धर्म का ज्ञान 2

तत्त्वज्ञ पुरुषको चाहिये कि वह अपमानको अमृतके समान समझकर उससे संतुष्ट हो और सम्मानको विषके तुल्य समझकर उससे सदा डरता रहे।सम्पूर्ण दोषोंसे मुक्त महात्मा पुरुष अपमानित होनेपर भी इस लोक और परलोकमें निर्भय होकर सुखसे सोता है; परंतु उसका अपमान करनेवाला पुरुष पापबंधनमें पड़ जाता है।न उनके कोई शत्रु होते हैं और न वे ही किसीके शत्रु होते हैं। जो मनुष्य ऐसा करते हैं, वे सदा सुखसे जीवन बिताते हैं

महात्मा पुरुषोंकी कोई निन्दा करे या सदा 
उनकी प्रशंसा करे अथवा उनके सदाचार तथा पुण्यकर्मों पर पर्दा डालें, किंतु वे सबके प्रति एक-सी ही बुद्धि रखते हैं।उन मनीषी पुरुषोंसे कोई कटु वचन कह दे तो उस कटुवादी पुरुषको बदलेमें कुछ नहीं कहते। 
अपना अहित करनेवालेका भी हित ही चाहते हैं
तथा जो उन्हें मारता है, उसे भी वे बदले में मारना नहीं चाहते।

#शान्तिपर्व

आत्मा (के मोक्ष) की सिद्धि तो वेदोंमें दस
उपायोंद्वारा बतायी जाती है। जो गहन (दुर्बोध) ब्रह्म वेदवाक्योंमें वेददर्शी विद्वानोंद्वारा वर्णित हुआ है और वेदान्तवचनोंमें जिसका स्पष्टरूपसे वर्णन किया गया है, वह #क्रमयोग से लक्षित होता है।स्वाध्याय,गार्हस्थ्य,संध्यावन्दनादि,कृच्छ्रचान्द्रायणादि,यज्ञ,पूर्तकर्म,योग,दान,गुरु शुश्रूषा और समाधि-ये #क्रमयोग दस हैं।

ब्राह्मणोंके लिये तप ही यज्ञ है, क्षत्रियों के लिये हिंसा प्रधान युद्ध आदि ही यज्ञ हैं, वैश्योंके लिये घृत आदि हविष्यकी आहुति देना ही यज्ञ है और शूद्रों केलिये तीनों वर्गोंकी सेवा ही यज्ञ है। 

#शान्तिपर्व

जन्म, मृत्यु, जरा और रोग आदि होनेके समय महान् दुःख और दोषोंका वैराग्य पूर्वक दर्शन करना दर्शनयोग है।जिसे योगके द्वारा सिद्धि प्राप्त करनी हो, उसे इन बारह योगोंका अवश्य अवलम्बन करना चाहिये।

#शान्तिपर्व-२३६/३

वह ब्रह्म वेदके कर्मकांडों में गुप्त रूप से प्रतिपादित हुआ है, अतः वेद के विद्वानों द्वारा भी वह अज्ञात ही रहता है। किंतु #वेदान्त में उसी #ब्रह्म का स्पष्ट रूप से प्रतिपादन किया गया है और निष्काम #कर्मयोग के द्वारा इस ब्रह्म का साक्षात्कार किया जा सकता है।

#शान्तिपर्व-२३८/११

तपस्या से मनुष्य उस ब्रह्मभाव को प्राप्त कर लेता है, जिसमें स्थित होकर वह संपूर्ण जगत की सृष्टि करता है। अतः #ब्रह्मभाव को प्राप्त व्यक्ति समस्त प्राणियों का #प्रभु हो जाता है।
वह ब्रह्म वेदके कर्मकांडों में गुप्त रूप से प्रतिपादित हुआ है, अतः वेद के विद्वानों द्वारा भी वह अज्ञात ही रहता है। किंतु #वेदान्त में उसी #ब्रह्म का स्पष्ट रूप से प्रतिपादन किया गया है और निष्काम #कर्मयोग के द्वारा इस ब्रह्म का साक्षात्कार किया जा सकता है।

#शान्तिपर्व-२३८/११

#शान्तिपर्व
नवद्वारं पुरं गत्वा हंसो हि नियतो वशी ।
ईशः सर्वस्य भूतस्य स्थावरस्य चरस्य च ॥

स्थावर - जंगम सभी प्राणियोंका ईश्वर स्वाधीन परमात्मा नव द्वारोंवाले शरीरमें प्रवेश करके हंस (जीव) रूपसे स्थिरतापूर्वक स्थित है।
 

हानिभङ्गविकल्पानां नवानां संचयेन च। 
शरीराणामजस्याहुर्हंसत्वं पारदर्शीनः ॥

पारदर्शी ( तत्त्वज्ञानी ) पुरुष परिणाममें हानि , भंग एवं विकल्पसे युक्त नवीन शरीरोंको बारंबार ग्रहण करनेके कारण अजन्मा परमात्माके अंशभूत जीवात्माको #हंस कहते हैं। 

शान्तिपर्व-१३९/३३

#हंस नामसे जिस अविनाशी #जीवात्मा का प्रतिपादन किया गया है , वह कूटस्थ #अक्षर ही है , इस प्रकार जो विद्वान उस अक्षर आत्माको यथार्थरूपसे जान लेता है , वह प्राण, जन्म और मृत्युके बन्धनको सदाके लिये त्याग देता है ।

ध्यान , वेदाध्ययन , दान , सत्य , लज्जा , सरलता , आचारशुद्धि एवं इन्द्रियोंका निग्रह - इनके द्वारा तेजकी वृद्धि होती है और पापोंका नाश हो जाता है। 

#शान्तिपर्व-२४०/११

जब अतिशय हर्ष, प्रेम, आनन्द, समता और
स्वस्थचित्तता-ये सद्गुण अकस्मात् या किसी कारणवश विकसित हों, तब समझना चाहिये कि ये #सात्विक गुण हैं।अभिमान, असत्यभाषण, लोभ, मोह और असहनशीलता-

ये दोष चाहे किसी कारणसे प्रकट हुए हों अथवा बिना कारणके हर एक परिस्थिति में #रजोगुण के ही चिह्न माने गये हैंजिस किसी कारणसे हो जायँ, उन्हे #तमोगुण का कार्य इसी प्रकार मोह, प्रमाद, निद्रा, तन्द्रा और अज्ञान जानना चाहिये। 

#शान्तिपर्व-२४७/१५

जब अतिशय हर्ष, प्रेम, आनन्द, समता और
स्वस्थचित्तता-ये सद्गुण अकस्मात् या किसी कारणवश विकसित हों, तब समझना चाहिये कि ये #सात्विक गुण हैं।अभिमान, असत्यभाषण, लोभ, मोह और असहनशीलता-

ये दोष चाहे किसी कारणसे प्रकट हुए हों अथवा बिना कारणके हर एक परिस्थिति में #रजोगुण के ही चिह्न माने गये हैंजिस किसी कारणसे हो जायँ, उन्हे #तमोगुण का कार्य इसी प्रकार मोह, प्रमाद, निद्रा, तन्द्रा और अज्ञान जानना चाहिये। 

#शान्तिपर्व-२४७/१५

जिसके पास वस्त्र के नाम पर एक लंगोटी मात्र है,
ओढ़ने केलिये एक चादर तक नहीं है, जो बिना 
बिछौनेके ही सोता है, बाँहोंका ही तकिया लगाता है और सदा शान्त भावसे रहता है, उसीको देवता ब्राह्मण मानते हैं।जिसको इस सम्पूर्ण जगत् की नश्वरताका ज्ञान है ,जो प्रकृति और उसके विकारोंसे परिचित है तथा जिसे सम्पूर्ण भूतोंकी गतिका ज्ञान है, उसे देवतालोग ब्रह्मज्ञानी मानते हैं।जो सम्पूर्ण भूतोंसे निर्भय है, जिससे समस्त प्राणी भय नहीं मानते हैं तथा जो सबभूतोंका आत्मा है, उसीको देवता ब्रह्मज्ञानी मानते हैं।

