वैराग्य शतकम

वैराग्य शतकम् - Part 1
॥ वैराग्य शतकम् भर्तृहरिविरचितम् ॥
मंगलाचरणम्
दिक्कालाद्यनवच्छिन्नाऽनन्तचिन्मात्रमूर्त्तये ।
स्वानुभूत्येकमानाय नमः शान्ताय तेजसे ।। १ ।।
अर्थ:
जो दशों दिशाओं और तीनो कालों में परिपूर्ण है, जो अनन्त है, जो चैतन्य स्वरुप है, जो अपने ही अनुभव से जाना जा सकता है, जो शान्त और तेजोमय है, ऐसे ब्रह्मरूप परमात्मा को मैं नमस्कार करता हूँ ।
बोद्धारो मत्सरग्रस्ताः प्रभवः स्मयदूषिताः।
अबोधोपहताश्चान्ये जीर्णमंगे सुभाषितम्।। २ ।।
अर्थ:
जो विद्वान् हैं, वे इर्षा से भरे हुए हैं; जो धनवान हैं, उनको उनके धन का गर्व है; इनके सिवा जो और लोग हैं, वे अज्ञानी हैं; इसलिए विद्वत्तापूर्ण विचार, सुन्दर सुन्दर सारगर्भित निबन्ध या उत्तम काव्य शरीर में ही नाश हो जाते हैं ।
जो विद्वान् हैं, पण्डित हैं, जिन्हें अच्छे बुरे का ज्ञान या तमीज है, वे तो अपनी विद्वता के अभिमान से मतवाले हो रहे हैं, वे दूसरों के उत्तम से उत्तम कामों में छिद्रान्वेषण करने या नुक्ताचीनी करने में ही अपना पांडित्य समझते हैं; अतः ऐसो में कुछ कहने में लाभ की जरा भी सम्भावना नहीं ।
दुसरे प्रकार के लोग जो धनी हैं, वे अपने धन के गर्व से भूले हुए हैं । उन्हें धन-मद के कारण कुछ सूझता ही नहीं, उन्हें किसी से बातें करना या किसी की सुनना ही पसन्द नहीं; अतः उनसे भी कुछ लाभ नहीं ।
अब रहे तीसरे प्रकार के लोग; वे नितान्त मूर्ख या अज्ञानी हैं; उन गँवारों में अच्छे बुरे की तमीज नहीं, अतः उनसे कुछ कहने या अपनी कृति दिखाने सुनाने को दिल नहीं चाहता; इसलिए हमारे मुंह से निकल सकने वाले उत्तमोत्तम विचार, निबन्ध, काव्य या सुभाषित, संसार के सामने न आकर, हमारे शरीर में ही नष्ट हुए जाते हैं । हमारा परिश्रम व्यर्थ जाता है और संसार हमारे कामों के देखने और लाभान्वित होने से वञ्चित रहता है ।
शिक्षा: जो तुम्हारी तरफ मुखातिब हों, तुम्हारी बातों पर कान दे, तुम्हारी बातों को ध्यान से सुने, उन्ही को अपनी बातें सुनाओ । जो तुम्हारी बातें सुनना न चाहें, उनके गले मत पड़ो । ऐसा करने से आपकी आत्म-प्रतिष्ठा में बट्टा लगेगा - आपका अपमान होगा ।
पण्डित मत्सरता भरे, भूप भरे अभिमान ।
और जीव या जगत के, मूरख महाअजान ।।
मूरख महाअजान, देख के संकट सहिये ।
छन्द प्रबन्ध कवित्त, काव्यरस कासों कहिये ।।
वृद्धा भई मनमांहि, मधुर बाणी मुखमण्डित ।
अपने मन को मार, मौन घर बैठत पण्डित ।।
न संसारोत्पन्नं चरितमनुपश्यामि कुशलं विपाकः पुण्यानां जनयति भयं मे विमृशतः ।
महद्भिः पुण्यौघैश्चिरपरिगृहीताश्च विषया महान्तो जायन्ते व्यसनमिव दातुं विषयिणाम् ।। ३ ।।
अर्थ:
मुझे संसारी कामों में जरा सुख नहीं दीखता । मेरी राय में तो पुण्यफल भी भयदायक ही हैं । इसके सिवा, बहुत से अच्छे अच्छे पुण्यकर्म करने से जो विषय-सुख के सामान प्राप्त किये और चिरकाल तक भोगे गए हैं, वे भी विषय सुख चाहनेवालो का, अन्त समय में दुखों के ही कारण होते हैं ।
इस जीवन में सुख का लेश भी नहीं है । जिनके पास अक्षय लक्ष्मी, धन-दौलत, गाडी-घोड़े, मोटर, नौकर-चाकर, रथ-पालकी प्रभृति सभी सुख के सामान मौजूद हैं, राजा भी जिनकी बात को टाल नहीं सकता, जिनके इशारों से ही लोगों का भला बुरा हो सकता है, ऐसे सर्वसुख संपन्न लोग भी, चाहे ऊपर से सुखी दीखते हों, पर वास्तव में सुखी नहीं हैं; भीतर ही भीतर उन्हें घुन खाये जाता है; किसी न किसी दुःख से वे जरजरित हुए जाते हैं । दो कहानियां सुनते हैं -
एक महात्मा अपने शिष्य के साथ किसी नगर में गए । वहां उन्होंने देखा कि, एक साहूकार इन्द्रभवन जैसे मकान में बैठा है, सैकड़ों सेवक आज्ञापालन को तैयार खड़े हैं, जोड़ी-गाडी द्वार पर खड़ी है, हाथी झूम रहे हैं, सामने सोने-चंडी और हीरे-पन्नो के ढेर लग रहे हैं । महात्मा को देखकर सेठ ने अपने एक कर्मचारी को उनको भोजन कराने की आज्ञा दी । जब गुरु-चेले भोजन करने बैठे, तब चेला बोलै - "गुरु जी ! आप कहते थे, संसार में कोई भी सुखी नहीं है । देखिये यह सेठ कैसा सुखी है ! इसे किस बात का अभाव है ? लक्ष्मी इसकी दासी हो रही है ।" गुरु ने कहा - "जरा सब्र करो । हम पता लगाकर कुछ कह सकेंगे ।" महात्मा ने जब भोजन कर लिया, तब सेठ से कहा - "सेठ जी ! परमात्मा ने आपको सभी सुख दिए हैं ।" सेठ ने रोककर कहा - "महाराज ! मेरे समान इस जगत में कोई दुखी नहीं है । मुझे परमात्मा ने धनैश्वर्य सब कुछ दिया है, पर पुत्र एक भी नहीं । पुत्र बिना, ये सुख बिना नमक के पदार्थ की तरह बेस्वाद हैं । मेरा दिल रात दिन जला करता है, कभी मुझे सुख की नींद नहीं आती । मैं इसी सोच में जला जाता हूँ कि पुत्र बिना इस संपत्ति को कौन भोगेगा ?" सेठ की बातें सुनकर चेले ने कहा - "हाँ गुरूजी, आपकी बात राई-रत्ती सच है । संसार में कोई सुखी नहीं । कोई किसी बात से दुखी है तो कोई किसी दुःख से ।"
संसारी सुख अनित्य हैं
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सांसारिक सुख-भोग असार, अनित्य और नाशवान हैं । ये सदा स्थिर रहनेवाले नहीं; आज जो लक्ष्मी का लाल है, वह कल दर दर का भिखारी देखा जाता है; जो आज जवान पट्ठा है, मिर्जा अकड़बेग की तरह अकड़ता हुआ चलता है, वही कल बुढ़ापे के मारे लकड़ी टेक टेक कर चलता है । जिसे पहले सब लोग खूबसूरत कहते थे और मुहब्बत से पास बिठाते थे, अब उसके पास खड़ा होना भी नहीं चाहते । मतलब यह कि यौवन, जीवन, मन-धन, शरीर-छाया और प्रभुता, यह सब अनित्य और चञ्चल हैं; अतः दुःख के कारण हैं । काया में मरण, लाभ में हानि , जीत में हार, सुन्दरता में असुन्दरता, भोग में रोग, संयोग में वियोग और सुख में दुःख - ये सब दुःख के कारण हैं । अगर बिना मृत्यु का जीवन, बिना रंज की ख़ुशी, बिना बुढ़ापे की जवानी, बिना दुःख का सुख, बिना वियोग का संयोग और सदा-सर्वदा रहने वाला धन होता, तो मनुष्य को इस जीवन में अवश्य सुख होता ।
विषय भोगों में सुख नहीं है । ये असार हैं; केले के पत्ते या प्याज के छिलको की तरह सारहीन हैं । फिर भी, मोहवश मनुष्य विषयों में फंसा रहता है । पर एक न एक दिन मनुष्य को इन विषय-भोगों से अलग होना ही पड़ता है । अलग होने के समय विषय भोगी को बड़ा दुःख होता है इससे विषय परिणाम में दुःखदायी ही हैं ।
इसके सिवा, तरह तरह के पुण्य सञ्चय करने, यज्ञ-याग आदि करने अथवा दान करने से मनुष्य को स्वर्ग मिलता है । वहां वह अमृत पीता और अप्सराओं को भोगता है, कल्पवृक्ष से मनवांछित पदार्थ पाता है, पर पुण्य कर्मो के नाश हो जाने या उनके फल भोग चुकने पर वह स्वर्ग से नीचे गिरा दिया जाता है, उसे फिर इसी मृत्युलोक में आना होता है । उस समय वह स्वर्ग सुखों की याद कर करके मन ही मन रोता और दुखी होता है । इसी से मुझे पुण्यफल भी भयावह मालूम होते हैं । परिणाम में वे भी दुखो के ही कारण होते हैं । तात्पर्य यह कि, संसार मिथ्या और सारहीन है । इसके सुखभोग अनित्य, चञ्चल और सदा न रहने वाले हैं, इसी से दुःख के कारण हैं । मृत्युलोक और स्वर्गलोक में कहीं भी प्राणी को सुख नहीं है ।
शिक्षा: अगर मनुष्य दुखों से दूर रहना चाहे, सदा सुख भोगना चाहे, तो उसे अनित्य और नाशमान पदार्थों से अलग रहना चाहिए । उनमें मोह न रखना चाहिए । बुद्धिमान को लोक-परलोक की असारता और संयोग-वियोग का विचार करके अनित्य पदार्थो से प्रेम न करना चाहिए उसे सदा नित्य अविनाशी परमात्मा से प्रेम करना चाहिए ।
उत्खातं निधिशंकया क्षितितलं ध्माता गिरेर्धातवो
निस्तीर्णः सरितां पतिर्नृपतयो यत्नेन संतोषिताः ।
मन्त्राराधनतत्परेण मनसा नीताः श्मशाने निशाः
प्राप्तः काणवराटकोऽपि न मया तृष्णेऽधुना मुञ्चमाम् ।। ४ ।।
अर्थ:
धन मिलने की उम्मीद से मैंने जमीन के पैंदे तक खोद डाले; अनेक प्रकार की पर्वतीय धातुएं फूंक डाली; मोतियों के लिए समुद्र की भी थाह ले आया; राजाओं को भी राजी रखने में कोई बात उठा न राखी; मन्त्रसिद्धि के लिए रात रात भर श्मसान एकाग्रचित्त से बैठा हुआ जप करता रहा; पर अफ़सोस की बात है, कि इतनी आफ़ते उठाने पर भी एक कानि कौड़ी न मिली । इसलिए हे तृष्णे ! अब तो तू मेरा पीछा छोड़ ।
इसका यही मतलब है कि, भाग्य के विरुद्ध चेष्टा करना व्यर्थ है । जितना धन भाग्य में लिखा है, उतना तो बिना कोशिश किये, बिना किसी कि खुशामद किये, बिना देश-विदेश डोले, घर बैठे ही मिल जाएगा । भाग्य के लिखे से अधिक हजारों चेष्टाएं करने पर भी न मिलेगा । सिकंदर अमृत के लिए अँधेरी दुनिया में गया; पर अमूर्त के कुण्ड के पास पहुँच जाने पर भी, वह अमृत को चख न सका; क्योंकि उसके भाग्य में अमृत न था । मूर्ख मनुष्य भाग्य पर सन्तोष नहीं करता; धन के लिए मारा मारा फिरता है । जब कुछ भी हाथ नहीं लगता, तब रोता और कलपता है ।
भ्रान्तं देशमनेकदुर्गविषम् प्राप्तं न किञ्चित्फलम्
त्यक्त्वा जातिकुलाभिमानमुचितं सेवा कृता निष्फला ।
भुक्तं मानविवर्जितम परगृहेष्वाशङ्कया काकव-
त्तृष्णे दुर्मतिपापकर्मनिरते नाद्यापि संतुष्यसि ।। ५ ।।
अर्थ:
मैं अनेक कठिन और दुर्गम स्थानों में डोलता फिरा, पर कुछ भी नतीजा न निकला । मैंने अपनी जाति और कुल का अभिमान त्यागकर, पराई चाकरी भी की; पर उससे भी कुछ न मिला । शेष में, मैं कव्वे की तरह डरता हुआ और अपमान सहता हुआ पराये घरों के टुकड़े भी खाता फिरा । हे पाप-कर्म करने वाली और कुमतिदायिनी तृष्णे ! क्या तुझे इतने पर भी सन्तोष नहीं हुआ ?
खलोल्लापाः सोढाः कथमपि तदाराधनपरै:
निगृह्यान्तर्वास्यं हसितमपिशून्येन मनसा ।
कृतश्चित्तस्तम्भः प्रहसितधियामञ्जलिरपि
त्वमाशे मोघाशे किमपरमतो नर्त्तयसि माम् ।। ६ ।।
अर्थ:
मैंने दुष्टों की सेवा करते हुए उनकी तानेजानि और ठट्ठेबाज़ी सही, भीतर से, दुःख से आये हुए आंसू रोके और उद्विग्न चित्त से उनके सामने हँसता रहा । उन हंसने वालों के सामने, चित्त को स्थिर करके, हाथ भी जोड़े । हे झूठी आशा ! क्या अभी और भी नाच नचाएगी ?
आदित्यस्य गतागतैरहरहः संक्षीयते जीवितम्
व्यापारैर्बहुकार्यभारगुरुभिः कालो न विज्ञायते ।
दृष्ट्वा जन्मजराविपत्तिमरणं त्रासश्च नोत्पद्यते
पीत्वा मोहमयीं प्रमादमदिरामुन्मत्तभूतं जगत् ।। ७ ।।
अर्थ:
सूर्य के उदय और अस्त के साथ मनुष्यों की ज़िन्दगी रोज़ घटती जाती है । समय भागा जाता है, पर कारोबार में मशगूल रहने के कारण वह भागता हुआ नहीं दीखता । लोगों को पैदा होते, बूढ़े होते, विपत्ति ग्रसित होते और मरते देखकर भी उनमें भय नहीं होता । इससे मालूम होता है कि मोहमाया, प्रमादरूपी मदिरा के नशे में संसार मतवाला हो रहा है ।
किसी ने खूब कहा है :
सुबह होती है शाम होती है ।
योंही उम्र तमाम होती है ।।
विचारकर देखने से बड़ा विस्मय होता है कि दिन और रात कैसे तेजी से चले जाते हैं । जिनको कोई काम नहीं है अथवा दुखिया है, उन्हें तो ये बड़े भारी मालूम होते हैं, काटे नहीं कटते, एक एक क्षण, एक एक वर्ष की तरह बीतता है; पर जो कारोबार या नौकरी में लगे हुए हैं, उनका समय हवा से भी अधिक तेजी से उड़ा चला जा रहा है, यानी कारोबार या धंधे में लगे रहने के कारण उन्हें मालूम नहीं होता । वे अपने कामों में भूले रहते हैं और मृत्युकाल तेजी से नजदीक आता जाता है ।
शंकराचार्य जी ने 'मोहमुद्गर' में कहा है :
दिन यामिन्यौ सायं प्रातः शिशिरवसन्तौ पुनरायातः।
कालः क्रीडति गच्छत्यायु तदपि न मुञ्चत्याशावायुः।।
दिन-रात, सवेरे-सांझ, शीत और वसंत आते और जाते हैं, काल क्रीड़ा करता है, जीवनकाल चला जाता है, तो भी संसार आशा को नहीं छोड़ता ।
शिक्षा: मनुष्यों ! मिथ्या आशा के फेर में दुर्लभ मनुष्य देह को योंही नष्ट न करो । देखो ! सर पर काल नाच रहा है: एक सांस का भी भरोसा न करो । जो सांस बाहर निकल गया है, वह वापस आवे या न आवे इसलिए गफलत और बेहोशी छोड़कर, अपनी काया को क्षणभंगुर समझकर, दूसरो की भलाई करो और अपने सिरजनहार में मन लगाओ; क्योंकि नाता उसी का सच्चा है; और सब नाते झूठे हैं ।
कहा है -
माया सगी न मन सगा, सगा न यह संसार।
परशुराम या जीव को, सगा सो सिरजनहार।।
दीना दीनमुखैः सदैव शिशुकैराकृष्टजीर्णाम्बरा
क्रोशद्भिः क्षुधितैर्नरैर्न विधुरा दृश्या न चेद्गेहिनी ।
याच्ञाभङ्गभयेन गद्गदगलत्रुट्यद्विलीनाक्षरं
को देहीति वदेत् स्वदग्धजठरस्यार्थे मनस्वी जनाः ।। ८ ।।
अन्वयः
शिशुकैः + आकृष्ट
क्षुधितैः + निरन्न
चेत् + गेहिनी
याचना + भङ्ग + भयेन -> मांग पूरी न होने का भय, जबान खली जाने का भय
अर्थ:
स्त्री के फटे हुए कपड़ों को दीनातिदीन बालक खींचते हैं, घर के और मनुष्य भूख के मारे उसके सामने रोते हैं - इससे स्त्री अतीव दुखित है । ऐसी दुखिनी स्त्री अगर घर में न होती तो कौन धीर पुरुष, जिसका गला मांगने के अपमान और इन्कारी के भय से रुका आता है, अस्पष्ट भाषा या टूटे-फूटे शब्दों में, गिड़गिड़ा कर "कुछ दीजिये" इन शब्दों को, अपने पेट की ज्वाला शान्त करने के लिए, कहता?
भूख से बिल्लाते बच्चे जिस मां की फटी पुरानी साडी को पकड़ कर खींचते हुए रो रहे हों और मां भी खुद भूख से बेताब हो, ऐसी स्त्री को यदि घर में देखना न पड़े, तो कोई ऐसा व्यक्ति न होगा जो अपना निजी पेट भरने के लिए किसी के सामने सवाल करने जाय और वह भी जबकि सवाल करने से पहले ही मन में यह दुविधा हो कि कहीं जबान खाली न जाय और इस डर से मुंह से शब्द भी न निकलें अर्थात घर में बच्चो और स्त्री कि यह दशा देख नहीं सकता इसलिए अपने अपमान का ध्यान न कर औरो से मांगने पर मजबूर हो जाता है ।
याचना करने से त्रिलोकी भगवान् को भी छोटा होना पड़ा, तब औरो कि कौन बात है ? इसीलिए तुलसीदास जी ने कहा है -
तुलसी कर पर कर करो, कर तर कर न करो ।
जा दिन कर तर कर करो, ता दिन मरण करो ।।
हाथ के ऊपर हाथ करो, पर हाथ के नीचे हाथ न करो, जिस दिन हाथ के नीचे हाथ करो, उस दिन मरण करो; यानी दूसरों को दो, पर दूसरों के आगे हाथ न फैलाओ । जिस दिन दूसरों के आगे हाथ फ़ैलाने की नौबत आये, उस दिन मरण हो जाए तो भला ।
स्त्री पुरुषों के पालन पोषण की चिन्ता में सारी आयु बीत जाती है; पर परमात्मा के भजन में उसका मन नहीं लगता ! मन तो तब लगे जबकि वह शुद्ध हो । उसे तो हरदम, नून-तेल, आटे-दाल की चिन्ता लगी रहती है । ईश्वर में मन न लगने से और शेष दिन आ जाने से, उसे फिर जन्म-मरण के झंझटों में फंसना होता है । यह स्त्री माया ही संसार वृक्ष का बीज है । शब्द, स्पर्श, रस, रूप और गंध उसके पत्ते; काम, क्रोधादि उसकी डालियाँ और पुत्र-कन्या प्रभृति उसके फल हैं । तृष्णा रुपी जल से यह संसार-वृक्ष बढ़ता है । संसारबंधन से मुक्त होने में "कनक और कामिनी" ये दो ही बाधक हैं ।
कहा है :
चलूँ चलूँ सब कोई कहै, पहुंचे विरला कोय ।
एक कनक और कामिनी, दुर्लभ घाटी दोय ।।
एक कनक और कामिनी, ये लम्बी तलवारि ।
चाले थे हरिमिलन को, बीचहि लीने मारि ।।
नारि नसावै तीन सुख, जेहि नर पास होये ।
भक्ति-मुक्ति अरु ज्ञान में, पैठ सके न कोय ।।
एक बार व्यास जी ने शुकदेव जी को शादी करने को कहा । व्यास जी ने समझाने में घटा न रखा, पर शुकदेव जी ने एक न मानी । उन्होंने कहा "पिताजी ! लोह और काठ की बेड़ियों से चाहे छुटकारा हो जाय; पर स्त्री पुत्र प्रभृति की मोहरूपी बेड़ियों से पुरुष का पीछा नहीं छूट सकता हे पिता ! गृहस्थाश्रम जेलखाना है; इसमें जरा भी सुख नहीं । स्त्री के लिए पुरुष को संसार में नीच से नीच काम करने पड़ते हैं । जिनके मुंह देखने से पाप लगता है उसकी खुशामदें करनी पड़ती हैं, इसके वास्ते मैं स्त्री बंधन में नहीं पड़ना चाहता ।"
*व्यास-शुकदेव संवाद स्कंदपुराण से है।
समानाः स्वर्याताः सपदि सुहृदो जीवितसमाः ।
शनैर्यष्टयोत्थानम घनतिमिररुद्धे च नयने
अहो धृष्टः कायस्तदपि मरणापायचकितः ।। ९ ।।
अर्थ:
बुढ़ापे के मारे भोगने की इच्छा नहीं रही; मान भी घट गया; हमारी बराबर वाले चल बसे; जो घनिष्ट मित्र रह गए हैं, वे भी निकम्मे या हम जैसे हो गए हैं । अब हम बिना लकड़ी के उठ भी नहीं सकते और आँखों में अँधेरी छा गयी है । इतना सब होने पर भी, हमारी काया कैसी बेहया है, जो अपने मरने की बात सुनकर चौंक उठती है ?
जगत की विचित्र गति है ! इस जीवन में जरा भी सुख नहीं है । मनुष्य के मित्र और नातेदार मर जाते हैं, आप निकम्मा हो जाता है, आँख कान प्रभृति इन्द्रियां बेकाम हो जाती हैं, आँखों से सूझता नहीं और कानो से सुनाई नहीं देता, घर-बाहर के लोग अनादर करते हैं, बुढ़ापे के मारे चला फिरा नहीं जाता, खाने को भी कठिनाई से मिलता है; तो भी मनुष्य मरना नहीं चाहता, बल्कि मरने की बात सुनकर चौंक उठता है। इसे मोह न कहें तो क्या कहें ?
