धर्म का ज्ञान

ये वा पापं न कुर्वन्ति कर्मणा मनसा गिरा ।
निक्षिप्तदण्डा भूतेषु दुर्गाण्यतितरन्ति ते ॥
अर्थ:-
जो मन , वाणी और क्रियाद्वारा कभी पाप नहीं करते हैं और किसी भी प्राणीको कष्ट नहीं पहुंचाते हैं , वे भी संकट से पार हो जाते हैं। 

#महाभारत

पुरुष जननेन्द्रिय से , पैरों , से जो कुछ पाप कर्म किये रहता है , जो कुछ पाप
बाहों से , अथवा मन से या वाणी से किये होता है , उन सभी पापों से सायंकालीन सन्ध्या करने पर मुक्त हो जाता हे। इसी प्रकार प्रातःकालीन संध्योपासना कर रात्रि में किये गये पापों से पुरुष मुक्त हो जाता है।
-बौधायनधर्मसूत्र
Whatever sins are committed by the male genitals, feet, whatever sins are committed.
 It is done with the arms, or with the mind, or by speech, you are freed from all those sins by evening evening.In the same way, a man is freed from sins committed in the night by worshiping in the morning.

वेदविहीन ब्राह्मणोंको दिया हुआ दान अपात्रदोषसे निरर्थक हो जाता है। जो ब्राह्मण वेदज्ञानसे शून्य और शास्त्रज्ञानसे रहित होता हुआ भी दूसरोंमें दोष नहीं देखता तथा संतुष्ट रहता, उसे तथा व्रतशून्य दीन - हीनको भी दया करके दान देना चाहिये ।
अर्थ:-
The donation made to the non-Vedic Brahmins becomes meaningless with ineligible.  A Brahmin who, being void of Vedic knowledge and devoid of scriptural knowledge, does not see fault in others and remains satisfied, he and Vratshunya Din - inferior should also give mercy.

बिना दी हुई वस्तुको न लेना , दान , अध्ययन  और तप में तत्पर रहना , किसी भी प्राणीकी हिंसा न करना , सत्य बोलना , क्रोध त्याग देना और यज्ञ करना - ये सब धर्म के लक्षण हैं। 
-शान्तिपर्व
Do not take any given thing, be ready in charity, study and penance, do not commit violence to any creature, speak the truth, renounce anger and sacrifice - all these are signs of religion.

यदि राजा दण्डनीय पुरुषको दण्ड न दे तो उसे अपनी शुद्धिके लिये एक रातका उपवास करना चाहिये । यदि पुरोहित राजाको ऐसे अवसरपर कर्तव्यका उपदेश न दे तो उसे तीन रातका उपवास करना चाहिये। 
#महाभारत
If the king does not punish the punishable man then he should fast for one night for his cleanliness.  If the priest does not preach duty on such an occasion, he should fast for three nights.

प्रणव (ॐ) के उच्चारण के पूर्व शास्त्रसम्मत 'हरिः' इस पद का उच्चारण अवश्य करना चाहिए। क्योंकि कहा गया है कि वेद में, रामायण में, पुराणों में तथा महाभारत में पारायण के समय आदि, मध्य तथा अन्त में 'हरिः' शब्द अवश्य जोड़कर पाठ करना चाहिए।

-याज्ञवल्क्यशिक्षा
The scripture must be pronounced before the pronunciation of Pranava (ॐ), 'Harih'.  Because it has been said that in Vedas, Ramayana, Puranas and Mahabharata
 At the time of Parayana, one must recite by adding the words 'Hariha' at the beginning, middle and end.

अविद्या( #तमस् )का लक्षण -'अनित्याऽशुचिदुःखानात्मसु नित्यशुचिसुखात्मख्यातिरविद्या’
-( योगसूत्र-२/५ ) । 

अर्थात् 
अनित्य, अशुचि, दुःख तथा अनात्म पदार्थों में नित्य, शुचि, सुख, तथा आत्मभावना करना ही 'अविद्या' है।
In impermanence, imperfection, sorrow and self-immaterial things, 'avidya' is to have continual, pure, happy, and self-feeling.

वे सदा से चले आने वाले धर्म सैकड़ों वार नष्ट हो चुके हैं, परंतु क्षात्रधर्म ने ही उनका उद्धार एवं प्रसार किया है। युग-युग में आदिधर्म (क्षात्रधर्म) की वृद्धि हुई है। इसलिए इस क्षात्रधर्म को लोक में सबसे श्रेष्ठ बताते हैं। 

#शान्तिपर्व
The religions that have always run away have been destroyed hundreds of times, but Kshatradharma has saved and spread them.  There is an increase of Adidharma (Kshatradharma) in the Yuga Yuga.  Therefore, this Kshatradharma is considered to be the best in the world.

भीष्मजी कहते हैं-युधिष्ठिर! 

संन्यासी को चाहिये कि वह मन और इन्द्रियोंको संयममें रखते हुए मुनिवृत्तिसे रहे। किसी वस्तुकी कामना न करे। अपने लिये मठ या कुटी न बनवाये।निरन्तर घूमता रहे और जहाँ सूर्यास्त हो वहीं ठहर जाय।प्रारब्धवश जो कुछ मिले, उसीसे जीवन-निर्वाह करे।

#शान्तिपर्व
Bhishma ji says - Yudhishthira!