सम्पूर्ण शास्त्रों की एक मात्र निष्ठा यही है कि जो जो दृश्य पदार्थ है वह प्रतीति काल मैं तो विद्यमान् है, परंतु बाधित हो जानेपर वह नहीं है।ज्ञानी पुरुष की दृष्टिमें सदसत् स्वरूप #ब्रह्म ही इस जगत का आदि, मध्य और अन्त है।सब कुछ त्याग देने पर ही उस ब्रह्म की प्राप्ति होती है। यही बात संपूर्ण वेदों में निश्चित की गयी है।वह अपने आनंद स्वरूप में सब में अनुगत तथा #मोक्ष में प्रतिष्ठित है।

श्रेष्ठ पुरुष विधिपूर्वक सब आश्रमों में प्रवेश करके उनके धर्म का पालन करते हुए परम गति को प्राप्त होते हैं। कुछ लोग सन्यास लेकर, कुछ वानप्रस्थ का आश्रय लेकर, कुछ गृहस्थ रहकर और कोई ब्रह्मचर्य आश्रम का सेवन करते हुए ही उस आश्रम धर्म का पालन करके परम पद को प्राप्त होते हैं।उस समय वे ही द्विजगण आकाश में जो ज्योतिर्मय रूप दिखाई देते हैं, जो कि नक्षत्रों के समान ही आकाश के विभिन्न स्थानों में अनेक तारागण हैं - इन सबने सन्तोष के द्वारा ही अनन्त पद प्राप्त किया है, ऐसा वैदिक सिद्धान्त है।ऐसे पुण्यात्मा पुरुष यदि कभी पुनः संसार की धर्माधिकार युक्त योनियों में आते या जन्म ग्रहण करते हैं तो वे उस योनि के संबंध से पाप कर्मों द्वारा लिप्त नहीं होते हैं।

#शान्तिपर्व-२७०/२६

काम, क्रोध, लोभ, भय और निद्रा-ये ही
योगसम्बन्धी वे पाँच दोष हैं, जिनको विद्वान् पुरुष जानते हैं। इनका मूलोच्छेद कर देना चाहिये तथा इनका परित्याग करके वाणीको संयममें रखते हुए योगसाधनोंका सेवन करना चाहिये।

#शान्तिपर्व

मुमुक्षु पुरुषको चाहिये कि क्षमासे क्रोधका 
और संकल्पोंके त्यागसे कामनाओंका उच्छेद कर डाले। और पुरुष ज्ञानध्यानादि सात्त्विक गुणोंके सेवनसे निद्राका क्षय करे।अप्रमादसे भयको दूर करे, आत्माके चिन्तनसे श्वासकी रक्षा करे अर्थात् #प्राणायाम करे और धैर्यके द्वारा इच्छा, द्वेष एवं कामका निवारण करे।तत्त्ववेत्ता पुरुष शास्त्रके अभ्याससे भ्रम, मोह 
और संशयका तथा आलस्य और प्रतिभा (नानाविषयिणी बुद्धि)-इन दोनों दोषोंका ज्ञानके अभ्याससे निराकरण करे।

शब्द ब्रह्मणि निष्णातः परं ब्रह्माधिगच्छति।शरीरमेतत् कुरुते यद्वेदे कुरुते तनुम्॥

जो पुरुष #शब्दब्रह्म में पारंगत (वेदोक्त कर्मोंके अनुष्ठान से शुद्धचित्त हो चुका) है, वह #परब्रह्म को प्राप्त कर लेता है। 

#शान्तिपर्व


पिता और माता वेदोक्त गर्भाधानकी विधिसे बालकके जिस शरीरको जन्म देते हैं, वे उस बालकके उस शरीरका ही संस्कार करते हैं ।इस प्रकार जिसका शरीर वैदिक संस्कारसे संस्कृत हो जाता है, वही #ब्रह्मज्ञान का पात्र होता है।

जो अपना #धर्म(कर्तव्य) समझ कर बिना किसी प्रकारकी भोगेच्छाके यज्ञोंका अनुष्ठान करते हैं, उनके उस #यज्ञ का फल वेद या इतिहास द्वारा नहीं जाना जाता है। 

#शान्तिपर्व

विद्वान् पुरुष वस्तुओंकी अनित्यताका चिन्तन करके स्नेहको, #योगाभ्यास के द्वारा क्षुधाको, करुणाके द्वारा अपने अभिमानको और #संतोष से तृष्णाको जीते।
आलस्यको उद्योगसे और विपरीत तर्कको शास्त्रके प्रति दृढ़ विश्वाससे जीते, #मौनावलम्बन द्वारा बहुत बोलनेकी आदतको और शूरवीरताके द्वारा #भय को त्याग दे।
मन और वाणीको अर्थात् मनसहित समस्त इन्द्रियोंको #बुद्धि द्वारा वशमें करे, बुद्धिका विवेकरूप नेत्रद्वारा शमन करे, फिर #आत्मज्ञान द्वारा विवेकज्ञानका शमन करे और आत्माको परमात्मामें विलीन कर दे।
इस प्रकार पवित्र आचार-विचारसे युक्त साधकको सब ओरसे उपरत होकर शान्तभावसे परमात्माका साक्षात्कार
करना चाहिये।

इस जगत्में समस्त जीव - समुदायको परागति चौदह लाख बतायी गयी है । ( पाँच कर्मेन्द्रिय पाँच ज्ञानेन्द्रिय तथा मन , बुद्धि , चित्त और अहंकार ये चौदह करण हैं । 

इन्हींके भेदसे चौदह प्रकारकी गति होती है । फिर विषयभेदसे वृत्तिभेद होनेके कारण चौदह लाख प्रकारकी गति होती है । )जीवका जो ऊर्ध्वलोकोंमें गमन होता है , वह भी उन्हीं चौदह करणोंद्वारा सम्पादित होता है । विभिन्न स्थानोंमें जो स्थिरतापूर्वक निवास है , वह और उन स्थानोंसे जो उन जीवोंका अधःपतन होता है , वह भी उन्हींके सम्बन्धसे होता है ।


सहस्रों कल्पोंतक देवरूपसे विचरते रहनेपर भी जीव विषयभोगसे मुक्त नहीं होता तथा प्रत्येक कल्पमें किये हुए अशुभ कर्मोंके फलोंको नरकमें रहकर भोगता हुआ जीव उन्नीस हजार विभिन्न गतियोंको प्राप्त होता है । तत्पश्चात् उसे नरकसे छुटकारा मिलता है ।मनुष्यके सिवा अन्य सभी योनियोंमें केवल सुख दुःखके भोग प्राप्त होते हैं । मोक्षका सुयोग हाथ नहीं लगता है । दस इन्द्रिय,पाँचप्राण और चार अंत:करण ये उन्नीस भोग के साधन हैं ,और वृत्तियों की भेदसे इन्हींके इतने ही सौ और उतने ही हज़ार प्रकार हो जाते हैं।

प्राणियोंके वर्ण छ : प्रकारके हैं - कृष्ण , धूम्र , नील , रक्त , हरिद्रा ( पीला ) और शुक्ल।

इनमें से कृष्ण , धूम्र और नील वर्णका सुख मध्यम होता है ।
रक्तवर्ण विशेष रूपसे सहन करने योग्य होता है । 
हरिद्राकी - सी कान्ति सुख देनेवाली होती है। 
शुक्लवर्ण अत्यन्त सुखदायक होता है।जब तमोगुणकी अधिकता , सत्त्वगुणकी न्यूनता और रजोगुणकी सम अवस्था हो , तब #कृष्णवर्ण होता है । यह #स्थावर सृष्टिका रंग माना गया है । 

तमोगुणकी अधिकता , रजोगुणकी न्यूनता और सत्त्वगुणकी सम अवस्था होनेपर #धूम्रवर्ण होता है । यह #पशु_पक्षी की योनिमें जन्म लेनेवाले प्राणियोंका वर्ण है ।रजोगुणकी अधिकता , सत्त्वगुणकी न्यूनता और तमोगुणकी सम अवस्था होनेपर #नीलवर्ण होता है । यह #मानवसर्ग का वर्ण बताया गया है ।

इसीमें जब सत्त्वगुणकी सम अवस्था और तमोगुणकी न्यूनता हो तो माध्यम वर्ण होता है। उसका रंग #लाल होता है। इसे #अनुग्रह सर्ग कहते हैं।

गुणहीन मनुष्य अधिकतर अपनी प्रशंसा किया करते हैं। वे अपनी में गुणोंकी कमी देखकर दूसरे गुणवान् पुरुषों के गुणों में दोष बताकर उन पर आक्षेप किया करते हैं।
कल्याण चाहने वाला पुरुष रात में घूमना,दिन में सोना,आलस्य,चुगली,मादक वस्तुका सेवन, आहार-बिहारका अधिक मात्रामें सेवन और उसका सर्वथा परित्याग - ये सब बातें त्याग दे।

#शान्तिपर्व

मूर्ख मनुष्य केवल अपनी प्रशंसा करने से ही
जगत् में ख्याति नहीं पा सकता।विद्वान् पुरुष गुफामें छिपा रहे तो भी उसकी सर्वत्र प्रसिद्धि हो जाती है।

#शान्तिपर्व-२८७/३२

Foolish man only by praising himself
 He cannot get fame in the world. Even if a learned man hides in a cave, he gets fame everywhere.

