तुलसीदास के वचन रामचरितमानस मे

नामु राम को कलपतरु कलि कल्यान निवासु।
जो सुमिरत भयो भाँग तें तुलसी तुलसीदासु॥ 

भावार्थ-

कलियुग में राम का नाम कल्पतरु और कल्याण का निवास है, जिसको स्मरण करने से भाँग-सा (निकृष्ट) तुलसीदास तुलसी के समान (पवित्र) हो गया॥ 

In Kali Yuga, the name of Rama is the abode of Kalpataru and Kalyan, on remembering it, Bhang-sa (inferior) Tulsidas became (holy) like Tulsi.


राम भगति मनि उर बस जाके
दुख लवलेस न सपनेहुँ ताके।
चतुर सिरोमनि तेइ जग माही
जे मनि लागि सुजतन कराही।।
अर्थ:-
श्री राम भक्ति रूपी मणि,जिस हृदय बसे,उसे स्वप्न मे भी लेशमात्र दुख नही,चराचर जगत मे वही मानव चतुर शिरोमणि है जो उस भक्ति रत्न पाने का यत्न करते है।
Lord Rama's devotional gem, the heart that is inhabited, does not have even the least grief in the dream, in the world of Chachar, it is the same clever man who strives to get that devotional gem.

फिरत सदा माया कर प्रेरा। काल कर्म सुभाव गुन घेरा॥
कबहुँक करि करुना नर देही। देत ईस बिनु हेतु सनेही॥

भावार्थ

तुलसीदास जी कहते है, माया की प्रेरणा से काल, कर्म, स्वभाव और गुण से घिरा हुआ (इनके वश में हुआ) यह सदा भटकता रहता है। बिना ही कारण स्नेह करने वाले ईश्वर कभी विरले ही दया करके इसे मनुष्य का शरीर देते हैं॥

Tulsidas ji says, surrounded by Kaal, Karma, nature and virtue (under his control), he always wanders from the inspiration of Maya.  Without loving reason, God seldom gives mercy to a man's body.

कबि न होउँ नहिं चतुर कहावउँ। मति अनुरूप राम गुन गावउँ॥

कहँ रघुपति के चरित अपारा। कहँ मति मोरि निरत संसारा॥5॥


भावार्थ-

तुलसीदास जी कहते है, मैं न तो कवि हूँ, न चतुर कहलाता हूँ, अपनी बुद्धि के अनुसार श्री रामजी के गुण गाता हूँ। कहाँ तो श्री रघुनाथजी के अपार चरित्र, कहाँ संसार में आसक्त मेरी बुद्धि !

Tulsidas ji says, I am neither a poet, nor am I called clever, I sing the virtues of Shri Ramji according to my intellect.  Where is the immense character of Shri Raghunathji, where is my wisdom in the world.


भरत चरित करि नेमु तुलसी जो सादर सुनहिं।

सीय राम पद पेमु अवसि होइ भव रस बिरति॥

भावार्थ

तुलसीदासजी कहते हैं- जो कोई भरतजी के चरित्र को नियम से आदरपूर्वक सुनेंगे, उनको अवश्य ही श्रीसीतारामजी के चरणों में प्रेम होगा और सांसारिक विषय रस से वैराग्य होगा।

Tulsidas ji says - Whoever listens to Bharatji's character with respect, he will surely fall in love at the feet of Shri Sitaramji and will have disinterest in worldly matters.

जेहिं पद सुरसरिता परम पुनीता प्रगट भई सिव सीस धरी।
सोई पद पंकज जेहि पूजत अज मम सिर धरेउ कृपाल हरी॥
एहि भाँति सिधारी गौतम नारी बार बार हरि चरन परी।
जो अति मन भावा सो बरु पावा गै पति लोक अनंद भरी॥

भावार्थ-

जिन चरणों से परमपवित्र देवनदी गंगा प्रकट हुईं, जिन्हें शिव ने सिर पर धारण किया और जिन चरणकमलों को ब्रह्मा पूजते हैं, कृपालु हरि (आप) ने उन्हीं को मेरे सिर पर रखा। इस प्रकार (स्तुति करती हुई) बार-बार भगवान के चरणों में गिरकर, जो मन को बहुत ही अच्छा लगा, उस वर को पाकर गौतम की स्त्री अहल्या आनंद में भरी हुई पति लोक को चली गई।


अस प्रभु दीनबंधु हरि कारन रहित दयाल।
तुलसिदास सठ तेहि भजु छाड़ि कपट जंजाल॥ 211॥

भावार्थ-

प्रभु राम ऐसे दीनबंधु और बिना ही कारण दया करनेवाले हैं। तुलसीदास कहते हैं, हे शठ (मन)! तू कपट-जंजाल छोड़कर उन्हीं का भजन कर॥ 211

Comments

Popular posts from this blog

धर्म के दश लक्षण (मनु के अनुसार)

शास्त्र

ब्राह्मण के नौ गुण क्या होते हैं