 The ascetic should keep his mind and senses in abstinence, and remain in a mental state.  Do not wish for anything.  Do not build a monastery or a hut for yourself. Continue to roam continuously and stay where the sunset is. Do whatever you can with the help of your life.

जिसने ब्रह्मचर्यका पालन किया है, उस ब्रह्मचारी ब्राह्मण के मनमें यदि मोक्षकी अभिलाषा जाग उठे तो उसे ब्रह्मचर्य-आश्रमसे ही संन्यास ग्रहण करनेका उत्तम अधिकार प्राप्त हो जता है। 
#महाभारत
If the desire of salvation arises in the mind of the Brahmachari Brahmin who has followed Brahmacharya, then he gets the right to take renunciation from the Brahmacharya-Ashram.


संसार के अन्य लोग कौमार अवस्था को पाकर प्रायः नास्तिक विचार और बुरे आचार व्यवहार के पोषक बन जाते हैं, परंतु उसी उम्र में प्रह्लाद को बाह्य विषयों से वैराग्य हुआ और भगवान में उनकी भक्ति हो गई - यह अद्भुत बात है। 

#नरसिंहपुराण
Other people of the world, after attaining the state of virginity, often become nurturers of atheistic thoughts and bad conduct, but at the same age Prahlada has disinterestedness from external subjects and devotion to God - this is wonderful.

जिन राज्यों में स्त्रियों की प्रधानता हो और जिन्हें विद्वानों ने छोड़ रखा हो, वे राज्य मूर्ख मंत्रियों से संतप्त होकर पानी की बूँदके समान सूख जाते हैं। 

#शान्तिपर्व 
The states in which women have predominance and which the scholars have left, those states are filled with foolish ministers and dry up like drops of water.

पुरूरवाने पूछा - यदि पापियोंद्वारा विशेषरूपले
पाप और पुण्यात्माओंद्वारा विशेषरूपसे पुण्य किये
जानेपर पुण्य - पापसे रहित #आत्मा को भी दण्ड भोगना
पड़ता है , तब किसलिये कोई पुण्य करे और किसलिये
पाप न करे ? 

#शान्तिपर्व
Pururawane asked - If sinners by special appearance Specially done by sins and saints. Punishment on the go - to be punished even without sin Falls, then why should someone perform virtue and for what reason Do not sin?

कश्यप - पापाचारियोंके संसर्ग का त्याग
न करनेसे धर्मात्मा पुरुषोंको भी उनसे मेल-जोल 
रखनेके कारण उनके समान ही दण्ड भोगना
पड़ता है । ठीक उसी तरह , जैसे सूखी लकड़ियोंकि
साथ मिली होनेसे गीली लकडी भी जल जाती है ।अतः विवेकी पुरुष पापियोंके साथ किसी तरह भी सम्पर्क स्थापित न करे।
भवार्थ:-
Kashyap - renunciation of sinners
 By not doing so, even godly men interact with them Suffer the same punishment as for keeping Does matter .  Just like dry wood Being mixed with it also burns wet wood. Therefore, prudent men should not establish contact with sinners in any way.

जो हरिनाम का जप करते हैं , हरिकीर्तन में लगे रहते हैं और सदा हरिकी पूजा ही किया करते हैं , वे मनुष्य कृतकृत्य हो गये हैं इसमें संदेह नहीं है । कलियुगमें भगवान् विष्णुका नामकीर्तन समस्त दुःखोंको दूर करनेवाला और सम्पूर्ण पुण्यफलोंको देनेवाला है।
अर्थ:-
There is no doubt that those who chant Harinam, are engaged in Harikirtan and always worship Hariki.  In the Kali Yuga, the name of Lord Vishnu is to remove all sorrows and to give complete blessings.

वाचिक, उपांशु और मानस-तीन प्रकारका जप कहा गया है। इन तीनों जपयज्ञोंमें उत्तरोत्तर जप श्रेष्ठ है, अर्थात् वाचिक जपकी अपेक्षा उपांशु और उसकी अपेक्षा मानस जप श्रेष्ठ है।

जप करनेवाला पुरुष आवश्यकतानुसार ऊँचे, नीचे और समान स्वरोंमें बोले जानेवाले स्पष्ट शब्दयुक्त अक्षरोंद्वारा जो वाणीसे सुस्पष्ट शब्दोच्चारण करता है, वह 'वाचिक जप' कहलाता है।
इसी प्रकार जो तनिक-सा ओठोंको हिलाकर धीरे-धीरे मन्त्रका उच्चारण करता है और मन्त्रको स्वयं ही कुछ-कुछ सुनता या समझता है, उसका वह जप 'उपांशु' कहलाता है।
बुद्धिके द्वारा मन्त्राक्षरसमूहके प्रत्येक वर्ण, प्रत्येक पद और शब्दार्थका जो चिन्तन एवं ध्यान किया जाता है, वह 'मानस जप' कहा गया है।
Chanting of three types is called Vachik, Upanshu and Manas.  In all the three chanting chants, successive chanting is superior, that is, Upanshu is better than recitation and Manas chanting is better than that.