लकड़हारा और मौत
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एक वृद्ध अतीव निर्धन था । बेटे पोते सभी मर गए थे । एक मात्र बुढ़िया रह गयी थी । बूढ़े के हाथ पैरों ने जवाब दे दिया था । आँखों से दीखता न था । फिर भी, अपने और बूढी के पेट के लिए, वह जंगल से लकड़ी काटकर लाता और बेचकर गुज़ारा करता था । एक दिन उसने जीवन से निहायत दुखी होकर मृत्यु को पुकारा । उसके पुकारते ही मृत्यु मनुष्य के रूप में उसके प्रत्यक्ष आ खड़ी हुई । बूढ़े ने पुछा - "तुम कौन हो ?" उसने कहा - "मैं मृत्यु हूँ, तुम्हें लेने आयी हूँ ।" मृत्यु का नाम सुनते ही लकड़हारा चौंक उठा और कहने लगा - "मैंने आपको ये भार उठवाने को बुलवाया था ।" मृत्यु उसका भार उठवा कर चली गयी ।
देखिये ! बूढा लकड़हारा हर तरह दुखी था, उसे जीवन में जरा भी सुख नहीं था, फिर भी वह मरना न चाहता था; अपितु मृत्यु को देखते ही चौंक पड़ा था । यही गति संसार की है ।
एक दुखित बूढ़ा सेठ
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एक वैश्य ने उम्र भर मर-पचकर खूब धन जमा किया । बुढ़ापे में पुत्रों ने सारे धन पर अधिकार कर बूढ़े को पौली में एक टूटी सी खाट और फटी सी गुदड़ी पर डाल दिया और कुत्ता मारने के लिए हाथ में लकड़ी दे दी । सुबह शाम घर का कोई आदमी बचा-खुचा, बासी-कूसी उसे खाने को दे जाता । सेठ बड़े दुःख से अपना जीवन जीता था । पुत्र-वधुएं दिन भर कहा करती थी - "यह मर नहीं जाते, सबको मौत आती है पर इनको नहीं आती। दिन भर पौली में थूक-थूक कर मैला करते हैं ।" एक दिन एक पोता उन्हें पीट रहा था । इतने में नारद जी आ निकले उन्होंने सारा हाल देखकर कहा - "सेठजी ! आप बड़े दुखी हैं । स्वर्ग में कुछ आदमियों की आवश्यकता है । अगर तुम चलो तो हम ले चलें ।" सुनते ही सेठ ने कहा - "जा रे वैरागीड़ा ! मेरे बेटे पोते मुझे मारते हैं चाहे गाली देते हैं, तुझे क्या ? तू क्या हमारा पञ्च है ? मैं इन्हीं में सुखी हूँ । मुझे स्वर्ग की आवश्यकता नहीं ।" सेठ की बातें सुनकर नारद जी को बड़ा आश्चर्य हुआ । कहने लगे - "ओह ! संसार सचमुच ही मोह-पाश में फंसा है । मोह की मदिरा के मारे इसे होश नहीं । मनुष्य ने कब्र में पैर लटका रखे हैं; फिर भी विषयों में ही उसका मन लगा है ।" किसी ने ठीक ही कहा है :
गतं तत्तारुण्यं तरुणिहृदयानन्दजनकं
विशीर्णा दन्तालिर्निजगतिरहो यैष्टिशरणां ।
जड़ी भूता दृष्टिः श्रवणरहितं कर्णयुगलं
मनोमे निर्लज्जं तदपि विषयेभ्यः स्पृहयति ।।
तरुणियों के ह्रदय में आनन्द पैदा करने वाली जवानी चली गयी है, दन्तपंक्ति गिर गयी है, लकड़ी का सहारा लेकर चलता हूँ, नेत्र ज्योति मारी गयी है, दोनों कानों से सुनाई नहीं देता, तो भी मेरा निर्लज्ज मन विषयों को चाहता है ।
शंकराचार्यकृत चर्पटपञ्जरिका स्तोत्र से:
अङ्गं गलितं पलितं मुण्डं दशनविहीनं जातं तुण्डम्।
वृध्दो याति गृहीत्वा दण्डं तदपि न मुञ्चत्याशापिण्डम्।।
हिंसाशून्यमयत्नलभ्यमशनं धात्रामरुत्कल्पितं
व्यालानां पशवः तृणांकुरभुजः सृष्टाः स्थलीशायिनः ।
संसारार्णवलंघनक्षमधियां वृत्तिः कृता सा नृणां
यामन्वेषयतां प्रयांति संततं सर्वे समाप्ति गुणाः ।। १० ।।
अर्थ:
विधाता ने हिंसारहित, बिना उद्योग के मिलने वाली हवा का भोजन साँपों की जीविका बनाई, पशुओं को घास खाना और जमीन पर सोना बताया; किन्तु जो मनुष्य अपनी बुद्धि के बल से भवसागर के पार हो सकते हैं, उनकी जीविका ऐसी बनाई कि जिसकी खोज में उनके सारे गुणों की समाप्ति हो जाये, पर वह न मिले ।
विधाता ने सांपो के लिए तो हवा का भोजन बता दिया, जिसके हासिल करने में किसी प्रकार की हिंसा भी नहीं करनी पड़ती और वह बिना किसी प्रकार की चेष्टा के उन्हें अपने वासस्थानों में ही मिल सकता है । जानवरों के लिए घास चरने को और जमीन सोने को बता दी, इससे उनको भी अपने खाने के लिए विशेष चेष्टा नहीं करनी पड़ती, वे जंगल में उगी उगाई घास तैयार पाते हैं और इच्छा करते ही पेट भर लेते हैं । उन्हें सोने के लिए पलँगो और गद्दे-तकियों की फ़िक्र नहीं करनी पड़ती, जमीन पर ही जहाँ जी चाहता है पड़ रहते हैं । सर्प और पशुओं के साथ भगवान् ने पक्षपात किया, उन्हें बेफिक्री की ज़िन्दगी भोगने के उपाय बता दिए, किन्तु मनुष्यों के साथ ऐसा नहीं किया ! उन बेचारों को बुद्धि तो ऐसी दे दी कि जिससे वे संसार सागर के पार हो सकें अथवा दुर्लभ मोक्षपद को प्राप्त हो सकें; पर उन्हें जीविका ऐसी बताई कि जिसकी खोज में उनकी सारी कोशिशें बेकार हो जाएं, पर जीविका का ठिकाना न हो । यह क्या कुछ कम दुःख की बात है ? यदि विधाता मनुष्यों को भी साँपों और पशुओं की सी ही जीविका बताता, तो कैसा अच्छा होता ? मनुष्य जीविका की फ़िक्र न होने से, सहज में ही अपनी बुद्धि के जोर से मोक्ष पा जाते ।
उस्ताद ज़ौक़ भी कुछ इस तरह शिकायत करते हैं -
बनाया ज़ौक़ जो इंसां को उसने जुजव ज़ईफ़ ।
तो उस ज़ईफ़ से कुल काम दो जहाँ के लिए ।।
ए ज़ौक़ ! ईश्वर को देखो, कि उसने मनुष्य को कितना कमज़ोर बनाया, पर काम उससे दोनों लोकों के लिए । उसे इस लोक और परलोक, दोनों कि फ़िक्र लगा दी ।
किसी ने ठीक कहा है -
घृतलवणतैलतण्डुल शोकन्धन चिन्तयाऽअनुदिनम् ।
विपुल मतेरपि पुंसो नश्यति धीरमन्दविभावत्वात् ।।
घी, नोन, तेल, चावल, साग और ईंधन की चिंता में बड़े बड़े मतिमानों की उम्र भी पूरी हो जाती है; पर इस चिंता का ओर छोर नहीं आता । इसी से मनुष्य को ईश्वर भजन या परमात्मा की भक्ति-उपासना को समय नहीं मिलता । अगर मनुष्य इतनी आपदाओं के होते हुए भी परलोक बनाना चाहे, तो उसे चाहिए कि अपनी ज़िन्दगी की जरूरतों को कम करे, क्योंकि जिसकी आवश्यकताएं जितनी ही कम हैं, वह उतना ही सुखी है । इसलिए महात्मा लोग महलों में न रहकर वृक्षों के नीचे उम्र काट देते हैं । वन में जो फल-फूल मिलते हैं, उन्हें खाकर और झरनो का शीतल जल पीकर पेट भर लेते हैं । आवश्यकताओं को कम करना ही सुख-शांति का सच्चा उपाय है ।
वैराग्य शतकं - कालमहिमानुवर्णनम् - 11
न ध्यातं पदमीश्वरस्य विधिवत्संसारविच्छित्तये
स्वर्गद्वारकपाटपाटनपटुर्धर्मोऽपि नोपार्जितः ।
नारीपीनपयोधरोरुयुगलं स्वप्नेऽपि नालिङ्गितं
मातुः केवलमेव यौवनवनच्छेदे कुठारा वयम् ।। ११ ।।
अर्थ:
हमने संसार बन्धन के काटने के लिए, यथाविधि, ईश्वर के चरणों का ध्यान नहीं किया; हमने स्वर्ग के दरवाजे खुलवाने वाले धर्म का सञ्चय भी नहीं किया और हमने स्वप्न में भी कठोर कूचों का आलिङ्गन नहीं किया । हम तो अपनी माँ के यौवन रुपी वन के काटने के लिए कुल्हाड़े ही हुए ।
हमने लोक-परलोक साधन के लिए, जन्म मरण का फंदा काटने के लिए अथवा परमपद की प्राप्ति के लिए, शास्त्रों में लिखी विधि से परमात्मा के कमल चरणों का ध्यान नहीं किया; उसकी पूजा उपासना नहीं की; सारी उम्र पेट की चिंता में बिता दी । हमने पूर्वजन्म या वर्तमान जन्म के पापों के समूल नाश करने के लिए प्रायश्चित्त नहीं किये, न जीवों को अभय किया, न दानपुण्य किया; फिर हमारे लिए स्वर्ग का द्वार कैसे खुल सकता है ? क्योंकि धर्म का सञ्चय करने से ही स्वर्ग का द्वार खुलता है । न हमने परमात्मा के पद-पंकजों का ध्यान किया, न धर्म सञ्चय किया और न स्त्री के पीनपयोधरों का स्वप्न में भी आलिङ्गन किया । मतलब यह है, न हमने संसार के मिथ्या विषय-सुख ही भोगे और न हमने मोक्ष या स्वर्ग प्राप्ति के उपाय ही किये । "दुविधा में दोनों गए, माया मिली न राम" अथवा "इधर के रहे न उधर के रहे, खुदा मिला न विसाले सनम" । हमने यों ही संसार में जन्म लेकर अपनी माता की जवानी और नाश की ! अगर हम जैसे निकम्मे न पैदा होते तो बेचारी की जवानी की रेढ़ तो न होती ।
वैराग्य शतकं - तृष्णादूषणं - 12
भोगा न भुक्ता वयमेव भुक्तास्तपो न तप्तं वयमेव तप्ताः ।
कालो न यातो वयमेव यातास्तृष्णा न जीर्णा वयमेव जीर्णाः ।। १२ ।।
अर्थ:
विषयों को हमने नहीं भोगा, किन्तु विषयों ने हमारा ही भुगतान कर दिया; हमने तप को नहीं तपा किन्तु तप ने हमें ही तपा डाला; काल का खात्मा न हुआ, किन्तु हमारा ही खात्मा हो चला । तृष्णा का बुढ़ापा न आया, किन्तु हमारा ही बुढ़ापा आ गया ।
हमने बहुत कुछ भोग भोगे, पर भोगों का अन्त न आया, हाँ हमारा अन्त आ गया । काल या समय का अन्त न आया किन्तु हमारा अन्त आ गया - हमारी उम्र पूरी हो चली । हमें जो धर्म-कार्य करने थे, वह हम न कर सके । हमने तप तो नहीं तपा, किन्तु संसारी तापों ने हमारे तई तपा डाला - संसार के जालों में फंसकर हम ही शोक-तापों से तप गए । हमारा अन्त आ पहुंचा, हम निर्बल और वृद्ध हो गए; पर तृष्णा बूढी और कमज़ोर न हुई - हमें संसार से विरक्ति न हुई ।
ऐसी ही बात उस्ताद ज़ौक़ ने कही है -
दुनिया से ज़ौक़ ! रिश्तए उल्फत को तोड़ दे ।
जिस सर का है यह बाल, उसी सर में जोड़ दे।।
पर ज़ौक़ न छोड़ेगा इस पीरा जाल को।
यह पीरा जाल, गर तुझे चाहे तो छोड़ दे।।
मतलब या कि लोग दुनिया को नहीं छोड़ते, दुनिया ही उन्हें निकम्मा करके छोड़ देती है ।
क्षान्तम् न क्षमया ग्रहोचितसुखं त्यक्तं न सन्तोषतः
सोढा दुःसहशीतवाततपनक्लेशा न तप्तम् तपः।
ध्यातं वित्तमहर्निशं नियमितप्राणैर्न शम्भोः पदम्
तत्तत्कर्म कृतम्य यदेव मुनिभिस्तैस्तैः फलैर्वचितम् ।। १३ ।।
अर्थ:
क्षमा तो हमने की, परन्तु धर्म के ख्याल से नहीं की । हमने घर के सुख चैन तो छोड़े पर सन्तोष से नहीं छोड़े । हमने सर्दी-गर्मी और हवा के न सह सकने योग्य दुःख तो सही; किन्तु ये सब दुःख हमने तप की गरज से नहीं, किन्तु दरिद्रता के कारन सही । हम दिन रात ध्यान में लगे तो रहे, पर धन के ध्यान में लगे रहे - हमने प्राणायाम क्रिया द्वारा शम्भू के चरणों का ध्यान नहीं किया । हमने काम तो सब मुनियों के से किये, परन्तु उनकी तरह फल हमें नहीं मिले ।
हमनें क्षमा तो की परन्तु दया-धर्मवश नहीं की, हमारी क्षमा असमर्थता के कारण हुई; हममे सामर्थ्य नहीं थी इसलिए शांत हो गए । हमने अच्छा खाना पीना ऐश-आराम छोड़े, मजबूरी से छोड़े; अपनी भीतरी इच्छा से नहीं छोड़े । हमने उन्हें रोग प्रभृति के कारण त्यागा, पर सन्तोष से नहीं त्यागा । हमने गर्म-सर्द हवा के झोंके सही; हमने सर्दी-गर्मी सही जरूर, पर तप की गरज से नहीं, किन्तु घर में पैसा न होने की वजह से । हम सोते जागते आठ पहर, चौंसठ घडी ध्यान तो करते रहे, पर पैसे या स्त्री-पुत्रों का अथवा संसार के और झगड़ों का । हमने भोलानाथ के कमल चरणों का ध्यान नहीं किया । सारांश यह ! हमने मुनियों की तरह विषय-सुख त्यागे, उनकी तरह सर्दी-गर्मी के दुस्सह कष्ट भी उठाये, उनकी तरह हम ध्यान मग्न भी रहे - पर वे जिस तरह सामर्थ्य होते भी शांत होते हैं - सन्तोष के साथ विषय-सुखों से मुंह मोड़ लेते हैं - शिव का ही ध्यान करते हैं, उस तरह हमने नहीं किया; इसी से हम उन फलों से वञ्चित रहे, जिनको वे लोग प्राप्त करते हैं ।
दरिद्रावस्था में वैराग्य
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आपके घर में कंगाली और मुहताजी का राज है । आप स्त्री और बच्चों का पालन नहीं कर सकते । इसलिए स्त्री आपको नफरत की नजर से देखती है । यह सब देखकर आपके दिल में वैराग्य पैदा हुआ है । यह नीचे दर्जे का वैराग्य है ।
सुखैश्वर्य में वैराग्य
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आपका अन्तः करण शुद्ध हो गया है; अतः आप धनैश्वर्य और पुत्रकलत्रादि को त्यागकर वन को जा रहे हैं । आप कहते हैं, "अब मुझे विषय सुख अच्छे नहीं लगते । मैं वन जाकर जगदीश का भजन करूँगा ।" यही वैराग्य उत्तम वैराग्य है और ऐसे नररत्न प्रशंसा के पात्र हैं ।
वलीभिर्मुखमाक्रान्तं पलितैरङ्कितं शिरः।
गात्राणि शिथिलायन्ते तृष्णैका तरुणायते।। १४ ।।
अर्थ:
चेहरे पर झुर्रियां पड़ गयी, सर के बाल पककर सफ़ेद हो गए, सारे अंग ढीले हो गए - पर तृष्णा तो तरुण होती जाती है ।
महात्मा सुन्दरदास जी कहते हैं -
नैननकी पलही में पल के, क्षण आधि घरी घरी घटिका जो गई है ।
जाम गयो जुग जाम गयो, पुनि सांझ गयी तब रात भई है ।
आज गयी अरु काल गई, परसों तरसों कुछ और ठई है ।
सुन्दर ऐसे ही आयु गई, तृष्णा दिन ही दिन होत नई है ।
आज सारा संसार तृष्णा के फेरे में पड़ा हुआ है । अमीर और गरीब, सभी इसके बन्धन में बन्धे हैं । गरीब की अपेक्षा धनियों को तृष्णा बहुत है । धनी हमेशा निन्यानवे के फेरे में लगे रहते हैं । ९९ होने पर १०० करने की फ़िक्र लगी रहती है । १००० होने पर १०,००० की, १० हज़ार होने पर लाख की, लाख होने पर करोड़ की और करोड़ होने पर अरब-ख़रब की तृष्णा लगी रहती है । इसी फेर में मनुष्य रोगी और बूढा हो जाता है पर तृष्णा न रोगिणी होती है और न बूढी ।
सुभाषितावली में लिखा है -
यौवनं जरया ग्रस्तमारोग्यं व्याधिभिर्हतं।
जीवितं मृत्युरभ्येति तृष्णैका निरुपद्रवा।।
जवानी बुढ़ापे से, आरोग्यता व्याधियों से और जीवन मृत्यु से ग्रसित है; पर तृष्णा को किसी उपद्रव का डर नहीं ।
शंकराचार्य कृत प्रश्नोत्तरमाला में लिखा है -
बद्धो हि को यो विषयानुरागी ।
का वा विमुक्तिर्विषयेनुरक्तिः ।।
को वास्ति घोरो नरकस्स्वदेहस्तृष्णाक्षयस्स्वर्गपदं किमस्ति ?
बन्धन में कौन है? विषयानुरागी।
विमुक्ति क्या है? विषयों का त्याग।
घोर नरक क्या है? अपना शरीर।
स्वर्ग क्या है? तृष्णा का नाश।
और भी किसी ने कहा है -
कामानां हृदये वासः संसार इति कीर्तितः ।
तेषां सर्वात्मना नाशो मोक्ष उक्तो मनीषिभिः ।।
हृदय में कामनाओं का निवास है, उसी को 'संसार' कहते हैं और उनके सब तरह से नाश हो जाने को 'मोक्ष' कहते हैं ।
चर्पटपञ्जरिका स्तोत्रं से -
अङ्गम् गलितं पलितं मुण्डम दशनविहीनं जातं तुण्डं ।
वृद्धो याति गृहीत्वा दण्डं तदपि न मुञ्चत्याशापिण्डम ।।
अंग शिथिल हो रहे हैं, सर गंजा हो गया है, मुँह से दांत गिर चुके हैं, चलने के लिए लाठी का सहारा लेना पड़ता है, फिर भी आशाएं पीछा नहीं छोड़ रहीं ।
दोहा
सेत चिकुर तन दशन बिन, बदन भयो ज्यों कूप ।
गात सबै शिथिलित भये, तृष्णा तरुण स्वरुप ।।
तेनैव च दिवा भानु्रहो दौर्गत्यमेतयो:।। १५ ।।
अर्थ:
आकाश के जिस टुकड़े को ओढ़कर चन्द्रमा रात बिताता है, उसी को ओढ़कर सूर्य दिन बिताता है । इन दोनों की कैसी दुर्गति होती है !
आकाश के जिस हिस्से को, रात के समय चन्द्रमा तय करता है, उसी को दिन में सूर्य तय करता है । सूरज और चाँद, ज्योतिष में सबसे बड़े हैं । जब ऐसे ऐसों की ऐसी दुर्गति होती है, कि बेचारों को रात दिन इधर से उधर और उधर से इधर चक्कर लगाने पड़ते हैं और परिणाम में कोई फल भी नहीं मिलता; तब हमारी आपकी कौन गिनती है ? जब ये पराधीनता की बेड़ियों में जकड़े हुए हैं, इन्हें ज़रा सी भी आज़ादी नहीं है, एक दिन क्या - एक क्षण भी ये अपनी इच्छानुसार आराम नहीं कर सकते, तब इतर छोटे प्राणियों की क्या बात हैं ?
शिक्षा: बड़ों की दुर्दशा देखकर छोटो को अपनी विपत्ति पर रोना-कलपना नहीं, बल्कि सन्तोष करना चाहिए । संसार में कोई भी सुखी नहीं है ।
दोहा:
इक अम्बर के टूक कों, निशि में ओढ़त चन्द।
दिन में ओढ़त ताहि रवि, तू कत करात छछन्द।।
अवश्यं यातारश्चिरतरमुषित्वाऽपि विषया
वियोगे को भेदस्त्यजति न जनो यत्स्वयममून् ।
व्रजन्तः स्वातन्त्र्यादतुलपरितापाय मनसः
स्वयं त्यक्त्वा ह्येते शमसुखमनन्तं विदधति ।। १६ ।।
अर्थ:
विषयों को हम चाहें कितने दिन तक क्यों न भोगें, एक दिन वे निश्चय ही हम से अलग हो जायेंगे; तब मनुष्य उन्हें स्वयं अपनी इच्छा से ही क्यों न छोड़ दे? इस जुदाई में क्या फर्क है ? अगर वह न छोड़ेगा तो, वे छोड़ देंगे । जब वे स्वयं मनुष्य को छोड़ेंगे, तब उसे बड़ा दुःख और मनःक्लेश होगा । अगर मनुष्य उन्हें स्वयं छोड़ देगा, तो उसे अनन्त सुख और शान्ति प्राप्त होगी ।
जो लोग विषयों को पहले ही त्याग देते हैं, उन्हें उनके न होने पर दुःख नहीं होता; किन्तु जो उन्हें नहीं छोड़ते, उन्हें उनके न होने पर महाकष्ट होता है । जो बुद्धिमान पहले से ही धन दौलत स्त्री-पुरुष आदि से मोह हटा लेते हैं, उन्हें मरते समय कष्ट नहीं होता । जो उनमें अपना मन लगाए रहते हैं, वे मरते समय रोते हैं, पर ज़बान बंद हो जाने से अपने मन की बात बता नहीं सकते । इसलिए जो सुख से मरना चाहें, उन्हें पहले से ही विषयों से मुख मोड़ लेना चाहिए । इसी तरह, जो आज नाना प्रकार के सुख भोग रहा है, यदि कल उसे वे सुख न मिलें, तो वह बड़ा दुखी होता है; किन्तु जो विषयों को भोगते तो हैं, किन्तु उनमें आसक्ति नहीं रखते, उन्हें विषय सुखों के न मिलने या उनसे बिछुड़ने पर ज़रा भी कष्ट नहीं होता ।
विवेकव्याकोशे विदधति शमे शाम्यति तृषा-
परिष्वङ्गे तुङ्गे प्रसरतितरां सा परिणतिः।
जराजीर्णैश्वर्यग्रसनगहनाक्षेपकृपणस्तृषापात्रं
यस्यां भवति मरुतामप्यधिपतिः ।। १७ ।।
अर्थ:
जब ज्ञान का उदय होता है, तब शान्ति की प्राप्ति होती है । शान्ति की प्राप्ति से तृष्णा शान्त होती जाती है, किन्तु वही तृष्णा विषयों के संसर्ग से बेहद बढ़ जाती है । मतलब यह है, कि विषयों से तृष्णा कभी शान्त नहीं हो सकती । सुन्दरी के कठोर कूचों पर हाथ लगाने से काम-मद बढ़ता है, घटता नहीं । जराजीर्ण ऐश्वर्य को देवराज इन्द्र भी नहीं त्याग सकते ।
ज्ञान से ही तृष्णा का नाश और शान्ति की प्राप्ति होती है । विषयों के भोगने से तृष्णा घटती नहीं, उलटी बढ़ती है । जो तृष्णा को त्यागते हैं, तृष्णा से नफरत करते हैं, उसे पास नहीं आने देते, उनसे तृष्णा भी दूर भागती है । देखिये, यद्यपि स्वर्ग के राज को भोगते लाखों-करोडो वर्ष बीत गए, तो भी इन्द्र स्वर्ग-राज्य को छोड़ नहीं सकता । जब इन्द्र की भी तृष्णा लाखों-करोड़ों वर्ष राज्य भोगने से शान्त नहीं होती, तब मनुष्य बेचारे किस खेत की मूली हैं ? तृष्णा पुराणी होने से बढ़ती है, घटती नहीं । हम ज्यों ज्यों विषय भोगते हैं, त्यों त्यों वे पुराने होते हैं और हमारी तृष्णा बढ़ती है । पुराने होने पर, उन्हें छोड़ने में हमें बड़ा कष्ट होता है ।
शिक्षा: तृष्णा को शीघ्र छोड़ो । पुराणी होने से वह पापीयसी और भी बलवती हो जाएगी; फिर उसे त्यागना आपकी शक्ति से बाहर हो जायेगा । उसके नाश के लिए 'ज्ञान' का पैदा होना जरुरी है; क्योंकि उसका सच्चा मार 'ज्ञान' ही है ।
तृष्णा-मूल नसाय होये जब ज्ञान उदय मन।
भये विषय में लीं बढे दिन-पर-दिन चौगुन।
जैसे मुग्धा-नार कठिन कुच हाथ लगावत।
बढ़त काममद अधिक अधिक तब में सरसावत।
जराजीर्ण ऐश्वर्य को त्यागत लागत दुःख अति।
तोहि तजिबे को असमर्थ यह वासव जो है वायुपति।।
कृशः काणः खञ्जः श्रवणरहितः पुच्छविकलो
ब्रणी पूयल्किन्नः कृमिकुलशतैरावृततनुः ।
क्षुधाक्षामो जीर्णः पिठरजककपालार्पितगलः
शुनीमन्वेति श्वा हतमपि च हन्त्येव मदनः।। १८ ।।
अर्थ:
दुबला काना और लंगड़ा कुत्ता, जिसके कान और पूँछ नहीं हैं, जिसके जख्मों में राध बह रही है, जिसके शरीर मेंकीड़े बिलबिला रहे हैं, जो भूखा और बूढा है, जिसके गले में हांडी का घेरा पड़ा है - कुतिया के पीछे पीछे दौड़ता है । कामदेव मरे हुए को भी मारता है ।
जिस कुत्ते की ऐसी बुरी हालत है, वह कुत्ता भी मैथुन करने के लिए कुतिया के पीछे पीछे दौड़ता है; तब मोटे-ताजे, मावा-मलाई और मिष्टान्न खाने वाले अपनी कामवासना को कैसे रोक सकते हैं ? इसी से बचने के लिए, ज्ञानी लोग अपनी देह को एकदम गला देते हैं, तरह तरह के व्रत और उपवास करते हैं, धूनी तपते हैं और शीत लहर सहते हैं । कामदेव बड़ा बलवान है । जो उसके काबू में नहीं आते, वे सबसे बलवान और सच्चे योद्धा हैं । वे भीष्म और अर्जुन हैं ।
शय्या च भूः परिजनो निजदेहमात्रं।
वस्त्रं च जीर्णशतखण्डसलीनकन्था
हा हा तथाऽपि विषया न परित्यजन्ति।। १९ ।।
अर्थ:
वह मनुष्य जो भीख मांगकर दिन में एक समय ही नीरस अलौना अन्न खाता है, धरती पर सो रहता है, जिसका शरीर ही उसका कुटुम्बी है जो सौ थेगलियों(चीथड़ों) की गुदड़ी ओढ़ता है, आश्चर्य है कि, ऐसे मनुष्य को विषय नहीं छोड़ते !
जो दिन भर में एक अलौना - फीका अन्न खाते हैं और वह भी मांग-मांग कर; जिनके पास सोने के लिए पलंग और गद्दे-तकिये नहीं, बेचारे पेड़ों के नीचे या खुले मैदान में घास-पात पर सो रहते हैं; जिनके नाते-रिश्तेदार कोई नहीं, उनका अपना शरीर ही उनका नातेदार है; जिनके पास पहनने को कपडे नहीं; बेचारे ऐसी गुदड़ी ओढ़ते हैं, जिसमें सैकड़ों चीथड़े लटकते हैं - ऐसे लोगों का भी विषय पीछा नहीं छोड़ते, तब धनियों का पीछा तो वे कैसे छोड़ने लगे, जहाँ उन्हें सब तरह के ऐशो-आराम मिलते हैं ? कहा है :-
विश्वामित्रपराशरप्रभृतयो वाताम्बुपर्णाशना-
स्तेऽपि स्त्रीमुखपड़्कजं सुललितं दृष्ट्वैव मोहंगताः?
शाल्यन्नं सघृतं पयोदधियुतं ये भुञ्जते मानवा-
स्तेषामिन्द्रियनिग्रहो यदि भवेद्विन्ध्यस्तरेत्सागरे।।
विश्वामित्र और पराशर प्रभृति ऋषि भी - जो हवा, जल और पत्ते खाते थे - स्त्री का कमल मुख देखकर मोहित हो गए; फिर शालिचांवल, दही और घी मिला भोजन जो खाते हैं, उनकी इन्द्रियां यदि उनके वश में हो जाएँ, तो विंध्याचल पर्वत भी समुद्र में तैरने लगे । मतलब यह है कि पत्तों और जल पर गुज़र करने वाले ऋषि भी जब स्त्रियों पर मोहित हो गए, तब घी दूध खानेवालों की क्या बात है ? कामदेव का वश करना बड़ा कठिन है । पराशर ने दिन की रात कर दी और नदी को रेत में परिणत कर दिया, पर वे भी काम को वश में न कर सके। इतना ही नहीं; बड़े बड़े देवता भी काम को वश में न कर सके । स्वयं ब्रह्मा, विष्णु और महेश तक को काम ने जीत लिया ।
"आत्मपुराण" में लिखा है :
कामेन विजितो ब्रह्मा, कामेन विजितो हरिः ।
कामेन विजितः शम्भुः, शक्रः कामेन निर्जितः।।
कामदेव ने ब्रह्मा, विष्णु, शिव और इन्द्र को जीत लिया ।
"पद्मपुराण" में लिखा है - शान्तनु नामक ऋषि की स्त्री का नाम अमोघ था । वह परमा सुन्दरी और पतिव्रता थी । एक दिन ब्रह्मा जी ऋषि से मिलने गए । ऋषि उस समय कहीं बाहर गए हुए थे । उस पतिव्रता ने ब्रह्मा जी को आसन बिछा कर बिठाया । ब्रह्मा जी उसका रूप देखकर मुग्ध हो गए । उनका वीर्य निकल गया; अतः वे लज्जित हो गए। इतने में ऋषि आ गए । उन्होंने वीर्य पड़ा देख स्त्री से पूछा - "यह क्या !" स्त्री ने कहा - "स्वामिन ! ब्रह्मा जी आये थे ।" सुनकर ऋषि ने कहा - "स्त्री का दर्शन ऐसा ही है कि जिससे देवता भी धैर्य त्याग देते हैं ।"
एक बार महादेव जी समाधिस्थ थे । वहीँ वन में मनुष्यों की सुन्दरी और युवती स्त्रियां क्रीड़ा कर रही थीं । शिवजी का मन चल गया । उन्होंने अपने तपोबल से उन्हें आकाश में ले जाकर उनसे भोग किया । अन्त में पारवती जी ने स्त्रियों को नीचे गिरा दिया और शिवजी को समाधी में लगाया ।
विष्णु भगवान् ने जलन्धर नामक राक्षस की वृन्दा नामक पतिव्रता स्त्री से छलकर भोग किया । उसने उन्हें श्राप दिया ।
इन्द्र ने गौतम ऋषि की स्त्री अहिल्या से छल से भोग किया और इतने में ऋषि आ गए । उन्होंने इन्द्र को देखते ही श्राप दिया । ऋषि के श्राप से इन्द्र के शरीर में भग ही भग हो गयी ।
एक बूढा तपस्वी किसी मन्दिर में अकेला रहता था । वह पूरा जितेन्द्रिय था । दैवात एक युवती उस मन्दिर के सामने से निकली । तपस्वी मुग्ध हो गया और उसके पीछे हो लिया । जब वह अपने घर पहुंची, तब ऋषि भी द्वार पर जाकर उससे प्रार्थना करने लगा । उसने द्वार बन्द करना चाहा और ऋषि ने सिर अड़ा कर घुसना चाहा । उसने ज़ोर से द्वार बन्द करने की चेष्टा की । इससे ऋषि का सिर कट गया और वह वहीँ मर गया । ऐसे ऐसे बूढ़े और अभ्यासी जितेन्द्रिय पुरुष जब स्त्रियों को देखते ही पागल हो जाते हैं, तब औरों का क्या कहना ?
यद्यपि कामदेव को काबू में करना महाकठिन है ;
तथापि कामदेव को वश में करो;
क्योंकि स्त्री संसार बन्धन की मूल और जन्म-मरण की कारण है ।
स्त्री भक्ति-मुक्ति और सुख-शान्ति की नाशक है । जिनके स्त्री है, वे परमेश्वर की भक्ति नहीं कर सकते, क्योंकि उन्हें जञ्जालों से फुर्सत ही नहीं मिल सकती । यों तो सभी विषय विष के समान घातक हैं, पर स्त्री सबसे ऊपर है । जहाँ स्त्री है, वहां सभी विषय हैं । विषय दुःख और ताप के कारण हैं, अतः बुद्धिमान व्यक्ति को विषयों से बचना चाहिए । मोक्ष चाहने वालों को तो स्त्री के दर्शन भी न करने चाहिए ।
शिक्षा: विषय विष हैं। इनका त्याग ही सुख की जड़ है । जो विषयी हैं उन्हें कहीं सुख नहीं । अतः काम को जीतो । जिसने काम को जीत लिया, उसने सबको जीत लिया ।
स्तनौ मांसग्रन्थि कनकलशावित्युपमितौ
मुखं श्लेष्मागारं तदपि च शशाङ्केन तुलितम ।।
स्रबन्मूत्रक्लिन्नम् करिवरकरस्पर्द्धि जघन-
महो निन्द्यम रूपं कविजन विशेषैर्गुरु कृतं ।। २० ।।
अर्थ:
स्त्रियों के स्तन, मांस के लौंदे हैं, पर कवियों ने उन्हें सोने के कलशों की उपमा दी है । स्त्रियों का मुंह कफ का घर है, पर कवी उसे चन्द्रमा के समान बताते हैं और उनकी जांघो को, जिनमे पेशाब प्रभृति बहते रहते हैं, श्रेष्ठ हाथी की सूंड के समान कहते हैं । स्त्रियों का रूप घृणा योग्य है, पर कवियों ने उसकी कैसी तारीफ की है ।
राग सोरठ
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अनाड़ी मन ! नारी नरक का मूल ।
रंग रूप पर भय लुभाना, क्यों भूल गया हरि नाम दिवाना?
इस धन यौवन का नाहिं ठिकाना, दो दिन में हो जाये धूल ।।
कंचन भरे दो कलश बतावे, ताहि पकड़ आनंद मनावे।
यह तो चमड़े की थैली है मूरख, जिन पै रह्यो तू भूल।।
जा मुख को तू चन्दा कर माने, थूक राल वामे लिपटाने।
धिक् धिक् धिक् ! तेरे या मुख पै, मिष्टा में रह्यो तू भूल।।
कैसा भारी धोका खाया, तन पर कामिन के ललचाया।
कहें कबीर आँख से देखा, यह तो माटी का स्थूल।।
स्त्री आफतों की जड़ है
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स्त्री अनेक आपदाओं का मूल है । अनेक रूपवती स्त्रियों के कारण उनके पतियों के प्राण नष्ट हुए हैं । नूरजहां के कारण शेर अफ़ग़ान के जान मारी गयी । स्त्री के पीछे सुन्द-उपसुन्द आपस में लड़कर मर गए । स्त्री के पीछे राजा नहुष को स्वर्ग से गिरना पड़ा । स्त्री के कारण बाली मारा गया और रावण का सर्वनाश हुआ एवं शिशुपाल का सर काटा गया । स्त्री के पीछे ही भारत को ग़ारत करने वाला महाभारत हुआ । स्त्री सांप से भी भयंकर है । सांप के तो काटने से मनुष्य मरता है, स्त्री विष के सम्बन्ध से मनुष्य को बार बार जन्म लेना और मरना पड़ता है; क्योंकि मरते समय पुरुष का मन अपनी स्त्री में जरूर जाता है । मरण समय जिसकी वासना जिसमें रहती है, वह उसे अवश्य मिलता है ।
कहा है:
वासना यत्र यस्य स्यात्सतं स्वप्नशु पश्यति ।
स्वप्नवन्मरणे ज्ञेयं वासनातो वपुर्नृणां ।।
जिस मनुष्यकी जहाँ वासना होती है, उसी वासनाके अनुरूप वह स्वप्न देखता है । स्वप्नके समान ही मरण होता है अर्थात् वासनाके अनुरूप ही अन्तसमयमें चिन्तन होता है और उस चिन्तनके अनुसार ही मनुष्यकी गति होती है ।
दोहा
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नारी कहूं कि नाहरी(सिंहनी), नख-सिख सों यह खाये।
जल बूड़ा तो ऊबरे, भग बूड़ा बहि जाये।।
एक कनक अरु कामिनी, तजिये भगिए दूर।
हरि विच पारें अन्तरा, यम देसी मुख धूर।।
जहाँ काम तहाँ राम नहीं, राम तहाँ नहीं काम।
दोउ कबहुँ न रहें, काम राम इक ठाम।।
अविनाशी विच धार तिन, कुल कंचन अरु नार।
जो कोई इन ते बचे, सोइ उतरे पार।।
स्त्री त्यागी ही पण्डित है
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मनुष्यों और पशुओं में क्या भेद है ? मनुष्य खाते, सोते, डरते और स्त्री भोग करते हैं और पशु भी यही चारों काम करते हैं । पर इन दोनों में अंतर यही है कि मनुष्य को धम्मज्ञान है, पशु को नहीं । यदि मनुष्य पशुओं की तरह अज्ञानी हो, तो वह भी पशु ही है ।
कहा है:
अधीत्य वेदशास्त्राणि, संसारे रागिणश्च ये।
तेभ्यः परो न मूर्खोऽस्ति सधर्मा श्वाश्वसूकरैः।।
जो पुरुष वेद-शास्त्रों को पढ़कर भी संसार से या स्त्री-पुरुष आदि से प्रीति रखते हैं, उनसे बढ़कर मूर्ख कौन है? क्योंकि स्त्री-पुरुष प्रभृति में तो कुत्ते, घोड़े और सूअर भी प्रेम रखते हैं ।
शुकदेव जी ने भागवत में कहा है :
मानुष्यं दुर्लभं प्राप्य, वेदशास्त्राणय धीत्य च ।
वध्यते यदि संसारे, को विमुच्येत मानवः ?