बुद्धिमान् पुरुष ज्ञानवान् होनेपर भी बिना पूछे किसीको कोई उपदेश न करे। अन्याय पूर्वक पूछनेपर भी किसीके प्रश्नका उत्तर न दे। जडकी भाँति चुपचाप बैठा रहे।मनुष्यको सदा धर्ममें लगे रहनेवाले साधु-महात्माओं तथा स्वधर्मपरायण उदार पुरुषोंके समीप निवास करनेकी इच्छा रखनी चाहिये।

संसारी जीवोंको तो जब उनके स्नेह के आधारभूत स्त्री, पुत्र आदि का नाश हो जाता है, #धन चला जाता और #रोग तथा चिंता से कष्ट उठाना पड़ता है, तभी #बैराग्य होता है।वैराग्य से मनुष्य को आत्मतत्व की #जिज्ञासा होती है।जिज्ञासा से शास्त्रोंके #स्वाध्याय में मन लगता है तथा शास्त्रों के अर्थ और भाव के ज्ञान से वह #तप को ही कल्याण का साधन समझता है।संसार में ऐसा विवेकी मनुष्य दुर्लभ है, जो स्त्री पुत्र आदि प्रियजनों से मिलने वाले सुख के न रहने पर तपमें प्रवृत्त होनेका निश्चय करता है।

#शान्तिपर्व-२९५/१३

शूद्रको तीनों वर्णोका नित्य सेवक बताया जाता
है । यदि ब्राह्मण जीविकाके अभावमें क्षत्रिय अथवा
वैश्यके धर्मसे जीवन - निर्वाह करे तो वह पतित नहीं
होता है ; किंतु जब वह शूद्रके धर्मको अपनाता है , तब
तत्काल पतित हो जाता है।जब शूद्र सेवावृत्तिसे जीविका न चला सके , तब उसके लिये भी व्यापार , पशुपालन तथा शिल्पकला
आदिसे जीवन - निर्वाह करनेकी आज्ञा है।

#शान्तिपर्व-२९४/४

असंतोष दुःखका ही कारण है। लोभसे मन और इन्द्रियाँ चंचल होती हैं, उससे मनुष्यकी बुद्धि उसी प्रकार नष्ट हो जाती है, जैसे बिना अभ्यासके विद्या। 
Discontent is the cause of sorrow.  Greed makes the mind and senses fickle; it destroys the intellect of man in the same way as learning without practice.
#शान्तिपर्व-२९५/२५


रंगमंचपर स्त्री आदिके वेषमें उतरकर नाचना या खेल दिखाना , बहुरूपिये का काम करना , मदिरा और मांस बेचकर जीविका चलाना तथा लोहे और चमड़े की बिक्री करना - ये सब काम ( सबके लिये ) लोकमें निन्दित माने गये हैं ।जिसके घरमें पूर्वपरम्परासे ये काम न होते आये हों , उसे स्वयं इनका आरम्भ नहीं करना चाहिये । जिसके यहाँ पहलेसे इन्हें करनेकी प्रथा हो , वह भी छोड़ दे तो महान् धर्म होता है - ऐसा शास्त्रका निर्णय है ।
Dancing or showing a game in the guise of a woman on the stage, working as a masquerade, making a living by selling liquor and meat, and selling iron and leather - all these works (for all) are considered to be condemned in the world.  Yes, he should not start them himself.  Those who already have the practice of doing them here, leave that too.

 If given, then there is a great religion - such is the judgment of the scriptures.

#शान्तिपर्व

जो सूर्यके उत्तरायण होनेपर उत्तम नक्षत्र और पवित्र मुहूर्तमें मृत्युको प्राप्त होता है , वह पुण्यात्मा है। वह किसीको भी कष्ट न देकर प्रायश्चित्तके द्वारा अपने पापको नष्ट कर डालता है और अपनी शक्तिके अनुसार शुभकर्म करके स्वेच्छासे मृत्युको अंगीकार करता है।
किंतु विष खा लेनेसे , गलेमें फांसी लगानेसे ,
आगमें जलनेसे , लुटेरोंके हाथसे तथा दाढ़वाले पशुओं के
आघातसे जो वध होता है , वह अधम श्रेणीका माना
जाता है। पुण्यकर्म करनेवाले मनुष्य इस तरहके उपायोंसे
प्राण नहीं देते तथा ऐसे - ऐसे दूसरे अधम उपायोंसे भी
उनकी मृत्यु नहीं होती।

#शान्तिपर्व

जो लोग देहको पाकर पाकर हठपूर्वक उसका परित्याग
कर देते हैं , उनको पूर्ववत् ही यातनामय शरीरकी प्राप्ति
होती है । ऐसे लोग ( #आत्महत्या के कारण उस लाभसे वंचित हो )
एक घरसे दूसरे घरमें जानेवाले मनुष्यों के समान  एक 
शरीरसे दूसरे शरीरको प्राप्त होते हैं।इनकी उस अवस्थाके प्राप्त होने में आत्महत्या रूप
#पाप के सिवा दूसरा कोई कारण नहीं है । 
उन प्राणियोंको उस शरीरका मिलना उचित ही है , 
जो कि पंचभूतमय है।

#शान्तिपर्व

संसारके विविध प्राणियोंमें चलने-फिरनेवाले जीव श्रेष्ठ माने गये हैं । इन जंगम प्राणियोंमें भी दो पैरवाले जीव श्रेष्ठ कहे गये हैं। मनुष्योंमें भी #द्विज श्रेष्ठ कहे गये हैं । द्विजोंमें बुद्धिमान् और बुद्धिमानोंमें भी #आत्मज्ञानी श्रेष्ठ समझे जाते हैं ।उनमें भी जो अहंकाररहित हैं , उन्हें सर्वश्रेष्ठ माना गया है।

जिस तरह अगाध सरोवर से हजारों नालियाँ निकलती हैं, उसी तरह सत्त्वनिधि श्रीहरि के असंख्य अवतार होते हैं। सभी प्रजापतिगण, ऋषिगण, मनुगण तथा महाओजस्वी मनुओं के पुत्रगण ये सबके सब श्रीहरि के अंश हैं।

#श्रीमद्भागवत

युधिष्ठिरने पूछा-तात! धर्मज्ञ कुरुश्रेष्ठ! #सांख्य और #योग में क्या अन्तर है? यह बतानेकी कृपा करें। 

भीष्मजी-सांख्यके विद्वान् सांख्यकी और योगके ज्ञाता द्विज योगकी प्रशंसा करते हैं। दोनों ही अपने-अपने पक्षकी उत्कृष्टता सूचित करनेके लिये उत्तमोत्तम युक्तियोंका प्रतिपादन करतेयोगके मनीषी विद्वान् अपने मतकी 
श्रेष्ठता बताते हुए यह युक्ति उपस्थित करते हैं कि #इश्वर का अस्तित्व स्वीकार किये बिना किसीकी भी मुक्ति कैसे हो सकती है? (अत: मोक्षदाता ईश्वरकी सत्ता अवश्य स्वीकार करनी चाहिये)।#सांख्य मतके माननेवाले मोक्षका कारण इस प्रकार बताते हैं-सब प्रकारकी गतियोंको जानकर जो विषयोंसे विरक्त हो जाता है, वही देहत्यागके अनन्तर मुक्त होता है। यह बात स्पष्टरूपसे सबकी समझमें आ सकती है। दूसरे किसी उपायसे
मोक्ष मिलना असम्भव है। इस प्रकार वे सांख्यको ही #मोक्षदर्शन कहते हैं।

युधिष्ठिरने कहा - महाराज ! आप मेरे हितैषी हैं , 
आपने मुझ शिष्यके प्रति शिष्ट पुरुषोंके मतके अनुसार 
इस योगमार्गका यथोचितरूपसे वर्णन किया। 