 A man who chants is pronounced as pronounced, pronounced by the utterances of the words spoken in high, low and similar vowels as required, which is called 'chanting chant'.

 In the same way, the person who shakes a little lip and slowly chants the mantra, and the mantra itself hears or understands something, the chanting of that mantra is called 'Upanshu'.

 Every Varna, every verse and word of meditation, which is meditated on and meditated on by the Buddha, has been called 'Manas Japa'.


पुत्र-हीन पिता कन्या-दान करते समय-'इस कन्यासे जो पुत्र होगा, वह मेरी श्राद्धादि पारलौकिक क्रिया करनेवाला होगा' ऐसा जामाता ( जमाई-दामाद ) से कहकर उस कन्याको 'पुत्रिका' करे 'भाईसे हीन अलंकृत इस कन्याको मैं तुम्हारे लिए दे रहा हूँ, इससे जो पुत्र हो वह मेरा पुत्र हो।-#मनुस्मृति-९/१२७/३ मनुस्मृति-९/१२७ 
While donating a son-inferior father-girl, 'The son from this girl, he will be doing my shraadhadi parloki kriya' by telling Jamata (Jamaai-son-in-law) to 'do daughter' to that girl 'I am giving this girl ornate inferiority to my brother, my son should be my son.

एकान्त स्थानमें अकेले बैठकर अपने हृदयमें कमलके आसनपर विराजमान, तपाये हुए सुवर्णके समान कान्तिमान् अपने आत्मस्वरूप भगवान् का चिन्तन करे।
जो सबके प्राणों और चित्तकी चेष्टाओंको जानता है, सभीके हृदयमें विराजमान है तथा समस्त प्राणियोंद्वारा जाननेयोग्य है-वह परमात्मा मैं ही हूँ, ऐसी भावना करे। जबतक आत्मसाक्षात्कार जन्य सुखकी प्रतीति हो, तभीतक ध्यान करना आवश्यक है। उसके उपरान्त श्रौत और स्मार्त कर्मोंका आचरण करे।


दिन-रातमें एक बार भोजन करके रहना और विशेषतः रातमें भोजन न करना-यह व्रत है। पूर्णिमा और अमावास्या को एक ही बार भोजन करके रहना चाहिये। इन तिथियोंमें एक बार भोजन करके रहनेवाला मनुष्य पावन गतिको प्राप्त करता है।
एकादशी को दिन-रात उपवास करनेका विधान है। उस दिन भगवान् विष्णुका पूजन करके मनुष्य सब पापोंसे मुक्त हो जाता है।

#नरसिंहपुराण
Staying with food once a day and night and especially not eating at night - it is fasting.  Poornima and Amavasya should be eaten only once.  A person who dines once on these dates receives holy movements.

 There is a law to fast Ekadashi day and night.  On that day, after worshiping Lord Vishnu, a person is freed from all sins.

युधिष्ठिर ! तुम अपने कुटुम्बीजनों से सदा उसी
प्रकार भय मानना , जैसे लोग मृत्युसे डरते रहते हैं ।
जिस प्रकार पड़ोसी राजा अपने पासके राजाकी उन्नति
देख नहीं सकता , उसी प्रकार एक कुटुम्बी दूसरे
कुटुम्बीका अभ्युदय कभी नहीं सह सकता।जो सरल , कोमल स्वभाववाला , उदार , लज्जाशील और सत्यवादी है ; ऐसे राजाके विनाशका समर्थन कुटुम्बी के सिवा दूसरा नहीं कर सकता।
 -पितामहभीष्म
#शान्तिपर्व
Yudhisthira !  You should always fear your relatives, just as people are afraid of death.  Just as the neighboring king cannot see the progress of the king near him, in the same way one family cannot tolerate the other family members. One who is simple, soft-tempered, generous, shameful and truthful;  No one can support the destruction of such a king except Kutumbi.


एक काम पर एक ही व्यक्ति को नियुक्त करना चाहिए; दो या तीन को नहीं। क्योंकि वे आपस में एक दूसरे को सहन नहीं कर पाते। एक कार्य पर नियुक्त हुए अनेक व्यक्तियों में प्रायः सदा मतभेद हो ही जाता है।

#महाभारत 
#शांतिपर्व
One person should be appointed on one job;  Not two or three.  Because they are unable to bear each other.  There is always a difference of opinion among many people appointed on one task.

दूसरोंपर किया हुआ पूरा - पूरा विश्वास अकालमृत्युके 
समान है ; क्योंकि अधिक विश्वास करनेवाला मनुष्य 
भारी विपत्तिमें पड़ जाता है । वह जिसपर विश्वास करता 
है , उसीकी इच्छापर उसका जीवन निर्भर होता है ।

#शान्तिपर्व
All faith in others - complete faith is like premature death;  Because a man of more faith is in great calamity.  What he believes in, his life depends on his will.