दुर्लभ मनुष्य चोला पाकर और वेद-शास्त्र पढ़कर भी यदि मनुष्य संसार में फंसा रहे, तो फिर संसार बन्धन से छूटेगा कौन ?
कबीरदास जी कहते हैं:
काम क्रोध मद लोभ की, जब लग घट में खानि।
कहा मूर्ख कहा पण्डिता, दोनों एक समानि।।
जब तक मन में, काम, क्रोध, मद और लोभ है, तब तक पण्डित और मूर्ख दोनों समान हैं । जिसमें ये सब नहीं, वही पण्डित है और जिसमें ये सब हैं, वह मूर्ख और अज्ञानी है।
शंकराचार्य कृत "प्रश्नोत्तरमाला" में लिखा है :
शूरान्महाशूर तमोऽस्ति को वा?
मनोजवाणैर्व्यथितो न यस्तु।
प्राज्ञोऽति धीरश्च शमोऽस्ति को वा?
प्राप्तो न मोहं ललनाकाटाक्षैः।
संसार में सबसे बड़ा शूरवीर कौन है? जो काम-बाणो से पीड़ित नहीं है।
प्राज्ञ, धीर और समदर्शी कौन है? जिसे स्त्री के कटाक्षों से मोह नहीं होता।
क्रमशः
महात्मा तुलसीदास जी को स्त्री से विरक्ति
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एक बार महात्मा तुलसीदास जी की स्त्री अपने पीहर चली गयी; महात्मा जी को आधी रात के समय स्त्री-प्रसंग की इच्छा हुई । आपकी ससुराल और आपके गाँव के बीच में नदी पड़ती थी । आप फ़ौरन ही घर छोड़ ससुराल को चल दिए । भयंकर रात में प्रबल वेग से बहती हुई नदी को पार कर आप ससुराल पहुँच गए । लेकिन जब घर के द्वार पर पहुंचे तो पौली का द्वार बन्द था । अब आप मकान में चढ़ने की तरकीब सोचने लगे । इतने में आपको एक रस्सी सी नज़र आयी, आप उसे पकड़ कर चढ़ गए और अणि स्त्री के कमरे में जा पहुंचे । स्त्री आपको देखते ही चौकन्नी सी हो गयी । आपने कहा - "प्यारी ! मैं तेरे लिए इस समय महाकष्ट भोग कर आया हूँ । मेरी अभिलाषा पूर्ण कर।"
स्त्री आपको देखते ही पलंग से नीचे बैठ गयी और बोली - "हे मेरे पतिदेव ! रात कैसी भयावनी हो रही है । बादलों की गड़गड़ाहट और बिजली की कड़क से मनुष्य का ह्रदय काँप उठता है । उधर नदी चढ़ रही है । आपने अपने शरीर की परवा न कर मुझे दर्शन दिए; इसलिए मैं आपकी अनुग्रहीत हूँ । परन्तु स्वामिन ! यह तो बताइये, आप मकान में आये कैसे, क्योंकि द्वार बन्द है?" आपने कहा - "एक रस्सी लटक रही थी, उसी के सहारे मैं चढ़ आया।" स्त्री ने जाकर देखा, तो वह रस्सी नहीं, वरन एक लम्बा चौड़ा काल सर्प था । देखते ही स्त्री के सिर में चक्कर आ गया उसके मुंह से इतना ही निकला - "स्वामिन ! जितना प्रेम आपका मुझमें है, यदि इतना ही हरि में होता, तो आपका निश्चय ही बड़ा उपकार होता ।
जितना प्रेम हराम से, उतना हरि से होय।
चला जाय बैकुंठ को, पला न पकडे कोय।।
कहते हैं, तुलसीदास तत्क्षण उसे गुरु कहकर वन को चले गए ।
स मीनोऽप्यज्ञानाद्वडिशयुतमश्नातु पिशितम् ।
विजानन्तोऽप्येतान्वयमिह विपज्जालजटिलान्
न मुञ्चामः कामानहह गहनो मोहमहिमा ॥ २१॥
अर्थ:
अज्ञानवश, पतङ्ग दीप की लौ पर गिरकर अपने तई भस्म कर लेता है; क्योंकि वह उसके परिणाम को नहीं जानता; इसी तरह मछली भी कांटे के मांस पर मुंह चलकर अपने प्राण खोती है, क्योंकि वह उससे अपने प्राण-नाश की बात नहीं जानती । परन्तु हम लोग तो अच्छी तरह जानबूझकर भी विपद मूलक विषयों की अभिलाषा नहीं त्यागते । मोह की महिमा कैसी विस्मयकर है ।
आश्चर्य है कि मनुष्य - जिसे भगवान् ने समझ दी है, जो जानता है कि विषयों की कामना आफत की जड़ है, विषयों में सुख नहीं, घोर विपद है; विषय विष से भी अधिक दुखदायी हैं - विषयों की इच्छा करता है । इससे कहना पड़ता है कि, मोह की माया बड़ी कठिन है । महात्मा कबीरदास कहते हैं:
शङ्कर हूँ ते सबल है, माया या संसार।
अपने बल छूटे नहीं, छुडावे सिरजनहार।।
फलमलमशनाये स्वादुपानाय तोयं
शयनमवनिपृष्ठे वल्कले वाससी च।
नवधनमधुपानभ्रान्तसर्वेन्द्रियाणा-
मविनयमनुमन्तुं नोत्सहे दुर्जनानाम् ।। २२ ।।
अर्थ:
खाने के लिए फलों की इफरात है, पीने के लिए मीठा जल है, पहनने के लिए वृक्षों की छाल है; फिर हम धनमद से मतवाले दुष्टों की बातें क्यों सहें ?
मनुष्य को सन्तोष नहीं, उसे तृष्णा नहीं छोड़ती; इसी से वह विषयों को भोगने की लालसा से ढाणियों की खुशामदें करता है, उनकी टेढ़ी-सूधी सुनता है, अपनी प्रतिष्ठा खोता है, निरादर और अपमान सेहत है । अगर वह सन्तोष कर ले, तो उसे ऐसे दुष्टों और धनमद से मतवाले शैतानो की खुशामद क्यों करवानी पड़े? अपनी मानहानि क्यों करनी पड़े ? परमात्मा इन शैतानो से बचावे ! एक तो तंगदिल लोग वैसे ही शैतान होते हैं, पर जब उन पर दौलत का नशा चढ़ जाता है, तब तो उनकी शैतानी का ठिकाना ही क्या ?
उस्ताद ज़ौक़ कहते हैं और खूब कहते हैं -
नशा दौलत का बद अवतार को, जिस आन चढ़ा ।
सर पै शैतान के, एक और भी शैतान चढ़ा ।।
अनुभवहीन और तंगदिल मनुष्य पर जिस समय दौलत का नशा चढ़ गया, तब मानो शैतान के सर पर एक और शैतान चढ़ गया । जिसे किसी चीज़ की जरुरत नहीं वो किसी की खुशामद क्यों करेगा ? वह अपना मान क्यों खोयेगा ? निष्पृह के लिए तो जगत तिनके के समान है । इसलिए सुख चाहो तो इच्छाओं को त्यागो।
किसी ने ठीक ही कहा है:
भागती फिरती थी दुनिया, तब तलब करते थे हम।
अब जो नफरत हमने की, तो बेक़रार आने को है।।
दोहा:
भूमि शयन, बल्कल वसन, फल भोजन जलपान।
धनमदमाते नरन को, कौन सहत अहमान?
विपुलहृदयैर्धन्यैः कैश्चिज्जगज्जनितं पुरा
विधृतमपरैर्दत्तं चान्यैर्विजित्य तृणं यथा ।
इह हि भुवनान्यन्ये धीराश्चतुर्दश भुञ्जते
कतिपयपुरस्वाम्ये पुंसां क एष मदज्वरः ।। २३ ।।
अर्थ:
कोई तो ऐसे बड़े दिलवाले लोग हुए, जिन्होंने इस प्राचीनकाल में इस जगत की रचना की; कुछ ऐसे हुए जिन्होंने इस जगत को अपनी भुजाओं पर धारण किया; कुछ ऐसे हुए जिन्होंने समग्र पृथ्वी जीती और फिर तुच्छ समझकर दूसरों को दान कर दी; और कुछ ऐसे भी हैं जो चौदह भुवन का पालन करते हैं । जो लोग थोड़े से गावों के मालिक होकर, अभिमान के ज्वर से मतवाले हो जाते हैं, उनके समबन्ध में हम क्या कहें?
सज्जन लोग धनैश्वर्य और प्रभुता पाकर कभी अहङ्कार नहीं करते; ओछे या नीच ही थोड़ी सी विषय सम्पत्ति पाकर अभिमान किया करते हैं । निति रत्न में लिखा है:
दिव्यं चूतरसं पीत्वा गर्वं नो याति कोकिलः।
पीत्वा कर्दमपानीयं भेको मकमकायते। ।
अगाधजलसञ्चारी न गर्वं याति रोहितः।
अङ्गष्ठोदकमात्रेण सफरी फर्फरायते।।
उत्तम रसाल के रस को पीकर कोकिल गर्व नहीं करता, किन्तु कीचड मिला पानी पीकर ही मेंढक टरटराया करता है ।
अगाध जल में रहने वाली रोहित मछली गर्व नहीं करती किन्तु अंगूठे जितने जल में सफरी मछली ख़ुशी से नाचती फिरती है ।
बस, छोटे और बड़े, पूरे और ओछे लोगों में यही अन्तर होता है । जो जितना छोटा है, वह उतना ही घमण्डी और उछलकर चलनेवाला है और जो जितना ही बड़ा और पूरा है, वह उतना ही गम्भीर और निरभिमानी है । नदी नाले थोड़े से जल से इतरा उठते हैं; किन्तु सागर, जिसमें अनंत जल भरा है गम्भीर रहता है ।
अभिमान या अहङ्कार महा अनर्थों का मूल है । यह नाश की निशानी है । अहंकारी से परमात्मा दूर रहता है । जिससे परमात्मा दूर रहता है, उसके दुःखों का अंत कहाँ है ? अतः मनुष्यों ! अभिमान को त्यागो । जो आज टुकड़ो का मुहताज है, वह कल राजगद्दी का स्वामी दिखाई देता है और आज जिसके सर पर राजमुकुट है, सम्भव है कि कल वह गली-गली मारा-मारा फिरे । संसार की यही गति है, इसलिए अभिमान वृथा है । परमात्मा ने एक से बढ़कर एक बना दिया है । कहा है:
एक-एक से एक-एक को, बढ़कर बना दिया।
दारा किसी को, किसी को सिकन्दर बना दिया।।
*दारा ईरान का बादशाह था । वह अपने समय में मध्याह्न के मार्तण्ड की तरह तपता था । उसने बहुत से देश जीत लिए । किसी को उम्मीद न थी कि, दारा भी किसी से पराजित होगा ; पर ईश्वर ने तो एक से बढ़कर एक बनाये हैं । उसने दारा को भी परास्त करने वाला सिकन्दर पैदा कर दिया । सिकन्दर आज़म ने दारा को शिकस्त दी और भारत पर भी चढ़ाई की।
आपको किस बात का गर्व है? यह राज्य और धन दौलत क्या सदा आपके कुल में रहेंगे या आपके साथ जायेंगे ? जो रावण लंकेश्वर था, जिसने यक्ष, किन्नर, गन्धर्व और देवताओं तक को अपने अधीन कर लिया था, आज वह कहाँ है? उसका धन वैभव क्या उसके साथ गया? जिस राम ने समुद्र का पल बांधकर वानर सेना से रावण का नाश किया वही राम आज कहाँ है? जिस बलि ने रावण जैसे त्रिलोक विजयी को अपने पुत्र के पालने से बाँध रखा था आज वह बलि कहाँ है ? जिस सहस्त्रबाहु ने रावण के सर पर चिराग रख कर जलाया था, वह सहस्त्रबाहु ही आज कहाँ है ? चारों दिशाओं को अपने भुजबल से जीतनेवाले भीमार्जुन कहाँ हैं ? इस पृथ्वी पर अनेक, एक से एक बली राजा और शूरवीर हो गए, पर यह पृथ्वी किसी के साथ न गयी । क्या आपकी धन-दौलत, जमींदारी या राजलक्ष्मी अटल और स्थिर है ? क्या यह आपके साथ जाएगी ? हरगिज़ नहीं । आप जिस तरह खाली हाथ आये थे, उसी तरह खाली हाथ जायेंगे ।
अभिमानियों का नशा उतरने के लिए उस्ताद ज़ौक ने भी खूब कहा है:
दिखा न जोशो खरोश इतना, ज़ोर पर चढ़कर।
गए जहां में दरिया, बहुत उतर-चढ़कर।।
हे मनुष्य ! ज़ोर में आकर इतना जोश-खरोश न दिखा इस दुनिया में बहुत से दरिया चढ़-चढ़ कर उतर गए - कितने ही बाग़ लगे और सूख गए ।
महात्मा कबीरदास जी कहते हैं:
धरती करते एक पग, करते समन्दर फाल ।
हाथों परवत तोलते, ते भी खाये काल।।
हाथों परवत फाड़ते, समुन्दर घूँट भराय।
ते मुनिवर धरती गले, कहा कोई गर्व कराय?
त्वं राजा वयमप्युपासितगुरुप्रज्ञाभिमानोन्नताः
ख्यातस्त्वं विभवैर्यशांसि कवयो दिक्षु प्रतन्वन्ति नः ।
इत्थं मानद नातिदूरमुभयोरप्यावयोरन्तरं यद्यस्मासु
पराङ्मुखोऽसिवयमप्येकान्ततो निःस्पृहाः।। २४ ।।
अर्थ:
अगर तू राजा है, तो हम भी गुरु की सेवा से सीखी हुई विद्या के अभिमान से बड़े हैं। अगर तू अपने धन और वैभव के लिए प्रसिद्ध है, तो कवियों ने हमारी विद्या की कीर्ति भी चारों और फैला रखी हैं । हे मानभञ्जन करने वाले, तुझमें और हममें ज्यादा फर्क नहीं है । अगर तू हमारी ओर नहीं देखता, तो हमें भी तेरी परवा नहीं है ।
अभुक्तयां यस्यां क्षणमपि न यातं नृपशतै-
र्भुवस्तस्या लाभे क इव बहुमानः क्षितिभुजाम्।
तदंशस्याप्यंशे तदवयवलेशेऽपि पतयो
विषादे कर्तव्ये विदधति जडाः प्रत्युत मुदम।। २५ ।।
अर्थ:
सैकड़ों हज़ारों राजा इस पृथ्वी को अपनी अपनी कहकर चले गए, पर यह किसी की भी न हुई; तब राजा लोग इसके स्वामी होने का घमंड क्यों करते हैं ? दुःख की बात है, कि छोटे छोटे राजा छोटे से छोटे टुकड़े के मालिक होकर अभिमान के मारे फूले नहीं समाते ! जिस बात से दुःख होना चाहिए, मूर्ख उससे उलटे खुश होते हैं ।
इस पृथ्वी पर रावण और सहस्त्रबाहु प्रभृति एक से एक बढ़कर राजा हो गए, जिन्होंने त्रिलोकी अपनी ऊँगली पर नचा डाली । वे कहते थे कि हमारे बराबर जगत में दूसरा कोई नहीं है। यह पृथ्वी सदा हमारे पास ही रहेगी । पर वे सब एक दिन इसे छोड़कर चल बसे। यह उनकी न हुई; वे इसे सदा न भोग सके। तब आजकल के छोटे छोटे राजा, जो अपने तई पृथ्वीपति समझ कर अभिमान के नशे में चूर रहते हैं, इसके लिए लड़ते हैं, खून खराबा करते हैं, क्या यह उनकी अज्ञानता नहीं है ? उनकी यह छोटी सी प्रभुता - मालिकाई, सदा-सर्वदा नहीं रहेगी; यह विजली की सी चमक और बदल की सी छाया है । इस पर घमण्ड करना बड़ी भूल की बात है ।
महात्मा कबीर कहते हैं -
चहुँदिशि पाका कोट था, मंदिर नगर मंझार ।
खिरकी खिरकी पाहरू, गज बंधा दरबार ।।
चहुँदिशि तो योद्धा खड़े, हाथ लिए हथियार ।
सब ही यह तन देखता, काल ले गया मार ।।
आस पास योद्धा खड़े, सबै बजावें गाल ।
मंझ महल ते ले चला, ऐसा परबल काल ।।
हे मनुष्य ! मौत से डर, अभिमान त्याग । किसी राजा की नगरी के चारों तरफ पक्की शहरपनाह थी, उसका महल शहर के बीचोंबीच था, हरेक फाटक की खिड़की पर पहरेदार थे, दरबार में हाथी बंधा था, चारों तरफ सिपाही हथियार बांधे हुए खड़े थे । आस पास खड़े योद्धा गाल बजाते ही रह गए और वह बलवान काल, ऐसा बंदोबस्त होने पर भी राजा को अपने साथ ले गया ।
न नटा न विटा न गायना न परद्रोहनिबद्धबुद्धयः।
नृपसद्मनि नाम के वयं स्तनभारानमिता न योषितः।। २७ ।।
अर्थ:
न तो हम नट या बाज़ीगर हैं, न हम नचैये-गवैये हैं, न हमको चुगलखोरी आती है, न हमें दूसरों की बर्बादी की बन्दिशें बांधनी आती हैं और न हम स्तनभारावनत स्त्रियां ही हैं; फिर हमारी पूछ राजाओं के यहाँ क्यों होने लगी? हममें इनमें से एक भी बात नहीं, फिर हमारा प्रवेश राजसभा में कैसे हो सकता है ? वहां तो उनकी पूछ है - उन्ही का आदर है - जो उनकी विषय-वासनाएं पूरी करते हैं।
दोहा:
नट भट विट गायन नहीं, नहिं बादिन के माहिं।
कौन भांति भूपति मिलन, तरुणी भी हम नाहिं?।।
पुरा विद्वत्तासीऽदुपशमवतां क्लेशहतये
गता कालेनासौ विषयसुखसिद्धयै विषयिणाम् ।
इदानीं तु प्रेक्ष्य क्षितितलभुजः शास्त्रविमुखा
नहो कष्टं साऽपि प्रतिदिनमधोऽधः प्रविशति ।। २८ ।।
अर्थ:
पहले समयों में, विद्या केवल उन लोगों के लिए थी, जो मानसिक क्लेशों से छुटकारा पाकर चित्त की शान्ति चाहते थे । इसके बाद विषय सुख चाहने वालों के काम की हुई । अब तो राजा लोग शास्त्रों को सुनना ही नहीं चाहते; वे उससे पराङ्गमुख हो गए हैं; इसलिए वह दिन-ब-दिन रसातल को चली जाती है । यह बड़े ही दुःख की बात है।
पहले ज़माने में जो विद्या शान्तिकामी लोगों के अशान्त चित्तों को शान्त करने, उनकी मनोवेदनाओं को दूर करने और उनके शोक ताप की आग में जलने से बचने के काम आती थी, होते होते वही विद्या, विषय-सुख भोगने का जरिया हो गयी । लोग भाँति भाँति की विद्याएं सीख कर राजाओं और ढाणियों को खुश करते और उनसे धन पाकर स्वयं विषय सुख भोगते थे । यहाँ तक तो खैर थी; किन्तु अब राजा लोग ऐसे हो गए हैं, कि वह विद्या और विद्वानों कि ओर नज़र उठा कर भी नहीं देखते, पण्डितों से धर्मशास्त्र नहीं सुनते; इसलिए अब कोई विद्या नहीं पढता । कदर न होने से, विद्या अब अधोगति को प्राप्त होती जा रही है। क्या यह दुःख का विषय नहीं है?
दोहा:
विद्या दुःखनाशक हती, फेरि विषय सुख दीन।
जात रसातल को चली, देखि नृपन्ह मतिहीन।।
स जातः कोऽप्यासीन्मदनरिपुणा मूर्ध्नि धवलं
कपालं यस्योच्चैर्विनिहितमलंकारविधये ।
नृभिः प्राणत्राणप्रवणमतिभिः कैश्चिदधुना
नमद्भिः कः पुंसामयमतुलदर्पज्वरभरः ।। २९ ।।
अर्थ:
प्राचीन काल में ऐसे पुरुष हुए हैं, जिनकी खोपड़ियों कि माला बनाकर स्वयं शिव ने श्रृंगार के लिए अपने गले में पहनी । अब ऐसे लोग हैं, जो अपनी जीविका-निर्वाह के लिए सलाम करने वालों से ही प्रतिष्ठा पाकर, अभिमान के ज्वर (मद) से गरम हो रहे हैं ।
दोहा:
ऐसेहू जग में भये, मुण्डमाल शिव कीन।
धनलोभी नर नावट लखि, तुमको मदज्वर दीन।।
अर्थानामीशिषे त्वं वयमपि च गिरामीश्महे यावदित्थं
शूरस्त्वं वादिदर्पज्वरशमनविधावक्षयं पाटवं नः।
सेवन्ते त्वां धनान्धा मतिमलहतये मामपि श्रोतुकामा
मय्यप्यास्था न ते चेत्त्वयि मम सुतरामेष राजन्गतोऽस्मि ।। ३० ।।
अर्थ:
यदि तुम धन के स्वामी हो तो हम वाणी के स्वामी हैं। यदि तुम युद्ध करने में वीर हो तो हम अपने प्रतिपक्षियों से शास्त्रार्थ करके उनका मद-ज्वर तोड़ने में कुशल हैं । यदि तुम्हारी सेवा धन-कामी या धनान्ध करते हैं, तो हमारी सेवा अज्ञान-अंधकार का नाश चाहनेवाले, शास्त्र सुनने के लिए करते हैं । यदि तुम्हें हमारी ज़रा भी गरज़ नहीं है, तो हमें भी तुम्हारी बिलकुल गरज़ नहीं है । लो, हम भी चलते हैं ।
यदा किञ्चिज्झोऽहं द्विप इव मदान्धः समभवं
तदा सर्वज्ञोऽस्मीत्यभवदवलिप्तं मम मनः।
यदा किंचित्किञ्चिद्बुधजनसकाशादवगतं
तदा मूर्खोऽस्मीति ज्वर इव मदो मे व्यपगतः।। ३१ ।।
अर्थ:
जब मैं थोड़ा जानता था, तब हाथी के समान मद से अन्धा हो रहा था; मैं समझता था कि मैं सर्वज्ञ हूँ । जब मुझे बुद्धिमानो की सुहबत से कुछ मालूम हुआ; तब मैंने समझा, कि मैं तो कुछ भी नहीं जानता । मेरा झूठा मद, ज्वर की तरह उतर गया।
उस्ताद ज़ौक़ ने भी ठीक ऐसी ही बात कही है:
हम जानते थे, इल्म से कुछ जानेंगे ।
जाना तो यह जाना, कि न जाना कुछ भी।।
किसी ने ठीक ही कहा है:
"अल्प विद्यो महागर्वी "।
अतिक्रान्तः कालो लटभललनाभोगसुभगो
भ्रमन्तः श्रान्ताः स्मः सुचिरमिह संसारसरणौ।।
इदानीं स्वः सिन्धोस्तटभुवि समाक्रन्दनगिरः
सुतारैः फुत्कारैः शिवशिवशिवेति प्रतनुमः।। ३२ ।।
अर्थ:
ज़ेवरों से लदी हुई स्त्रियों के भोगने-योग्य जवानी चली गयी; और हम चिरकाल तक विषयों के पीछे दौड़ते-दौड़ते थक भी गए । अब हम पवित्र जाह्नवी तट पर, (ललचाने वाली स्त्रियों) की निन्दा करते हुए, शिव-शिव जपेंगे।
किसी ने ठीक ही कहा है:
इश्क़ का जोश है जब तक, कि जवानी के हैं दिन।
यह मर्ज़ करता है शिद्दत, इन्ही अय्याम में ख़ास।।
अब तो बुढ़ापे का दौरदौरा है, इस उम्र में हम नाज़नीनों के साथ ऐश कर भी नहीं सकते । इसके सिवा हम सावधान भी हो गए हैं । हमने बेवकूफी छोड़ दी है । हम बहुत दिनों तक विषयों में लीं रहे, हमने बहुत कुछ विषय भोग, भोगे; अब हम थक गए, उनसे हमारा जी ऊब गया । उनसे हमें कुछ भी सुख नहीं मिला । इसलिए हम गंगा जी के किनारे बैठ कर, संसार बन्धन की मूल और नरक की नसैनी सुंदरियों की ममता छोड़, शिव से प्रीती करेंगे और दिन-रात उन्ही का पवित्र एवं कल्याणकारी नाम जपेंगे, जिससे हमारा अंतकाल तो सुधर जाए ।
दोहा:
रमणकाल यौवन गयो, थक्यो भ्रमत संसार।
देहुँ गंगतट शेष वय, शिव-शिव जपत विस्तार।।
माने म्लायिनि खण्डिते च वसुनि व्यर्थे प्रयातेऽर्थिनि
क्षीणे बन्धुजने गते परिजने नष्टे शनैर्यौवने ।
युक्तं केवलमेतदेव सुधियां यज्जह्नुकन्यापयः-
पूतग्रावगिरीन्द्रकन्दरतटीकुञ्जे निवासः क्वचित् ।। ३३ ।।
अर्थ:
जब लोगों में इज़्ज़त आबरू न रहे; धन नाश हो जाये; याचक लौट लौट कर जाने लगें; भाई-बन्धु, स्त्री-पुत्र और नाते-रिश्तेदार मर जाएं; तब बुद्धिमान को चाहिए कि किसी ऐसे पर्वत की गुहा के कोने में जा बसे, जिसके पत्थर गंगा जी के जल से पवित्र हो रहे हों ।
जब लोगों में अपना मान न रहे, लोग नफरत की नज़र से देखने लगें; अपनी धन-दौलत जाती रहे; जो याचक पहले कुछ पाते थे, वे निर्धनता के कारण विमुख होकर लौट जाते हैं; भाई-बन्धु और स्त्री-पुत्र प्रभृति नातेदार दूसरी दुनिया को चले गए हों, तब तो बुद्धिमान को चाहिए कि संसार को त्याग दें; इसमें मोह न रखें और किसी ऐसे पहाड़ की गुफा में जा रहे, जिसके पत्थरों को पवित्र गंगाजल पखार पखारकर पवित्र करता हो। ऐसी हालत में संसार में रहना - वृथा समय खोना है । कम से कम उस समय तो बुद्धिमान एकान्त में बैठकर, सब तरह की आशा तृष्णा छोड़कर, भगवान् के चरणकमलों के मन लगावे ।
दोहा:
गयो मान यौवन सुधन, भिक्षुक जात निराश।
अब तो मौको उचित यह, श्रीगंगा तट बास।।
प्रसादं किं नेतुं विशसि हृदयक्लेशकलितम् ।
प्रसन्ने त्वय्यन्तः स्वयमुदितचिन्तामणि गुणे
विमुक्तः संकल्पः किमभिलषितं पुष्यति न ते ।। ३४ ।।
अर्थ:
हे मलिन मन ! तू पराये दिलों को प्रसन्न करने में किसलिए लगा रहता है ? यदि तू तृष्णा को छोड़कर संतोष कर ले, अपने में ही संतुष्ट रहे, तो तू स्वयं चिंतामणि स्वरुप हो जाये। फिर तेरी कौन सी इच्छा पूरी न हो?
मन ही सब कामों का करता है । सभी इन्द्रियां मन के ही अधीन और मन की ही अनुगामिनी हैं। मन ही बंधन और मोक्ष का कारण है । मनुष्य मन से ही पाप-पुण्य और सुख-दुःख प्रभृति का भागी होता है । मन ही मनुष्य को बुरा-भला, साधु-असाधु सब कुछ बना देता है । मन की वृत्ति सुधरने से ही, मन के वासना-हीन होने से ही, सब कुछ त्यागने से ही, वह आत्मसाक्षात्कार के योग्य हो जाता है ; इसीलिए कोई ज्ञानी पुरुष मन को सम्बोधित करके कहता है -
"अरे मन ! तू स्वयं तो मलिन और दुःख के भार से दबा हुआ है; फिर तू औरो के दिल खुश करने की इतनी कोशिशें क्यों करता है, क्यों आफतें उठता है, क्यों मान खोता है और क्यों अपमान सहता है ? इससे तुझे क्या लाभ होगा ? मेरी बात माने तो तू इच्छा को त्याग दे, किसी भी चीज़ की इच्छा मत रख; तब तुझे शान्ति मिलेगी - परमानन्द की प्राप्ति होगी । जब तू चिंतामणि की भाँती स्वच्छ हो जायेगा, जब तू अपने स्वरुप को पहचान जायेगा, तब तुझे आत्मसाक्षात्कार हो जायेगा, तुझे ब्रह्मज्ञान हो जायेगा, तू ब्रह्म के प्रेम में लीन हो जायेगा, हर्ष-विषाद और शोक-मोह तेरे पास न आएंगे, अष्ट सिद्धि और नव निधि तेरे सामने हाथ बांधे खड़ी रहेंगी । उस समय तेरी कोई अभिलाषा पूरी हुए बिना बाकी न रहेगी । इसीलिए कहता हूँ, कि तू दूसरों को राज़ी करने की अपेक्षा अपने तई ही राज़ी कर, इससे तुझे निश्चय ही उसकी प्राप्ति होगी, जिसके समान त्रिलोकी में और कोई नहीं है । जिस समय उसकी अनुपम छवि तेरी आँखों में समा जाएगी, उस समय तुझे और कुछ अच्छा न लगेगा;केवल वही अच्छा लगेगा । महाकवि रहीम ने कहा है -
प्रीतम-छवि नैनन बसी, पर-छवि कहाँ समाये।
भरी सराय "रहीम" लखि, आप पथिक फिर जाए।।
जब आँखों में प्यारे कृष्ण की सुन्दर मनमोहिनी छवि समा जाती है, तब उसमें और किसी की छवि नहीं समा सकती । जब तक नयनों में मुरली मनोहर की छवि नहीं समाती, नयन उसकी छवि से खाली रहते हैं, तभी तक मामूली छवि उनमें समाती रहती है । जिस तरह सराय को भरी हुई देखकर, उसमें कोठरियां खाली न पाकर, मुसाफिर लौट जाते हैं; उसी तरह नयनों में मनमोहन की बांकी छवि देखकर और संसारी मिथ्या खूबसूरतियाँ नयनों के पास भी नहीं फटकती । जब दिल में परम प्यारे कृष्ण का डेरा लग जाता है, तब उसमें सुन्दर कामिनियों और लक्ष्मी प्रभृति किसी को भी स्थान नहीं मिलता; अर्थात दिल को उसके मुकाबले में संसार के अच्छे से अच्छे पदार्थ - स्त्री-पुरुष और धन-दौलत प्रभृति- तुच्छातितुच्छ जंचते हैं ।
दोहा:
तू ही रीझत क्यों नहीं, कहा रिझावत और?