अब मैं #सांख्य विषयक सम्पूर्ण विधि पूछ रहा हूँ । 
आप मुझे उसे बतानेकी कृपा करें ; क्योंकि तीनों लोकोंमें भीष्मजीने कहा - युधिष्ठिर ! आत्मतत्त्वके 
मुझसे सुनो । इसे ईश्वरकोटिके #कपिल आदि सम्पूर्ण 
यतियोंने प्रकाशित किया है। 

इस मतमें किसी प्रकारकी भूल नहीं 
दिखायी देती । इसमें गुण तो बहुत - से हैं ; किंतु दोषोंका 
सर्वथा अभाव है।
जो ज्ञान है , वह आपको विदित है।नेत्र रूप - गुणसे संयुक्त हैं । प्राणेन्द्रिय गन्ध नामक 
गुणसे सम्बन्ध रखती है । श्रोत्रेन्द्रिय शब्दमें आसक्त है 
और रसना रसगुणमें। त्वचा स्पर्शनामक गुणमें आसक्त है ।
इसी प्रकार वायुका आश्रय आकाश , मोहका आश्रय तमोगुण 
और लोभका आश्रय इन्द्रियोंके विषय हैं।गतिका आधार #विष्णु , बलका #इन्द्र , उदरका 
#अग्नि तथा पृथ्वीदेवीका आधार #जल है । जलका तेज , 
तेजका वायु , वायुका आकाश , आकाशका आश्रय 
महत्तत्त्व अर्थात् महत्तत्त्वका कार्य अहंकार
अहंकारका अधिष्ठान समष्टि बुद्धि है।बुद्धिका आश्रय तमोगुण , तमोगुणका आश्रय रजोगुण और
और रजोगुणका आश्रय सत्त्वगुण है । सत्त्वगुण 
जीवात्माके आश्रित है । जीवात्माको भगवान् 
नारायणदेवके आश्रित समझो । भगवान् नारायणका आश्रय है 
मोक्ष ( परब्रह्म ) , परंतु मोक्षका कोई भी आश्रय नहीं है।
इन बातोंको भलीभाँति जानकर तथा सत्त्वगुणको ,
मनसहित ग्यारह इन्द्रिय , पाँच प्राण - इन सोलह गुणोंसे
घिरे हुए सूक्ष्म शरीरको , शरीरके आश्रित रहनेवाले
स्वभाव और चेतनाको जाने ।जिसमें पापका लेश भी नहीं है , वह एकमात्र #जीवात्मा 
शरीरके भीतर हृदयरूपी गुफामें उदासीन - भावसे विद्यमान है , 
इस बातको जाने । 

विषयकी अभिलाषा रखनेवाले मनुष्योंका 
जो #कर्म है , वह शरीरके भीतर आत्माके अतिरिक्त
दूसरा तत्त्व है । यह भी अच्छी तरह जान ले।इन्द्रिय और इन्द्रियोंके विषय - ये सब - के - सब
शरीरके भीतर स्थित हैं । मोक्ष परम दुर्लभ वस्तु है । इन
सब बातोंको वेदोंके स्वाध्यायपूर्वक भलीभाँति समझ ले।
प्राण , अपान , समान , व्यान और उदान - ये पाँच
प्राणवायु हैं । अधोगामी वायु छठा और ऊर्ध्वगामी प्रवह
नामक वायु सातवाँ है । ये वायुके जो सात भेद हैं ,
प्रत्येकके सात - सात भेद और हो जाते हैं । इस
प्रकार कुल ४९ वायु होते हैं ।अनेक प्रजापति ,अनेक ऋषि तथा मुक्तिके अनेकानेक उत्तम मार्ग हैं । इन सबकी जानकारी प्राप्त करनी चाहिये। सप्तर्षियों , बहुसंख्यक राजर्षियों , देवर्षियों , अन्यान्य महापुरुषों तथा सूर्यके समान तेजस्वी ब्रह्मर्षियोंका
भी ज्ञान प्राप्त करे।

कुन्तीनन्दन ! ऐसी प्रसिद्धि है कि यह सांखयशास्त्र 
ही उस निराकार परमात्माका आकार है । भरतश्रेष्ठ । 
जितने ज्ञान हैं , वे सब सांख्यकी ही मान्यताका प्रतिपादन 
करते हैं।महात्मा पुरुषोंमें , वेदोंमें , सांख्यों
( दर्शनों ) में , योगशास्त्रमें तथा पुराणोंमें जो नाना
प्रकारका उत्तम ज्ञान देखा जाता है , वह सब सांख्यसे
ही आया हुआ है।बड़े - बड़े इतिहासोंमें , सत्पुरुषों- 
द्वारा सेवित अर्थशास्त्रमें तथा इस संसारमें जो कुछ भी 
महान् ज्ञान देखा गया है , वह सब सांख्यसे ही प्राप्त 
हुआ है।

यो हि च शास्त्रे च ग्रन्थधारणतत्परः ।
न च ग्रन्थार्थतत्त्वज्ञस्तस्य तद्धारणं वृथा ॥

जो वेद और शास्त्रके ग्रन्थोंको तो याद रखनेमें
तत्पर है , किंतु उनके यथार्थ तत्त्वको नहीं समझा ,
उसका वह याद रखना व्यर्थ है। 

#शान्तिपर्व

जो स्थूल एवं मन्दबुद्धिसे युक्त होनेके कारण 
विद्वानोंकी सभामें शास्त्रग्रन्थका अर्थ नहीं बता 
सकता , वह निर्णयपूर्वक उस ग्रन्थका तात्पर्य कैसे कह 
सकता है ?जिसका चित्त शास्त्रज्ञानसे शून्य है , वह ग्रन्थके 
तात्पर्यका ठीक - ठीक निर्णय कर ही नहीं सकता । यदि 
वह कुछ कहता है तो मनस्वी होनेपर भी लोगोंके
उपहासका पात्र बनता है।

पुरुष और प्रकृति - ये दो तत्व हैं । इनके
स्वरूपको व्यक्त करनेवाले जो तीन प्रकारके #सात्त्विक ,
#राजस और #तामस चिह्न हैं , वे सब प्राकृत माने गये
हैं ; परंतु जो लिंगी अर्थात् इन सबका आधार #आत्मा है ,
वह न पुरुष कहा जा सकता है और न प्रकृति ही । वह
इन दोनोंसे विलक्षण है।जैसे फूलों और फलोंद्वारा सदा #निराकार ऋतुओंका
अनुमान हो जाता है , उसी प्रकार निराकार #पुरुष का
संयोग पाकर अपने द्वारा उत्पन्न किये हुए जो #महत्तत्त्व
आदि लिंग हैं , उन्हींके द्वारा #प्रकृति अनुमानका विषय
होती है।
#शान्तिपर्व

शरीरमें जो त्वचा , मांस , रुधिर , मेदा , पित्त , मज्जा , स्नायु और
इन्द्रियसमुदाय हैं ( वे सब माता - पिताके सम्बन्धसे प्रकट हुए हैं )। 

द्रव्यसे द्रव्य , इन्द्रियसे इन्द्रिय तथा देहसे देहकी प्राप्ति होती है।परंतु परमात्मा तो इन्द्रिय , बीज , द्रव्य और देहसे रहित तथा निर्गुण है ; अत : उसमें गुण कैसे हो सकते हैं। 

जैसे आकाश आदि गुण सत्त्व आदि गुणोंसे सत्त्व , रज , तम - ये तीनों गुण भी प्रकृतिसे उत्पन्न होते और उसीमें लीन होते हैं।तुम यह जान लो कि त्वचा , मांस , रुधिर , मेदा , पित्त , मजा , अस्थि और स्नायु - ये आठों वस्तुएँ वीर्यसे उत्पन्न हुई हैं ; इसलिये प्राकृत ही हैं।

संपूर्ण प्राणियों का प्रलय #नैमित्तिक, #प्राकृतिक और #आत्यन्तिक - 3 प्रकारका होता है।उसमें से जो कल्पान्तमें  ब्राह्म प्रलय होता है वह नैमित्तिक, जो मोक्ष नामक प्रलय है वह आत्यन्तिक और जो दो परार्द्धाके अन्तमें होता है वह प्राकृत #प्रलय कहलाता है।