मनुष्यको जब कभी विषय - भोगोंसे वैराग्य होता
है , तब विरक्त होनेपर वह हर्ष और शोकको त्याग देता
है तथा ज्ञानमय धन पाकर नित्य सुखका अनुभव करने
लगता है। 

#शान्तिपर्व
Whenever a person is disinterested with the pleasures, then on being disengaged, he renounces happiness and mourning and begins to experience continual happiness after attaining enlightened wealth.
राजन् ! बताओ तो सही , तुम्हारे पिता आज कहाँ
है ? तुम्हारे पितामह अब कहाँ चले गये ? आज न तो
तुम उन्हें देखते हो और न वे तुम्हें देख पाते हैं। 
इस बातको तुम देखते और समझते हो , 
फिर उन पूर्वजोंके लिये क्यों निरन्तर शोक
करते हो ? जरा बुद्धि लगाकर विचार तो करो , निश्चय
ही एक दिन तुम भी नहीं रहोगे।

#महाभारत
#शान्तिपर्व

मनुष्य जिस कर्मसे पिता को प्रसन्न करता है ,उसीके द्वारा प्रजापति ब्रह्माजीभी प्रसन्न होते हैं तथा जिस बर्तावसे वह माता को प्रसन्न कर लेता है , उसीके पृथ्वी का भी पूजा हो जाती है।जिस कर्मसे शिष्य उपाध्याय ( विद्यागुरु ) को प्रसन्न करता है , उसीके द्वारा परब्रह्म परमात्मा की पूजा सम्पन्न हो जाती है ; अत : गुरु माता - पितासे भी अधिक पूजनीय है। गुरुओंके पूजित होनेपर पितरोंसहित देवता और ऋषि भी प्रसन्न होते हैं । इसलिये गुरु परम पूजनीय है ।
भलीभाँति पूजित हुए वे माता-पिता और गुरुजन जिस कामके लिये आज्ञा दें , वह धर्म के अनुकूल हो या विरुद्ध , उसका पालन करना ही चाहिये।जो उनकी आज्ञाके पालनमें संलग्न है , उसके 
लिये दूसरे किसी धर्मके आचरणकी आवश्यकता नहीं 
है । जिस कार्यके लिये वे आज्ञा दें , वही धर्म है ऐसा 
धर्मात्माओंका निश्चय है।मैं तो सारा शुभ कर्म करके इन तीनों गुरुजनोंको
ही समर्पित कर देता था । इससे मेरे उन सभी शुभ
कर्मोंका पुण्य सौगुना और हजारगुना बढ़ गया
युधिष्ठिर । इसीसे तीनों लोक मेरी दृष्टिके सामने
प्रकाशित हो रहे हैं - भीष्म
जो लोग विद्या पढ़कर गुरुका आदर नहीं करते , निकट रहकर मन , वाणी और क्रियाद्वारा गुरुकी सेवा नहीं करते , उन्हें गर्भके बालककी हत्यासे भी बढ़कर पाप लगता है । जैसे गुरुओंका कर्तव्य है , शिष्यको आत्मोन्नतिके पथपर पहुँचाना , उसी तरह शिष्योंका धर्म है गुरुओंका पूजन करना।इन तीनोंकी आज्ञाका कभी उल्लंघन न करे
इनको भोजन करानेके पहले स्वयं भोजन न करे , इनका
कोई दोषारोपण न करे और सदा इनकी सेवा में संलग
रहे । यही सबसे उत्तम पुण्यकर्म है । इनकी सेवासे
तुम कीर्ति , पवित्र यश और उत्तमलोक सब
प्राप्त कर लोगे।

#शान्तिपर्व
जो लोग विद्या पढ़कर गुरुका आदर नहीं करते , निकट रहकर मन , वाणी और क्रियाद्वारा गुरुकी सेवा नहीं करते , उन्हें गर्भके बालककी हत्यासे भी बढ़कर पाप लगता है । जैसे गुरुओंका कर्तव्य है , शिष्यको आत्मोन्नतिके पथपर पहुँचाना , उसी तरह शिष्योंका धर्म है गुरुओंका पूजन करना।

#शान्तिपर्व
भीष्मजीने कहा - राजन् ! मुझे तो माता - पिता 
तथा गुरुजनोंकी पूजा ही अधिक महत्त्वकी वस्तु जान 
पड़ती है । इसलोकमें इस पुण्य कार्यमें संलग्न होकर 
मनुष्य महान् यश और श्रेष्ठ लोक पाता है।जिसने इन तीनोंका आदर कर लिया , उसके द्वारा
सम्पूर्ण लोकोंका आदर हो गया और जिसने इनका
अनादर कर दिया , उसके सम्पूर्ण शुभ कर्म निष्फल हो
जाते हैं।जिसने इन तीनों गुरुजनोंका सदा अपमान ही किया है , उसके लिये न तो यह लोक सुखद है और न परलोक।

अध्यापक , पिता और माता के प्रति जो मन - वाणी 
और क्रियाद्वारा द्रोह करते हैं , उन्हें भ्रूणहत्यासे भी महान्
पाप लगता है । संसारमें उससे बढ़कर दूसरा कोई 
पापाचारी नहीं है।जो पिता - माताका औरस पुत्र है और पाल-पोस कर बड़ा कर दिया गया है , वह यदि अपने माता-पिताका भरण-पोषण नहीं करता है तो उसे भ्रूणहत्यासे भी बढ़कर पाप लगता है और जगत्में उससे बड़ा पापात्मा दूसरा कोई नहीं है। 