तेरे ही आनन्द से, चिंतामणि सब ठौर ।।
सुखासीनाः शान्तध्वनिषु द्युसरितः ।।
भवाभोगोद्विग्नाः शिवशिवशिवेत्यार्तवचसः
कदा स्यामानन्दोद्गमबहुलबाष्पाकुलदृशः।। ४२ ।।
अर्थ:
वह समय कब आवेगा, जब हम पवित्र गंगा के ऐसे स्थान पर जो चन्द्रमा की चांदनी से चमक रहा होगा , सुख से बैठे होंगे और रात के समय, जब सब तरह का शोरगुल बन्द होगा, आनन्दाश्रुपूर्ण नेत्रों से, संसार के विषय दुखों से थक कर, सर्वशक्तिमान शिव की रटना लगा रहे होंगे ?
धन्य हैं वे लोग जिन्हे संसारी झूठे विषय-सुखों से नफरत हो गयी है, जो यहाँ के जंजालों से थक गए हैं जिन्होंने मोह जाल तोड़कर गङ्गा के पवित्र किनारे पर वास कर लिया है और निस्तब्ध चांदनी रात में, गदगद होकर, शिव शिव रटते हैं !! और लोग जो संसार के मोहपाश में फंसे हुए हैं, अपना जीवन वृथा खोते हैं।
विस्तीर्णं वस्त्रमाशासुदशकममलं तल्पमस्वल्पमुर्वी।
येषां निःसङ्गताङ्गीकरणपरिणत: स्वात्मसन्तोषिणस्ते
धन्याः संन्यस्तदैन्यव्यतिकरनिकराः कर्मनिर्मूलयन्ति।। ५२ ।।
अर्थ:
वे ही प्रशंसाभाजन हैं, वे ही धन्य हैं, उन्होंने ही धर्म की जड़ काट दी है - जो अपने हाथों के सिवा और किसी बासन की जरुरत नहीं समझते, जो घूम घूम कर भिक्षा का अन्न कहते हैं, जो देशो दिशाओं को ही अपना विस्तृत वस्त्र समझते हैं, जो अकेले रहना पसन्द करते हैं, जो दीनता से घृणा करते हैं और जिन्होंने आत्मा में ही सन्तोष कर लिया है ।
जिन्होंने सबसे मन हटाकर, सब तरह के विषयों को त्याग कर, संसारी माया जाल काटकर अपने आत्म में ही सन्तोष कर लिया है; जो किसी भी वास्तु की आकांक्षा नहीं रखते, यहाँ तक की जल पीने को भी कोई बर्तन पास नहीं रखते; अपने हाथों से ही बर्तन का काम लेते हैं; खाने के लिए घर में सामान नहीं रखते, कल के भोजन की फ़िक्र नहीं करते, आज इस गांव में मांगकर पेट भर लेते हैं तो कल दुसरे गांव में जा मांगते हैं, एक गांव में दो रात नहीं बिताते; जो शरीर ढकने के लिए कपड़ों की भी जरुरत नहीं रखते, दशों दिशाओं को ही अपना वस्त्र समझते हैं; जो पलंग-तोशक, गद्दे-तकियों की आवश्यकता नहीं समझते, ज़रा सी जमीन को ही निर्मल पलंग समझते हैं; जब नींद आती है तो अपने हाथ का तकिया लगाकर सो जाते हैं; जो किसी का संग नहीं करते, अकेले रहते हैं, वैराग्य में ही परमानन्द समझते हैं; जो किसी के सामने दीनता नहीं करते अथवा दैत्यरूपी व्यसनों से घृणा करते और अपने स्वरुप में ही मगन रहते हैं, वे पुरुष सचमुच ही महापुरुष हैं । ऐसे पुरुष रत्न धन्य हैं ! उन्होंने सचमुच ही कर्मबन्धन काट दिया है । वे ही सच्चे त्यागी और सन्यासी हैं । ऐसे ही महापुरुषों के सम्बन्ध में महात्मा सुन्दरदास जी ने कहा है -
काम ही क्रोध न जाके, लोभ ही न मोह ताके।
मद ही न मत्सर, न कोउ न विकारो है।।
दुःख ही न सुख माने, पाप ही न पुण्य जाने।
हरष ही न शोक आनै, देह ही तें न्यारौ है।।
निंदा न प्रशंसा करै, राग ही न द्वेष धरै।
लेन ही न दें जाके, कुछ न पसारो है।।
सुन्दर कहत, ताकी अगम अगाध गति।
ऐसो कोउ साधु, सों तो राम जी कू प्यारो है।।
जिसमें काम, क्रोध, लोभ, मद और मत्सर प्रभृति विकार नहीं हैं; जो दुःख सुख और पाप पुण्य को नहीं जानता; जिसे न ख़ुशी होती है न रंज; जो अपने शरीर से अलग है; जो न किसी की तारीफ करता है और न किसी की बुराई करता है; जिसे न किसी से प्रेम है न किसी से वैर, जिसका न किसी से लेना है और न किसी को देना, न और ही किसी तरह का व्यवहार है। सुन्दरदास कहते हैं, ऐसे मनुष्य की गति अगम्य और अगाध है । उसकी गहराई का पता नहीं । ऐसा ही मनुष्य भगवान् को प्यारा लगता है ।
छप्पय
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भोजन को कर पट्ट, दशों दिशि बसन बनाये।
भखै भीख को अन्न, पलंग पृथ्वी पर छाये।
छाँड़ि सबन को संग, अकेले रहत रैन दिन।
नित आतस सों लीन, पौन सन्तोष छिनहिं छिन।
मन को विकार, इन्द्रीन को डारै तोर मरोर जिन।
वे धन्य संन्यास धन, कर्म किये निर्मूल तिन।।
वयं तु स्थूलेच्छा महति च पदे बद्धमनसः।
जरा देहं मृत्युर्हरति सकलं जीवितमिदं
सखे नान्यच्छ्रेयो जगति विदुषोऽन्यत्र तपसः।। ५३ ।।
अर्थ:
मालिक को राज़ी करना कठिन है। राजाओं के दिल घोड़ों के समान चंचल होते हैं। इधर हमारी इच्छाएं बड़ी भारी हैं; उधर हम बड़े भारी पद - मोक्ष के अभिलाषी हैं । बुढ़ापा शरीर को निकम्मा करता है और मृत्यु जीवन को नाश करती है । इसलिए हे मित्र ! बुद्धिमान के लिए, इस जगत में, तप से बढ़कर और कल्याण का मार्ग नहीं है ।
सेवा-धर्म बड़ा कठिन है । हज़ारों प्रकार की सेवाएं करने, अनेक प्रकार की हाँ में हाँ मिलाने, दिन को रात और रात को दिन कहने, तरह तरह की खुशामदें करने से भी मालिक कभी संतुष्ट नहीं होता । राजाओं के दिल अशिक्षित घोड़ों की तरह चंचल होते हैं । उनके चित्त स्थिर नहीं रहते; ज़रा सी देर में वे प्रसन्न होते हैं और ज़रा सी देर में अप्रसन्न हो जाते हैं; क्षणभर में गांव के गांव बक्शते और क्षणभर में सूली पर चढ़वाते हैं; इसलिए राजसेवा में बड़ा खतरा है । उसमें ज़रा भी सुख नहीं, यहाँ तक की जान की भी खैर नहीं है । एक तरफ तो हमारी इच्छाओं और हमारे मनोरथों की सीमा नहीं है दूसरी ओर हम परमपद के अभिलाषी हैं; इसलिए यहाँ भी मेल नहीं खाता । बुढ़ापा हमारे शरीर को निर्बल और रूप को कुरूप करता एवं सामर्थ्य और बल का नाश करता है तथा मृत्यु सिर पर मंडराती है । ऐसी दशा में मित्रवर ! कहीं सुख नहीं है । अगर सुख - सच्चा सुख चाहते हो, तो परमात्मा का भजन करो । उससे आपके परलोक और इहलोक दोनों सुधरेंगे, आप जन्म-मरण के कष्ट से छुटकारा पाकर मोक्ष-पद पाएंगे । सारांश यह है कि सच्चा और नित्य सुख केवल वैराग्य और ईश्वर भक्ति में है । गोस्वामी तुलसीदास जी कहते हैं -
"तुलसी" मिटै न कल्पना, गए कल्पतरु-छाँह।
जब लगि द्रवै न करि कृपा, जनक-सुता को नाह।।
हित सन हित-रति राम सन, रिपु सन वैर विहाय।
उदासीन संसार सन, "तुलसी" सहज सुभाय।।
मनुष्य चाहे कल्पवृक्ष के नीचे क्यों न चला जाय, जब तक सीतापति की कृपा न होगी तब तक उसके दुखों का नाश नहीं हो सकता; इसलिए शत्रुता-मित्रता छोड़, संसार से उदासीन हो, भगवान् से प्रीति करो ।
खुलासा - कहते हैं, इंद्रा के बगीचे में एक ऐसा वृक्ष है, जिसकी छाया में जाकर मनुष्य या देवता जो चीज़ चाहते हैं, वही उनके पास, आप से आप आ जाती है । उसी वृक्ष को "कल्पवृक्ष" कहते हैं । तुलसीदास जी कहते हैं, जब तक जानकीनाथ रामचन्द्र जी दया करके प्रसन्न न हों तब तक, मनुष्य की कल्पना कल्पवृक्ष की छाया में जाने से भी नहीं मिट सकती ।
जप, तप, तीर्थ, व्रत, शम, दम, दया, सत्य, शौच और दान बगैर काम अगर मन में वासना रखकर किये जाते हैं; यानी करनेवाला यदि उनका फल या परस्कार चाहता है, तो उसे स्वर्गादि मिलते हैं । स्वर्ग में जाने से मनुष्य का आवागमन - इस दुनिया में आना और यहाँ से फिर जाना - पैदा होना और मरना - नहीं बन्द हो सकता । क्योंकि कहते हैं - "पुण्य क्षीणे मृत्युलोके", पुण्यों के क्षीण होते ही फिर स्वर्ग से मृत्युलोक में आना पड़ता है, पर मनुष्य का असल मकसद पूरा नहीं होता; यानि उसे परमपद या मोक्ष नहीं मिलता । इसलिए मनुष्य को निष्काम कर्म करने चाहिए । "गीता" में भी यही बात भगवान् कृष्ण ने कही है । बहुत लिखने से क्या - भगवान् की भक्ति सर्वोपरि है । भगवान् की भक्ति से जो काम हो सकता है, वह घोर-से-घोर तपस्याओं से भी नहीं हो सकता ।
किसी ने कहा है -
पठित सकल वेदश्शास्त्रपारंगतो वा
यम नियम पारो वा धर्म्मशास्त्रार्थकृद्वा।
अटित सकल तीर्थव्राजको वाहिताग्निर्नहि
हृदि यदि रामः सर्वमेतत्वृथा स्यात्।।
चाहे सारे वेद-शास्त्रों को पढ़लो, चाहे यम नियम आदि कर लो, चाहे धर्मशास्त्र को मनन कर लो और चाहे सारे तीर्थ कर लो, अगर आपके दिल में राम नहीं हैं तो सब वृथा है ।
इसीलिए तुलसीदास जी कहते हैं, कि दोस्तों से दोस्ती और दुश्मनो से दुश्मनी छोड़कर एवं संसार से उदासीन होकर भगवान् से प्रीति करो । मतलब यह है, कि न किसी से राग करो और न किसी से द्वेष; सबको उदासीन होकर देखो । जब आपका दिल राज-द्वेषादि से शुद्ध होगा - इस दुनिया में न कोई आपका प्यारा होगा और न कोई कुप्यारा; तभी आपका दिल एक भगवान् में लगेगा ।
सुंदरदास जी कहते हैं -
१)
काहे कूँ फिरत नर! दीन भयो घर-घर।
देखियत, तेरो तो आहार इक सेर है।।
जाको देह सागर में, सुन्यो शत योजन को।
ताहू कूँ तो देत प्रभु, या में नहिं फेर है।।
भूको कोउ रहत न, जानिये जगत मांहि।
कीरी अरु कुञ्जर, सबन ही कूँ देत है।।
"सुन्दर" कहत, विश्वास क्यों न राखे शठ?
बेर-बेर समझाय, कह्यौ केती बेर है।। २ ।।
२)
काहे कूँ दौरत है दशहुं दिशि?
तू नर ! देख कियो हरिजू को।
बैठी रहै दूरिके मुख मुंदी,
उघारत दांत खवाइहि टूको।
गर्भ थके प्रतिपाल करी जिन,
होइ रह्यो तबहिं जड़ मूको।
"सुन्दर" क्यूँ बिल्लात फिरे अब?
राख ह्रदय विश्वास प्रभु को।। २ ।।
१)
हे पुरुष ! तू दीन होकर क्यों घर-घर मारा-मारा फिरता है ? हैख, तेरा पेट तो एक सेर आते में भर जाता है। सुनते हैं, समुद्र में जिसका शरीर चार सौ कोस लम्बा चौड़ा है, उसको भी प्रभु भोजन पहुंचाते हैं, इसमें ज़रा भी शक नहीं । संसार में कोई भी भूखा नहीं रहता । वह जगदीश चींटी और हाथी सबका पेट भरते हैं । अरे शठ ! विश्वास क्यों नहीं रखता ? सुन्दरदास कहते हैं, मैंने तुझे यह बात बारम्बार कितनी बार नहिं समझाई है ?
२)
अरे ! तू दशों दिशाओं में क्यों भागता फिरता है ? तू भगवान् के किये कामों का ख्याल कर। देख, जब तू मुंह बन्द किये हुए छिपा बैठा था, तब भी तुझे खाने को पहुँचाया और जब तेरे दांत आ गए तब भी तेरे मुंह खोलते ही खाने को टुकड़ा दिया । जिस प्रभु ने तेरी गर्भावस्था से ही - जबकि तू जड़ और मूक था - पालना की है, वही क्या अब तेरी खबर न लेगा? सुन्दरदास जी कहते हैं, तू क्यों चीखता फिरता है ? भगवान् का भरोसा रख; वही प्रभु अब भी तेरी पालना करेंगे।
सारांश यह कि बुद्धिमान को दुनिया के घमण्डी लोगों की खुशामद छोड़, केवल उसकी खुशामद और नौकरी करनी चाहिए, जिसके दिल में न घमण्ड है और न क्रूरता । जो उसकी शरण में जाता है, उसी की वह अवश्य प्रतिपालना करता और उसके दुःख दूर करने को हाज़रा हुज़ूर खड़ा रहता है । मनुष्य ! तेरी ज़िन्दगी अढ़ाई मिनट की है । इस अढ़ाई मिनट की ज़िन्दगी को वृथा बरबाद न कर । इसे ख़तम होते देर न लगेगी । राजाओं और अमीरों की सेवा-टहल और लल्लो-चप्पो में यह शीघ्र ही पूरी हो जाएगी और उनसे तेरी कामना भी सिद्ध न होगी । यदि तू सबका आसरा छोड़, जगदीश की ही चाकरी करेगा; तो निश्चय ही तेरा भला होगा - तेरे दुखों का अवसान हो जायेगा; तुझे फिर जन्म लेकर घोर कष्ट न सहने होंगे; तुझे नित्य और चिरस्थायी शान्ति मिलेगी । अरे ! तू साड़ी चतुराई और चालाकियों को छोड़कर, एक इस चतुराई को कर; क्योंकि यह चातुरी सच्ची चातुरी है । जो जगदीश को प्रसन्न कर लेता है, वही सच्चा चतुर है ।
कहा है -
या राका शशि-शोभना गतघना सा यामिनी यामिनी।
या सौन्दर्य्य-गुणान्विता पतिरता सा कामिनी कामिनी।।
या गोविन्द-रस-प्रमोद मधुरा सा माधुरी माधुरी।
या लोकद्वय साधनी तनुभृतां सा चातुरी चातुरी।।
मेघावरण शून्य पूर्ण-चन्द्रमा से शोभायमान जो रात्रि है, वही रात्रि है । जो सुंदरी है, गुणवती है और पति में भक्ति रखनेवाली है, वही कामिनी है । कृष्ण के प्रेम के आनन्द से मनोहर मधुरता ही मधुरता है । शरीरधारियों का दोनों लोक में उपकार करनेवाली जो चतुराई है, वही चतुराई है ।
दोहा
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नृप-सेवा में तुच्छ फल, बुरी काल की व्याधि।
अपनों हित चाहत कियो, तौ तू तप आराधि।।
अर्थ:
देह सनेह न छाँडत है नर।
त्कुरुत करुणामैत्रीप्रज्ञा वधूजनसंगमम्।
न खलु नर के हाराक्रान्तं घनस्तनमण्डलम्
शरणमथवा श्रोणीबिम्बम् रणन्मणिमेखलम्।। ६२ ।।
मनुष्यों, स्त्रियों में मन मत लगाओ । उनके साथ रहने, उनके साथ संगम करने से सुख होता है; पर वह सुख नश्वर और क्षणस्थायी है । वह ऐसा सुख नहीं जो सदा रहे । परिणाम में उससे अनेक प्रकार के दुःख होते हैं । जो सुख अनित्य है, शेष में दुखों का मूल और रोगों की खान है, उस सुख को सुख समझना, बुद्धिमानो का काम नहीं । अगर आपको सङ्गंम ही करना है, तो आप सुहानुभूति, परोपकारवृत्ति एवं प्रज्ञारूपी बहू के साथ सङ्गंम कीजिये । इनके साथ सङ्गंम और प्रीति करने से आप को नित्य सुख मिलेगा; ऐसा सुख मिलेगा, जो इस लोक और परलोक में सदा स्थिर रहेगा ।
जिन लोगों ने पहले दूसरों के दुःख दूर किये हैं, जिन्होंने परोपकार के लिए जानें दी हैं, जिन्होंने ज्ञान से काम लिया है, उनका भला ही हुआ है । अगर आप स्त्री-सुख में भूले रहोगे, तो जब आपको नरक की भयंकर यातनाएं भोगनी पड़ेंगी, जब आप पर यमदूतों के डण्डे पड़ेंगे, उस समय क्या स्त्रियों के हारों से सुशोभित स्तन-मण्डल और कर्धनियों से शोभायमान पतली कमर आपकी रक्षा कर सकेंगी ? नहीं, इनसे कोई लाभ न होगा; उस समय ये आड़े न आएंगे । उस मौके पर, परोपकार करके जो पुण्य संचय किया होगा, वही आपकी रक्षा करेगा । बुद्धि से काम लोगे तो भला होगा; क्योंकि बुद्धि ही आपको नरक से बचने की राह बतावेगी; किन्तु स्त्री तो आपको सीधी नरक की राह दिखावेगी । आश्चर्य है, अज्ञानी लोग अच्छे को बुरा और बुरे को अच्छा समझते हैं । वे अपने सच्चे मित्रों से प्रीति नहीं करते, किन्तु झूठे और कुराह में ले जानेवालों से प्रीति करते हैं ।
महात्मा सुन्दरदास जी ने कहा है -
(१)
विषही की भूमि मांहि, विष के अङ्कुर भये।
नारी-विषवेली बढ़ी, नखशिख देखिये।।
विषही के जर मूल, विषही के डार पात।
विषही के फूल फल, लागे जु विशेखिये।।
विष के तन्तु पसार, उरझायी आंटी मार।
सब नर-वृक्ष पर, लपटेहि लेखिये।।
"सुन्दर" कहत, कोऊ सन्त-तरु बची गए।
तिनके तौ कहूं, लता लागि नहीं पेखिये।।
(२)
कामिनी को अंग, अति मलिन महा अशुद्ध।
रोम-रोम-मलिन, मलिन सब द्वार हैं।।
हाड मांस मज्जा मेद, चामसूँ लपेट राखै।
ठौर-ठौर रकत के, भरेई भण्डार हैं।।
मूत्रहु-पुरीष-आंत, एकमेक मिल रहीं।
औरहु उदर मांहि, विविध विकार हैं।।
"सुन्दर" कहत, नारी नखशिख निन्द्यरूप।
ताहि जो सराहै, सो तौ बड़ोई गंवार है।।
(३)
रसिकप्रिया रसमंजरी और श्रृंगारहि जान।
चतुराई करि बहुत विधि, विषय बनाई आन।।
विषय बनाई आन, लगत विषयिनकूँ प्यारी।
जागे मदन प्रचण्ड, सराहै नखशिख नारी।।
ज्यूँ रोगी मिष्टान्न खाई, रोगहि बिस्तारै।
"सुन्दर" ये गति होइ, जोई रसिकप्रिया धारै।।
मतलब यह की स्त्री विष की बेल है । उसकी जड़, उसकी डालियाँ, उसकी पत्तियां, उसके फल फूल सभी विषपूर्ण हैं । सारांश यह कि स्त्री का सर्वाङ्ग विष से भरा है स्त्री का कोई भी अंग ऐसा नहीं जिसमें विष न हो । यह स्त्रीरूपी विषबेल अज्ञानी विषयी लोगों को अपने फन्दे में फंसाकर नाश कर देती है; क्योंकि विष स्वभाव से ही प्राणघाती होता है । सिर्फ वे लोग इस स्त्रीरूपी विषबेल से बचते हैं, जो ज्ञानी हैं, जो इसकी असलियत को जानते हैं, जिन्होंने अपनी इन्द्रियों को अपने वश में कर लिया है, जिनकी इन्द्रियां विषयों की तरफ नहीं झुकतीं । और भी खुलासा यह है, कि स्त्री विष-लता के समान है, विष लता जिस वृक्ष से लिपट जाती है, उसे सुखा-सुखाकर नष्ट कर देती है। इसी तरह स्त्री जिस विषयी पुरुष के पीछे लग जाती है अथवा जो पुरुष स्त्री के फन्दे में फंस जाता है, वह भी सब तरह से नष्ट हो जाता है । इसके सभी अंगों में विष भरा है । जिस तरह विष खाने से ज़हर चढ़ता है, उसी तरह इसकी आँख, इनके गाल, इसकी भौं, छातियां, जांघें प्रभृति किसी भी अंग के देखने और छूने से विष चढ़ जाता है । विष के चढ़ जाने से पुरुष मतवाला हो जाता है; उसके होश-हवास खता हो जाते हैं और बुद्धि मारी जाती है । बुद्धि के मारे जाने से पुरुष बिना पतवार की नाव की तरह नष्ट हो जाता है । इस लोक में नाना प्रकार के रोग और दुःख भोगकर मर जाता और परलोक में भी दुःख ही पाता है । संखिया प्रभृति विष का मारा हुआ इस लोक में दुःख पाता है, पर स्त्री-विष का मारा हुआ अनेक जन्मों में दुःख पाता है । और ज़हर खाने वाला एक ही बार मरता है; पर स्त्री-विष सेवन करने वाला बारम्बार मरता है । अतः बुद्धिमानों को इस स्त्रीरूपी विषलता से सदा दूर रहना चाहिए, ताकि इसका विष शरीर में पैवस्त न होने पावे।
खुलासा यह है कि स्त्री ऊपर से अच्छी मालूम होती है, पर वास्तव में गन्दगी का पिटारा है । इसकी नाक में रहँट भरा हुआ है। इसकी आँखों में गींडें भरी हुई हैं । इसके मुंह में कफ और खखार भरे हुए हैं । इसकी मूत्रेन्द्रिय से हर समय सफ़ेद-सफ़ेद या लाल-लाल गन्दा पदार्थ बहा करता है । पेशाब से जाँघे भीगी रहती है । इसकी मल और मूत्र की इन्द्रिय में २ अंगुल से ज्यादा का दूर का फर्क नहीं है । जिन छातियों पर विषयी मर मिटते हैं, जिन्हे वे सुन्दर सोने के कलश, कामदेव के नगाड़े अथवा शान्तरे और अनार कहते हैं, वे दो मांस के लौंदे हैं । उनके ऊपर चमड़ा चढ़ा हुआ है, इसी से उनके भीतर की गन्दगी छिपी रहती है । ऐसी गन्दगी की पिटारी की तारीफों में जो लोग कवितायेँ करते हैं वे सचमुच ही बेअक्ल और गंवार हैं ।
सोरठा
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तजि तरुणी सों नेह, बुद्धिबधू सों नेह कर।
नरक निवारत येह, वहै नरक लै जात है।।
किं वा प्राणसमासमागमसुखं नैवाधिकं प्रीतये।।
किं तूद्भ्रान्तपतङ्गपक्षपवनव्यालोलदीपाङ्कुर-
च्छायाचञ्चलमाकलय्य सकलं सन्तो वनान्तं गताः।। ६८ ।।
अर्थ:
क्या सन्तों के रहने के लिए उत्तमोत्तम महल न थे, क्या सुनने के लिए उत्तमोत्तम गान न थे, क्या प्यारी-प्यारी स्त्रियों के संगम का सुख न था, जो वे लोग वनों में रहने को गए ? हाँ, सब कुछ था; पर उन्होंने इस जगत को गिरने वाले पतंग के पंखों से उत्पन्न हवा से हिलते हुए दीपक की छाया के समान चञ्चल समझकर छोड़ दिया; अथवा उन्होंने मूर्ख पतंग की भांति, जो हवा से हिलते हुए दीपक के छाया में घूम-घूमकर अपने तई जलाकर भस्म कर देता है, संसार को अपना नाश करते देखकर संसार को छोड़ दिया।
यह संसार दीपक की लौ के समान है और इसमें बसनेवाले जीव पतंगों के समान हैं । जिस तरह मूर्ख पतंग दीपक से मोह करके और उस पर गिर-गिर भस्म होते हैं; उसी तरह मनुष्य इस संसार के असल तत्व को न समझकर, इसके मोह में फंसकर, इसमें नाश होते हैं । जिस तरह पतंग नहीं समझता कि दीपक से प्रेम करने में मेरे हाथ कुछ न आवेगा, बल्कि मेरी जान ही जायेगी; उसी तरह संसारी आदमी नहीं समझते, कि इन संसारी विषय-वासनाओं में फंसकर, इनसे प्रेम करके हम अपना नाश करा बैठेंगे । जो बुद्धिमान और विचारवान हैं, वे इस बात को समझते हैं; अतः संसारी पदार्थों से मोह नहीं करते और अपने नाश से बचते हैं । वे संसार को अनित्य और नाश की निशानी समझकर, इससे मन हटाकर परमात्मा में मन लगते हैं । वे अपने तई दुनिया का मुसाफिर मात्र समझकर, मौत का हरदम ख्याल रखते हैं ।
महात्मा कबीर ने कहा है -
तन सराय मन पाहरू, मनसा उतरी आय ।
को काहू को है नहीं, सब देखा ठोक बजाय।।
"कबिरा" रसरि पाँव में, कहँ सोवे सुख चैन।
श्वास-नकारा कूंच का, बाजत है दिन-रैन।।
इस चौसर चेता नहीं, पशु-ज्यों पाली देह।
राम नाम जाना नहीं, अन्त परी मुख खेह।।
यह शरीर सराय है, मन चौकीदार है और मनसा - इच्छा इस शरीर रुपी सराय में उतरा हुआ मुसाफिर है; इस जगत में कोई किसी का नहीं है । अच्छी तरह ठोक बजा या जांच पड़ताल करके देख लिया ।
हे कबीर ! पैरों में रस्सी पड़ी हुई है । फिर भी तू सुख चैन में कैसे सो रहा है ? देख इस दुनिया से कूच करने का श्वास रुपी नागदा दिन-रात बज रहा है !
अगर तू इस चौपड़ के खेल में न चेतेगा, इस जन्म में भी होश न करेगा, पशु की तरह शरीर को पालेगा और राम को नहीं जानेगा; तो अन्त में तेरे मुंह में धुल पड़ेगी ।
छप्पय
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महल महारमणीक, कहा बसिबे नहिं लायक ?
नाहिन सुनवे जोग, कहा जो गावत गायक ?
नवतरुणी के संग, कहा सुखहू नहिं लागत ?
तो काहे को छाँड़-छाँड़, ये बन को भागत ?
इन जान लियो या जगत को, जैसे दीपक पवन में ।
बुझिजात छिनक में छवि भरयो, होत अंधेरो भवन में ।।
अतीव सुन्दर व रमणीक महल क्या बसने योग्य नहीं हैं ? गवैये जो मनोहर गाना गाते हैं, क्या वह सुनने योग्य नहीं है ? नवीना बाला स्त्रियों के साथ रमण करने में क्या आनन्द नहीं आता ? अगर इन सब में आनन्द और सुख है, तो लोग इन सबको छोड़-छोड़ कर बन में क्यों भागे जाते हैं ? इसलिए भागे जाते हैं, कि उन्होंने इस जगत को उस दीपक के समान समझ लिया है, जो हवा में रखा हुआ है और क्षणभर में बुझ जाता है ।
किं कन्दाःकन्दरेभ्यः प्रलयमुपगता निर्झरा व गिरिभ्यः
प्रध्वस्ता वा तरुभ्यः सरसफलभृतो वल्कलिन्यश्च शाखाः।।
वीक्ष्यन्तेयन्मुखानि प्रसभमपगतप्रश्रयाणाम् खलानां
दुःखोपात्ताल्पवित्तस्मयवशपवनानअर्तितभ्रूलतानि।। ६९ ।।
अर्थ:
क्या पहाड़ों की गुफाओं में कन्द-मूल और उनकी चट्टानों में पानी के झरने नहीं रहे, क्या छाल वाले वृक्षों में रसीली फलवती शाखाएं नहीं रहीं, जो लोग उन अभिमानी और नीचों के सामने दीनता करते हैं, जिनकी भौंहें मारे अभिमान के चढ़ी रहती हैं और जिन्होंने बड़े कष्ट से थोड़ा सा धन जमा कर लिया है ?