#विष्णुपुराण

२५वाँ तत्त्वरूप महान् आत्मा अव्यक्त प्रकृतिको जानता है, इसलिये उसे '#बुध्यमान' कहते हैं; परंतु वह भी २६वें तत्त्वरूप निर्मल नित्य शुद्ध बुद्ध सनातन #परमात्मा को नहीं जानता है; किंतु वह सनातन परमात्मा उस २५वें तत्त्वरूप #जीवात्मा को तथा  २४वीं प्रकृतिको भी भलीभाँति जानता है।चौबीसवीं अव्यक्त प्रकृति न तो अद्वितीय ब्रह्मको देख पाती है और न पचीसवें तत्त्व रूप जीवात्माको। जब #जीवात्मा अव्यक्त ब्रह्मकी ओर दृष्टि रखकर अपनेको #प्रकृति से भिन्न मानता है , तब यह प्रकृतिका #अधिपति हो जाता है।

#शान्तिपर्व-३०८/९

वन में रहकर भी जो ग्रामीण सुखों का उपभोग करने में लगा है, उसको ग्रामीण ही समझना चाहिये, तथा गांवों में रहकर भी जो वनवासी मुनियोंके-से  बर्तावमें ही सुख मानता है, उसकी गिनती वनवासियों में ही करनी चाहिये। 

#शान्तिपर्व

समाधिमें स्थित हुए #योगी_के_लक्षण -

जैसे तृप्त हुआ मनुष्य सुखसे सोता है , उसी  प्रकार योगयुक्त पुरुषके चित्तमें सदा प्रसन्नता बनी रहती है - वह समाधिसे विरत होना नहीं चाहता । यही उसकी प्रसन्नताकी पहचान है।जैसे तेलसे भरा हुआ दीपक वायुशून्य स्थानमें
एकतार जलता रहता है । उसकी शिखा स्थिरभावसे 
ऊपरकी ओर उठी रहती है , उसी तरह समाधिनिष्ठ 
योगीको भी मनीषी पुरुष स्थिर बताते हैं।जैसे बादलकी बरसायी हुई बूंदोंके आघातसे
पर्वत चंचल नहीं होता , उसी तरह अनेक प्रकारके 
विक्षेप आकर योगीको विचलित नहीं कर सकते । यही 
योगयुक्त पुरुषकी पहचान है।उसके पास बहुत - से शंख और नगाड़ोंकी ध्वनि 
हो और तरह - तरहके गाने - बजाने किये जायें तो भी 
उसका ध्यान भंग नहीं हो सकता ।

शब्द , स्पर्श , रूप , रस और गन्ध- 
ये इन्द्रियोंके पाँच दोष हैं । इन दोषोंको दूर करे । फिर लय 
और विक्षेपको शान्त करके सम्पूर्ण इन्द्रियोंको मनमें स्थिर 
करे । तत्पश्चात् मनको अहंकारमें , अहंकारको 
बुद्धिमें और बुद्धिको प्रकृतिमें स्थापित करे ।
इस प्रकार सबका लय करके योगी पुरुष केवल उस परमात्माका 
ध्यान करते हैं , जो रजोगुणसे रहित , निर्मल , नित्य , अनन्त , 
शुद्ध , छिद्ररहित , कूटस्थ , अन्तर्यामी , अभेद्य , अजर , अमर ,
अविकारी , सबका शासन करनेवाला और सनातन #ब्रह्म है ।

मोह, अप्रकाश (अज्ञान), तामिस्र और अन्धतामिस्र ये सब #तमोगुण के लक्षण हैं। इनमें #तामिस्र क्रोधका वाचक है और #अन्धतामिस्र मरण का। भोजनमें रुचि का न होना, खाने की वस्तुओं से तृप्ति या संतोषका अभाव अथवा कितना ही भोजन क्यों न मिले, उसे पर्याप्त न मानना,पीनेकी वस्तुओंसे कभी तृप्त न होना, दुर्गन्ध युक्त वस्त्र, अनुचित विहार, मलिन शय्या और आसनों का सेवन, दिन में सोना, अत्यन्त वाद-विवादमें और प्रमादमें अत्यन्त आसक्त रहना, अज्ञानवश नाच-गीत और नाना प्रकारके बाजों में श्रद्धा, नाना प्रकार के धर्मों से द्वेष-
ये #तमोगुण के लक्षण हैं।

धैर्य, आनन्द, प्रीति, उत्कर्ष, प्रकाश (ज्ञानशक्ति), सुख, शुद्धि, आरोग्य, संतोष, श्रद्धा, अकार्पण्य (दीनताका अभाव), असंरम्भ (क्रोधका अभाव), क्षमा ,धृति, अहिंसा, समता, सत्य, ऋणसे रहित होना, मृदुता, लज्जा, अचंचलता, शौच, सरलता ,सदाचार, अलोलुपता, हृदय में सम्भ्रमका न होना,इष्ट और अनिष्टके वियोगका बखान न करना,दान के द्वारा धैर्य धारण करना,किसीवस्तुकीइच्छानकरना,परोपकार और सम्पूर्ण प्राणियों पर दया-
ये सब #सत्त्व सम्बन्धी गुण बताये गये हैं।

जो #गृहस्थ - आश्रममें दोष देखकर उसका परित्याग 
करके दूसरे आश्रममें चला जाता है , वह भी कुछ 
छोड़ता है और कुछ ग्रहण करता है ; अतः उसे भी 
संगदोषसे छुटकारा नहीं मिलता है। 
किसीका निग्रह और किसीपर अनुग्रह करना ही 
आधिपत्य ( प्रभुत्व ) कहलाता है । यह जैसे राजामें है , 
। वैसे #संन्यासी में भी है । इस दृष्टिसे जब संन्यासी भी
राजाओं के ही समान हैं , तब केवल वे ही मुक्त होते 
हैं - ऐसा माननेका क्या कारण है ?
#शान्तिपर्व

मेरी तो यह धारणा है कि गेरुआ वस्त्र पहनना , 
मस्तक मुड़ा लेना तथा त्रिदण्ड और कमण्डलु धारण
करना - ये सब उत्कृष्ट संन्यासमार्गका परिचय देनेवाले
चिह्नमात्र हैं । इनके द्वारा मोक्षकी सिद्धि नहीं होती ।-राजा #जनक 
यदि इन चिह्नोंके रहते हुए भी यहाँ दुःखसे
सर्वथा मोक्ष पानेके लिये एकमात्र ज्ञान ही उपाय है
तो जितने भी चिह्न धारण किये जाते हैं , वे सब
निरर्थक हैं।अथवा यदि कहें कि #त्रिदण्ड और #गैरिक_वस्त्र
आदि धारण करनेसे कुछ सुविधा प्राप्त होती है और
कष्ट कम होता है , इसलिये संन्यासियोंने उन चिह्नोंको 
धारण करनेका विचार किया है तो छत्र आदि धारण
करनेमें भी इसी सामान्य प्रयोजनकी ओर क्यों न दृष्टि
रखी जाय ?
#शान्तिपर्व

