति करने में) निपुण और विज्ञानवान्‌ है
Neither hate anyone, fight or quarrel, nor hope, nor fear.  All directions are always happy for him.  Whoever does not initiate (karma with the desire of fruit), who does not have one's own house (who does not have motherhood in the house), who is honorable, sinless and angerless, who is (in devotion) skillful and scientific

शिवाय विष्णुरूपाय शिवरूपाय विष्णवे l
शिवस्य हृदयं विष्णुर्विष्णोश्च हृदयं शिवः ll
अर्थं:-
Shiva is in the form of Vishnu, as Vishnu is in the form of Shiva .
Shiva is in the heart of Vishnu as Vishnu is in the heart of Shiva. 

एहिं जग जामिनि जागहिं जोगी। परमारथी प्रपंच बियोगी॥
जानिअ तबहिं जीव जग जागा। जब सब बिषय बिलास बिरागा॥

भावार्थ

इस जगत् रूपी रात्रि में योगी लोग जागते हैं, जो परमार्थी हैं और प्रपंच (मायिक जगत) से छूटे हुए हैं। जगत् में जीव को जागा हुआ तभी जानना चाहिए, जब सम्पूर्ण भोग-विलासों से वैराग्य हो जाए॥

तन बिनु परस नयन बिनु देखा। ग्रहइ घ्रान बिनु बास असेषा॥

असि सब भाँति अलौकिक करनी। महिमा जासु जाइ नहिं बरनी॥

भावार्थ-

वह बिना शरीर (त्वचा) के ही स्पर्श करता है, आँखों के बिना ही देखता है और बिना नाक के सब गंधों को ग्रहण करता है (सूँघता है)। उस ब्रह्म की करनी सभी प्रकार से ऐसी अलौकिक है कि जिसकी महिमा कही नहीं जा सकती।

He touches without body (skin), sees without eyes and absorbs (smells) all smells without nose.  To do that Brahman is in all ways supernatural, whose glory cannot be said.

ईश्वरः सर्वभोक्ता च चोरवत्तत्र संस्थितः ।

स एवं मूषकः प्रोक्तों मनुजानां प्रचालकः।

मायया गूढरूपः सन् भोगान् भुङ्क्ते हि चोरवत्॥

~मुद्गलपुराण

'मुद्गल पुराण' में मूषक को 'बृहदारण्यक- उपनिषद् ' में वर्णित 'ब्रह्म' का प्रतीक बताया है, जो समस्त सृष्टि में, शरीरों में अन्तर्यामी रूप से स्थित रहते हुए भी माया से गूढ़ होकर मूषकवत् चुपचाप भोगों को भोगा करता है, पर मोह, अविद्या व अज्ञान से युक्त प्राणी उसे नहीं जानते। 

In the 'Mudgal Purana', Mushka has been described as a symbol of 'Brahma' mentioned in the 'Brihadaranyaka-Upanishads', who, despite being internally located in the body, is incoherent with Maya, and Mooktavat silently indulges the people, but fascination  , Beings with ignorance and ignorance do not know him. 

इदं कृतमिदं नेतिद्वंद्वैर्मुक्तं यदा मनः।

धर्मार्थकाममोक्षेषुनिरपेक्षं तदा भवेत्॥

अर्थ:-

यह करना चाहिए और यह नहीं जब मन इस प्रकार के द्वंद्वों से मुक्त होजाता है तब उसको धर्म,अर्थ,काम और मोक्ष की इच्छा नहीं रहती॥

It should be done and not when the mind is freed from such duality, then it has no desire for religion, meaning, work and salvation.

जामवंत अंगद दुख देखी। कहीं कथा उपदेस बिसेषी॥

तात राम कहुँ नर जनि मानहु। निर्गुन ब्रह्म अजित अज जानहु॥

हम सब सेवक अति बड़भागी। संतत सगुन ब्रह्म अनुरागी॥

भावार्थ:-

जाम्बवान् ने अंगद का दुःख देखकर विशेष उपदेश की कथाएँ कहीं। (वे बोले-) हे तात! श्री रामजी को मनुष्य न मानो, उन्हें निर्गुण ब्रह्म, अजेय और अजन्मा समझो। सब सेवक अत्यंत बड़भागी हैं, जो निरंतर सगुण ब्रह्म (श्री रामजी) में प्रीति रखते हैं॥

Jambavan, seeing Angad's grief, told stories of a special sermon somewhere.  (He said-) O Tat!  Do not consider Shri Ramji as a human being, consider him as Nirgun Brahm, invincible and unborn.  All the servants are very big partners, who constantly have love in the virtuous Brahman (Shri Ramji).

देखी माया सब विधि गाढ़ी । अति सभीत जोरें कर ठाढ़ी ||

देखा जीव नचावइ जाही । देखी भगति जो छोरह ताही ॥ 

भवार्थ:-

सब प्रकार से बलवान माया को भगवान् के सामने अत्यन्त भयभीत कर हाथ जोड़े खडी देखी है। जीव को देखा, जिसे वह माया नचाती रहती है, और फिर भक्ति को देखा, जो उस जीव को माया से छुड़ा देती है॥ 

In all ways, the mighty Maya is seen standing in front of God in fear and with folded hands.  Looked at the creature, which she keeps dancing Maya, and then saw devotion, which frees that creature from Maya.


प्रणवो धनुः शरो ह्यात्मा ब्रह्म तल्लक्ष्यमुच्यते। 

अप्रमत्तेन वेद्धव्यं शरवत्तन्मयो भवेत।।

भवार्थ:-

इस संसार में जो कुछ भी दृश्यमान-कल्पित व भासित है वह ब्रह्म ही है।अर्थात चर-अचर, दृश्य-अदृश्य सत्ता के रूप में सर्वत्र परमात्मा ही अभिव्यक्त है। अतः सभी आदरणीय हैं।

In this world everything that is visible-imagined and devout is Brahm. That is, God is manifest everywhere in the form of variable, visible, invisible entity.  Hence, all are respected.

बिस्वरूप रघुबंस मनि करहु बचन बिस्वासु। 

लोक कल्पना बेद कर अंग अंग प्रति जासु॥ 

भवार्थ:-

मेरे इन वचनों पर विश्वास कीजिए कि ये रघुकुल के शिरोमणि राम (नारायण) ही विश्व रूप हैं और यह सारा विश्व उन्हीं का रूप है वेद जिनके अंग-अंग में लोकों की कल्पना करते हैं॥

Trust these words of mine that they are the world form of Raghukul's Shiromani Ram (Narayana) and this whole world is the form of him who imagines the people in his body.


अचिन्त्याव्यक्तरूपाय निर्गुणाय गुणात्मने

समस्त जगदाधारमूर्तये ब्रह्मणे नमः

अर्थात्

जो ब्रह्म अचिन्त्य, अव्यक्त, तीनो गुणो सत्व राजस तमस (जो सजीव,निर्जीव,स्थूल,सूक्ष्म में हैं) से रहित त्रिगुणात्मक और समस्त जगत का अधिष्ठान रूप है, उस परम हरि ब्रह्म को नमस्कार हो।

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