पहाड़ों में रहने को गुफाएं, खाने को कन्दमूल, पीने को उनके झरनों का जल और वृक्षों में मीठे मीठे रसीले फल मौजूद हैं; फिर भी लोग उन धनियों की टेढ़ी भृकुटियों को क्यों देखते हैं, उनकी टेढ़ी-सूधी क्यों सहते हैं, जिनकी आँखें उस थोड़े से धन के मद से नहीं खुलती, जो उन्होंने बड़े बड़े कष्टों से येनकेन प्रकारेण जमा कर लिया है ! ऐसे नीच अभिमानियों से अपमानित होने की अपेक्षा पहाड़ों में रहना और फलमूल तथा शीतल जल पर गुज़ारा करना भला । इस से उनकी आत्मा खूब सुखी होगी; अभिमानी नीच धनियों की बुरी बातों से आत्मा जल जल कर ख़ाक होती है ।
अगर कुछ भी समझ हो, ज़रा भी आत्मप्रतिष्ठा का ख्याल हो, तो मनुष्य को अपनी "इच्छा" का नाश करना चाहिए । इच्छा रहित मनुष्य सात विलायतों के बादशाह को भी तुच्छ समझता है । धनियों से दीनता करना और माँगना बड़ी बुरी बात है । देखिये गोस्वामी तुलसीदासजी प्रभृति महापुरुषों ने क्या कहा है :-
तुलसी कर पर कर करो, कर तर कर न करो।
जा दिन कर तर कर करो, ता दिन मरण करो।।
माँगन मरण समान है, मत कोई मांगो भीख।
माँगन ते मरना भला, यह सतगुरु की सीख।।
तुलसीदास जी कहते हैं - हे प्रभु ! हाथ पर हाथ करो, हाथ के नीचे हाथ न करो । जिस दिन हाथ के नीचे हाथ करो, उस दिन हमारी मौत हो जाए । मतलब यह है कि जब तक हम दूसरों को देते रहे, तब तक हम जीवित रहे; जिस दिन हमारी मांगने की नौबत आ जाये, उस दिन हम मर जाएँ ।
अगर दीनता ही करनी है तो परमात्मा से करो । उसके आगे दीनता करने से सभी इच्छाएं पूरी हो सकती हैं । कहा है :-
तेरी बन्दानवाज़ी, हफ्त किश्वर बख़्फ़ा देती है ।
जो तू मेरा - जहाँ मेरा, अरब मेरा, अज़म मेरा ।। दाग़ ।।
कबीर ने कहा है :-
थोड़ा सुमिरन बहुत सुख, जो करि जानै कोय ।
सूत लगे न बिनावनी, सहजै तनसुख होय ।।
साईं सुमिर, मत ढील कर; जा सुमरे ते लाह।
इहाँ ख़लक खिदमत करे, वहाँ अमरपुर जाह।।
भगवान् की थोड़ी सी याद करने से ही बहुत सुख होता है, बशर्ते की कोई याद करना जाने । इसमें न तो सूत लगता है और न बिनवाई देनी पड़ती है; सहज में आनन्द होता है ।
हे मनुष्य ! स्वामी को सुमिरन करने में देर न कर । उसके सुमिरन में बहुत लाभ हैं । जो स्वामी को याद करता है, इस दुनिया में संसारी लोग उसकी सेवा करते हैं और जब मर कर दूसरी दुनिया में जाता है, तब स्वर्गपुरी में बस्ता है ।
छप्पय
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कहा कन्दराहीन भये, पर्वत भूतल से ?
झरना निर्जल भये कहा, जे पूरित जल से ?
कहा रहे सब वृक्ष, फूल-फल बिन मुरझाये ?
सही खलन के बैन, अन्धता जो मद छाये ।
कर संचित धन जे स्वल्प हूँ, इत उत फेरें भ्रू विकट ।
रे मन ! तू भूल न जाहुं कहूं, इन खल पुरुषन के निकट ।।
गंगातरंगकणशीकरशीतलानि
विद्याधराध्युषितचारुशीलतलानि।।
स्थानानि किं हिमवतः प्रलयं गतानि
यत्सावमानपरपिण्डरता मनुष्याः।। ७० ।।
अर्थ:
हिमालय पर्वत के वे चट्टानें जो गंगाजल की लागरों से उठे हुए छींटो से शीतल हो रही है और जहाँ जगह जगह विद्याधर बैठे हैं, क्या अब नहीं रही हैं, जो लोग अपमान से मिले हुए पराये टुकड़ों पर गुज़र करते हैं ?
पराये टुकड़ों पर गुज़र करने की अपेक्षा मर जाना भला है । अगर माँगना ही हो तो, तो मांगने की विधि चातक से सीखनी चाहिए । वह एक से ही मांगता है, दूसरे से हरगिज़ नहीं मांगता, चाहे मर क्यों न जाए; और मांगने में भी यह खूबी, कि वह कभी अधीन होकर नहीं मांगता; एक घनश्याम(बादल) से ही मांगता है । चातक के समान याचक और वारिद(बादल) के समान दानी जगत में कौन है ? जो ओछों से मांगते हैं, जने-जने के पैर पकड़ते हैं, उनको धिक्कार है ! इसलिए मनुष्यों ! पापहीये की तरह एकमात्र घनश्याम से ही मांगो । महात्मा तुलसीदास जी ने कहा है :-
"तुलसी" तीनों लोक में, चातक ही को माथ।
सुनियत जासु न दीनता, किये दूसरो नाथ।।
ऊंची जाति पपीहरा, नीचे पियत न नीर।
कै याचै घनश्याम सों, कै दुःख सहै शरीर।।
ह्वै अधीन चातक नहीं, शीश नाय नहिं लेय।
ऐसे मानी मंगनहीं, को वारिद बिन देय।।
तुलसी कहते हैं - तीनो लोक में सिर्फ एक पापहीये का ही सिर ऊंचा है, क्योंकि उसने अपने स्वामी स्वाति के सिवा और किसी से कभी दीनता नहीं की ।
पपहिए की जाति ऊंची है; क्योंकि वह नदियों और तालाबों वगैरह जलाशयों का पानी नहीं पीता । वह या तो घनश्याम से यानि स्वाति नक्षत्र में बादल से ही मांगता है अथवा दुःख भोगता है ।
पपहिया और मंगतों की तरह अधीन होकर और सिर नवकार नहीं लेता । वह तो मान के साथ ही लेता है । ऐसे मानी मांगते को बादल के सिवा और कौन दे सकता है ? जिनको परमात्मा ने देने लायक बनाया है, उन्हें दिल खोलकर गरीब और मुहताजों को देना चाहिए । जो देते हैं, फिर पाते हैं और जो देते हैं उन्हीं का जीवन सफल है । रहीम कवी कहते हैं :-
दीनहि सबको लखत है, दीन लखे नहीं कोय।
जो "रहीम" दीनहिं लखत, दीनबन्धु सम होय।।
"रहिमन" वे नर मर चुके, जे कहूं माँगन जाहिं।
उनते पाहिले वे मुए, जिन मुख निकसत नाहिं।।
तबही लग जीबो भलो, दीबो परे न धीम।
बिन दीबो जीबो जगत, हमें न रुचे "रहीम"।।
दीन या मुहताज सबकी तरफ देखता है, पर दीन की तरफ कोई नहीं देखता । रहीम कहते हैं, जो दीन की तरफ देखता है, वह दीनबन्धु भगवान् के समान होता है ।
रहीम कहते हैं, वे मनुष्य मर गए जो कहीं मांगने जाते हैं । उनसे पहले वे मरे, जिनके मुंह से नाही निकलती है । मतलब यह है कि मंगता तो मरा हुआ है ही, पर जो मांगने वालों को नहीं देता, वह उससे भी पहले मरा हुआ है । जीना तभी तक अच्छा है जब तक देना मन्दा न हो । बिना दान किये जीना, रहीम कहते हैं, हमें अच्छा नहीं लगता ।
दोहा
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गंगातट गिरिवर गुफा, उहाँ कहँ नहीं ठौर ?
क्यों ऐते अपमान सों, खात पराये कौर ?
यदा मेरुः श्रीमान्निपतति युगान्ताग्निनिहितः
समुद्राः शुष्यन्ति प्रचुरनिकरग्राहनिलायाः।।
धरा गच्छत्यन्तं धरणिधरपादैरपि धृता
शरीरका वार्त्ता करिकल भकर्णाग्रचपले।। ७१ ।।
अर्थ:
जब प्रलय की अग्नि के मारे श्रीमान सुमेरु पर्वत गिर पड़ता है; मगरमच्छों के रहने के स्थान समुद्र भी सूख जाते हैं; पर्वतों के पैरों से दबी हुई पृथ्वी भी नाश हो जाती है; तब हाथी के कान की कोर के समान चञ्चल मनुष्य की क्या गिनती ?
जब काल सुमेरु जैसे पर्वतों को जला कर गिरा देता है, महासागरों को सुखा देता है, पृथ्वी को नाश कर देता है, तब इस छोटे से चञ्चल मनुष्य की क्या गिनती ? इसके नाश में कौन सा आश्चर्य ?
दोहा
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मेरु गिरत सूखत जलधि, धरनि प्रलय ह्वै जात।
गजसुत के श्रुति चपल त्यौं, कहा देह की बात।।
एकाकी निस्पृहः शान्तः पाणिपात्रो दिगम्बरः।
कदा शम्भो भविष्यामि कर्मनिर्मूलनक्षमः।। ७२ ।।
अर्थ:
हे शिव ! मैं कब अकेला, इच्छा रहित और शान्त हूँगा ? कब हाथ ही मेरा पात्र होगा और कब दिशाएं मेरे वस्त्र होंगे ? मैं कब कर्मों की जड़ उखाड़ने में समर्थ हूँगा ?
एकान्त वास करना, इच्छाओं को त्याग देना, शान्त रहना, हाथ से ही पानी वगैरह पीने के बर्तन का काम लेना, दिशाओं को ही वस्त्र समझना; यानी नग्न रहना और कर्मो की जड़ उखाड़ने में समर्थ होना - ये ही कल्याण के मार्ग हैं । जिनमें ये गुण हैं, वे धन्य हैं और वे ही सच्चे सुखिया हैं ।
दोहा
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एकाकी इच्छा-रहित, पाणिपात्र दिगवस्त्र।
शिव शिव ! हौं कब होऊंगा, कर्मशत्रु को शस्त्र?
प्राप्ताः श्रियः सकलकामदुघास्ततः किं
न्यस्तं पदं शिरसि विद्विषतां ततः किं ।
सम्पादिताः प्रणयिनो विभवैस्ततः किं
कल्पस्थितास्तनुभृतां तनवस्ततः किम् ।। ७३ ।।
जीर्णा कंथा ततः किं सितममलपटं पट्टसूत्रं ततः किम्
एका भार्या ततः किं हय करिसुगणैरावृतो वा ततः किम्।।
भक्तं भुक्तं ततः किं कदशनमथ वा वासरांते ततः किं
व्यक्त ज्योतिर्नवांतर्मथितभवभयं वैभवं वा ततः किम्।। ७४ ।।
अर्थ:
अगर मनुष्यों को सब इच्छाओं के पूर्ण करनेवाली लक्ष्मी मिली तो क्या हुआ ? अगर शत्रुओं को पदानत किया तो क्या ? अगर धन से मित्रों की खातिर की तो क्या ? अगर इसी देह से इस जगत में एक कल्प तक भी रहे तो क्या ?
अगर चीथड़ों की बनी हुई गुदड़ी पहनी तो क्या ? अगर निर्मल सफ़ेद वस्त्र पहने या पीताम्बर पहने तो क्या ? अगर एक ही स्त्री रही तो क्या ? अगर अनेक हाथी-घोड़ों सहित अनेकों स्त्रियां रहीं तो क्या ? अगर नाना प्रकार के व्यंजन भोजन किये अथवा शाम को मामूली खाना खाया तो क्या ? चाहे जितना वैभव पाया, पर यदि संसार बन्धन को मुक्त करनेवाली आत्मज्ञान की ज्योति न जानी, तो कुछ भी न पाया और कुछ भी न किया ।
मतलब यह है, सारे संसार के राज्य-वैभव अथवा त्रिभुवन के अधिपति होने में भी जो आनन्द नहीं है, वह आत्मज्ञान या ब्रह्मज्ञान में है ।
आत्मज्ञान होने से ही मनुष्य, जीवन मरण के कष्ट से छुटकारा पाकर, परम शान्ति-लाभ मिलता है ।
अर्ब खर्ब लौं द्रव्य है, उदय अस्त लौं राज।
जो तुलसी निज मरन है, तौ आवे केहि काज?।
अगर अरब खरब तक धन हो और उदयाचल से अस्ताचल तक राज हो, तो भी अगर अपना मरण हो, तो ये सब किस काम के ? धन-दौलत और राज-पाट सब जीते रहने पर काम आते हैं, मरने पर इनसे कोई लाभ नहीं ।
दोहा
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इन्द्र भये धनपति भये, भये शत्रु के साल।
कल्प जिए तोउ गए, अन्त काल के गाल।।
भक्तिर्भवे मरणजन्मभयं हृदिस्थं
स्नेहो न बन्धुषु न मन्मथजा विकाराः।
संसर्गदोषरहिता विजना वनान्ता
वैराग्यमस्ति किमितः परमार्थनीयम्।। ७५ ।।
अर्थ:
सदाशिव की भक्ति हो, दिल में जन्म-मरण का भय हो, कुटुम्बियों में स्नेह न हो, मन से काम-विचार दूर हों और संसर्ग-दोष से रहित होकर जंगल में रहते हों - अगर हममें ये गुण हों तब और कौन सा वैराग्य ईश्वर से मांगें ?
परमात्मा में प्रेम होना, मन में जन्म-मरण का भय होना, रिश्तेदारों से प्रेम न होना, मन में स्त्री की इच्छा का न उठना, एकान्तस्थान में अकेले वन में निवास करना - ये ही तो वैराग्य के पूरे लक्षण हैं । इनसे अधिक वैराग्य के और लक्षण नहीं ।
दोहा
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मन विरक्त हरिभक्ति-युत, संगी बन तृणडाभ ।
याहुते कछु और है, परम अर्थ को लाभ ?
तस्मादनन्तमजरं परमं विकासि-
तद्ब्रह्म चिन्तय किमेभिरसद्विकल्पैः ।
यस्यानुषङ्गिण इमे भुवनाधिपत्य-
भोगादयः कृपणलोकमता भवन्ति।। ७६ ।।
अर्थ:
उस वास्ते मनुष्यों ! अनन्त, अजर, अमर, अविनाशी और शान्तिपूर्ण ब्रह्म का ध्यान करो । मिथ्या जंजालों में क्या रखा है ? जो ब्रह्म का ज़रा सा भी आनन्द पा जाते हैं, उनकी नज़रों में संसारी राजाओं का आनन्द तुच्छ जंचता है ।
मतलब है कि लोगों को अनन्त, अजर, अमर, अविनाशी, शोक-रहित, शान्तिपूर्ण ब्रह्म का ध्यान करना चाहिए । उसी के ध्यान में पूर्णानन्द है; संसार के भोग-विलासों में ज़रा भी आनन्द नहीं । वह आनन्द सदा है; या आनंद क्षणिक है । उसमें सदा सुख है; इसमें सदा दुःख है । जिनको ब्रह्मानन्द का ज़रा सा भी मज़ा आ जाता है, वे त्रिलोकी के अधिपति के आनन्द को भी तुच्छ समझते हैं । राज, धन-दौलत और स्त्री-पुत्र प्रभृति सब उस परमात्मा के पीछे हैं; इसलिए इनको छोड़कर उससे ही प्रीति करने में चतुराई है ।
दोहा
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ब्रह्म अखण्डानन्द पद, सुमिरत क्यों न निशङ्क ।
जाके छिन-संसर्ग सों, लगत लोकपति रंक ?
दिङ्मण्डलं भ्रमसि मानस चापलेन ।
भ्रान्त्यापि जातु विमलं कथमात्मनीतं
तद्ब्रह्म न स्मरसि निर्वृतिमेषि येन ।। ७७ ।।
अर्थ:
हे चित्त ! तू अपनी चञ्चलता के कारण पाताल में प्रवेश करता है, आकाश से भी परे जाता है, दशों दिशाओं में घूमता है; पर भूल से भी तू उस विमल परमब्रह्म की याद नहीं करता, जो तेरे ह्रदय में ही मौजूद है, जिसके याद करने से ही तुझे परमानन्द - मोक्ष - मिल सकती है !
इस चञ्चल मन की अद्भुत लीला है । यह कभी आकाश में जाता है, कभी पाताल में जाता है और कभी दशों दिशाओं में फिरता है । इधर-उधर तो इतना भटकता है; पर, भूलकर भी, जहाँ जाना चाहिए वहां नहीं जाता । उसके पास ही अमृत का सरोवर है, उसे छोड़कर सदी-गली नालियों में फिरता है । उसे सब जगह छोड़ कर अपने ह्रदय में ही बैठे हुए ब्रह्म के पास जाना चाहिए और हर समय उसकी ही चिन्तना करनी चाहिए; इस से उसके पापों का नाश हो जाएगा, आवागमन से छुटकारा मिल जाएगा एवं परम शान्ति की प्राप्ति होगी । और चिन्ताओं से कोई लाभ नहीं; उन से तो जञ्जालों में ही फंसना होता है ।
मूर्ख लोग अव्वल तो परमत्मा में दिल ही नहीं लगते । यदि भूल से लगते भी हैं, तो परमात्मा की खोज में जहाँ-तहँ मारे मारे फिरते हैं; पर अपने ह्रदय में ही उसे नहीं खोजते ! यह उनका महा अज्ञान है ।
उस्ताद ज़ौक़ ने कहा है :-
वह पहलु में बैठे हैं और बदगुमानी ।
लिए फिरती मुझको, कहीं का कहीं है ।।
वह(ईश्वर) बगल में ही बैठा है, पर मैं भ्रम में फंसकर उसे ढूंढने के लिए कहाँ कहाँ मारा फिरता हूँ ।
महात्मा कबीर कहते हैं :-
ज्यों नयनन में पूतली, त्यों खालिक घट मांहि ।
मूरख नर जाने नहीं, बाहर ढूंढन जाहि ।।
कस्तूरी कुण्डल बसै, मृग ढूंढें बन मांहि ।
ऐसे घट-घट ब्रह्म है, दुनिया जाने नाहिं ।।
समझा तो घर में रहे, परदा पलक लगाय ।
तेरा साहिब तुझहि में, अंत कहूँ मत जाय ।।
महात्मा सुन्दरदास जी कहते हैं :-
कोउक जात प्रयाग बनारस।
कोउ गया जगन्नाथहि धावै ।।
कोउ मथुरा बदरी हरिद्वार सु ।
कोउ गंगा कुरुक्षेत्र नहावै ।।
कोउक पुष्कर ह्वै पञ्च तीरथ ।
दौरिहि दौरि जु द्वारिका आवै ।।
सुन्दर चित्त गह्यौ घरमांहि सु ।
बाहिर ढूँढत क्यूंकरि पावै ? ।।
जिस तरह आँखों में पुतली है, उसी तरह घट में (ह्रदय कमल में) पैदा करने वाला है; पर मूर्ख इस बात को नहीं जानता और उसे बहार खोजने जाता है ।
कस्तूरी हिरन की अपनी नाभि में है, पर मृग उसे बन में खोजता है; उसी तरह ब्रह्म घट-घट में है, पर दुनिया इस भेद को नहीं जानती ।
अगर समझता है तो घर में रह और पलकों का पर्दा लगा कर देख, तेरा मालिक तेरे ही अंदर है; अन्यत्र जाने की ज़रुरत नहीं ।
कोई परमेश्वर की खोज में प्रयाग, काशी, गया, पुरी, मथुरा, कुरुक्षेत्र और पुष्कर जाता है और कोई द्वारका जाता है । सुन्दरदास जी कहते हैं, जो धन घर में गड़ा है, वह बाहर कैसे मिलेगा ?
सारांश यह है, कि संसार अज्ञानान्धकार के कारण "छोरा बगल में ढिंढोरा शहर में" वाली कहावत चरितार्थ करता है । ईश्वर इसी शरीर के भीतर ह्रदय-कमल में मौजूद है, पर अज्ञानी लोग उसे पाने के लिए तीर्थों में भटकते फिरते हैं । इस तरह वह मिलता भी नहीं और वृथा हैरानी होती है । जो उसके दर्शन करना चाहें, नेत्र बन्द करके अपने ह्रदय में ही उसे देखें ।
कुण्डलिया
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फांद्यौ ते आकाश को, पठयौ ते पाताल ।
दशों दिशाओं में तू फिरयो, ऐसी चञ्चल चाल ।।
ऐसी चञ्चल चाल, इतै कबहूँ नहीं आयौ ।
बुद्धि सदन कों पाय, पाय छिनहूँ न छुवायौ ।।
देख्यौ नहीं निज रूप, कूप अमृत को छाँद्यौ ।
ऐरे मन मतिमूढ़ ! क्यों न भव-वारिधि फांद्यौ ? ।।
रात्रिः सैव पुनः स एव दिवसो मत्वा बुधा जन्तवो
धावन्त्युद्यमिनस्तथैव निभृतप्रारब्धतत्तत्क्रियाः ।
व्यापारैः पुनरुक्तभुक्त विषयैरित्थंविधेनामुना
संसारेण कदर्थिता कथमहो मोहान्न लज्जामहे।। ७८ ।।
अर्थ:
प्राणियों में बुद्धिमान यदि जानते हैं कि दिन और रात ठीक पहले की तरह ही होते हैं; तो भी वे उन्हीं काम-धंधों के पीछे दौड़ते हैं, जिनके पीछे वे पहले दौड़ते थे । वे लोग उन्हीं-उन्हीं कामों में लगे रहते हैं, जिनसे क्षणिक और बारम्बार वही लाभ होते हैं, जिनको वे बारम्बार कह और भोग चुके हैं । आश्चर्य का विषय है, कि मनुष्यों को लज्जा नहीं आती !
देखते हैं कि पहले की तरह ही दिन, रात, तिथि, वार, नक्षत्र और मॉस तथा वर्ष आते हैं और जाते हैं ; उसी तरह हम कहते-पीते, सोते-जाते और काम-धंधे करते हैं; कोई नई बात नहीं देखते । जिन कामों को पहले करते थे, उन्हें ही बारम्बार करते हैं । उनमें कितना सा लाभ और सुख है, इसे भी देखते-सुनते और समझते हैं । फिर भी; आश्चर्य है कि, हम इस मिथ्या संसार से मोह नहीं तोड़ते !
कुण्डलिया
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वेही निशि वेही दिवस; वेही तिथि वेही बार ।
वे उद्यम वेही क्रिया, वेही विषय-विकार ।
वेही विषय-विकार, सुनत देखत अरु सूंघत ।
वेही भोजन भोग, जागि सोवत अरु ऊंघत ।
महा निलज यह जीव; भोग में भयो विदेही ।
अजहूँ पलटत नाहिं, कढत गन वे के वेही ।।
मही रम्या शय्या विपुलमुपधानं भुजलता
वितानं चाकाशं व्यजनमनुकूलोऽयमनिलः।।
स्फुरद्दीपश्चन्द्रो विरतिवनितासंगमुदितः
सुखं शान्तः शेते मुनिरतनुभूतिर्नृप इव।। ७९ ।।
अर्थ:
मुनि लोग राजा महाराजाओं की तरह सुख से ज़मीन को ही अपनी सुखदायिनी शय्या मान कर सोते हैं । उनकी भुजा ही उनका गुदगुदा तकिया है, आकाश ही उनकी चादर है, अनुकूल वह ही उनका पंखा है, चन्द्रमा ही उनका चिराग है, विरक्ति ही उनकी स्त्री है; अर्थात विरक्ति रुपी स्त्री को लेकर वे उपरोक्त सामानों के साथ राजाओं की तरह सुख से आराम करते हैं ।
मुनि लोगों के पास न राजाओं की तरह महल हैं, न बढ़िया-बढ़िया पलंग और मखमली गद्दे-तकिये हैं, न ओढ़ने के लिए शाल-दुशाले हैं, बिजली के पंखे हैं, न झाड़-फानूस या बिजली की रौशनी है और न मृगनयनी, मोहिनी कामिनी ही हैं; तो भी वे ज़मीन को ही अपना पलंग, हाथ को ही तकिया, शीतल वह को ही पंखा, चन्द्रमा को ही दीपक और संसारी विषय-भोगों से विरक्ति को ही अपनी स्त्री मान कर सुख से सोते हैं । राजा-महाराजा और अमीर-उमरा बढ़िया-बढ़िया पलंग, कन्दहारी कालीन, मखमली गद्दे-तकिये, बिजली के पंखे और रौशनी तथा सुंदरी स्त्रियों के साथ जो मिथ्या सुख उपभोग करते हैं, उससे लाख दर्जे उत्तम और सच्चा सुख मुनि लोग ज़मीर और अपनी भुजा, अनुकूल वह, चन्द्रमा तथा अपनी विरक्ति रूपिणी स्त्री के साथ उपभोग करते हैं । अब बुद्धिमानो को विचार करना चाहिए, कि उन दोनों में बुद्धिमान कौन है और वास्तविक सुख किसे मिलता है । अमीरों के सुख के लिए कितने झंझट करने पड़ते हैं और कितनी आफतें उठानी पड़ती हैं; तथापि उन्हें सच्चा सुख नहीं मिलता और मुनि लोग बिना झंझट, बिना आफत और बिना प्रयास के सच्चा सुख भोगते और शान्ति की नींद सोते हैं ।
छप्पय
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पृथ्वी परम पुनीत, पलंग ताकौ मन मान्यौ ।
तकिया अपनो हाथ, गगन को तम्बू तान्यौ ।।
सोहत चन्द चिराग, बीजना करात दशोंदिशि ।
बनिता अपनी वृत्ति, संगहि रहत दिवस-निशि ।।
अतुल अपार सम्पति सहित, सोहत है सुख में मगन ।
मुनिराज महानृपराज ज्यों, पौढ़े देखे हम दृगन ।।
तल्लब्ध्वासनवस्त्रमानघटने भोगे रतिं मा कृथाः।।
भोगः कोऽपि स एक एव परमो नित्योदितो जृम्भते
यत्स्वादाद्विरसा भवन्ति विषयास्त्रैलोक्यराज्यादयः।। ८० ।।
अर्थ:
हे आत्मा ! अगर तुझे उस ब्रह्म का ज्ञान हो गया है, जिसके सामने तीनो लोक का राज्य तुच्छ मालूम होता है; तो तू भोजन, वस्त्र और मान के लिए भोगों की चाहना मत कर; क्योंकि वह भोग सर्वश्रेष्ठ और नित्य है; उसके मुकाबले में त्रिलोकी के राज्य प्रभृति सुख कुछ भी नहीं हैं ।
जब तक मनुष्य को ब्रह्म ज्ञान नहीं होता, जब तक उसे आत्मज्ञान नहीं होता, जब तक उसे सुख का स्वाद नहीं मिलता, तभी तक मनुष्य संसारी-विषय-भोगों में सुख समझता है । जब मनुष्य को उस सर्वोत्तम - सदा स्थिर रहनेवाले सुख का स्वाद मिल जाता है, तब वह संसारी आनन्द या दुनियावी मज़े तो क्या - त्रिभुवन के राजसुख को भी कोई चीज़ नहीं समझता । मतलब यह है कि सच्चा और वास्तविक सुख ब्रह्मज्ञान या आत्मज्ञान में है । उसके बराबर आनन्द त्रिलोकी के और किसी पदार्थ में नहीं है । जो संसारी पदार्थों में सुख मानते हैं वे अज्ञानी और नासमझ हैं । उनमें अच्छे और बुरे, असल और नक़ल के पहचानने की तमीज नहीं । वे रस्सी को सांप और मृगमरीचिका को जल समझने वालों की तरह भ्रम में डूबे या बहके हुए हैं ।
सोरठा
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कहा विषय को भोग, परम भोग इक और है ।
जाके होत संयोग, नीरस लागत इन्द्रपद ।।
किं वेदैः स्मृतिभिः पुराणपठनैः शास्त्रैर्महाविस्तरैः
स्वर्गग्रामकुटिनिवासफलदैः कर्मक्रियाविभ्रमैः।।
मुक्तवैकं भवबन्धदुःखरचनाविध्वंसकालानलं
स्वात्मानन्दपदप्रवेशकलनं शेषा वणिग्वृत्तयः।। ८१ ।।
अर्थ:
वेद, स्मृति, पुराण और बड़े बड़े शास्त्रों के पढ़ने तथा भिन्न-भिन्न प्रकार के कर्मकाण्ड करने से स्वर्ग में एक कुटिया की जगह प्राप्त करने के सिवा और क्या लाभ है ? ब्रह्मानन्द रुपी गढ़ी में प्रवेश करने की चेष्टा के सिवा, जो संसार बन्धनों के काटने में प्रलयाग्नि के समान है, और सब काम व्यापारियों के से काम हैं ।
वेद, स्मृति, पुराण और बड़े-बड़े शास्त्रों के पढ़ने-सुनने और उनके अनुसार कर्म करने से मनुष्य को कोई बड़ा लाभ नहीं है । अगर ये कर्मकाण्ड ठीक तरह से पार पड़ जाते हैं, तो इनसे इतना ही होता है, कि स्वर्ग में एक कुटी के लायक स्थान मिल जाता है, पर वह स्थान भी सदा कब्ज़े में नहीं रहता; जिस दिन पुण्यकर्मों का ओर आ जाता है, उस दिन वह स्वर्गीय स्थान फिर छिन जाता है; इससे प्राणी को फिर दुःख होता है । मतलब यह हुआ कि कर्मकाण्डों से जो सुख मिलता है, वह सुख नित्य या सदा-सर्वदा रहनेवाला नहीं । उस सुख के अन्त में फिर दुःख होता है - फिर स्वर्ग छोड़ कर मृत्युलोक में जन्म लेना पड़ता है - वही जन्म-मरण के दुःख झेलने पड़ते हैं । इसलिए मनुष्यों को ब्रह्मज्ञानी होने कि चेष्टा करनी चाहिए; क्योंकि ब्रह्मज्ञान रुपी अग्नि प्रलयाग्नि के समान है । वह अग्नि संसार बन्धनों को जड़ से जला देती है; अतः फिर सदा सुख रहता है - दुःख का नाम भी सुनने को नहीं मिलता । इसलिए ज्ञानियों ने ब्रह्मज्ञान - आत्मज्ञान को सर्वोपरि सुख दिलानेवाला माना है । मतलब यह है कि बिना ब्रह्मज्ञान या रामभक्ति के सब जप-तप आती वृथा हैं । सारे वेद-शास्त्रों और पुराणों का यही निचोड़ है कि ब्रह्म सत्य और जगत मिथ्या है तथा जीव ब्रह्मरूप है । जो इस तत्व को जानता है वही सच्चा पण्डित है । जो ब्रह्म या आत्मा को नहीं जानता, वह अज्ञानी और मूर्ख है । उसका पड़ना लिखना वृथा समय नष्ट करना है ।
तुलसीदास जी ने कहा है :-
चतुराई चूल्हे परौ, यम गहि ज्ञानहि खाय ।
तुलसी प्रेम न रामपद, सब जरमूल नशाय ।।
महादेवजी पार्वती से कहते हैं :-
ये नराधम लोकेषु, रामभक्ति पराङ्गमुखाः।
जपं तपं दयाशौचं, शास्त्राणां अवगाहनं।।
सर्व वृथा विना येन, श्रुणुत्वं पार्वति प्रिये ! ।।
हे प्रिये ! जो नराधम इस लोक में राम की भक्ति से विमुख हैं, उनके जप, तप, दया, शौच, शास्त्रों का पठन-पाठन - ये सब वृथा हैं । असल तत्व भगवान् की निष्काम भक्ति या ब्रह्म में लीन होना है ।
छप्पय
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श्रुति अरु स्मृति, पुरान पढ़े बिस्तार सहित जिन ।
साधे सब शुभकर्म, स्वर्ग को बात लह्यौ तिन ।।
करत तहाँ हूँ चाल, काल को ख्याल भयंकर ।
ब्रह्मा और सुरेश, सबन को जन्म मरण डर ।।
ये वणिकवृत्ति देखी सकल, अन्त नहीं कछु काम की ।
अद्वैत ब्रह्म को ज्ञान, यह एक ठौर आराम की ।।
शफरीस्फुरितेनाब्धेः क्षुब्धता जातु जायते ।। ८३ ।।
अर्थ:
जो विचारवान है, जो ब्रह्मज्ञानी है, उसे संसार लुभा नहीं सकता । मछली के उछालने से समुद्र उड़ नहीं उमड़ता ।
जिस तरह सफरी मछली के उछाल-कूद मचाने से समुद्र अपनी गंभीरता को नहीं छोड़ता, ज़रा भी नहीं उमगता, जैसा का तैसा बना रहता है; उसी तरह विचारवान ब्रह्मज्ञानी संसारी-पदार्थों पर लट्टू नहीं होता वह समुद्र की तरह गंभीर ही बना रहता है; अपनी गंभीरता नहीं छोड़ता । समुद्र जिस तरह मछली की उछल-कूद को कुछ नहीं समझता उसी तरह वह त्रिलोकी की सुख-संपत्ति को तुच्छ समझता है । मतलब यह है कि संसारी विषय-भोग उन्ही को लुभाते हैं, जो विचारवान नहीं हैं, जिनमें विचार शक्ति नहीं है, जिन्हे ब्रह्मज्ञान का आनन्द नहीं मालूम है ।
उस्ताद ज़ौक़ कहते हैं -
दुनिया है वह सय्यद कि सब दाम में इसके।
आ जाते हैं लेकिन कोई दाना नहीं आता ।।
दुनिया एक ऐसा जाल है, जिसमें प्रायः सभी फंसे हुए हैं । कोई दाना अर्थात विचारशील पुरुष ही इस जाल से बचा हुआ है ।
संसार अन्तः सार-शून्य है, इसमें कुछ नहीं है । यह ठीक आंवले के समान है, जो ऊपर से खूब सुन्दर और चिकना-चुपड़ा दीखता है; मगर भीतर कुछ नहीं । किसी ने संसार को स्वप्नवत और किसी ने इसे कोरा ख्याल ही कहा है ।
महाकवि ग़ालिब कहते हैं -
हस्ती के मत फरेब में आ जाइयो असद ।
आलम तमाम हलक़ ये दाम ख़्याल है ।।
ग़ालिब सृष्टि के चक्कर में मत आ जाना । यह सब प्रपंच तुम्हारे ख़्याल के सिवा और कोई चीज़ नहीं है ।
इसके जाल में समझदार नहीं फंसते किन्तु नासमझ लोग, जाल के किनारों पर लगी सीपियों की चमक-दमक देखकर जाल में आ फंसने वाली मछलियों की तरह इसके माया-मोह में फंसकर अनेक प्रकार के कष्ट उठाते हैं; किन्तु ज्ञानी इसकी अनित्यता, इसकी असारता को देखकर इससे किनारा कर लेते हैं ।
दोहा
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ज्यों सफरी को फिरत लख, सागर करत न क्षोभ।
अण्डा से ब्रह्माण्ड को, त्यों सन्तन को लोभ ।।
यदासीदज्ञानं स्मरितिमिरसंस्कारजनितं
तदा दृष्टं नारिमयभिदमशेषं जगदपि ।।
इदानीमस्माकं पटुतर विवेकाञ्जनजुषां
समीभूता दृष्टीस्त्रिभुवनमपि ब्रह्म तनुते ।। ८४ ।।
अर्थ:
जब तक हमें कामदेव से पैदा हुआ अज्ञान-अन्धकार था, तब तक हमें सारा जगत स्त्रीरूप ही दीखता था । अब हमने विवेकरूपी अञ्जन आँज लिया है, इससे हमारी दृष्टी समान हो गयी है । अब हमें तीनो भुवन ब्रह्मरूप दिखाई देते हैं ।
जब हम काम-मद से अन्धे हो रहे थे, जब हमें अच्छे-बुरे का ज्ञान नहीं था, तब हमें स्त्री ही स्त्री दिखाई देती थी, बिना स्त्री हमें क्षणभर भी कल नहीं थी; किन्तु अब हममें विवेक-बुद्धि आ गयी है, अब हम अच्छे-बुरे को समझने लगे हैं, इसलिए अब हमें सारा संसार एक सा मालूम होता है । अब हमें कहीं स्त्री नहीं दीखती, सभी तो एक से दीखते हैं । जहाँ नज़र दौड़ाते हैं, वहीँ ब्रह्म ही ब्रह्म नज़र आता है । मतलब यह कि न कोई स्त्री है न कोई पुरुष, सभी तो एकही हैं; केवल छोले का भेद है । आत्मा न स्त्री है न पुरुष; वह सबमें समान है । मगर अज्ञानियों को यह बात नहीं दीखती । उन्हें और का और दीखता है ।
श्वेताश्वतरोपनिषद में लिखा है -
नैव स्त्री न पुमानेष न चैवायं नपुंसकः ।
यद्यच्छरीरमादत्ते तेन तेन स युज्यते ।।
यह आत्मा न स्त्री है न पुरुष और न नपुंसक । यह जिस शरीर को धारण करता है, उसी-उसी के साथ जुड़ जाता है ।
जब मनुष्य को इस बात का ज्ञान हो जाता है कि स्त्री और पुरुष में कोई भेद नहीं, जो मैं हूँ वही स्त्री है - स्त्री ने और तरह का कपडा पहन रखा है और मैंने और तरह का - तब उसका मन स्त्री पर नहीं भूलता । अपने ही स्वरुप को और समझकर उससे मैथुन करने की इच्छा नहीं होती । ज्ञानी को संसार में शत्रु, मित्र, स्त्री-पुत्र, स्वामी-सेवक नहीं दीखते । वह स्त्री-पुत्र और शत्रु-मित्र सबको समान समझता है; किसी से राग और किसी से द्वेष नहीं रखता । उसे कुत्ते में, आदमी में तथा प्राणी मात्र में ही एक विष्णु दीखता है । यह अवस्था परमपद की अवस्था है ।
स्वामी शंकराचार्य जी कहते हैं -
शत्रौ मित्रे पुत्रे बन्धौ
मा कुरु यत्नं विग्रहसन्धौ ।
भव समचित्तः सर्वत्र त्वम्
वाञ्छस्यचिराद् यदि विष्णुत्वम् ।।
शत्रु, मित्र और पुत्र-बांधवों में, विरोध या मेल के लिए चेष्टा न कर । यदि शीघ्र ही मोक्ष पद चाहता है तो शत्रु-मित्र और पुत्र-कलत्र प्रभृति को एक नज़र से देख । सबको अपना समझ, किसी को गैर न समझ; समान चित्त हो जाय । जैसा ही पुरुष वैसी ही स्त्री, जैसा बेटा वैसा दुश्मन और जैसा धन वैसी मिटटी ।
कहानी - एक सच्चा महात्मा
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एक साधु सदा ज्ञानोन्मत्त अवस्था में रहता था । वह कभी किसी से फालतू बातचीत नहीं करता था । एक रोज़ एक गाँव में भिक्षा मांगने गया । एक घर से उसे जो रोटी मिली, वह उसे आप खाने लगा और साथ में कुत्ते को भी खिलने लगा । यह देख वहां अनेक लोग इकट्ठे हो गए और उनमें से कोई-कोई उसे पगला कह कर उसकी हंसी करने लगे । यह देख महात्मा ने उनसे कहा - "तुम क्यों हँसते हो?"