जो मेरी दाहिनी बाँहपर चन्दन छिड़के और जो बायीं बाँहको बसूलेसे काटे तो ये दोनों ही मनुष्य मेरे लिये एक समान हैं। मेरी दृष्टिमें मिट्टीके ढेले , पत्थर और सुवर्ण सब
आसक्तिरहित होकर राजाके पदपर प्रतिष्ठित हूँ । अतः अन्य त्रिदण्डी साधुओंसे मेरा स्थान विशिष्ट है।मैंने मोक्षरूपी पत्थरपर रगड़कर तेज किये हुए
त्याग - वैराग्यरूपी तलवारसे राज्य और ऐश्वर्यरूपी
पाशको तथा स्नेहके आश्रयभूत स्त्री - पुत्र आदिके
ममत्वरूपी बन्धनको काट डाला है।संन्यासिनी ! इस प्रकार मैं जीवन्मुक्त हूँ । आपमें योगका प्रभाव देखकर यद्यपि आपके प्रति मेरी आस्था और आदर - बुद्धि हो गयी है तथापि मैं आपके इस रूप और सौन्दर्यको योगसाधनाके योग्य नहीं मानता , अतः इस विषयमें मैं जो कुछ कहता हूँ , मेरे उस वचनको आप सुनिये।सुकुमारता , #सौन्दर्य , मनोहर शरीर तथा #यौवनावस्था- 
ये सारी वस्तुएँ #योग के विरुद्ध हैं ; फिर भी आपमें इन 
सब गुणों के साथ - साथ योग और नियम भी हैं ही , यह 
कैसे सम्भव हुआ ? यही मेरे मनमें संदेह है।यह जो त्रिदण्डधारणरूप चिह्न है , उसके अनुरूप 
आपकी कोई चेष्टा नहीं है । यह मुक्त है या 
नहीं , इसकी परीक्षा लेनेके लिये आपने मेरे शरीरको 
अभिभूत कर दिया है - उसपर बलात् अधिकार जमा 
लिया है।मनुष्य योगयुक्त होकर भी यदि कामभोगमें 
आसक्त हो जाय तो उसका त्रिदण्ड धारण करना 
अनुचित एवं व्यर्थ है । आप अपने इस बर्तावद्वारा 
संन्यास - आश्रमके नियमकी रक्षा नहीं कर रही हैं । यदि 
अपने स्वरूपको छिपानेके लिये आपने ऐसा किया 
हो तो जीवन्मुक्त पुरुषके लिये आत्मगोपन आवश्यक 
नहीं है।आपने स्वभावतः सोच - समझकर मेरे पूर्व - शरीरका 
आश्रय लेनेकी चेष्टा की है , अतः मेरे पक्षका आश्रय
लेने - मेरे शरीरमें प्रवेश करनेके कारण आपसे जो 
व्यतिक्रम बन गया है , उसे बताता हूँ , सुनिये।आपने किस कारणसे मेरे राज्य अथवा नगरमें
प्रवेश किया है अथवा किसके संकेतसे आप मेरे 
हृदयमें घुस आयी हैं ?वर्णों में श्रेष्ठ ब्राह्मणोंकी जो कन्याएँ हैं , उन सबमें
आप प्रमुख हैं । आप #ब्राह्मणी हैं और मैं #क्षत्रिय है ।
अतः हम दोनोंका एकत्र संयोग होना कदापि उचित
नहीं है । इसलिये आप #वर्णसंकर नामक दोषका उत्पादन
न कीजिये।

युधिष्ठिरने पूछा - जहाँ गृहस्थधर्म का त्याग बिना किये कौन पुरुष मोक्षतत्व को प्राप्त हुआ है , यह मुझे बताइये । 

भीष्मजीने कहा - भरतनन्दन । इस विषयमें जानकार मनुष्य जनक और सुलभाके संवादरूप इस प्राचीन इतिहासका उदाहरण दिया करते हैं।प्राचीन कालमें मिथिलापुरीके कोई एक राजा #जनक हो गये हैं , जो धर्मध्वज नामसे प्रसिद्ध थे । उन्हें गृहस्थआश्रम में रहते हुए भी ) संन्यासका जो सम्यगजानरूप 
फल है , वह प्राप्त हो गया था।उन्होंने वेदमें , मोक्षशास्त्रमें तथा अपने शास्त्र ( दण्डनीति ) में भी बड़ा परिश्रम किया था । वे इन्द्रियोंको तीव्र एकाग्र करके इस वसुन्धराका शासन करते थे। 

उन दिनों सुलभा नामवाली एक #संन्यासिनी योगधर्मके अनुष्ठानद्वारा सिद्धि प्राप्त करके अकेली ही इस पृथ्वीपर विचरण करती थी।इस सम्पूर्ण जगत्में घूमती हुई सुलभाने यत्र- 
तत्र अनेक स्थानोंमें त्रिदण्डी संन्यासियोंके मुखसे
मोक्षतत्त्वकी जानकारीके विषयमें मिथिलापति राजा
जनककी प्रशंसा सुनी।उनके द्वारा कही जानेवाली अत्यन्त सूक्ष्म परब्रह्म
विषयक वार्ता दूसरोंके मुखसे सुनकर सुलभाके 
संदेह हुआ कि पता नहीं जनकके सम्बन्धमें जो बातें 
सुनी जाती हैं , वे सत्य हैं या नहीं । यह संशय उत्पन्न
होनेपर उसके हृदयमें राजा जनकके दर्शनका संकल्प उदित हुआ।उसने योगशक्तिसे अपना पहला शरीर छोड़कर
दूसरा परम सुन्दर रूप धारण कर लिया । अब उसका
प्रत्येक अंग अनिन्द्य सौन्दर्यसे प्रकाशित होने लगा ।
सुन्दर भौंहोंवाली वह कमलनयनी बाला बाणों के समान
तीव्र गतिसे चलकर पलभरमें विदेहदेशकी राजधानी 
मिथिलामें जा पहुँची।मिथिलानगरीमें पहुंचकर संन्यासिनी सुलभाने भिक्षा 
लेनेके बहाने मिथिलानरेशका दर्शन किया। 

उसके परम सुकुमार शरीर और सौन्दर्यको देखकर राजा जनक 
मन - ही - मन सोचने लगे , ' यह कौन है , किसकी है
अथवा कहाँसे आयी है ?तदनन्तर उसका स्वागत करके राजाने उसे 
मुन्दर आसन समर्पित किया और पैर धुलाकर उसका 
यथोचित पूजन करनेके पश्चात् उत्तमोत्तम अन्न देकर 
उसे तृप्त किया।सुलभा मोक्षधर्मके विषयमें राजासे कुछ पूछना चाहती थी । उसके मनमें यह संदेह था कि राजा जनक #जीवन्मुक्त हैं या नहीं । वह योगशक्तियोंकी जानकार थी ही , अपनी सूक्ष्म बुद्धिद्वारा राजाकी बुद्धिमें प्रविष्ट हो गयी।राजा जनकसे प्रश्न करनेके लिये उद्यत हो उसने 
अपने नेत्रोंकी किरणोंद्वारा उनके नेत्रोंकी किरणोंको 
संयत करके योगबलसे उनके चित्तको बाँधकर उन्हें 
वशमें कर लिया। 

तब राजा जनकने सुलभाके अभिप्रायको 
जानकर उसका आदर करते हुए मुस्कराकर अपने 
भावद्वारा उसके भावको ग्रहण कर लिया।फिर छत्र आदि राजचिल्लोंसे रहित हुए राजा #जनक और #त्रिदण्ड रूप #संन्यास - चिह्नसे  युक्त हुई सुलभाका एक ही शरीरमें रहकर संवाद हुआ। 

जनकने पूछा - भगवति ! आपको यह संन्यासकी दीक्षा कहाँसे प्राप्त हुई है , आप कहाँ जायेंगी ? किसकी हैं और कहाँसे यहाँ आपका शुभागमन हुआ है ?


वाणी और बुद्धिको दूषित करनेवाले जो नौ - नौ दोष हैं , उनसे रहित ,अठारह गुणोंसे सम्पन्न और युक्तिसंगत अर्थसे युक्त पदसमूहको #वाक्य कहते हैं । उस वाक्यमें #सौक्ष्म्य , #सांख्य , #क्रम , #निर्णय और #प्रयोजन - ये पाँच प्रकारके अर्थ एक रहने चाहिये। 

#शान्तिपर्व-३२०/७९
जहाँ अनेक भिन्न - भिन्न ज्ञेय ( अर्थ ) उपस्थित हों और ‘यह घट है , यह पट है’
इस प्रकार वस्तुओंका पृथक् - पृथक् ज्ञान होता हो , ऐसे स्थलोंमें यथार्थ निर्णय 
करनेवाली जो बुद्धि है , उसीका नाम #सौक्ष्म्य है।
जहाँ किसी विशेष अर्थको अभीष्ट मानकर 
उसके दोषों और गुणोंकी विभागपूर्वक गणना की जाती 
है , उस अर्थको #संख्या अथवा #सांख्य समझना चाहिये ।परिगणित गुणों और दोषोंमेंसे अमुक गुण या दोष 
पहले कहना चाहिये और अमुकको पीछे कहना अभीष्ट 
है । इस प्रकार जो पूर्वापरके क्रमका विचार होता है , 
म #क्रम है और जिस वाक्यमें ऐसा क्रम हो , 
उस वाक्यको वाक्यवेत्ता विद्वान् क्रमयुक्त कहते हैं ।धर्म , अर्थ , काम और मोक्षके विषयमें किसी 
एकका विशेषरूपसे प्रतिपादन करनेकी प्रतिज्ञा करके 
प्रवचनके अन्तमें ' यही वह अभीष्ट विषय है ' ऐसा
कहकर जो सिद्धान्त स्थिर किया जाता है , उसीका नाम 
#निर्णय है ।इच्छा अथवा द्वेषसे उत्पन्न हुए दुःखोंद्वारा जहाँ किसी एक प्रकारके दुःखकी प्रधानता हो जाय , वहाँ जो वृत्ति उदय होती है , उसीको #प्रयोजन कहते हैं ।

