भक्त हनुमान की वंदना


रक्षश्चयैकचितकक्षकपूश्चिचतौ यः
सीताशुचो निजविलोकनतो मृतायाः।

दाहं व्यधादिव तदन्त्यविधेयभूतं,
लाङ्गूलदत्तदहनेन मुदे स नोऽस्तु॥

अर्थ:-
जिन्होंने सीता जी की पीड़ा को,जो उनके दर्शन मात्र से मर चुकी थी,एकमात्र राक्षस-समूह रूप काठ-कबाड़ो से बनी हुई लंकारूपिणी चिता पर सुलाकर,अपनी पूँछ की लगायी हुई अग्नि से उसका मरणान्त कालोचित दाह-संस्कार किया, वे हनुमान जी मेरी प्रसन्नता के कारण हैं। 
मैं महावीर श्री हनुमान जी को प्रणाम करता हूँ।
Who put the torment of Sita ji, who had died only by her vision, on the lankarupini pyre made of lath-junk, the only demon-group form, cremated her mortal with the fire of her tail, Hanuman ji  The reasons are to my delight. I bow to Mahavir Shri Hanuman.

मनोजवं मारुततुल्यवेगं 
जितेन्द्रियं बुद्धिमतां वरिष्ठम्।
वातात्मजं वानरयूथमुख्यं 
श्रीरामदूतम् शरणं प्रपद्ये॥
अर्थ:-
जिनकी मन के समान गति और वायु के समान वेग है, जो परम जितेन्दिय और बुद्धिमानों में श्रेष्ठ हैं, उन पवनपुत्र वानरों में प्रमुख श्रीरामदूत की मैं शरण लेता हूं। कलियुग में हनुमानजी  की भक्ति से बढ़कर किसी अन्य की भक्ति में शक्ति नहीं है।  
Those who have the same speed as the mind and the velocity like the wind, who are the best among the superlative and intelligent, I take refuge in the chief Shri Ramdoot among those windpants.  In Kali Yuga, there is no power in devotion to any other than the devotion of Hanumanji.

प्रनवउँ पवनकुमार खल बन पावक ग्यानधन।
जासु हृदय आगार बसहिं राम सर चाप धर॥
भवार्थ:-

मैं श्री हनुमान्‌ जी को प्रणाम करता हूँ जो दुष्ट रूपी वन को भस्म करने के लिए अग्निरूप हैं और जिनके हृदय में धनुष-बाण धारण किए श्री राम निवास करते हैं ।
I bow down to Shree Hanumanji, who is in a fire to devour the wicked forest and resides in his heart wearing a bow and arrow.

देखा सैल न औषध चीन्हा।सहसा कपि उपारि गिरि लीन्हा॥
गहि गिरि निसि नभ धावक भयऊ।अवधपुरी ऊपर कपि गयऊ॥

अर्थ:-उन्होंने पर्वत को देखा,परऔषध न पहचान सके,तब हनुमान्‌जी ने एकदम से पर्वत को ही उखाड़ लिया।पर्वत लेकर हनुमान्‌जी रात ही में आकाश मार्ग से दौड़ चले और अयोध्यापुरी के ऊपर पहुँच गए॥ 
He saw the mountain, but could not recognize the medicine, then Hanumanji immediately uprooted the mountain. Hanumanji ran the mountain in the night and reached Ayodhyapuri on the mountain.

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