विष्णुः परिस्थितो विष्णुः
विष्णुः खादति विष्णवे ।
कथं हससि रे विष्णो ?
सर्वं विष्णुमयं जगत् ।।
विष्णु के पास विष्णु है । विष्णु, विष्णु को खिलता है । अरे विष्णु, तू क्यों हँसता है ? सारा जगत विष्णुमय है; यानी सारा संसार उस पूर्णतम विष्णु से व्याप्त है ।
सच्चे और पहुंचे हुए साधू-फ़क़ीर सारे संसार में एक परमात्मा को देखते हैं । उन्हें दूसरा कोई नज़र नहीं आता । अज्ञानी लोग, जिनके ज्ञान-चक्षु बन्द हैं, जगत में किसी को अपना और किसी को पराया समझते हैं ।
किसी ने क्या अच्छा उपदेश दिया है ।
एकान्ते सुखमास्यतां परतरे चेतः समाधीयताम् ।
पूर्णात्मा सुसमीक्ष्यतां जगदिदं तद्व्यापितं दृश्यतां ।
प्राक्कर्म प्रविलोप्यतां चितिबलान्नाप्युत्तरे श्लिष्यतां ।
प्रारब्धं त्विह भुज्यतामथ परब्रह्मात्मना स्थीयताम् ।।
एकान्त-निर्जन स्थान में सुख से बैठना चाहिए । परब्रह्म परमात्मा में मन लगाना चाहिए । पूर्णात्मा पूर्णब्रह्म से साक्षात् करना चाहिए और इस जगत को पूर्णब्रह्म से व्याप्त समझना चाहिए । पूर्वजन्म के कर्मो का लोप करना चाहिए और ज्ञान के प्रभाव से अब के किये कर्मों के फल त्याग देने चाहिए; यानी निष्काम कर्म करने चाहिए; जिससे कर्मबन्धन में बंधकर फिर जन्म न लेना पड़े । इस संसार में प्रारब्ध या पूर्व जन्म के कर्मो को भोगना चाहिए और इसके बाद परमेश्वररूप से इस जगत में ठहरना चाहिए; यानि अपने में और परमात्मा में भेद न समझना चाहिए ।
दोहा
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काम-अन्ध जबही भयौ, तिय देखी सब ठौर ।
अब विवेक-अञ्जन किये, लख्यौ अलख सिरमौर ।।
रम्याश्चन्द्रमरिचयस्तृणवती रम्या वनान्तस्थळी
रम्यः साधुसमागमः शमसुखं काव्येषु रम्याः कथाः ।
कोपोपहितवाष्पबिन्दुतरलं रम्यं प्रियाया मुखं
सर्वंरम्यमनित्यतामुपगते चित्तेनकिञ्चित्पुनः ।। ८५ ।।
अर्थ:
चन्द्रमा की किरणे, हरी-हरी घास के तख्ते, मित्रों का समागम, शृङ्गार रस की कवितायेँ, क्रोधाश्रुओं से चञ्चल प्यारी का मुख - पहले ये सब हमारे मन को मोहित करते थे; किन्तु जब से संसार की अनित्यता हमारी समझ में आयी, तब से ये सब हमें अच्छे नहीं लगते ।
जब तक मनुष्य को संसार की असारता, उसकी अनित्यता, उसका थोथापन, उसकी पोल नहीं मालूम होती, तभी तक मनुष्य संसार और संसार के झगड़ों में फंसा रहता है और विषय भोगों को अच्छा समझता है; किन्तु संसार की असलियत मालूम होते ही, उसे विषय सुखों से घृणा हो जाती है । उस समय न उसे चन्द्रमा की शीतल चांदनी प्यारी लगती है, न मित्रमण्डली अच्छी मालूम होती है, न शृङ्गार रस की कवितायेँ अच्छी मालूम होती हैं और न उसका चित्त, चंद्रवदनि कामिनियों को ही देखकर मचलता है ।
छप्पय
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चन्द चाँदनी रम्य, रम्य बनभूमि पहुपयुत ।
योंही अति रमणीक, मित्र मिळवो है अद्भुत ।।
बनिता के मृदु बोल, महारमणीक विराजत ।
मानिनमुख रमणीक, दृगन अँसुअन जल साजत ।
ए हे परमरमणीक सब, सब कोउ चित्त में चहत ।
इनको विनाश जब देखिये, तब इनमें कछुहु न रहत ।।
भिक्षाशी जनमध्यसंगरहितः स्वायत्तचेष्टः सदा
दानादानविरक्तमार्गनिरतः कश्चित्तपस्वी स्थितः।।
रथ्याक्षीणविशीर्णजीर्णवसनैः सम्प्राप्तकंथासखि-
र्निमानो निरहंकृतिः शमसुखाभोगैकबद्धस्पृहः।। ८६ ।।
अर्थ:
ऐसा तपस्वी को विरला ही होता है, जो भीख मांगकर खाता है, जो अपने लोगों में रहकर भी उनमें मोह नहीं रखता, जो स्वाधीनतापूर्वक अपना जीवन निर्वाह करता है, जिसने लेने और देने का व्यवहार छोड़ दिया है, जो राह में पड़े हुए चीथड़ों की गुदड़ी ओढ़ता है, जिसे मान का ख्याल नहीं है, जिसमें अभिमान नहीं है और जो ब्रह्मज्ञान के सुख को ही सुख मानता है ।
ज्ञानी के लक्षण सुन्दरदास जी ने इस भांति कहे हैं -
कर्म न विकर्म करे, भाव न अभाव धरे।
शुभ न अशुभ परे, यातें निधरक है।।
वस तीन शून्य जाके, पापहु न पुण्य ताके।
अधिक न न्यून वाके, स्वर्ग न नरक है।।
सुख दुःख सम दोउ, नीचहूँ न उंच कोउ।
ऐसी विधि रहै सोउ, मिल्यो न फरक है।।
एकही न दोय जाने, बंद मोक्ष भ्रम मानै।
सुन्दर कहत, ज्ञानी ज्ञान में गरक है।।
जो भीख मांगकर पेट की अग्नि को शांत कर लेता है, पर किसी की खुशामद नहीं करता, किसी के अधीन नहीं होता, स्वाधीन रहता है; राह में पड़े हुए चीथड़े उठाकर उनकी ही गुदड़ी बनाकर ओढ़ लेता है; मान-अपमान और सुख-दुःख को समान समझता है; न किसी से कुछ लेता है न किसी को कुछ देता है; गृहस्थी में या अपने बन्धु-बान्धवों में रहकर भी उनमें ममता नहीं रखता; शुभाशुभ, पाप-पुण्य, स्वर्ग-नरक को कोई चीज़ नहीं समझता; किसी को नीच और किसी को उंच नहीं समझता, सभी में एक आत्मा देखता है; बन्धन और मोक्ष को भी मन का संकल्प या भ्रम समझता है तथा ब्रह्मज्ञान में गर्क रहता है और उसमें ही पूर्ण सुख समझता है - उससे बढ़कर ज्ञानी और कौन है ? ऐसे ज्ञानी के जीवन्मुक्त होने में संशय नहीं । उसे जन्म-मरण का कष्ट नहीं उठाना पड़ता । वह सदा परमानन्द में मग्न रहता है, पर ऐसे पुरुष कोई-कोई ही होते हैं ।
सोरठा
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उञ्छवृत्ति गति मान, समदृष्टि इच्छारहित।
करत तपस्वी ध्यान, कंथा को आसन किये।।
मातर्मेदिनि तात मारुत सखे तेजः सुबन्धो जलं ।
भ्रातर्व्योम निबद्ध एव भवतामेष प्रणामाञ्जलिः ।।
युष्मतसंगवशोपजातसुकृतोद्रेकस्फुरन्निर्म्मल-
ज्ञानापास्तसमस्तमोहमहिमा लिये परे ब्रह्मणि ।। ८७ ।।
अर्थ:
हे माता पृथ्वी ! पिता वायु ! मित्र तेज ! बन्धु जल ! भाई आकाश ! अब मैं आपको अन्तिम विदाई का प्रणाम करता हूँ । आपकी संगती से मैंने पुण्य कर्म किये और पुण्यों के फल स्वरुप मुझे आत्मज्ञान हुआ, जिसने मेरे संसारी मोह का नाश कर दिया । अब मैं परब्रह्म में लीन होता हूँ ।
मनुष्य शरीर पृथ्वी, वायु, तेज, जल और आकाश - पांच तत्वों से बनता है । जिसे आत्मज्ञान हो गया है, जिसने ब्रह्म को पहचान लिया है, वह इन पांच तत्वों से विदा लेता है और प्रणाम करके कहता है, कि मैं आप पाँचों के संग रहने से - यह शरीर धारण करने से - इस योग्य हुआ कि, ब्रह्मज्ञान प्राप्त कर सका; अब मेरा आपका साथ न होगा, अब मैं छोले में न आऊंगा, अब मुझे जन्म न लेना पड़ेगा । मैं आप लोगों का कृतज्ञ हूँ ; क्योंकि आपकी सुसंगति से ही मुझे या फल मिला है । अब मैं आपसे सदा को विदा होता हूँ । अब मैं ब्रह्म के आनन्द में मग्न हूँ । अब मुझे यहाँ आने की, आप लोगों की संगती करने की; यानि शरीर धारण करने की जरुरत नहीं । मतलब यह है कि मनुष्य का चोला ब्रह्मज्ञान के लिए मिलता है; और चोलों में, यह ज्ञान नहीं हो सकता । जो मनुष्य चोले में आकर ब्रह्मज्ञान लाभ करते हैं और उसकी बदौलत परम पद या मोक्ष प्राप्त करते हैं - वे ही धन्य हैं, उन्हीं का मनुष्य-देह पाना सार्थक है ।
छप्पय
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अरी मेदिनी-मात, तात-मारुत सुन ऐरे।
तेज-सखा जल-भ्रात, व्योम-बन्धु सुन मेरे।।
तुमको करत प्रणाम, हाथ तुम आगे जोरत।
तुम्हारे ही सत्संग, सुकृत कौ सिन्धु झकोरत।।
अज्ञान जनित यह मोहहू, मिट्यो तुम्हारे संगसों।
आनन्द अखण्डानन्द को, छाय रह्यो रसरंग सों।।
यावत्स्वस्थमिदं कलेवरगृहं यावच्च दूरे जरा
यावच्चेन्द्रियशक्तिरप्रतिहता यावत्क्षयो नायुषः ।
आत्मश्रेयसि तावदेव विदुषा कार्यः प्रयत्नो महा-
न्प्रोदीप्ते भवने च कूपखननं प्रत्युद्यमः कीदृशः ।। ८८ ।।
अर्थ:
जब तक शरीर ठीक हालत में है, बुढ़ापा दूर है, इन्द्रियों की शक्ति बनी हुई है, आयु के दिन बाकी हैं, तभी तक बुद्धिमान को अपने कल्याण की चेष्टा अच्छी तरह से कर लेनी चाहिए । घर जलने पर कुआँ खोदने से क्या फायदा ।
जब तक आपका शरीर निरोग और तन्दरुस्त रहे, बुढ़ापा न आवे, आपकी इन्द्रियों की शक्ति ठीक बनी रहे, आपका अन्त दूर हो, उम्र बाकी दिखे, तभी तक आप अपनी भलाई की चेष्टा कर लीजिये; यानि ऐसी हालत में ही भगवान् का भजन कर लीजिये । जब आप रोगों से जर्जरित हो जाएंगे, कफ,खांसी और दम घेर लेंगे, आँखों से न दिखेगा, कानो से न सुनाई देगा, गले में घर-घर कफ बोलने लगेगा, मौत अपना पंजा जमा देगी, तब आप क्या करेंगे ? अर्थात कुछ नहीं । उस समय आप कुछ करने की चेष्टा करेंगे भी, तो आपकी दशा उसकी सी होगी, जो घर में आग लगने पर कुआ खोदता है ।
किसी ने कहा है -
प्रथम नार्जिता विद्या, द्वितीय नार्जितं धनं ।
तृतीये नार्जितं पुण्यं, चतुर्थे किं करिष्यति ?।
बचपन में यदि विद्या नहीं सीखी, जवानी में यदि धन सञ्चय नहीं किया, बुढ़ापे में यदि पुण्य नहीं किया; तो चौथेपन में क्या करोगे ?
सबसे अच्छी बात तो बचपन में ही परमात्मा की भक्ति करना है । ध्रुव और प्रह्लाद ने बचपन में ही भक्ति करके परमात्मा के दर्शन किये थे अगर इस उम्र में न हो सके, तो जवानी में, जवानी में न हो सके तो बुढ़ापे में तो चूकना ही न चाहिए । स्त्री-पुत्र, धन-दौलत का मोह छोड़ परमात्मा में मन लगाओ; आजकल पर मत टालो; क्योंकि मौत हर समय घात में है, न जाने कब तुम्हे ले जाय । जब वह आ जाएगी तो तुमसे कुछ करते-धरते न बनेगा, तुम घबरा जाओगे, मुंह से परमात्मा का नाम न निकलेगा और हाथों से दान या पराया उपकार न कर सकोगे । उस समय तुम्हारा परलोक बनाने की चेष्टा करना, आग लग जाने पर कुंआ खोदने वाले के समान मूर्खतापूर्ण काम होगा । अतः जो करना है, मरने के समय से पहले ही करो ।
किसी ने परलोक-साधन के लिए क्या अच्छी सलाह दी है -
वेदो नित्यंधीयतां तदुदितं कर्म स्वनुष्ठीयतां
तेनेशस्यपिधीयतामपचितिः कामे मतिसत्यज्यतां।
पापौघः परिधूयतां भवसुखे दोषोऽनुसन्धीयताम्
आत्मेच्छा व्यवसीयतां निजगृहात् तूर्णं विनिर्गम्यताम् ।।
नित्य वेद पढ़ो और वेदोक्त कर्मो का अनुष्ठान करो । वेद विधि से परमेश्वर की पूजा करो । विषय भोगों को बुद्धि से हटाओ ; यानि विषयों को त्यागो । पाप समूह का निवारण करो । संसारी सुख इत्र-फुलेल चन्दनादि के लगाने, स्त्री-भोगने और नाच-गाना देखने सुनने प्रभृति परिणाम विचारो ; यानि इनके दोषों की भावना करो । परमेश्वर या आत्मा में अनुराग करो और गृहस्थी के अनेक दोषों को समझ कर, शीघ्र ही घर को त्यागकर वन को चले जाओ ।
उस्ताद ज़ौक़ कहते हैं -
बेनिशाँ पहले फ़नासे हो, जो हो तुझको बका ।
वर्ना है किसका निशाँ, ज़ौके फनाने रक्खा ।।
मरने से पहले सांसारिक बन्धनों से अपने चित्त को हटा ले - अमर होने की यही एक तरकीब है; वर्ना मौत किसी का निशान नहीं छोड़ती ।
छप्पय
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जौ लौं देह निरोग, और जौ लौं जरा तन ।
अरु जौ लौं बलवान आयु, अरु इन्द्रिन के गन ।
तौं लौं निज कल्याण करन को, यत्न विचारत ।
वह पण्डित वह धीर-वीर, जो प्रथम सम्हारत ।
फिर होत कहा जर्जर भये, जप तप संयम नहिं बनत ।
भव काम उठ्यौ निज भवन जब, तब क्योंकर कूपहि खनत ।।
नाभ्यस्ता भुविवादिवृन्ददमनी विद्या विनीतोचिता
खड्गाग्रैः करिकुम्भपीठदलनैर्नाकं न नीतं यशः ।
कान्ताकोमलपल्लवाधररसः पीतो न चन्द्रोदये
तारुण्यं गतमेव निष्फलमहो शून्यालये दीपवत् ।। ८९ ।।
अर्थ:
हमनें इस जगत में नम्रों को संतुष्ट करनेवाली और वादियों की मान भञ्जन करनेवाली विद्या नहीं पढ़ी, तलवार की धार से हाथी के मस्तक का पिछला भाग काटकर अपना यश स्वर्ग तक नहीं पहुँचाया; चांदनी रात में सुन्दरी के कोमल अधर-पल्लव (निचले होठ) का रस भी नहीं पिया । हाय ! हमारी जवानी सूने घर में जलनेवाले और आपही बुझ जाने वाले दीपक की तरह योंही गयी !
दोहा
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विद्या पढ़ी न रिपु दले, रह्यौ न नारि समीप।
यौवन यह योंही गयो, ज्यों सूने गृह दीप।।
ज्ञानं सतां मानमदादिनाशनं
केषांचिदेतन्मदमानकारणं ।।
स्थानं विविक्तं यामिनां विमुक्तये
कामातुराणामतिकामकारणाम् ।। ९० ।।
अर्थ:
अच्छे मनुष्यों में तो ज्ञान उनके मान-मद आदि का नाश करता है; किन्तु दुष्टों में वही ज्ञान मान-मद प्रभृति औगुणों की वृद्धि करता है । एकांत स्थान योगियों के लिए तो मुक्ति दिलानेवाला होता है; किन्तु वही कामियों की कामज्वाला बढ़ानेवाला होता है ।
जिस तरह स्वाति-बूँद सीप में पड़ने से मोती और केले में कपूर हो जाती है, किन्तु सर्पमुख में पड़ने से विष का रूपधारण करती है; उसी तरह एक चीज़ पुरुष-भेद से अलग अलग गुण दिखाती है । ज्ञान से अच्छे लोगों का अभिमान नाश हो जाता है, वे सब किसी को अपने बराबर समझते हैं, सबके साथ सुहानुभूति रखते हैं, किसी का दिल नहीं दुखाते; किन्तु उसी ज्ञान से दुष्ट लोगों की दुष्टता और भी बढ़ जाती है, वे अपने सामने जगत को तुच्छ समझते हैं; विद्याभिमान के मारे किसी की ओर नज़र उठा कर भी नहीं देखते, अपने सिवा सबको पशु समझते हैं । एक ही ज्ञान दो स्थानों में, स्थान भेद से अपना अलग-अलग प्रभाव दिखाता है । जैसे एकान्त स्थान योगियों के चित्त को ब्रह्मविचार में लीन करता है और इससे उनको परमपद - मुक्ति - मिल जाती है ; किन्तु वही एकान्त स्थान कामियों के दिलों में मस्ती पैदा करता है ।
दोहा
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ज्ञान घटावै मान-मद, ज्ञानहि देय बढ़ाय।
रहसि मुक्ति पावे यती, कामी रत लपटाय।।
जीर्णा एव मनोरथाः स्वहृदये यातं च जरां यौवनं
हन्ताङ्गेषु गुणाश्च वन्ध्यफलतां याता गुणज्ञैर्विना ।
किं युक्तं सहसाऽभ्युपैति बलवान्कालः कृतान्तोऽक्षमी
ह्याज्ञातंस्मरशासनाङ्घ्रियुगलं मुक्त्वाऽस्तिनान्यागतिः ।। ९१ ।।
अर्थ:
हमारी इच्छाएं हमारे ह्रदय में ही जीर्ण हो गईं, जवानी भी चली गयी, हमारे अच्छे-अच्छे गुण भी कदरदानों के न होने से बेकार हो गए, सर्वशक्तिमान, सर्वनाशक काल (मृत्यु) शीघ्र-शीघ्र हमारे पास आ रहा है; इसलिए अब हमारी समझ में कामारि शिव के चरणों के सिवा और जगह हमारी रक्षा नहीं है ।
मनुष्य दुखित होकर कहता है - हमारे मन की मन में ही रह गयी, हमारे अरमान न निकले और जवानी कूच कर गयी; अब उसके आने की भी उम्मीद नहीं, क्योंकि जवानी किसी की भी लौटकर आती सुनी नहीं ।
मनुष्य की तृष्णा कभी नहीं बुझती, एक पर एक इच्छा उठा ही करती है । इच्छाएं पूरी नहीं होती और मौत आ जाती है । महाकवि ग़ालिब भी पछता कर कहते हैं -
हज़ारों ख्वाहिशें ऐसी, कि हर ख्वाहिश पै दम निकले।
बहुत निकले मेरे अरमान, लेकिन फिर भी कम निकले।।
महाकवि दाग भी घबरा कर कहते हैं -
भरे हुए हैं हज़ारों अरमान
फिर उस पै है हसरतों की हसरत।
कहाँ निकल जाऊं या इलाही
मैं दिल की वसअत से तंग होकर।।
मेरे मन में हज़ारों वासनाएं हैं, पर वासनाओं के पूर्ण न होने का दुःख भी कुछ कम नहीं है । हे ईश्वर ! मैं अपने मन की विशालता से तंग हो गया । अब मेरा जी यही चाहता है, कि इस विराट दिल से तंग होकर कहीं चला जाऊं ।
इसी तरह महात्मा सुन्दरदास जी भी कहते हैं -
तीनहिं लोक आहार कियो सब।
सात समुद्र पियो पुनि पानी।।
और जहाँ तहाँ ताकत डोलत।
काढत आँख दरवात प्रानी।।
दांत दिखावत जीभ हिलावत।
या हित मैं यह डाकिनि जानी।।
सुन्दर खात भये कितने दिन।
हे तृष्णा ! अजहुँ न अघानी।।
इस तृष्णा से सभी समझदार अन्त में दुखी ही हुए हैं और उन्होंने पछता पछता कर ऐसी ही बातें कही हैं । इस तृष्णा के फेर में मनुष्य का बुढ़ापा आ जाता है, पर तृष्णा बूढी नहीं होती । बुढ़ापे में उसका ज़ोर और भी बढ़ जाता है । यह तीनो लोको को खाकर और सातों सागरों को पीकर भी नहीं धापति । इसलिए मनुष्य को आशा-तृष्णा त्यागकर, परमात्मा में लौ लगनी चाहिए । जो नहीं चेतते, उनका परिणाम बुरा होता है । जब एकदम से बुढ़ापा छा जाता है, शरीर अशक्त हो जाता है, तब कुछ भी नहीं होता । उम्र ख़त्म होने या मृत्यु आ जाने पर मनुष्य पछताता हुआ सबको छोड़ चला जाता है । कहा है -
ये मम देश विलायत हैं गज ।
ये मम मन्दिर ये मम थाती ।।
ये मम मात पिता पुनि बान्धव ।
ये मम पूत सु ये मम नाती ।।
ये मम कामिनि केलि करै नित ।
ये मम सेवक हैं दिन राती ।।
सुन्दर ऐसेही छाँड़ि गयो सब ।
तेल जरयो सु बुझी जब बाती ।।
यह मेरा देश है, ये मेरे हाथी-घोड़े महल-मकान हैं, ये मेरे माँ-बाप और बन्धु-बान्धव तथा नाती-पोते हैं, यह मेरी स्त्री और यह मेरे सेवक हैं; ऐसे करता करता ही मनुष्य सबको छोड़कर चला जाता है । जिस तरह तेल के जल जाने पर दीपक बुझ जाता है; उसी तरह उम्र पूरी होने पर मनुष्य मर जाता है । अतः जवानी में ही स्त्री-पुत्र प्रभृति सबका मोह छोड़, एकान्त में जा, परमात्मा का भजन करना चाहिए; क्योंकि बुढ़ापे में कुछ नहीं हो सकता ।
शेख सादी ने कहा है और ठीक कहा है -
जवान गोशानशीं, शेर मर्दे राहे खुदास्त ।
कि पीर खुद न तवानद, ज़े गोशये बरखास्त ।।
जवानी में जिन्होंने एकान्त में ईश्वर भजन किया है, सच्चे भक्त वही हैं, बूढा आदमी अगर एकान्तवास पर गर्व करे तो झूठा है, क्योंकि वह तो जहाँ पड़ा है, वह से सरक ही नहीं सकता ।
जो लोग साड़ी उम्र संसारी जंजालों में बिता देते हैं और परमात्मा का भजन नहीं करते, उनका नक्शा स्वामी सुन्दरदास जी ने खूब ही खींचा है -
ग्रीव त्वचा कटि है लटकी ।
कचहुँ पलटे अजहुँ रतीबामी ।।
दन्त गए मुख के उखरे ।
नखरे न गए सु खरो खर कामी ।।
कम्पत देह सनेह सु दम्पति ।
सम्पति जपत है निशि जामी ।।
सुन्दर अन्तहु भौन तज्यो ।
न भज्यो भगवन्त सु लौनहरामी ।।
मनुष्य की गर्दन हिलने लगती है, खाल लटकने लगती है, कमर झुक जाती है, बाल सफ़ेद हो जाते हैं, तो भी स्त्री के साथ भोग करता है । मुंह के दांत उखड जाते हैं, फिर भी कामी गधे के नखरे नहीं जाते, देह कांपती है; पर स्त्री से प्रीति रखता है और रात-दिन धन का जाप करता है । अन्त में घर छोड़ता है, पर नमकहराम मालिक का भजन नहीं करता ।
छप्पय
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मन के मनही मांहि, मनोरथ वृद्ध भये सब ।
निज अंगन में नाश भयो, वह यौवनहु अब ।
विद्या है गयी बाँझ, बूझवारे नहीं दीसत ।
दौरयो आवत काल, कोपकर दशनन पीसत ।
कबहुँ नहिं पूजे प्रीति सों, चक्रपाणि प्रभु के चरण ।
भवबन्धन काटे कौन अब, अजहुँ गहरे हरि शरण ।।
तृषा शुष्यत्यास्ये पिबति सलिलं स्वादु सुरभि
क्षुधार्तः सञ्शालीन्कवलयति शाकादिवाळितां ।
प्रदीप्ते कामाग्नौ सुदृढतरमाश्लिष्यति वधूं
प्रतीकारो व्याधेः सुखमिति विपर्यस्यति जनः ।। ९२ ।।
अर्थ:
जब मनुष्य का कण्ठ प्यास से सूखने लगता है, तब वह शीतल जल पीता है; जब उसे भूख लगती है, तब वह साग और कढ़ी प्रभृति के संग चावल खाता है; जब उसकी कामाग्नि तेज़ होती है तब वह स्त्री को ज़ोर से गले लगाता है; विचार कर देखने से मालूम होता है, कि ये सब बिमारियों की एक-एक दवा है; परन्तु लोग इन्हे भूल से सुख समान मानते हैं ।
प्यास रोग की दवा शीतल जल है; यानि शीतल जल से तृष्णा नाश होती है । क्षुधारोग की दवा रोटी-भात और साग-दाल प्रभृति हैं; यानी भात-दाल प्रभृति से भूख रोग नाश होता है । कामाग्नि भी एक रोग है, उसके शान्त करने का उपाय स्त्री को छाती से लगाना है, यानी स्त्री का आलिङ्गन करने से या चिपटाने से काम की आग ठण्डी हो जाती है । ( दाह ज्वर में षोडशी कामिनी के शरीर में चन्दन लगाकर चिपटने से बहुत लाभ होता है ) इन बातों पर विचार करने से साफ़ मालूम होता है, कि शीतल जल-पान, भिन्न-भिन्न प्रकार के भोजन और स्त्रियों का आलिङ्गन प्रभृति तृषा, क्षुधा और कामाग्नि प्रभृति रोगों की औषधियां हैं । इनको सुख समझना भूल नहीं तो क्या है ?