जो नास्तिक हो, धर्मकी मर्यादा भंग कर रहा हो और किनारेको तोड़-फोड़कर गिरा देने वाले नदीके महान् जल-प्रवाहकी भाँति स्थित हो, ऐसे मनुष्यको उखाड़े हुए बाँसकी तरह बिना किसी हिचक के त्याग दो।

#शान्तिपर्व

जीव अनेक प्रकारके शरीरोंमें जन्मता-मरता हुआ कभी इस मानव-योनिमें आकर #ब्राह्मण का शरीर पाता है, अत: तुम ब्राह्मणोचित कर्तव्यका पालन करो।

#शान्तिपर्व

जिस धनको न तो राजा से भय है और न चोरसे ही तथा जो मर जाने परभी जीवका साथ नहीं छोड़ता है, उस #धर्म रूपी धनका उपार्जन करो।

#शान्तिपर्व

#धन खर्च करते समय बड़ा दुःख होता है। 
उसकी रक्षामें भी सुख नहीं है और उसकी प्राप्ति भी बड़े कष्टसे होती है, अतः धनको प्रत्येक अवस्थामें दुःखदायक समझकर उसके नष्ट होनेपर चिन्ता नहीं ही करनी चाहिये।
मनुष्य धनका संग्रह करते-करते पहलेकी अपेक्षा 
ऊँची धन-सम्पन्न स्थितिको प्राप्त होकर भी कभी तृप्त नहीं होते। वे और अधिककी आशा लिये हुए ही मर जाते है; किंतु #विद्वान् पुरुष सदा संतुष्ट रहते हैं (वे धनकी तृष्णामें नहीं पड़ते)।
#शान्तिपर्व

जैसे जंगलमें नयी-नयी घासकी खोजमें विचरते 
हुए अतृप्त पशुको सहसा व्याघ्र आकर दबोच लेता है, उसी प्रकार भोगोंकी खोजमें लगे हुए अतृप्त मनुष्यको मृत्यु उठा ले जाती है।तथापि सबको दु:खसे छूटनेका उपाय अवश्य
सोचना चाहिये। जो #शोक छोड़कर साधन आरम्भ करता है और किसी #व्यसन में आसक्त नहीं होता, वह निश्चय ही दुःखोंसे मुक्त हो जाता है।


पृथ्वी, वायु, आकाश, जल, नेत्र , बुद्धि, आत्मा, मन, काल और दिशाएँ - ये दस गुण (वस्तुएँ) सदा ही प्राणियों के शरीर में स्थित होकर उनके पुण्य और पाप कर्मों को देखा करते हैं। 

#दानधर्मपर्व
#महाभारत


योगाभ्यासी जन पहले-पहल उस रूपका चिन्तन नहीं कर सकते, इसलिये उन्हें श्रीहरिके विश्वमय स्थूल रूपका ही चिन्तन करना चाहिये।

हिरण्यगर्भ, भगवान् वासुदेव, प्रजापति, मरुत् , वसु, रुद्र, सूर्य, तारे, ग्रहगण, गन्धर्व, यक्ष और दैत्य आदि समस्त देवयोनियाँ तथा मनुष्य, पशु, पर्वत, समुद्र, नदी,वृक्ष, सम्पूर्ण भूत एवं प्रधानसे लेकर विशेष (पंचतन्मात्रा)पर्यन्त उनके कारण तथा चेतन, अचेतन, एक, दो अथवा अनेक चरणोंवाले प्राणी और बिना चरणोंवाले
जीव-ये सब भगवान् हरिके भावनात्रयात्मक मूर्तरूप हैं।

समयके अनुसार इतने बड़े पुराणोंका श्रवण और पठन असम्भव देखकर स्वयं भगवान् उनका संक्षेप करनेके लिये प्रत्येक द्वापरयुगमें व्यासरूपसे अवतार लेते हैं और पुराणोंको अठारह भागोंमें बाँटकर उन्हें चार लाख श्लोकोंमें सीमित कर देते हैं।

मार्कण्डेयजीने पूछा-भगवन् ! मनुष्योंके शरीरमें कौन-कौन-से तीर्थ हैं ?

नारदजीने कहा-मनीषी पुरुष कहते हैं, मनुष्योंके
हाथमें ही पाँच तीर्थ हैं। उनके नाम इस प्रकार हैं- देवतीर्थ, ऋषितीर्थ, पितृतीर्थ, ब्राह्मतीर्थ और वैष्णवतीर्थ।अंगुलियोंके अग्रभागमें देवतीर्थ है। कनिष्ठा और अनामिका अंगुलिके मूलभागमें आर्षतीर्थ है। इसीको कायतीर्थ और प्राजापत्यतीर्थ भी कहते हैं। अंगुष्ठ और तर्जनीके मध्यभागमें पितृतीर्थ है। अंगुष्ठके मूलभागमें
ब्राह्मतीर्थ है और हथेलीके मध्यभागमें वैष्णवतीर्थ है।

#महाभारत

वेदोंको अप्रामाणिक मानना, शास्त्रकी आज्ञाका उल्लङ्घन करना तथा सर्वत्र अव्यवस्था फैलाना–ये सब अपना ही नाश करनेवाले हैं।

#महाभारत


पञ्चचूड़ा अप्सराका नारदजी से स्त्रियों के दोषों का वर्णन -

देवर्षि नारदने एक दिन ब्रह्मलोककी अनिन्द्य सुन्दरी मनोहर अंगोंसे युक्त पञ्चचूड़ा नामक  अप्सराको देखकर पूछा-‘मैं तुम्हारे मुँहसे स्त्रियोंके स्वभावका वर्णन सुनना चाहता हूँ।वह बोली- 
'देवर्षे! मैं स्त्री होकर स्त्रियोंकी निन्दा नहीं कर सकती। संसारमें जैसी स्त्रियाँ हैं और उनके जैसे स्वभाव हैं, वे सब आपको विदित हैं; अतः देवर्षे! आप मुझे ऐसे कार्यमें न लगावें।

देवर्षिने कहा-'तुम सच्ची बात बताओ। झूठ बोलनेमें दोष लगता है। सच
कहनेमें कोई दोष नहीं है'।उनके इस प्रकार समझानेपर उस मनोहर
हास्यवाली अप्सराने कहनेके लिये दृढ़ निश्चय करके स्त्रियोंके सच्चे और स्वाभाविक दोषोंको बताना आरम्भ किया।

पंचचूड़ा बोली-नारदजी! कुलीन, रूपवती
और सनाथ युवतियाँ भी मर्यादाके भीतर नहीं रहती हैं। यह स्त्रियोंका दोष है।स्त्रियोंसे बढ़कर पापिष्ठ दूसरा कोई नहीं है।स्त्रियाँ सारे दोषोंकी जड़ हैं, इस बातको आप भी अच्छी तरह जानते हैं। यदि स्त्रियोंको दूसरोंसे मिलनेका अवसर मिल
जाय तो वे सद्गुणोंमें विख्यात, धनवान्, अनुपम रूप सौन्दर्यशाली तथा अपने वशमें रहनेवाले पतियोंकी भी प्रतीक्षा नहीं कर सकतीं।हम स्त्रियोंमें यह सबसे बड़ा पातक है कि हम पापी से पापी पुरुषोंको भी लाज छोड़कर स्वीकार कर लेती है। जो पुरुष किसी स्त्री को चाहता है ,उसके निकट तक पहुँचता है और उसकी थोड़ी सी सेवा कर देता है, उसीको वे युवतियाँ चाहने लगती हैं।स्त्रियोंमें स्वयं मर्यादाका कोई ध्यान नहीं रहता।जब उनको कोई चाहनेवाला पुरुष न मिले और परिजनोंका भय बना रहे तथा पति पास हों, तभी ये नारियाँ मर्यादा के भीतर रह पाती है।इनके लिये कोई भी पुरुष ऐसा नहीं है जो अगम्य हो। उनका किसी अवस्था-विशेषपर भी निश्चय नहीं रहता। कोई रूपवान् हो या कुरूप; पुरुष है-इतना ही समझकर स्त्रियाँ उसका उपभोग करती हैं। स्त्रियाँ न तो भयसे, न दयासे, न धनके लोभसे और न जाति या कुलके सम्बन्धसे ही पतियोंके पास टिकती हैं।जो जवान हैं, सुन्दर गहने और अच्छे कपड़े 
पहनती हैं, ऐसी स्वेच्छाचारिणी स्त्रियोंके चरित्रको देखकर कितनी ही कुलवती स्त्रियाँ भी वैसी ही बननेकी इच्छा करने लगती हैं।जो बहुत सम्मानित और पतिकी प्यारी स्त्रियाँ हैं, जिनकी सदा अच्छी तरह रखवाली की जाती है वे भी घरमें आने-जानेवाले कुबड़ों, अन्धों, गूगों और बौनोंके 
साथ भी फँस जाती हैं।महामुनि देवर्षे! जो पंगु हैं अथवा जो अत्यन्त घृणित मनुष्य हैं,उन में भी स्त्रियोंकी आसक्ति हो जाती है।इस संसारमें कोई भी पुरुष स्त्रियों के लिये महत्त्व अगम्य नहीं है।यदि स्रियोंको पुरुषकी प्राप्ति किसी प्रकार भी भी सम्भव न हो और पति भी दूर गये हों तो वे आपसमें ही कृत्रिम उपायोंसे ही मैथुनमें प्रवृत्त हो जाती हैं।