#शान्तिपर्व
यद्यपि तुम्हारे पास लक्ष्मी नहीं है तो भी तुम दूसरोंकी सम्पत्ति देखकर सहन करो ; क्योंकि चतुर मनुष्य दूसरोंके यहाँ रहनेवाली सम्पत्तिका भी सदा उपभोग
करते हैं और जो लोगोंसे #द्वेष रखता है , उसके पास सम्पत्ति हो तो भी वह शीघ्र ही नष्ट हो जाती है ।

#शान्तिपर्व

बुद्धिबल से किए गये कार्य श्रेष्ठ हैं। बाहुबल से किये जानेवाले कार्य मध्यम हैं। जाँघ अर्थात् पैर के बलसे किये गये कार्य जघन्य(अधम कोटिके) हैं तथा मस्तक से भार ढोनेका कार्य सबसे निम्न श्रेणीका है।

#शान्तिपर्व
मनुष्यके उत्कर्ष और अपकर्ष (उन्नति और अवनति) अकस्मात् होते हैं, किसीका भला करके बुरा करना और उसे महत्त्व देकर नीचे गिराना, यह सब ओछी बुद्धिका परिणाम है। 

#शान्तिपर्व

आपद्गतेन धर्माणामन्यायेनोपजीवनम्।
अपि ह्येतद् ब्राह्मणेषु दृष्टं वृत्तिपरिक्षये॥२५॥

क्षत्रिये संशयः कस्मादित्येवं निश्चितं सदा।
आददीत विशिष्टेभ्यो नावसीदेत् कथंचन॥२६॥

जो आपत्ति में पड़ा हो वह धर्म के विपरीत आचरणद्वारा जीवन-निर्वाह कर सकता है। जीविका क्षीण होनेपर ब्राह्मणोंमें ऐसा व्यवहार देखा गया है। फिर क्षत्रियके लिये कैसे संदेह किया जा सकता है?उसके लिये भी सदा यही निश्चित है कि वह आपत्तिकाल में विशिष्ट अर्थात् धनवान् पुरुषोंसे बलपूर्वक धन ग्रहण करे। धनके अभावमें वह किसी तरह कष्ट न भोगे। विद्वान् पुरुष क्षत्रिय को प्रजाका रक्षक और विनाशक भी मानते हैं। अतः क्षत्रियबन्धुको प्रजाकी रक्षा करते हुए ही धन ग्रहण करना चाहिये।

#महाभारत
#शान्तिपर्व
#राजधर्मानुशासनपर्व - १३०-२५/२६

मूर्खलोग अपनी बाल्यावस्थामें खेल-कूदमें लगे रहते हैं, युवावस्थामें विषयोंमें फँस जाते हैं और बुढ़ापा आनेपर उसे असमर्थताके कारण व्यर्थ ही काटते हैं।इसलिये विवेकी पुरुषको चाहिये कि देहकी बाल्य, यौवन और वृद्ध आदि अवस्थाओंकी अपेक्षा न करके
बाल्यावस्थामें ही अपने कल्याणका यत्न करे।-प्रह्लादजी

#विष्णुपुराण
मैंने तुमलोगोंसे जो कुछ कहा है उसे यदि
तुम मिथ्या नहीं समझते तो मेरी प्रसन्नताके लिये ही बन्धनको छुटानेवाले श्रीविष्णुभगवान्का स्मरण करो।
उनका स्मरण करने में परिश्रम भी क्या है? 
स्मरणमात्रसे ही वे अति शुभ फल देते हैं। रातदिन उन्हींका स्मरण करनेवालोंका पाप भी नष्ट हो जाता है।


ऐसा मत समझो कि हम तो अभी बालक हैं, क्योंकि जरा, यौवन और जन्म आदि अवस्थाएँ तो देहके ही धर्म हैं, शरीरका अधिष्ठाता आत्मा तो नित्य है, उसमें यह कोई धर्म नहीं है। 

#विष्णुपुराण
Do not think that we are still children, because the slightest stage of youth, youth and birth are religions, body is the eternal soul, it does not have any religion in it.

भगवान् विष्णु इस संसारको भूषण और आयुध रूपसे किस प्रकार धारण करते हैं-

इस जगत् के निर्लेप तथा निर्गुण और निर्मल आत्माको अर्थात् शुद्ध क्षेत्रज्ञ-स्वरूपको श्रीहरि कौस्तुभ मणि रूपसे धारण करते हैं।
श्रीअनन्त ने प्रधान को श्रीवत्स रूपसे आश्रय दिया है और बुद्धि श्रीमाधवकी गदा रूपसे स्थित है। भूतोंके कारण तामस_अहंकार और इन्द्रियों के कारण राजस_अहंकार इन दोनोंको वे शंख और शाङ्गधनुष रूपसे धारण करते हैं।अपने वेगसे पवन को भी पराजित करनेवाला अत्यन्त चंचल, सात्त्विक_अहंकार रूप मन श्रीविष्णु भगवान् के कर- कमलोंमें स्थित चक्र का रूप धारण करता है। 

