महार्षि वाल्मीकि के वचन रामचरितमानस में

जाहि न चाहिअ कबहुँ कछु तुम्ह सन सहज सनेहु।
बसहु निरंतर तासु मन सो राउर निज गेहु॥
भवार्थ:-
महर्षि वाल्मीकि ने कहा हे राम जिसको कभी कुछ भी नहीं चाहिए और जिसका आपसे स्वाभाविक प्रेम है, आप उसके मन में निरंतर निवास कीजिए, वह आपका अपना घर है|
Maharishi Valmiki said, O Ram, who never needs anything and whoever has a natural love for you, abide in his mind constantly, that is your own home.

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