पुरुषोंके न मिलनेसे, घरके दूसरे लोगोंके भयसे तथा वध और बन्धनके डरसे ही स्त्रियाँ सुरक्षित हैं।स्त्रियोंका स्वभाव चंचल होता है। उनका सेवन बहुत ही कठिन काम है। इनका भाव जल्दी किसी समझमें नहीं आता; ठीक उसी तरह, जैसे विद्वान पुरुषकी वाणी दुर्बोध होती है।अग्नि कभी ईंधनसे तृप्त नहीं होती, समुद्र
कभी नदियोंसे तृप्त नहीं होता, मृत्यु समस्त प्राणियोंको एक साथ पा जाय तो भी उनसे तृप्त नहीं होती; इसी प्रकार सुन्दर नेत्रोंवाली युवतियाँ पुरुषोंसे कभी तृप्त नहीं होतीं।देवर्षे ! सम्पूर्ण रमणियोंके सम्बन्धमें दूसरी भी रहस्यकी बात यह है कि किसी मनोरम पुरुषको देखते ही स्त्रीकी योनि गीली हो जाती है।

सम्पूर्ण कामनाओंके दाता तथा मनचाही करनेवाला पति भी यदि उनकी रक्षामें तत्पर रहनेवाला हो तो वे अपने पतिके शासनको भी सहन नहीं कर सकतीं।वे न तो काम-भोगकी प्रचुर सामग्रीको, न  अच्छे अच्छे गहनोंको और न उत्तम घरोंको ही उतना अधिक महत्त्व देती हैं, जैसा कि रति के लिये किये गये अनुग्रहको।यमराज, वायु, मृत्यु, पाताल, बड़वानल, क्षुरेकी धार, विष, सर्प और अग्नि - ये सब विनाशके हेतु एक तरफ़ और स्त्रियाँ अकेली एक तरफ़ बराबर हैं। 

#महाभारत
#दानधर्मपर्व

जिसके चित्तमें सन्तोष है, उसके लिये सर्वत्र धन-सम्पत्ति भरी हुई है; जिसके पैर जूतेमें हैं, उसके लिये सारी पृथ्वी मानो चमड़ेसे मढ़ी है।

सन्तोषरूपी अमृतसे तृप्त एवं शान्त चित्तवाले पुरुषोंको जो सुख प्राप्त है, वह धनके लोभसे इधर-उधर दौड़नेवाले लोगोंको कहाँसे प्राप्त हो सकता है।असन्तोष ही सबसे बढ़कर दुःख है और सन्तोष ही सबसे बड़ा सुख है; अतः सुख चाहनेवाले पुरुषको सदा सन्तुष्ट रहना चाहिये।


मनुष्य तप करनेसे धन पाता है।#मौन व्रत के
पालनसे दूसरोंपर हुक्म चलाता है।#दान से उपभोग और #ब्रह्मचर्य से दीर्घायु प्राप्त करता है।#अहिंसा का फल है रूप और #दीक्षा का फल है उत्तम कुलमें जन्म। #फल_मूल खाकर रहनेवालोंको राज्य और #पत्ता चबाकर तप करनेवालोंको स्वर्गकी प्राप्ति होती है।
#दूध पीकर रहनेवाला मनुष्य स्वर्गको जाता है और #दान देनेसे वह अधिक धनवान् होता है।#गुरु की सेवा करनेसे विद्या और नित्य #श्राद्ध करनेसे संतानकी प्राप्ति होती है। जो केवल #साग खाकर रहनेका नियम लेता है क गोधनसे सम्पन्न होता है। #तृण खाकर रहनेवाले मनुष्योंको स्वर्गकी प्राप्ति होती है। तीनों कालमें #स्नान करनेसे बहुतेरी स्त्रियोंकी प्राप्ति होती है और #हवा पीकर रहनेसे मनुष्यको यज्ञका फल प्राप्त होता है। जो द्विज नित्य स्नान करके दोनों समय 
#संध्योपासना और #गायत्री-जप करता है वह चतुर होता है।

#तपस्या का फल -

तपस्या से स्वर्ग मिलता है, तपस्यासे सुयश की प्राप्ति होती है तथा तपस्यासे बड़ी आयु, ऊँचा पद और उत्तमोत्तम भोग प्राप्त होते हैं। ज्ञान, विज्ञान, आरोग्य, रूप, सम्पत्ति तथा सौभाग्य भी तपस्यासे प्राप्त होते हैं।

#महाभारत

जो #वृक्ष लगाता है, उसके लिये ये वृक्ष पुत्ररूप
होते हैं, इसमें संशय नहीं है। उन्हींके कारण परलोकमें जानेपर उसे स्वर्ग तथा अक्षय लोक प्राप्त होते हैं।

#महाभारत
#दानधर्मपर्व

#गोभक्त मनुष्य जिस-जिस वस्तुकी इच्छा
करता है, वह सब उसे प्राप्त होती है। स्त्रियोंमें भी जो गौओंकी भक्ता हैं, वे मनोवाञ्छित कामनाएँ प्राप्त कर लेती हैं। पुत्रार्थी मनुष्य पुत्र पाता है और कन्यार्थी कन्या।धन चाहनेवालेको धन और धर्म चाहनेवालेको #धर्म प्राप्त होता है। विद्यार्थी विद्या पाता है और सुखार्थी सुख।

गोभक्तके लिये यहाँ कुछ भी दुर्लभ नहीं
है।

#महाभारत

स्नानं दानं तपो होमो देवतापितृ कृम्र्म च।

तत्सर्व निषफलं याति ललाटे तिलकं बिना।

ब्राह्मण स्तिल्कं कृत्वा कुय्र्यासंध्याच्च तर्पणम्।।
अर्थात:तिलक के बिना स्नान, हवन,जप,तप व देवकार्य आदि सभी कार्य फल विहीन हो जाते हैं।


वेदज्ञ पुरुष अपना प्रिय हो या अप्रिय-इसका विचार न करके उसे श्राद्ध में भोजन कराना चाहिये। जो दस लाख अपात्र ब्राह्मणको भोजन कराता है, उसके यहाँ उन सबके बदले एक ही सदा संतुष्ट रहनेवाला वेदज्ञ ब्राह्मण भोजन करनेका अधिकारी है।

#महाभारत

जो मनुष्य केवल प्रात:काल और सायंकाल ही भोजन करता है, बीचमें नहीं खाता,उसे सदा उपवासी समझना चाहिये।-भीष्म

#महाभारत


क्रोधमें आकर पुत्र या शिष्यके सिवा दूसरे
किसीको न तो डंडा मारे, न उसे पृथ्वीपर ही गिरावे।हाँ, शिक्षाके लिये पुत्र या शिष्यको ताड़ना देना उचित माना गया है। 

-महाभारत

उदशिरा न स्वपेत तथा प्रत्यशिरा न च।
प्राक्शिरास्तु स्वपेद् विद्वानथवा दक्षिणाशिराः॥

उत्तर तथा पश्चिमकी ओर सिर करके न सोये।
विद्वान् पुरुषको पूर्व अथवा दक्षिण की ओर सिर करके ही सोना चाहिये।

-महाभारत


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