भक्ति का महत्व

सो सुतंत्र अवलंब न आना। तेहि आधीन ग्यान बिग्याना॥
भगति तात अनुपम सुखमूला। मिलइ जो संत होइँ अनुकूला॥ 
भवार्थ:-
वह भक्ति स्वतंत्र है, उसको ज्ञान-विज्ञान आदि किसी दूसरे साधन का सहारा अपेक्षा नहीं है। ज्ञान और विज्ञान तो उसके अधीन हैं। हे अनुज! भक्ति अनुपम एवं सुख की मूल है; और वह तभी मिलती है, जब संत प्रसन्न होते हैं।
That devotion is independent, it does not expect recourse to any other means like knowledge and science.  Knowledge and science are subject to that.  Hey Anuj!  Devotion is the root of unique and happiness;  And she meets only when the saints are happy.



जो अगम सुगम सुभाव निर्मल असम सम सीतल सदा।
पस्यंति जं जोगी जतन करि करत मन गो बस सदा॥
सो राम रमा निवास संतत दास बस त्रिभुवन धनी।
मम उर बसउ सो समन संसृति जासु कीरति पावनी॥
भवार्थ:-
हे प्रभु आप अगम और सुगम हैं निर्मल स्वभाव हैं विषम और सम हैं और सदा शांत हैं। योगी बहुत साधन करने आप को देख पाते हैं। तीनों लोकों के स्वामी रमानिवास श्री राम निरंतर अपने दासों के वश में रहते हैं। आप मेरे हृदय में निवास करें आपकी पवित्र कीर्ति आवागमन को मिटाने वाली है।
O Lord, you are inaccessible and easy-going, you are pure, asymmetrical and even, and always calm.  Yogis are able to see a lot of resources.  Ramanivas, the lord of the three worlds, Shri Rama is constantly subdued by his slaves.  May you dwell in my heart, Your sacred fame is going to erase the traffic.

हेतु रहित जग जुग उपकारी। तुम्ह तुम्हार सेवक असुरारी॥
स्वारथ मीत सकल जग माहीं। सपनेहुँ प्रभु परमारथ नाहीं॥

भावार्थ

हे असुरों के शत्रु! जगत में बिना हेतु के (निःस्वार्थ) उपकार करने वाले तो दो ही हैं- एक आप, दूसरे आपके सेवक। जगत में (शेष) सभी स्वार्थ के मित्र हैं। हे प्रभो! उनमें स्वप्न में भी परमार्थ का भाव नहीं है॥

O enemies of evil person!  There are only two (unselfish) benefactors in the world who are without cause (selfless) - one is you, the other is your servant.  All (remaining) in the world are friends of selfishness.  Oh, Lord!  They do not even have the feeling of charitableness in their dreams.

राम भालु कपि कटकु बटोरा। सेतु हेतु श्रमु कीन्ह न थोरा॥
नामु लेत भवसिंधु सुखाहीं। करहु बिचारु सुजन मन माहीं॥

भावार्थ-

राम ने तो भालू और बंदरों की सेना बटोरी और समुद्र पर पुल बाँधने के लिए थोड़ा परिश्रम नहीं किया; परंतु नाम लेते ही संसार समुद्र सूख जाता है। सज्जनगण! मन में विचार कीजिए (कि दोनों में कौन बड़ा है)।

Rama did little to build an army of bears and monkeys and to build bridges over the sea;  But as soon as the name is taken, the world dries up.  Gentlemen!  Think in your mind (who is the bigger of the two).

नामु  लेत   भवसिंधु   सुखाहीं ।
करहु बिचारु सुजन मन माहीं ॥
(मानसबालकाण्ड, दोहा २५ । ४)

भगवान्‌ का नाम लेते ही संसार-समुद्र सूख जाता है और फिर तो पैदल ही चले जाओ पार । तैरना ही नहीं पड़े । कोई पुल बनानेकी भी जरूरत नहीं । ऐसे नाम महाराजको परिश्रम करना नहीं पड़ता । करहु बिचारु सुजन मन माहीं पहले यह बात कह आये हैं ‘को बड़ छोट कहत अपराधू । सुनि गुन भेदु समुझिहहिं साधू ॥’ यहाँ कहते हैं कि सज्जन लोग मनमें ही विचार कर लोहम छोटा-बड़ा क्या बतावेंआप ही विचार कीजिये कि इन दोनोंमें बड़ा कौन है ?

As soon as the name of God comes, the world-sea dries up and then go across on foot.  Did not have to swim. Here, gentlemen think in mind, what can we tell, big and small, you should consider who is the bigger of the two?

सगुनोपासक मोच्छ न लेंही । 
तिन्ह कहुँ राम भगति निज देहीं ।।
(मानस ६ . ११२ . ४)

स्नेहो मे परमो राजंस्त्वयि तिष्ठतु नित्यदा । भक्तिश्च नियता वीर भावो नान्यत्र गच्छतु ॥

(वा. रा. ७ . ४०.16)
सगुण स्वरूप की उपासना करनेवाले भक्त इस प्रकार मोक्ष लेते भी नहीं। उनको भगवान राम अपनी भक्ति देते हैं।
श्री हनुमानजी महाराज भी सिर्फ यही माँगते हैं,
हे प्रभु! आपके प्रति मेरा परम स्नेह सदा बना रहे । भगवान कहते है, हे वीर ! आपमें ही मेरी निश्चल भक्ति सदा बनी रहे।।


वेदाहं समतीतानि वर्तमानानि चार्जुन।
भविष्याणि च भूतानि मां तु वेद न कश्चन।।
।। अध्याय ०७, श्लोक २६ ।।
भवार्थ-
हे अर्जुन! 
पूर्व में व्यतीत हुए और वर्तमान में स्थित तथा आगे होने वाले सब भूतों को मैं जानता हूँ, परन्तु मुझको कोई भी श्रद्धा-भक्तिरहित पुरुष नहीं जानता। 
Hey Arjun!

 I know all the ghosts that have passed in the past and are present and going forward, but I do not know any devout and devout men.

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