छप्पय
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प्यास लगे जब पान करत, शीतल सुमिष्ट जल।
भूख लगे तब खात, भात-घृत दूध और फल।
बढ़त काम की आगि, तबहिं नववधू संग रति।
ऐसे करत विलास, होत विपरीत दैव गति।
सब जीव जगत के दिन भरत, खात पियत भोगहु करत।
ये महारोग तीनो प्रबल, बिना मिटाये नहिं मिटत।।
स्नात्वा गाङ्गैः पयोभिः शुचिकुसुमफलैरर्चयित्वा विभो
त्वां ध्येये ध्यानं नियोज्य क्षितिधरकुहरग्रावपर्येकमूले ।
आत्मारामः फलाशी गुरुवचनरतस्त्वत्प्रसादात्स्मरारे
दुःखं मोक्ष्ये कदाहं तब चरणरतो ध्यानमार्गैकनिष्ठ ।। ९३ ।।
अर्थ:
हे शिव ! हे कामारि ! गंगा स्नान करके तुझ पर पवित्र फल-फूल चढ़ाता हुआ, तेरी पूजा करता हुआ, पर्वत की गुफा में शिला पर बैठा हुआ, अपने ही आत्मा में मग्न होता हुआ, वन-फल खाता हुआ, गुरु की आज्ञानुसार तेरे ही चरणों का ध्यान करता हुआ कब मैं इन संसारी दुखों से छुटकारा पाउँगा ?
दोहा
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न रसेवा तजि, ब्रह्म भजि, गुरुचरणन चित लाय।
कब गंगातट ध्यान धर, पूजोंगो शिव पाय?।
शय्या शैलशिला गृहं गिरिगुहा वस्त्रं तरुणं त्वचः
सारंगाः सुहृदो ननु क्षितिरुहां वृत्तिः फलैः कमलैः ।।
येषां निर्झरम्बुपानमुचितं रत्येव विद्याङ्गना
मन्ये ते परमेश्वराः शिरसि यैर्बद्धो न सेवांजलिः।। ९३ ।।
अर्थ:
मैं उनको परमेश्वर समझता हूँ, जो किसी के सामने मस्तक नहीं नवाते, जो पर्वत की शिला को ही अपनी शय्या समझते हैं, जो गुफा को ही अपना घर मानते हैं, जो वृक्षों की छालों को ही अपने वस्त्र और जंगली हिरणो को ही अपने मित्र समझते हैं, वृक्षों के कोमल फलों से ही उदार की अग्नि को शान्त करते हैं, जो कुदरती झरनो का जल पीते हैं और जो विद्या को ही अपनी प्राण प्यारी समझते हैं ।
जो किसी चीज़ की चाह नहीं रखते, वे किसी की परवा नहीं करते, वे किसी के सामने मस्तक नहीं नवाते; जिनकी वासनाओं का अन्त नहीं होता, वे ही जने-जने के सामने सर झुकाते हैं । जो संसार के दास नहीं, वे सचमुच ही देवता हैं ।
उस्ताद ज़ौक़ ने कहा है -
जिस इन्सां को सगे दुनिया न पाया।
फरिश्ता उसका हमपाया न पाया ।।
जो मनुष्य संसार का दास नहीं - संसार का कुत्ता नहीं - वह देवताओं से कहीं ऊंचा है । देवता उसकी बराबरी नहीं कर सकते । जिसमें सांसारिक वासनाओं का लेश न हो, उस मनुष्य और देवताओं में कोई भेद नहीं ।
सच्चे महात्मा वन और पर्वतों को छोड़कर दुनिया में कभी नहीं आते; वे मांगकर नहीं खाते; उन्हें वन में ही जो कुछ मिल जाता है, वही खा लेते हैं ।
महाकवि ग़ालिब कहते हैं -
वे तलब दें, तो मज़ा उसमें सिवा मिलता है ।
वह गदा, जिसका न हो खुए सवाल अच्छा है ।।
बिना मांगे मिल जाने में बड़ा आनन्द है । फ़क़ीर वही अच्छा जिसमें मांगने की आदत न हो ।
और भी कहा है -
दस्ते सवाल, सैकड़ों ऐबों का ऐब है ।
जिस दस्त में ये ऐब नहीं, वह दस्ते गैब है ।।
कबीर साहब ने भी कहा है -
अनमाँग्या उत्तम कह्यो, माध्यम माँगि जो लेय ।
कहे कबीर निकृष्ट सो, पर घर धरना देय ।।
उत्तम भीख जो अजगरी, सुनि लीजौ निज बैन ।
कहै कबीर ताके गहे, महा परम सुख चैन ।।
महापुरुष भगवान् के भरोसे रहते हैं, इसलिए उन्हें उनकी जरुरत की चीज़ उनके स्थान पर ही मिल जाती है । वे संसार रुपी काजल की कोठरी में आकर कालिख लगाना पसन्द नहीं करते । संसारी लोगों के साथ मिलने जुलने में भलाई नहीं । संसार से दूर रहना ही भला । क्योंकि मनुष्य जैसे आदमियों को देखता और जैसों की सङ्गति करता है, वैसा ही हो जाता है । रागियों की सङ्गति से वैरागी भी रागी या विषय-भोगी हो जाता है । जल और वृक्षों के पत्ते खाने वाले ऋषि स्त्रियों के देखने मात्र से अपने तप से हीन हो गए । इसीलिए शास्त्रों में लिखा है कि सन्यासी संसारियों से दूर रहे । वास्तविक महापुरुष जो सच्चे ब्रह्मज्ञानी और रासायनिक हैं; किसी के भी द्वार पर नहीं जाते । जिसे कुछ कामना होती है, वही किसी के द्वार पर जाता है । कामनाहीन पुरुष कभी किसी के पास नहीं जाता । सच्चे महात्मा संसारियों से अपनी जान छुपाते हैं ।
दो महात्मा जो राजा से मिलना नहीं चाहते थे
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एक नगर के बाहर वन में दो बड़े ही त्यागी महात्मा रहते थे । राजा ने चाहा कि मैं उनसे मिलूं । राजा अपने परिवार सहित उनसे मिलने गया । महात्माओं ने सोचा - यह तो बुरी बला लगी । इसे सदा को टालना चाहिए । आज यह आया है, कल नगर भर आवेगा । फिर हम तो भजन ही न कर सकेंगे । जब राजा पास पहुंचा, तो वे आपस में लड़ने लगे । एक बोला - "तूने मेरी रोटी खाली" । दुसरे ने कहा - "तूने भी तो कल मेरी खा ली थी"। यह देखकर राजा को घृणा हो गयी और वह लौट आया । इस तरह महात्माओं के एकान्तवास में विघ्न नहीं पड़ा ।
संसारियों की सङ्गति बुरी
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एक महात्मा कहीं से आकर काशी में रह गए । दस पांच वर्ष बाद अनेक लोग उन्हें जान गए और उन्हें अपने-अपने घर भोजन के लिए ले जाने लगे । महात्मा ने देखा कि, घरों में जाने से विक्षेप होता है, इसलिए उन्होंने अपनी लंगोटी ही उतारकर फेंक दी, कि नंगे रहने से लोग घरों पर न ले जाएंगे । पर फल उल्टा हुआ, उनकी महिमा और भी बढ़ गयी । अब तो बड़े-बड़े राजा, रईस और जमींदार उनके दर्शन को आने लगे । उनका सारा समय अमीरों से मिलने में ही बीतने लगा । इतने में एक और महात्मा आये और उनसे एकान्त में पुछा - "क्या हाल है ?" महात्मा ने कहा - "बवासीर से मरते हैं ।" आगन्तुक महात्मा ने कहा - "लोग तो आपको सिद्ध कहते हैं ?" महात्मा ने कहा - "कहा करें, लोग मूर्ख हैं । हमारे चित्त में तो वासनाएं भरी हैं, न जाने हमें किस योनि में जन्म लेना होगा ? हमारा तो सारा वैराग्य इन धनियों की सङ्गति में ही नष्ट हो गया । सच है, निवृत्ति मार्ग वालों को प्रवृत्ति मार्गवालों की सङ्गति करना अच्छा नहीं ।
छप्पय
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बसैं गुहागिरि, शुचित शिला शय्या मनमानी।
वृक्षवकल के वसन, स्वच्छ सुरसरिको पानी।
बाणमृग जिनके मित्र, वृक्षफल भोजन जिसके।
विद्या जिनकी नारि, नहीं सुरपति सभ तिनके।
ते लगत ईश सम मनुज मोहि, तनशुचि ऐसे जग भये।
जे पर सेवा के काज को, हाथ नहीं जोरत नए ।।
तिपरिचपले चिन्ताचक्रे निधाय विधिः खलः ।।
मृदमिव बलात्पिण्डीकृत्य प्रगल्भकुलालवद्-
भ्रमयति मनो नो जानीमः किमत्र विधास्यति ।। ९८ ।।
अर्थ:
हे प्यारी सखी बुद्धि ! कुम्हार जिस तरह गीली मिटटी के लौंदे को चाक पर चढ़कर डंडे से चाक को बारम्बार घुमाता है और उससे इच्छानुसार बर्तन तैयार करता है; उसी तरह संसार को गढ़नेवाला ब्रह्मा हमारे चित्त को चिन्ता के चाक पर चढ़ा कर, विपत्तियों के डंडे से चाक को लगातार घुमाता हुआ, हमारा क्या करना चाहता है, यह हमारी समझ में नहीं आता ?
मनुष्य के पीछे भगवान् ने चिन्ता बुरी लगा दी है । बात यह है, कि मनुष्य के पूर्व जन्म के कर्मो के कारण या इस जन्म की भूलों के कारण, उसे विपत्तियां भोगनी ही पड़ती है । विपत्तियों से पार होने के लिए, मनुष्य रात-दिन चिन्तित रहता है । चिन्ता या फ़िक्र से मनुष्य का रूप-रंग सब नष्ट होकर शीघ्र ही बुढ़ापा आ जाता है । आजकल चालीस बरस की उम्र में ही लोग बूढ़े हो जाते हैं, इसका कारण चिन्ता ही है । अगर चिन्ता न होती, तो मनुष्य को कुछ दुःख न होता । जहाँ तक हो, मनुष्य को चिन्ता को अपने पास न आने देना चाहिए; क्योंकि चिन्ता, चिता से भी बुरी है । चिता मरे हुए को भस्म करती है, पर चिन्ता जीते हुए को ही जलाकर ख़ाक कर देती है; अतः चिन्ता से दूर रहो । स्त्री, पुत्र और धन की चिन्ता में अपनी अमूल्य दुर्लभ काया को नाश न करो; क्योंकि ये स्त्री-पुत्र प्रभृति तुम्हारे कोई नहीं । अगर चिन्ता और विचार ही करना है, तो इस बात का करो कि तुम कौन हो और कहाँ से आये हो ?
स्वामी शंकराचार्य ने मोहमुद्गर में कहा है -
का तव कान्ताः कस्ते पुत्रः संसारोऽयमतीव विचित्रः ।
कस्य त्वम् वा कुत आयातः तत्त्वं चिन्तय तदिदं भ्रातः ।।
कौन तेरी स्त्री है ? कौन तेरा पुत्र है ? यह संसार अतीव विचित्र है । तू कौन है ? कहाँ से आया है ? हे भाई ! इस तत्व की चिन्ता कर; अर्थात न कोई तेरी स्त्री है और न कोई तेरा पुत्र है, वृथा चिन्ता क्यों करता है ?
तू कौन है ? कहाँ से आया है ? क्यों आया है ? तूने अपना कर्तव्य पालन किया है या नहीं ? तेरा अन्तिम परिणाम क्या है ? इत्यादि विचारों द्वारा अपने स्वरुप को पहचान जाने अथवा ईश्वर की शरण में चले जाने से ही चिन्ता से पीछा छूटेगा और शान्ति मिलेगी । निश्चय ही चिन्ता और विपत्तियों से बचने के लिए भगवान् का आश्रय लेना सर्वोपरि उपाय है । विपत्ति रुपी समुद्र में डूबते हुए के लिए भगवान् का नाम ही सच्चा सहारा है ।
गोस्वामी तुलसीदास जी ने कहा है -
तुलसी साथी विपति के, विद्या विनय विवेक ।
साहस सुकृत सत्यव्रत, राम भरोसो एक ।।
तुलसी असमय के सखा, साहस धर्म विचार ।
सुकृत शील स्वाभाव ऋजु, रामशरण आधार ।।
खेलत बालक व्याल संग, पावक मेलत हाथ ।
तुलसी शिशु पितु मातु इव, राखत सिय रघुनाथ ।।
तुलसी केवल रामपद, लागे सरल सनेह ।
तौ घर घट बन बाट मँह, कतहुँ रहै किन देह ।।
सारांश यह कि जो हमारे चित्त को चिन्ता के चाक पर चढ़ा कर विपत्तियों के डंडे से घुमाता है, यदि हम उसकी ही शरण में चले जाएँ, उसी से प्रेम करें, तो वह हमारे चित्त को चिन्ता के चाक पर न रक्खे; अर्थात हमें चिंताग्नि में न जलना पड़े; सुख-शान्ति सदा हमारे सामने हाथ बांधे खड़े रहे । यह बाला उन्हीं को खाती है, जो भगवान् से विमुख रहते हैं । इसलिए यदि इस चिन्ता-डायन से बचना चाहो तो परमात्मा को भजो ।
दोहा
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मन को चिंताचक्र धर, खल विधि रह्यौ घुमाय ।
रचि है कहा कुलालसम, जान्यौ कछु न जाय ?।।
तयोर्न भेदप्रतिपत्तिरस्ति मे तथापि भक्तिस्तरुणेन्दुशेखरे।। ९९ ।।
अर्थ:
यद्यपि मुझे विश्वेश्वर शिव और सर्वात्मन विष्णु में कोई भेद नहीं दीखता; तथापि मेरा मन उन्ही की ओर झुकता है, जिनके मस्तक में तरुण चन्द्रमा विराजमान है; अर्थात मैं शिव को ही चाहता हूँ ।
विष्णु और शिव में कोई भेद नहीं, एक ही परमात्मा के अलग अलग नाम हैं, वही कृष्ण हैं, वही रघुनाथ हैं, वही राम हैं और वही शिव हैं । पर फिर भी; जिस नाम का आश्रय ले लिया उसी का भरोसा करना ठीक है । मन भटकाना अच्छा नहीं ।
एक बार गोस्वामी तुलसीदास जी वृन्दावन गए । वहां उन्हें भगवान् कृष्ण के दर्शन हुए । भगवान् की बांकी झांकी देखकर गोस्वामी जी मुग्ध हो गए, पर उन्होंने उनको सिर न नवाया; क्योंकि उनके इष्टदेव रामचन्द्र जी थे । उन्होंने उस समय कहा -
कहा कहूँ छवि आज की, भले बने हो नाथ ।
तुलसी मस्तक जब नवै, धनुषबाण लेयो हाथ ।।
आपकी छवि आज भी बहुत मनोमुग्धकर है, पर मैं तो आपको तभी प्रणाम करूँगा, जब आप धनुष-बाण हाथ में लेकर रामचन्द्र बनोगे । भगवान् को तत्काल रामरूप धर धनुष-बाण हाथ में लेना पड़ा । यह काम भगवान् को भक्त की दृढ़ता देखकर करना पड़ा ।
प्रीति पपहिये की सच्ची और आदर्श है । वह चाहे प्यासा मर जाए, पर मेघ के सिवा किसी भी जलाशय का जल नहीं पीता । "उत्तर चातकाष्टक" में लिखा है -
पयोद हे ! वारि ददासि वा न वा ।
तवडेकचित्तः पुनरेष चातकः ।।
वरं महत्या म्रियते पिपासया
तथापि नान्यस्य करोत्युपासनाम् ।।
हे मेघ ! तू जल दे चाहे न दे, चातक तो तेरा ही आश्रय रखता है । घोर प्यास से भले ही मर जाए, पर वह दुसरे की उपासना नहीं करता । गोस्वामी तुलसीदास जी ने भी कहा है -
चातक घन तजि दूसरे, जियत न नाई नारि।
मरत न मांगे अर्घजल, सुरसरिहु को वारि ।।
व्याधा बधो पपीहरा, परो गंगजल जाय ।
चोंच मूँदि पीवे नहीं, धिक् पीवन प्रण जाय ।।
चातक ने मेघ को छोड़ और किसी को अपनी ज़िन्दगी में सर न नवाया । मरते समय गंगा का जल भी ग्रहण न किया । किसी शिकारी ने किसी चातक को मारा, वह गंगाजी में गिर पड़ा, प्यास के मारे घबरा रहा था, पर गंगाजल नहीं पीता था । उसने उलटी चोंच बन्द कर ली; कि कहीं जल मुख में न चला जाय और मेरा प्रण टूट जाय । वाह वाह ! प्रीति और भक्ति हो तो ऐसी ही हो ।
सारांश यह है, कि भगवान् के भी जिस नाम से प्रेम हो, उसे छोड़ कर दूसरे से प्रेम न करना चाहिए । एक ही पति की स्त्री होने में भलाई है । जिसके अनेक पति होते हैं, उसका भला नहीं होता । अनेक देवी-देवताओं के उपासक चातक से शिक्षा ग्रहण करें । कहा है -
पतिव्रता को सुख घना, जाके पति है एक।
मन मैली व्यभिचारिणी, जाके खसम अनेक।।
पतिव्रता पति को भजै, और न अन्य सुहाय।
सिंह बचा जो लंघना, तो भी घास न खाय।।
"कबिरा" सीप समुद्र की, रटे पियास पियास।
सकल बूँद को न गिनै, स्वाति बूँद की आस।।
प्रीति रीति तुझ सों मेरे, बहु गुनियाला कन्त।
जो हँसि बोलूं और सूँ, तो नील रंगाऊं दन्त।।
पतिव्रता, जिसके एक पति होता है, सदा सुखी रहती है; किन्तु अनेक खसमवाली व्यभिचारिणी सदा दुखी रहती है । पतिव्रता सदा अपने पति को ही चाहती है; उसे दूसरा अच्छा नहीं लगता । सिंह का बच्चा लंघन पर लंघन करने पर भी घास नहीं खाता । कबीरदास कहते हैं, समुद्र की सीप प्यास ही प्यास रटा करती है; कितनी ही बूंदे क्यों न गिरें, उसे तो स्वाति की बूँद ही प्यारी लगती है । मेरे गुणनिधान कन्त ! मेरी प्रीती तुझसे है । जो मैं दुसरे से हंसकर बोलूं तो मेरा काला मुंह हो ।
दोहा
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नाहिन शिव अरु विष्णु में, सूझै अन्तर मोय ।
तदपि चन्द्रशेखर लखत, प्रीति अधिक कछु होय ।।
रे रे कोकिल कोमलैः किं त्वं वृथाजल्पसि ।।
मुग्धे स्निग्धविदग्धमुग्धमधुरैर्लोलैः कटाक्षैरलं
चेतश्चुम्बितचन्द्रचूड़चरणध्यानमृतं वर्त्तते ।। १०० ।।
अर्थ:
हे कामदेव ! तू धनुष्टङ्कार सुनाने के लिए क्यों बारबार हाथ उठाता है ? हे कोकिला ! तू मीठी-मीठी सुहावनी आवाज़ में क्यों कुहू-कुहू करती है ? ए मूर्ख स्त्री ! तू अपने मनोमोहक मधुर कटाक्ष मुझ पर क्यों चलाती है ? अब तुम मेरा कुछ नहीं कर सकते; क्योंकि अब मेरे चित्त ने शिव के चरण चूमकर अमृत पी लिया है ।
जब तक मनुष्य का मन ब्रह्मानन्द का मज़ा नहीं जानता, जब तक वह परमात्मा के चरणों में ध्यान लगा कर अमृत नहीं पीटा, तभी तक कामदेव का ज़ोर चलता है, तभी तक कोकिला का पञ्चम स्वर उसके दिल में खलबली पैदा करता है, तभी तक स्त्री के कटाक्ष-बाण उस पर असर करते हैं; कामारि शिव से प्रीति होने पर ये सब कुछ नहीं कर सकते । भगवान् शिव और कामदेव में वैर है; अतः शिवभक्तों पर कामदेव अपने अस्त्र अपने अस्त्र नहीं चला सकता ।
छप्पय
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अरे काम वेकाम, धनुष टंकारत तर्जत।
तू हू कोकिल व्यर्थ बोल, काहे को गरजत।।
तैसे ही तू नारि वृथा ही करत कटाक्षै।
मोहि न उपजै मोह, छोह सब रहिगे पाछै।।
चित चन्द्रचूड़चरण को, ध्यान अमृत बरषत हिते।
आनन्द अखण्डानन्द को, ताहि अमृत सुख क्यों हिते।।
निश्चिन्तम् सुखसाध्यभैक्ष्यमशनं शय्या श्मशाने वने ।
मित्रामित्र समानताऽतिविमला चिन्ताऽथशून्यालये
ध्वस्ता शेषमदप्रमाद मुदितो योगी सुखं तिष्ठति ।। १०१ ।।
अर्थ:
वही योगी सुखी है, जो एकदम से फटी-पुरानी सैकड़ो चीथड़ों से बनी कोपीन पहनता है और वैसी ही गुदड़ी ओढ़ता है, जिसके पास चिन्ता नहीं फटकती, जो सुख से मिला हुआ भिक्षान्न खाता है, जो श्मशान भूमि या वन में सो रहता है, जो मित्र और शत्रुओं को समान समझता है, जो सूनी झोंपड़ी में ध्यान करता है और जिसके मद और प्रमाद सम्पूर्ण रूप से नष्ट हो गए हैं ।
फटी-पुरानी कोपीन पहनने, चीथड़ों की गुदड़ी ओढ़ने, निश्चिन्त रहने, सुख से मिले भिक्षान्न के खाने, मरघट या जंगल में सो रहने, दोस्त और दुश्मन को बराबर समझने और नितान्त सूने घर में पवित्र ध्यान करने से जिसके मद और प्रमाद नाश हो गए हैं, वही योगी संसार में सुखी है । ऐसी महापुरुषों को किसी की इच्छा नहीं होती । जिसे किसी चीज़ की इच्छा नहीं, उसके किसकी गरज़ ? जो मित्र और शत्रु को एक नज़र से देखते हैं, जहाँ जगह पाते हैं वही पद रहते हैं, वहीँ खा लेते हैं, उन्हें न चिन्ता राक्षसी सताती है, न उन्हें घमण्ड होता है और न उन्हें मस्ती आती है । वे तो ब्रह्म के ध्यान में मग्न रहते हैं, इसलिए दुःख उनके पास नहीं आता; वे सदा सुख में दिन बिताते हैं । जो लोग बढ़िया बढ़िया कपडे पहनते हैं, शाल-दुशाले ओढ़ते है, अच्छे-अच्छे स्वादिष्ट भोजन करते हैं, मखमली गद्दे-तकियों पर सोते हैं, किसी को दोस्त और किसी को दुश्मन समझते हैं, ब्रह्म का ध्यान नहीं करते, उनको चिन्ता लगी ही रहती है । देखने में वे सुखी मालूम होते हैं, पर भीतर ही भीतर उनकी आत्मा जला करती है । चिन्ता उनको खोखला कर डालती है । क्योंकि बढ़िया बढ़िया भोजन और वस्त्रों के लिए उन्हें सदा उपाय करने पड़ते हैं और उनकी रक्षा की चिन्ता करनी पड़ती है । ऐसो के ही मित्र और शत्रु होते हैं । जिनका वे भला करते हैं, जिन्हे कुछ सहायता देते हैं अथवा जिन्हे उनसे कुछ मिलने की आशा रहती है, वे मित्र बन जाते हैं; पर जिनका स्वार्थ साधन नहीं होता, जो उनके ठाठ-बाठ और वैभव को फूटी आँख नहीं देख सकते, वे उनके नाश की चेष्टा करते हैं और उनके दुश्मन हो जाते हैं । इसलिए उन्हें रात-दिन शत्रुओं से बदला लेने और उन्हें पराजित करने की फ़िक्र के मारे क्षणभर भी सुख की नींद नहीं आती । अपने वैभव और ऐश्वर्य को देखकर उन्हें स्वतः ही अभिमान हो आता है । अभिमान के नशे में वो अनर्थ करने लगते हैं; इससे उन्हें सदा भयभीत रहना पड़ता है । बहुत क्या कहें; जिनको आप अमीर देखते हैं, जिनको आप स्त्री-पुरुष, धन-रत्न, गाडी-घोड़े, मोटर प्रभृति से सुखी देखते हैं, वे वास्तव में ज़रा भी सुखी नहीं । सुखी वही है जिसे किसी चीज़ की ज़रूरत नहीं, जिसे किसी से वैर या प्रीति नहीं, जिसे ज़रा भी अभिमान नहीं, जिसकी इन्द्रियां वश में हैं, जो कभी चिन्ता को पास नहीं आने देता और जो ब्रह्मानन्द में ही मग्न रहता है । भला राजा महाराजा और धनी लोग इस सुख को कैसे पा सकते हैं ? अगर सुखी होना चाहो, तो संसार को त्याग कर, एकदम से निश्चिन्त होकर, परमात्मा के सिवा किसी चीज़ की चिन्ता न करो ।
जो लोग संसार त्यागें, वह सच्चे मन से त्यागें; ढोंग करने से कोई लाभ नहीं । आजकल ऐसे बनावटी महात्मा बहुत देखने में आते हैं, जो जाता-जूट बढ़ा लेते हैं, ख़ाक रमा लेते हैं आँखें लाल कर लेते हैं, गंगा में पहरों खड़े रहते हैं, शूलों की शय्या पर सोते हैं, पर उनकी आशा और तृष्णा नहीं जाती । वे ज़ाहिरा कष्ट उठाते हैं, कर्मेन्द्रियों से उनका काम नहीं लेते; पर मन और ज्ञानेन्द्रियों को अपने वश में नहीं करते, वासनाओं का त्याग नहीं करते, इससे उनका जीवन वृथा जाता है । ऐसे लोगों के सम्बन्ध में महात्मा कबीर कहते हैं -
निर्बन्धन बंधा रहे, बंध्या निरबन्ध होय ।
कर्म करे करता नहीं, दास कहावे सोय ।।
कृष्ण भगवान् गीता के तीसरे अध्याय के छठे श्लोक में कहते हैं -
कर्मेन्द्रियाणि संयम्य य आस्ते मनसा स्मरन् ।
इन्द्रियार्थान् विमूढात्मा मिथ्याचारः स उच्यते ।।
जो मनुष्य कर्मेन्द्रियों को वश में करके कुछ काम तो नहीं करता; किन्तु मन में इन्द्रियों के विषयों का ध्यान किया करता है, वह मनुष्य झूठा और पाखण्डी है ।
मतलब यह है, कि मनुष्यों को हाथ, पाँव, मुंह, गुदा और लिङ्ग को वश में कर लेने और इनसे कोई काम न लेने से कोई लाभ नहीं; इनसे तो इनका कोई काम लेना ही चाहिए; किन्तु आँख, कान, नाक, जीभ और त्वचा को वश में करना चाहिए । आँख, कान आदि पांच इन्द्रियों को वश में करना या अपने अपने विषयों से रोकना जरूरी है । बहुत से लोग, ज़ाहिर में सिद्ध बनने के लिए, हाथ-पाँव प्रभृति कर्मेन्द्रियों से काम नहीं लेते, किन्तु मन में भाँती भाँती के इन्द्रिय विषयों की इच्छा किया करते हैं । भगवान् कृष्ण ऐसों को पाखण्डी कहते हैं ।
सबसे अच्छा और सिद्ध पुरुष वही है जो ज़ाहिरा तो काम करता है, किन्तु अन्दर से मन और ज्ञानेन्द्रियों को विषय वासना से रोकता है । गीता में कहा है -
यस्त्विन्द्रियाणि मनसा नियम्यारभतेऽर्जुन ।
कर्मेन्द्रियैः कर्मयोगमसक्तः स विशिष्यते ।।
हे अर्जुन ! जो मन से आँख कान नाक आदि इन्द्रियों को वश में करके और इन्द्रियों को विषयों में न लगा कर "कर्मयोग" करता है, वही श्रेष्ठ है ।
रहीम ने यही बात कैसी अच्छी तरह कही है -
जो "रहीम" मन हाथ है, मनसा कहुँ किन जाहिं ।
जल में छाया जो परी, काया भीजत नाहिं ।।
तन को योगी सब करें, मन को विरला कोय ।
सहजे सब विधि पाइये, जो मन योगी होय ।।
मतलब यह है कि ढोंग करने से कोई लाभ नहीं । जिनका दिल साफ़ है, जिनके दिल से वासनाएं निकल गयी है, उन्हें नहाने धोने प्रभृति दिखाऊ कामों या दुकानदारी की जरुरत नहीं है । रहीम कहते हैं, मन यदि हाथ में है तो मनसा कहीं क्यों न जाय, हानि नहीं; क्योंकि जल में शरीर की परछाईं पड़ने से शरीर नहीं भीजता । लोग शरीर को जोगी करते हैं - तिलक छापे लगाते हैं, जटाजूट बढ़ाते हैं, नेत्रों को सुर्ख करते हैं, भभूत मलते हैं, कोपीन बांधते हैं; पर मन को कोई विरला ही जोगी करता है । लोग ऊपर से योगी बन जाते हैं, पर मन उनका विषय-भोगों में लगा रहता है । शरीर से चाहे जो काम क्यों न किये जाएँ, पर मन में विषयों की कामना न रहे; यानि शरीर जोगी न हो, मन जोगी हो जाये; तो सिद्धि या मोक्ष मिलने में संदेह नहीं । सारांश यह कि, मन के योगी होने से ही ईश्वर मिलता है ।