भगवान् गदाधरकी जो [मुक्ता,माणिक्य,मरकत,इन्द्रनील और हीरकमयी] पंचरूपा वैजयन्तीमाला है वह पंचतन्मात्राओं और पंचभूतों का ही संघात है।जो ज्ञान और कर्ममयी इन्द्रियाँ हैं उन सबको श्रीजनार्दन भगवान् #बाण रूप से धारण करते हैं।

भगवान् अच्युत जो अत्यन्त निर्मल खड्ग धारण करते हैं वह अविद्यामय कोश से आच्छादित विद्यामय ज्ञान ही है।इस प्रकार पुरुष, प्रधान, बुद्धि, अहंकार, पंचभूत, मन, इन्द्रियाँ तथा विद्या और अविद्या  भी श्री हृषीकेश में आश्रित है। 
पुरुष-कौस्तुभ मणि
प्रधान-श्रीवत्स
बुद्धि-गदा
तामस_अहंकार-शंख
राजस_अहंकार-शारंग धनुष
इन्द्रिय(ज्ञान,कर्म)-वाण
मन-चक्र
विद्या और अविद्या-खड्ग
वैजयंतीमाला-पंचतन्मात्रा और पंचभूत 

#श्रीविष्णुपुराण
पिता धर्मः पिता स्वर्गः पिता हि परमं तपः।
पितरि प्रीतिमापन्ने सर्वाःप्रीयन्ति देवता।।

पिता ही धर्म है,पिता ही स्वर्ग है और पिता ही सबसे श्रेष्ठ तपस्या है।पिता के प्रसन्न हो जाने पर सारे देवता प्रसन्न हो जाते है
माता-पिता का सम्मान करें!
The father is religion, the father is heaven and the father is the best austerity. When the father is pleased, all the gods become happy.
 Respect the parents!

आत्मा मस्तकके रन्ध्रस्थानमें स्थित होकर सम्पूर्ण शरीरकी रक्षा करता है और प्राण मस्तक तथा अग्नि दोनोंमें स्थित होकर शरीरको चेष्टाशील बनाता है। 

वह प्राण से संयुक्त आत्मा ही जीव है , वही सम्पूर्ण भूतोंका आत्मा सनातन पुरुष है ।
वही मन , बुद्धि ,अहंकार , पाँचों भूत और विषयरूप हो रहा है। इस प्रकार ( जीवात्मासे संयुक्त ) प्राणके द्वारा शरीरके भीतरके समस्त विभाग तथा इन्द्रिय आदि सारे बाह्य अंग परिचालित होते हैं । तत्पश्चात् समान वायुके
रूपमें परिणत हो प्राण ही अपनी - अपनी गतिके आश्रित शरीरका संचालक होता है|

जिस पुरुष के चित्त में पाप कर्म के अनन्तर पश्चात्ताप होता है उसके लिए ही प्रायश्चित्त का विधान है, किन्तु यह हरिस्मरण तो एकमात्र स्वयं ही परम प्रायश्चित्त है।

For a man who has repentance of sin in his mind, there is a law of atonement, but this memorial is the ultimate atonement itself.
#विष्णुपुराण

पापी लोग नरक भोग के अनंतर क्रम से स्थावर, कृमि, जलचर, पक्षी, पशु, मनुष्य, धार्मिक पुरुष, देवगण तथा मुमुक्षु होकर जन्म ग्रहण करते हैं। मुमुक्षु पर्यन्त इन सभी में दूसरों की अपेक्षा पहले प्राणी संख्या में सहस्र गुण अधिक हैं।

#विष्णुपुराण
Sinners take birth in the eternal order of hell enjoyment as real, worm, aquatic, birds, animals, humans, religious men, deities and mumukshu  Till Mumukshu, all these have more than the thousand qualities of the first creature in comparison to others.

पापी मनुष्यका पाप के द्वारा छिपाया हुआ पाप पुनः उसे पाप में ही लगाता है और धर्मात्मा का धर्मत: गुप्त रक्खा हुआ धर्म उसे पुनः धर्म में ही प्रवृत्त करता है।

 #शान्तिपर्व-१९३/२८
The sin of a sinful man, hidden by his sin, re-infuses it into sin itself, and the religiously secreted religion of the righteous rejoins him in religion itself.
Man first has knowledge of subjects,

 मनुष्य को पहले तो विषयोंका ज्ञान होता है, फिर उसके मन में उसे पाने की इच्छा उत्पन्न होती है।
 उसके बाद ‘इस कार्य को सिद्ध करूँ’ यह निश्चय और प्रयत्न आरंभ होता है।
 फिर कर्म सम्पन्न होता और उसका फल मिलता है।
 इस प्रकार फल को कर्म स्वरूप समझे। कर्मों को जानने में आने वाले पदार्थों का रूप समझें और ज्ञेय को ज्ञान रूप समझें तथा ज्ञान का स्वरूप कार्य और कारण जाने।
A man first has knowledge of subjects, then a desire arises in his mind.
  After that 'prove this work', this determination and effort begins.
  Then karma takes place and it results.
  In this way, consider the fruit as karma.  Understand the form of the substances that come in knowing the deeds, and understand the known as the form of knowledge, and know the nature of knowledge, work and reasons.

