धर्म का ज्ञान 2
तत्त्वज्ञ पुरुषको चाहिये कि वह अपमानको अमृतके समान समझकर उससे संतुष्ट हो और सम्मानको विषके तुल्य समझकर उससे सदा डरता रहे।सम्पूर्ण दोषोंसे मुक्त महात्मा पुरुष अपमानित होनेपर भी इस लोक और परलोकमें निर्भय होकर सुखसे सोता है; परंतु उसका अपमान करनेवाला पुरुष पापबंधनमें पड़ जाता है।न उनके कोई शत्रु होते हैं और न वे ही किसीके शत्रु होते हैं। जो मनुष्य ऐसा करते हैं, वे सदा सुखसे जीवन बिताते हैं महात्मा पुरुषोंकी कोई निन्दा करे या सदा उनकी प्रशंसा करे अथवा उनके सदाचार तथा पुण्यकर्मों पर पर्दा डालें, किंतु वे सबके प्रति एक-सी ही बुद्धि रखते हैं।उन मनीषी पुरुषोंसे कोई कटु वचन कह दे तो उस कटुवादी पुरुषको बदलेमें कुछ नहीं कहते। अपना अहित करनेवालेका भी हित ही चाहते हैं तथा जो उन्हें मारता है, उसे भी वे बदले में मारना नहीं चाहते। #शान्तिपर्व आत्मा (के मोक्ष) की सिद्धि तो वेदोंमें दस उपायोंद्वारा बतायी जाती है। जो गहन (दुर्बोध) ब्रह्म वेदवाक्योंमें वेददर्शी विद्वानोंद्वारा वर्णित हुआ है और वेदान्तवचनोंमें जिसका स्पष्टरूपसे वर्णन किया गया है, वह #क्रमयोग से लक्षित होता है।स्वाध्याय,गार्हस्थ्...