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Showing posts from May, 2021

धर्म का ज्ञान 2

तत्त्वज्ञ पुरुषको चाहिये कि वह अपमानको अमृतके समान समझकर उससे संतुष्ट हो और सम्मानको विषके तुल्य समझकर उससे सदा डरता रहे।सम्पूर्ण दोषोंसे मुक्त महात्मा पुरुष अपमानित होनेपर भी इस लोक और परलोकमें निर्भय होकर सुखसे सोता है; परंतु उसका अपमान करनेवाला पुरुष पापबंधनमें पड़ जाता है।न उनके कोई शत्रु होते हैं और न वे ही किसीके शत्रु होते हैं। जो मनुष्य ऐसा करते हैं, वे सदा सुखसे जीवन बिताते हैं महात्मा पुरुषोंकी कोई निन्दा करे या सदा  उनकी प्रशंसा करे अथवा उनके सदाचार तथा पुण्यकर्मों पर पर्दा डालें, किंतु वे सबके प्रति एक-सी ही बुद्धि रखते हैं।उन मनीषी पुरुषोंसे कोई कटु वचन कह दे तो उस कटुवादी पुरुषको बदलेमें कुछ नहीं कहते।  अपना अहित करनेवालेका भी हित ही चाहते हैं तथा जो उन्हें मारता है, उसे भी वे बदले में मारना नहीं चाहते। #शान्तिपर्व आत्मा (के मोक्ष) की सिद्धि तो वेदोंमें दस उपायोंद्वारा बतायी जाती है। जो गहन (दुर्बोध) ब्रह्म वेदवाक्योंमें वेददर्शी विद्वानोंद्वारा वर्णित हुआ है और वेदान्तवचनोंमें जिसका स्पष्टरूपसे वर्णन किया गया है, वह #क्रमयोग से लक्षित होता है।स्वाध्याय,गार्हस्थ्...

शिवमहिमा स्रोतरम

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   महिम्नस्तोत्र में कहा गया है--  स्तोत्रेण किल्बिषहरेण हरप्रियेण।  हर अर्थात्  शिव  तभी तो शिव तथा विष्णु दोनो एक साथ हो तो हरिहर कहलाते हैं। इस पंक्ति का अर्थ है कि  हर प्रकार के पापों को समन करने वाला यह स्तोत्र भगवान शिव को अतिप्रिय है। यह स्तोत्र साक्षात् शिवस्वरूप है तथा शिवभक्तों के मध्य अत्यंत प्रचलित हैं। शिवमहिम्न स्तोत्र में 43 श्लाेक हैं, श्लाेक तथा उनके भावार्थ निम्नांकित हैं पुष्पदन्त उवाच - महिम्नः पारं ते परमविदुषो यद्यसदृशी। स्तुतिर्ब्रह्मादीनामपि तदवसन्नास्त्वयि गिरः।। अथाऽवाच्यः सर्वः स्वमतिपरिणामावधि गृणन्। ममाप्येष स्तोत्रे हर निरपवादः परिकरः।। १।।   भावार्थ:  पुष्पदंत कहते हैं कि हे प्रभु ! बड़े बड़े विद्वान और योगीजन आपके महिमा को नहीं जान पाये तो मैं तो एक साधारण बालक हूँ, मेरी क्या गिनती? लेकिन क्या आपके महिमा को पूर्णतया जाने बिना आपकी स्तुति नहीं हो सकती? मैं ये नहीं मानता क्योंकि अगर ये सच है तो फिर ब्रह्मा की स्तुति भी व्यर्थ कहलाएगी। मैं तो ये मानता हूँ कि सबको अपनी मति अनुसार स्तुति करने का अधिकार ...

वैराग्य शतकम

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   भर्तृहरि के जीवन के विषय मे निश्चित रूप से कहा नही जा सकता। कहते है दूसरी शताब्दी मे महाराज गंधर्व सेन उज्जैन के राजा थे। उनकी दो पत्नी थी। पहली पत्नी के पुत्र भर्तृहरि और दूसरे पत्नी के पुत्र विक्रमादित्य जिनके नाम से विक्रम संवत प्रचलित हुआ। पिता के मृत्यु के बाद भर्तृहरि को राज्यभार मिला किंतु कुछ समय बाद उन्हे वैराग्य हुआ और उन्होंने अपना राज्य अपने छोटे भाई को दे दिया।  वैराग्य शतकम् - Part 1 ॥ वैराग्य शतकम् भर्तृहरिविरचितम् ॥ मंगलाचरणम्  दिक्कालाद्यनवच्छिन्नाऽनन्तचिन्मात्रमूर्त्तये । स्वानुभूत्येकमानाय नमः शान्ताय तेजसे ।। १ ।। अर्थ: जो दशों दिशाओं और तीनो कालों में परिपूर्ण है, जो अनन्त है, जो चैतन्य स्वरुप है, जो अपने ही अनुभव से जाना जा सकता है, जो शान्त और तेजोमय है, ऐसे ब्रह्मरूप परमात्मा को मैं नमस्कार करता हूँ । बोद्धारो मत्सरग्रस्ताः प्रभवः स्मयदूषिताः।  अबोधोपहताश्चान्ये जीर्णमंगे सुभाषितम्।। २ ।। अर्थ: जो विद्वान् हैं, वे इर्षा से भरे हुए हैं; जो धनवान हैं, उनको उनके धन का गर्व है; इनके सिवा जो और लोग हैं, वे अज्ञानी हैं; इसलिए विद्वत्...