  Shantiparva-20/04/4

जो मनुष्य सुख और दु:ख दोनों को छोड़ देता है, वह अक्षय ब्रह्मको प्राप्त होता है। अतः ज्ञानी पुरुष कभी शोक नहीं करते हैं। 
A person who gives up both happiness and sorrow attains Akshay Brahmako.  Therefore, wise men never mourn.

 # Shantiparva

#शान्तिपर्व

मृत्यु के समय भगवान का चिन्तन -

मृत्युकाल उपस्थित होनेपर मेरी बुद्धि आपमें ही लगी रहे। मेरे प्राण आपमें ही लीन रहें। मेरा आपमें ही भक्तिभाव बना रहे और मैं सदा आपकी ही शरणमें पड़ा रहूँ। इस प्रकार मैं निरन्तर आपका ही स्मरण करता रहूँ।
पूर्व शरीरमें मैंने जो दुष्कर्म किये हों, उनके
फलस्वरूप रोग-व्याधि मेरे शरीरमें प्रवेश करें और नाना प्रकारके दु:ख मुझे आकर सतावें। इन सबका जो मेरे ऊपर #ऋण है, वह उतर जाय।
देवेश्वर! मैंने इसलिये आपका स्मरण किया है कि फिर मेरा जन्म न हो; अतः फिर कहता हूँ कि मेरे कर्म नष्ट हो जायँ और मुझपर किसीका ऋण बाकी न रह जाय।
पूर्व जन्ममें जिन कर्मोंका मेरे द्वारा संचय किया गया है, वे सभी रोग मेरे शरीरमें उपस्थित हो जायें। मैं सबसे उऋण होकर भगवान् विष्णुके परम धामको जाना चाहता हूँ।

#शान्तिपर्व-२०९

जिस प्रकार लोहा अचेतन होनेपर भी चुम्बककी ओर खिंच जाता है , वैसे ही शरीरके उत्पन्न होनेपर इन्द्रिय प्राणीके स्वाभाविक संस्कार तथा अविद्या , काम , कर्म आदि दूसरे गुण उसकी ओर खिंच आते हैं।इसी प्रकार अव्यक्तसे उत्पन्न हुए कारणस्वरूप भाव अचेतन होनेपर भी चेतनकर्ताके सम्बन्धसे चेतन - से होकर जानना आदि क्रियाके हेतु बन जाते हैं। 
Just as iron is pulled towards the magnet even when it is unconscious, in the form of the body, the natural sanskars of senses and other qualities such as avidya, kama, karma etc. are drawn towards it.  Knowing through it, etc. are made for action.

#शान्तिपर्व

जैसे धूलके उड़नेसे वायु न तो धूलसे लिप्त होती है और न अलिप्त ही रहती है । उसी प्रकार न तो राजस , तामस आदि भावोंसे जीवात्मा लिप्त होता है और न अलिप्त ही रहता है।अतः विवेकी पुरुषको क्षेत्र और क्षेत्रज्ञ का यह अन्तर जान लेना चाहिये । इन दोनोंके तादात्म्यका - सा अभ्यास हो जानेसे जीव ऐसा हो गया है कि उसे अपने शुद्ध स्वरूपका पता ही नहीं लगता।
As the dust blows, the air neither gets covered with dust nor remains elated.  In the same way, neither Rajas, Tamas, etc. are involved in the spirit, nor are they indulged.  With the practice of these two identities, the organism has become such that it does not know its pure form.

युवावस्थामें प्राप्त किया हुआ ज्ञान प्राय: बुढ़ापेमें क्षीण हो जाता है, परंतु परिपक्वबुद्धि मनुष्य समयानुसार ऐसा मानसिक बल प्राप्त कर लेता है, जिससे उसका #ज्ञान कभी क्षीण नहीं होता।वह परिपक्व बुद्धिवाला मनुष्य अत्यन्त दुर्गम मार्गके समान गुणोंके बन्धनको पार करके जैसे-जैसे अपने दोष देखता है, वैसे-ही-वैसे उन्हें लाँघकर अमृतमय परमात्मपदको प्राप्त कर लेता है।

रजोगुणसे प्रभावित हुई इन्द्रियोंकी प्रेरणासे मनुष्य विषयभोगरूप कर्मों में प्रवृत्त होता है और इस लोकमें दुःख भोगकर अन्तमें नरकगामी होता है। अतः मन, वाणी और शरीरद्वारा ऐसा कार्य करे जिससे अपनेको धैर्य प्राप्त हो।


विद्वान महर्षियों का कहना है कि जाग्रत अवस्था में निरंतर शब्द आदि विषयों को ग्रहण करते करते स्रोत्र आदि इंद्रियां जब थक जाती हैं, तब सभी प्राणियों के अनुभव में आने वाला स्वप्न दिखाई देने लगता है।
उस समय इन्द्रियों के लय होने पर भी मन का लय नहीं होता; इसलिए वह समस्त विषयोंका जो मनसे अनुभव करता है, वही स्वप्न कहलाता है।
इस विषय में प्रसिद्ध दृष्टांत बताया जाता है।जैसे जाग्रत अवस्था में विभिन्न कार्यों में आसक्त चित्त हुए मनुष्य के संकल्प मनोराज्य की ही विभूति है, उसी प्रकार स्वप्न के भाव भी मन से ही संबंध रखते हैं। 

#शान्तिपर्व-२१६

स्वप्न का दर्शन होते ही सात्विक, राजस अथवा तामस गुण यथायोग्य सुख-दु:ख रूप फल का अनुभव कराने के लिए उसके पास आ पहुँचते हैं। तदनन्तर मनुष्य स्वप्न में अज्ञानवश वात, पित्त या कफ की प्रधानता से युक्त तथा काम, मोह आदि राजस, तामस भावों से व्याप्त नाना प्रकार के शरीरों का दर्शन करते हैं। तत्वज्ञान हुए बिना उस स्वप्न दर्शन को लाँघना अत्यंत कठिन बताया गया है है।

#स्वप्न का दर्शन होते ही सात्विक, राजस अथवा तामस गुण यथायोग्य सुख-दु:ख रूप फल का अनुभव कराने के लिए उसके पास आ पहुँचते हैं।तदनन्तर मनुष्य स्वप्न में अज्ञानवश वात, पित्त या कफ की प्रधानता से युक्त तथा काम, मोह आदि राजस, तामस भावों से व्याप्त नाना प्रकार के शरीरों का दर्शन करते हैं। #तत्वज्ञान हुए बिना उस स्वप्न दर्शन को लाँघना अत्यंत कठिन बताया गया है है।

शास्त्रोंमें कहीं #जीवात्मा और #परमात्मा की पृथक्ताका प्रतिपादन करनेवाले वचन उपलब्ध होते हैं और कहीं उनकी एकताका। यह परस्पर विरोध देखकर दोषदृष्टि न करते हुए सनातन ज्ञानको प्राप्त करे।जो उन दोनों प्रकारके वचनोंका तात्पर्य समझकर मोक्षके तत्त्वको जान लेता है, वह वीतराग पुरुष संसारबन्धनसे मुक्त हो जाता है। 

#शान्तिपर्व

जैसे चोर या लुटेरे किसीकी भेड़को मारकर उसे कंधेपर उठाये हुए जबतक भागते हैं तबतक उन्हें सारी दिशाओंमें पकड़े जानेका #भय बना रहता है; और जब मार्गको प्रतिकूल समझकर उस भेड़के बोझको अपने कंधेसे उतार फेंकते हैं तब अपनी अभीष्ट दिशाको सुखपूर्वक चले जाते हैं।उसी प्रकार अज्ञानी मनुष्य जबतक सांसारिक कर्मरूप बोझको ढोते हैं तबतक उन्हें सर्वत्र भय बना रहता है; और जब उसे त्याग देते हैं, तब #शान्ति के भागी हो जाते हैं।जैसे चोर या डाकू जब उस चोरीके मालका बोझ उतार फेंकता है तब जहाँ उसे सुख मिलनेकी आशा होती है, उस दिशामें अनायास चला जाता है। उसी प्रकार मनुष्य राजस और तामस कर्मोको त्यागकर शुभ गति प्राप्त कर लेता है।

#शान्तिपर्व-२१५/१४

जैसे प्यासा मनुष्य पानी पीकर तृप्तिलाभ करता है, उसी प्रकार साधक ब्रह्म बोधक वाक्यको स्मरण करके सदा तृप्ति एवं सम्पूर्ण ज्ञान प्राप्त करता है और उस ज्ञानसे उस का सुख उत्तरोत्तर अभ्युदय को प्राप्त होता है।

जैसे एक ही जलमें मृत्तिकाविशेष एवं बीज
आदि द्रव्यविशेषके संयोगसे रसभेद उत्पन्न होते हैं, उसी प्रकार प्रकृति और आत्मा के संयोगसे गुण-कर्म के अनुसार अनेक प्रकारकी सृष्टि प्रकट होती है।

#शान्तिपर्व

भगवान् के जो गुण-सम्बन्धी नाम हैं, वे परमात्मा में औपचारिक हैं। नेत्र, मन तथा अन्य किसी इन्द्रिय के द्वारा भी उस सर्वव्यापी परमात्माका ग्रहण नहीं हो सकता। वाणीद्वारा भी उनका वर्णन नहीं किया जा सकता। केवल सूक्ष्म बुद्धिद्वारा उनका चिन्तन एवं साक्षात्कार किया जा सकता है।

पर्वदिनोंमें स्त्रीगमन करनेसे धन की हानि होती है; दिनमें करनेसे पाप होता है ,पृथिवी पर करनेसे रोग होते हैं और जलाशय में स्त्री प्रसंग करनेसे अमंगल होता है।

#विष्णुपुराण

शूद्रको भी उचित है कि दान दे, बलिवैश्वदेव अथवा नमस्कार आदि अल्प यज्ञोंका अनुष्ठान करे,पितृश्राद्ध आदि कर्म करे, अपने आश्रित कुटुम्बियोंके भरण-पोषण केलिये सकल वर्णोसे द्रव्य संग्रह करे और ऋतुकालमें अपनी ही स्त्रीसे प्रसंग करे। 

#विष्णुपुराण

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