महाकवि ज़ौक़ कहते हैं -
सरापा पाक हैं धोये जिन्होंने हाथ दुनिया से ।
नहीं हाजत कि वह पानी बहाएं सर से पाऊं तक ।।
जिन्होंने दुनिया से हाथ धो लिए हैं, वे सिरसे पाँव तक शुद्ध हो गए हैं । उन्हें सिर से पाँव तक पानी बहाकर स्नान करने की जरुरत नहीं ।
मन जब वासना-हीन हो जाता है, तब वह सूखी दिया-सलाई के समान हो जाता है । सूखी दिया-सलाई जिस तरह झट जल उठती है, पर गीली नहीं जलती; उसी तरह वासनाहीन मन पर परमात्मा का रंग जल्दी चढ़ता है ; किन्तु वासनायुक्त मन पर हरगिज़ नहीं । इसलिए मन को वासनाहीन करना चाहिए । साथ ही भक्ति भी निष्काम करनी चाहिए । ईश्वर से मुराद न मांगनी चाहिए । कामना रखकर भक्ति करने से कामना निश्चय ही पूर्ण होती है - ईश्वर भक्त की इच्छा अवश्य पूरी करता है; पर वैसी भक्ति से परिणाम में भय है ; क्योंकि फलों के भोगने के लिए जन्मना और मरना पड़ता है । किन्तु जो लोग बिना किसी इच्छा के परमात्मा की भक्ति करते हैं, वे मुक्ति लाभ करते हैं - उन्हें जन्म लेना और मरना नहीं पड़ता ।
जब साधक के मन में कामना नहीं रहती, तब उसके मन से ईर्ष्या-द्वेष और मित्रता-शत्रुता सब दूर हो जाती है । वह सब जगत को एक नज़र से देखता है । वह मनुष्यों की आशा नहीं रखता, केवल परमात्मा की शरण ले लेता है; इसलिए उसे सहज में मुक्ति मिल जाती है । गोस्वामी तुलसीदास जी ने कहा है -
तब लगि हमते सब बड़े, जब लगि है कुछ चाह ।
चाह-रहित कह को अधिक, पाय परमपद थाह ।।
जब तक मन में ज़रा भी आशा रहती है, तभी तक मनुष्य किसी को बड़ा मानता है और किसी का दास बनता है; जब आशा नहीं रहती तब वह सबको समान समझता है और सबका आसरा छोड़ एकमात्र परमात्मा का आसरा पकड़ता है; इससे उसको भवबन्धन से छुटकारा मिलकर परमपद की प्राप्ति हो जाती है ।
छप्पय
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कन्था अरु कोपीन, फटी पुनि महा पुरानी ।
बिना याचना भीख, नींद मरघट मनमानी ।।
रह जग सों निश्चिन्त, फिरै जितहि मन आवै ।
राखे चित कू शान्त, अनुचित नहीं भाषै ।।
जो रहे लीन अस ब्रह्म में, सोवत अरु जागत यदा ।
है राज तुच्छ तिहुँ भुवन को, ऐसे पुरुषन को सदा ।।
भोगा भंगुरवृत्तयो बहुविधास्तैरेव चायं भवः
तत्कस्यैव कृते परिभ्रमतरे लोका कृतं चेष्टितैः ।
आशापाशशतोपशान्तिविशदं चेतः समाधीयतां
कामोच्छित्तिवशे स्वधामनि यदि श्रद्धेयमस्मद्वचः ।। १०२ ।।
अर्थ:
नाना प्रकार के विषय भोग नाशमान और संसार-बन्धन के कारण हैं, इस बात को जानकार भी मनुष्यों ! उनके चक्कर में क्यों पड़ते हो ? इस चेष्टा से क्या लाभ होगा ? अगर आपको हमारी बात का विश्वास हो, तो आप अनेक प्रकार के आशा-जाल के टूटने से शुद्ध हुए चित्त को सदा कामनाशक स्वयंप्रकाश शिवजी के चरण में लगाओ । (अथवा अपनी इच्छाओं के समूल नाश के लिए, अपने ही आत्मा के ध्यान में मग्न हो जाओ ।
आप आज जिन विषय-सुखों को देखकर फूले नहीं समाते, वे विषय-सुख सदा आपके साथ नहीं रहेंगे । वे आज हैं तो कल नहीं रहेंगे । वे बिजली की चमक के समान चञ्चल हैं; अभी बिजली चमकी और फिर नहीं । आप ऐसे नश्वर, असार और क्षणस्थायी सुखों पर मत भूलो । होश करो ! अपनी काया नाशमान है । आप सदा इस संसार में नहीं रहेंगे । आपकी ज़िन्दगी का कोई भरोसा नहीं । आपका जो दम आता है, उसे ही गनीमत समझिये । आप एक कदम रखकर, दूसरा कदम रखने की भी दृढ़ आशा न कीजिये । आपका जीवन हवा के झोंको से छिन्न-भिन्न मेघों के समान है । अभी घटा छा रहीं थी; देखते देखते हवा उन्हें कहाँ का कहाँ उड़ा ले गयी; आकाश साफ़ हो गया। यह सारा संसार, संसार के सुख-भोग, स्त्री-पुत्र, धन-रत्नादि सभी स्वप्न की सी माया हैं । यह दुनिया मुसाफिरखाना है । रोज़ अनेक आदमी मुसाफिरखाने, सराय या धर्मशालाओं में आते और जाते रहते हैं; सदा उनमें कोई नहीं रहता । वे जिस तरह एक दिन या दो-तीन दिन रहकर चले जाते हैं; उसी तरह आपको भी, इस दुनिया रुपी सराय में चन्द रोज़ क़याम करके, आगे जाना होगा । ये सारे सामान यहाँ के यहीं रह जायेंगे । ये सब ऐसे ही रहेंगे, पर आप न रहेंगे । इसलिए आप होशियार रहिये, भूलिए मत । जिस जवानी पर आप इतना इतराते और इतने श्रृंगार-बनाव करते हैं, यह भी चन्दरोज़ा है । यह चार दिन की चाँदनी है । इसके बाद अन्धेरी रात निश्चय ही आवेगी । उस समय आपको यह अकड़, यह उछाल कूद, यह एन्ठना, यह मूंछे मरोड़ना - सब हवा हो जाएगा । आप शीघ्र ही लाठी तक कर चलने लगेंगे । आपका रूप-लावण्य नाश हो जाएगा । जो लोग आपको खूबसूरत समझकर आज प्यार करते हैं, वे ही कल आपको देखकर नाक-भौं सिकोड़ेंगे । फिर भला, आप ऐसी नश्वर निकम्मी काया क्यों इतना अभिमान करते हैं ? आप अहङ्कार को त्यागिये और अपने को उस खिलाडी का एक मिटटी का पुतला मात्र समझिये । सबकी शुभकामना और परोपकार कीजिये और एकमात्र अपने बनानेवाले से ही दिल लगाइये । इसी में आपका कल्याण है । यह जगत कुछ भी नहीं, कोरा भ्रम है । यह मृगमरीचिका या स्वप्न की सी माया है । इस पर ज्ञानी नहीं भूलते ।
महात्मा सुन्दरदास जी कहते हैं -
कोउ नृप फूलन की सेज पर सूतो आई ।
जब लग जाग्यो तौ लों, अति सुख मान्यो है ।।
नींद जब आयी, तब वाही कूँ स्वप्न भयो ।
जब परयो नरक के कुण्ड में, यूं जान्यो है ।।
अति दुःख पावे, पर निकस्यो न क्यूँ ही जाहि ।
जागि जब परयो, तब स्वप्न बखान्यो है ।।
यह झूठ वह झूठ, जाग्रत स्वप्न दोउ ।
"सुन्दर" कहत, ज्ञानी सब भ्रम मान्यो है ।।
छप्पय
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अति चञ्चल ये भोग, जगत हूँ चञ्चल तैसो ।
तू क्यों भटकत मूढ़ जीव, संसारी जैसो ।।
आशाफांसी काट, चित्त तू निर्मल ह्वैरे ।
करि रे प्रतीति मेरे वचन, ढुरिरे तू इह ओर को ।।
छिन यहै यहै दिनहुँ भल्यौ, निज राखै कुछ भोर को ।
धन्यानां गिरिकन्दरे निवसतां ज्योतिः परं ध्यायतां-
आनन्दाश्रुजलं पिबन्ति शकुना निःशङ्कमङ्केशयाः ।।
अस्माकं तु मनोरथोपरचितप्रासादवापीतट-
क्रीडाकाननकेलिकौतुकजुषामायुः परिक्षीयते ।। १०३ ।।
अर्थ:
वे धन्य हैं, जो पर्वतों की गुफाओं में रहते हैं और परब्रह्म की ज्योति का ध्यान करते हैं, जिनके आनन्दाश्रुओं को उनकी गोद में बैठे हुए पक्षी निर्भयता से पीते हैं । हमारी ज़िन्दगी तो मनोरथों के महल की बावड़ी के किनारे के क्रीड़ा-स्थान में लीलाएं करते हुए ही वृथा बीतती है ।
मतलब यह कि वे लोग सफल काम हैं, जो पहाड़ों की गुफाओं में बैठे हुए परमात्मा ज्योति का ध्यान करते रहते हैं और ध्यान में इतने मग्न हो जाते हैं कि उन्हें अपने तनबदन की भी सुध नहीं रहती । उनको भीतर ही भीतर उस ब्रह्म के ध्यान से जो आनन्द-बोध होता है, उससे उनकी आँखों से आनन्द के आंसू बहने लगते हैं । पक्षी उनकी गोद में निडर बैठे हुए उन आंसुओं को पीते हैं । उन्हें कुछ खबर नहीं, कि पक्षी गोद में बैठे हैं या क्या कर रहे हैं । वे तो आनन्द में बेसुध रहते हैं । यही आनन्द परमानन्द है । इससे परे और आनन्द नहीं । जिनको यह सच्चा आनन्द मिलता है, वही सच्चे भाग्यवान हैं । एक वह हैं और एक हम अभागे हैं, जो रात-दिन मनोरथों के महल गढ़ा करते हैं - रात-दिन मिथ्या कल्पनाएं किया करते हैं । इन शेखचिल्ली के से गढन्तों से हमें कोई लाभ नहीं - इन झूठे ख्याली पुलावों के पकने में हमारा दुष्प्राप्य जीवन वृथा नष्ट हो रहा है ।
जो मनुष्य मानव-चोला पाकर परमात्मा का भजन नहीं करते, परमात्मा के दर्शनों की चेष्टा नहीं करते - उनका जीवन वृथा है ।
इसलिए उस्ताद ज़ौक़ ने कहा है -
दिल वह क्या, जिसको नहीं तेरी तमनाये विसाल ।
चश्म वह क्या, जिसको तेरे दीद की हसरत नहीं ।।
वह दिल ही नहीं, जिसे तुझे पाने की इच्छा न हो और वह आँख ही नहीं, जिसे तेरे दर्शन की लालसा न हो ।
गोस्वामी तुलसीदास जी कहते हैं -
गए पलट आवें नहीं, सो करु मन पहचान ।
आजु जोई सोई कालहि है, तलसी मर्म न मान ।।
रामनाम रटिबो भलो, तुलसी खता न खाय ।
लरिकाई ते पैरिबो, धोखे बूड़ि न जाय ।।
नदी की जो धार चली गयी है, लौटकर नहीं आएगी, जो दिन चले गए हैं, वापस नहीं आएंगे । जो दिन आज है, वही कल है । कल कोई नई बात नहीं हो जायेगी । अतः जो कल करना है उसे आजही करो; और जो आज करना है, उसे अभी करो; क्योंकि यदि पल भर में प्रलय हो गयी - आप चल बसे - तो फिर कब करोगे ? बचपन से ही राम नाम रटना अच्छा है । जो लोग बचपन से ही तैरना सीख लेते हैं, धोखे से नहीं डूबते । जो लोग यही विचार किया करते हैं, कि अमुक काम हो जायेगा, तो उसके बाद हम सब गृहस्थी के झगड़े छोड़ भगवत भजन करेंगे, वे इस तरह के विचार किया ही करते हैं कि इतने में समय पूरा हो जाता है और काल उनका चोटा पकड़ कर उन्हें ले जाता है । उस वक्त वह बहुत पछताते और सिर धुनते हैं; लेकिन उस समय क्या हो सकता है ? उस समय उनकी गति उस भौंरे सी होती है, जो कमल के मुख में बन्द हो कर कहता है -
रात्रिर्गमिष्यति भविष्यति सुप्रभातं।
भास्वानुदेष्यति हसिष्यति पंकजालं ।।
इत्थं विचिन्तयति कोशगते द्विरेफे ।
हा हन्त हन्त नलिनीं गज उज्जहार ।।
बड़े बड़े शाल के लट्ठों को छेद डालने की शक्ति रखने वाला भौंरा, प्रेम के मारे, कोमल कमल में बन्द हो जाता है । रात हो जाती है और भौंरा कमल के अन्दर बैठा विचार करता है - "अब रात का अवसान होगा, सवेरा होगा, सूरज उदय होगा और यह कमल खिल जायेगा; तब मैं निकल जाऊंगा । अब रात भर यहीं आनन्द करूँ ।" वह तो ऐसे विचार करता ही रहता है, कि जंगली हाथी कमल को उखाड़ कर मुंह में रख लेता है और भौंरो के मन की मन में ही रह जाती है । यही दशा संसारी विषय-लोलुपों की है । वह विचार बाँधा ही करते हैं और काल उन्हें मुंह में धर लेता है, अतः हो सके तो बचपन में ही ईश्वर भजन करो । बचपन में यदि ऐसा सौभाग्य न हो, तो जवानी में तो न चूको । जवानी इसके लिए अच्छा समय है । उस अवस्था में शक्ति रहती है । जाने में ईश्वरभक्ति करनेवाला निश्चय ही मोक्ष या स्वर्ग पाता है ।
कहा है -
दानं दरिद्रस्य प्रबोशच शान्तिः
यूनां तपो ज्ञानवताञ्च मौनं ।
इच्छा निवृत्तिश्च सुखासितानां
दया च भूतेषु दिवं नयन्ति ।।
दरिद्रता का किया दान, निग्रह अनुग्रह की शक्ति होने पर क्षमा, जवानी का किया तप, विद्वान् होकर चुप रहना, सुख-भोग की सामर्थ्य होने पर इच्छाओं को रोक लेना और प्राणियों पर दया करना - ये स्वर्ग की प्राप्ति करते हैं ।
एक दिन सेठ बीमार हो गया । उसने सेठानी से वैद्य को बुलाने को कहा । सेठानी ने वैद्य को बुलाया । वैद्य ने नाड़ी-नब्ज़ देख, रोग का हाल पूछ, दवा का नुस्खा लिख दिया और सेवन-विधि बताकर चला गया । सेठानी ने पंसारी के यहाँ से दवा मंगा, आले में रख दी । दिन भर हो गया पर सेठ को दवा न दी । संध्या समय सेठ ने कहा - "क्या दवा नहीं मंगाई गयी ?" सेठानी ने कहा - "जी, दवा तो मंगा ली है, पर वह रक्खी है उस ताक में ।" सेठ ने पूछा - "अब तक दी क्यों नहीं ?" सेठानी ने कहा - "जल्दी क्या है ? आज नहीं तो कल, नहीं तो परसों दे दूंगी । कभी न कभी दे ही दूंगी ।" सेठ ने कहा - "अगर मैं मर गया तो दवा कौन काम आवेगी ?" सेठानी ने कहा - "मरने को तो आप मानते ही नहीं । मैं जब जब भगवत भजन करने को कहती हूँ, तब-तब आप कह देते हैं कि देखा जायेगा; जल्दी थोड़े ही है । यदि आपको मरने की ही याद होती तो ऐसा न कहते । आज दवा के लिए आपको मरने की याद आयी है । जिस तरह दवा की रोगनाश के लिए जरुरत है; उसी तरह भजन-पूजन की जन्म-मरण का फन्दा काटने के लिए जरुरत है । ऐसा न हो कि पशु योनि मिल जाय और सारा गुड़-गोबर हो जाय ।" आज स्त्री का उपदेश लग गया । सेठ को वैराग्य हो गया । सेठानी ने उसे दवा पिला दी और वह अच्छा भी हो गया । उसी दिन से उसने ईश्वर भजन में लौ लगा दी । वह और सब भूला पर ज़िन्दगी भर, मौत और ईश्वर को न भूला ।
महात्मा कबीर ने खूब जबरदस्त चेतावनी दी है -
"कबिरा" जो दिन आज है, सो दिन नाहिं काल।
चेत सके तो चेतियो, मीच परी है ख्याल।।
हे कबीर ! जो दिन आज है, वह कल नहीं होगा; यानी आज का सा मौका कल फिर न मिलेगा । चेतना है तो चेत जा ! देख, मृत्यु तेरे घात में है । चूहे पर बिल्ली की तरह झपट्टा मारना ही चाहती है ।
गोस्वामी जी ने भी खूब कहा है -
"तुलसी" विलम्ब न कीजिये, भेज लीजै रघुबीर।
तन तरकस ते जात है, श्वास सार सो तीर।।
काल करे सो आज कर, आज करे सो अब।
पल में परलय होएगी, बहुरि करोगे कब?
तुलसीदास जी कहते हैं, देर न करो, भगवान् को भेज लो; क्योंकि तनरूपी तरकस से श्वास रुपी तीर, जो सार है, निकला जाता है । जो काम कल करना है, उसे आज ही कर डालो और जो आज करना है, उसे अभी कर डालो; क्योंकि यदि पल में प्रलय हो गयी, तो फिर कब करोगे ?
जो मनुष्य दिन-रात घर-धन्धों में ही लगे रहते हैं, कभी खुश होते हैं कभी रंज करते हैं, कभी कन्या के वैधव्य दुःख को देखकर जलते रहते हैं, तो कभी पुत्र के मरण से औंधा मुंह किये पड़े रहते हैं अथवा कान्ता-वियोग या स्त्री के मरण से तड़फते हैं अथवा धनवृद्धि के लिए दौड़ते फिरते हैं । लेकिन परमात्मा का नाम कभी नहीं लेते; यदि लेते हैं तो हाथ को तो गोमुखी में रखते हैं, पर मन को विषयों में लगाए रहते हैं, लोगों से बातें करते रहते और सड़ासड़ माला फेरा करते हैं, ऐसों के पास एक दिन भी चतुर पृष्ठों को न रहना चाहिए ।
कहा है -
राजा धर्मविना, द्विजः शुचिविना, ज्ञानं विना योगिनः ।
कान्ता सत्यविना, हयो गति विना, भूषा च ज्योतिर्विना ।।
योद्धा शूरविना, तपो व्रत विना, छन्दो विना गीयते ।
भ्राता स्नेह विना, नरो हरि विना, मुञ्चन्ति शीघ्रं बुधाः ।।
धर्महीन राजा को, शौचहीन ब्राह्मण को, ज्ञानहीन योगी को, असत्यवादिनी स्त्री को, गतिहीन घोड़े को, चमक-दमक रहित गहने को, शूरताहीन योद्धा को, नियम रहित तप को, छन्द बिना कविता को, स्नेह-हीन भाई को और हरिभक्ति रहित पुरुष को बुद्धिमान लोग शीघ्र ही छोड़ देते हैं ।
हरिभक्ति रहित पुरुष को चतुर लोग इसलिए त्याग देते हैं, कि उसकी सङ्गति में उनका मन भी कहीं वैसा न हो जाय । मनुष्य जैसी सङ्गति करता है, वैसा ही हो जाता है । जो विषयी पुरुषों की सङ्गति करता है, वह विषयी हो जाता है; पर जो ज्ञानी और वैरागियों की सङ्गति करता है, वह ज्ञानी और वैरागी हो जाता है । महापुरुषों की एक शुभ दृष्टी से मनुष्य निहाल हो जाता है; यानी भाव-बन्धन से उसका पीछा छूट जाता है । हम आगे दोनों तरह के दृष्टान्त देते हैं -
एक दिन राजा अपने परिवार और दरबारियों समेत महात्मा के दर्शन को गया । महात्मा के दर्शन कर वह बहुत ही खुश हुआ और उनसे नगर में चलकर बाग़ में तप करने की प्रार्थना की । महात्मा बहुत ज़ोर देने से इस बात पर राज़ी हो गया । राजा ने अपने बाग़ में उसके लिए एक एकान्त कमरा खूब सजवा दिया । मखमली गद्दे, तकिये, कौच, पलंग और कुर्सियां रखवा दीं और चौदह-चौदह बरस की सुन्दरी मनमोहिनी कामिनियाँ महात्मा जी की सेवा को नियुक्त कर दीं ।
महात्मा जी खूब आनन्द से दिनी गुज़ारने और विधुवदिनी कामिनियों को भोगने लगे । चन्दरोज में ही वह विषयों के वशीभूत हो गए । एक दीं राजा फिर उनसे मिलने गया । उसने देखा कि महात्मा जी का रंग रूप गुलाब के फूल जैसा हो गया है । वह मसनद के सहारे लेते हुए हैं और चन्द्रानना स्त्रियां उन पर मोरछल कर रही हैं । यह तमाशा देख राजा को बड़ा दुःख हुआ । उसने अपने मंत्री से यह हाल कहा । मंत्री ने कहा - "महाराज ! निवृत्ति मार्ग वालों को प्रवृत्ति मार्ग वालों की सङ्गति भूलकर भी न करनी चाहिए ।"
कहा है -
कामीनाम् कामिनीनां च संगात् कामी भवेत् पुमान्।
देहान्तरे ततः क्रोधी लोभी मोहि च जायते।।
काम क्रोधादि संसर्गाद शुद्धं जायते मनः।
अशुद्धे मनसि ब्रह्मज्ञानं तच्च विनश्यति।।
कामी पुरुषों और स्त्रियों की सङ्गति से पुरुष कामी और जन्मान्तर में मोहि और क्रोधी हो जाता है ।
काम क्रोधादि के सम्बन्ध से मन भी अशुद्ध हो जाता है । अशुद्ध मन से उपदेश किया हुआ ब्रह्मज्ञान भी नष्ट हो जाता है ।
कहा है -
महानुभावसंसर्गः कस्य नोन्नतिकारकः।
पद्मपत्रस्थितम् वारिधत्ते मुक्ताफलश्रियम ।।
महापुरुषों की सङ्गति से किसकी उन्नति नहीं होती ? कमल के पत्ते पर पड़ी जल की बून्द मोती की शोभा को धारण करती है ।
और भी -
दोहा
-------
जेहि जैसी सङ्गति करी, सो तैसो फल लीन ।
कदली सीप भुजंग मुख, एक बून्द गुण तीन ।।
जो जैसी सङ्गति करता है, वह वैसा ही फल पाता है । मेह की एक बून्द केले में कपूर, सीप में मोती और सर्प मुख में विष हो जाती है ।
सवैय्या
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ज्ञान बढै गुनवान की संगत,
ध्यान बढै तपसी-संग कीने ।
मोह बढै परिवार की संगत,
लोभ बढै धन में चित दीने ।
क्रोध बढै नर मूढ़ की संगत,
काम बढै तिय के संग कीने ।
बुद्धि विवेक विचार बढै,
कवि "दीन" सुसज्जन संगत कीने ।।
सत्संग की महिमा का पार नहीं । सत्संग से ही दस्यु भील वाल्मीकि ऋषि हो गए । पद्मयोनि से पैदा हुए ब्रह्मा कैवर्त्ति से पैदा हुए व्यासजी, उर्वशी से पैदा हुए वशिष्ठ जी और हिरनी से पैदा हुए ऋषि श्रृंगी सत्संग से ब्रह्मतत्व को प्राप्त हुए; अतः महापुरुष्णो का संग करना चाहिए । "सत्संग" भाव-सागर से पर करने के लिए नौका-स्वरुप है ।
कहा है -
तत्त्वं चिन्तय सततं चित्ते,
परिहर चिन्तां नश्वरवित्ते ।
क्षणमिह सज्जनसङ्गतिरेका,
भवति भवार्णवतरणे नौका ।।
हमेशा तत्व की चिन्तना कर, चञ्चल धन की चिन्ता छोड़ । यह जगत अल्पकालीन है; केवल सज्जनों की सङ्गति ही भवसागर के पार जाने के लिए नाव के समान है ।
इस संसार वृक्ष के जितने फल हैं, सभी प्राणी के नाश करनेवाले और उसे सदा दुखों के गर्त में पटक रखनेवाले हैं; केवल दो फल अमृत समान हैं;
कहा है -
संसारविषवृक्षस्य द्वे फैले अमृतोपमे ।
काव्यामृत रसास्वाद आलापः सज्जनैः सह ।।
इस संसार रुपी विष-वृक्ष के दो फल अमृत के समान हैं
१) काव्यरुपी अमृत का रसास्वादन करना, २) साधु पुरुषों की सङ्गति करना ।
शंकराचार्य जी ने कैसा अच्छा उपदेश दिया है । इसमें संसार-सागर से पार होने का सारा मसाला है -
संगः सत्सु विधीयतां, भगवतोभक्तिर्दृढ़ा धीयतां,
शान्त्यादिः परिचीयतां, दृढतरं कर्माशु संत्यज्यताम्।
सद्विद्या ह्युपसर्प्यतां, प्रतिदिनं तत्पादुका सेव्यतां,
ब्रह्मैकाक्षरमर्थ्यतां श्रतिशिरोवाक्यं समाकर्ण्यताम्।।
साधु पुरुषों का संग करना चाहिए । भगवान् में दृढ़ भक्ति करनी चाहिए । क्षमा और दम प्रभृति का अभ्यास करना चाहिए । संसार-बन्धन के कारण "कर्म - सकाम कर्मों को" शीघ्र त्यागना चाहिए । सच्चे विद्वानों की सेवा करनी चाहिए और उनकी पादुकाएं उठानी चाहिए । ब्रह्म बोधक एकाक्षर प्रणव "ॐ" का जाप करना चाहिए और वेद के शिरोवाक्य "वेदान्त" को सुनना चाहिए ।
वाह ! क्या खूब कहा है ! जो इस वचन पर अमल करेगा, उसे परमानन्द की प्राप्ति क्यों न होगी ? अवश्य होगी ।
छप्पय
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योगी जग विसराय, जाय गिरिगुहा बसत हैं ।
करत ज्योति को ध्यान, मगन आंसू वरसत हैं ।।
खगकुल बैठत अंक, पियत निःशंक नयनजल ।
धनि-धनि हैं वे धीर, धरयो जिन यह समाधिबल ।।
हम सेवत बारी बाग सर, सरिता बापी कूपतट ।
खोवत है योंही आयु को, भये निपटही नीरघट ।।
आघ्रातं मरणेन जन्म जरया विद्युच्चलं यौवनं
सन्तोषो धनलिप्सया शमसुखं प्रौढाङ्गनाविभ्रमैः ।
लोकैर्मत्सरिभिर्गुणा वनभुवो व्यालैर्नृपा दुर्जनैः
अस्थैर्येण विभूतिरप्यपहृता ग्रस्तं न किं केन वा ।। १०४ ।।
अर्थ:
मृत्यु ने जन्म को ग्रस रक्खा है, बुढ़ापे ने बिजली के समान चञ्चल युवावस्था को ग्रस रक्खा है, धन की इच्छा ने सन्तोष को ग्रस रक्खा है, जलनेवालों ने गुणों को ग्रस रक्खा है, सर्प और जंगली जानवरों ने वन को ग्रस रक्खा है, दुष्टों ने राजाओं को ग्रस रक्खा है, अस्थिरता या चञ्चलता ने धनैश्वर्य को ग्रस रक्खा है; तब ऐसी कौन सी चीज़ है, जो किसी दूसरी नाशक चीज़ के चंगुल में नहीं है ?
खुलासा यह है, कि जन्म को मृत्यु का भय है, जवानी को बुढ़ापे का भय है, सन्तोष को लोभ का भय है, शान्ति को स्त्रियों के हावभाव और विलासों का भय है, गुणों को उनसे जलने या कुढ़नेवालों का भय है, वन में सर्प और हिंसक पशुओं का भय है, राजाओं में दुष्ट दरबारियों का भय है, धन और ऐश्वर्य में क्षणभंगुरता का भय है । संसार में ऐसी कोई अच्छी वास्तु नहीं है, जिसे किसी का भय न हो । मतलब यह है कि, संसार और संसार के सभी पदार्थ नाशमान हैं । ऐसी कोई चीज़ नहीं है, जिसका काल नाश नहीं कर देता अथवा जिसे किसी तरह का भय नहीं है ।
संसार की यह दशा है, तब भी तो मनुष्य चेत नहीं करता, यही तो आश्चर्य की बात है ! अज्ञानी मनुष्य, मोहवश, अपना हानि-लाभ नहीं देखता; संसार की झूठी माया में फंसा रहता है ।
तुलसीदास जी ने ठीक ही कहा है -
करत चातुरी मोहवश, लखत न निज हित हान ।
शूक मर्कट इव गहत हठ, तुलसी परम सुजान ।।
दुखिया सकल प्रकार शठ, समुझि परत तोई नाहिं ।
लखत न कण्टक मीन जिमि, अशन भखत भ्रम नाहिं ।।
विषयों के संसर्ग से मनुष्य के मन में कामना - इच्छा पैदा होती है । जब इच्छा पूरी नहीं होती, तब क्रोध होता है और क्रोध से मोह की उत्पत्ति होती है । मोह होने से प्राणी को अपना हित या परलोक की हानि नहीं दीखती । राग-द्वेष प्रभृति के कारण उसमें ज्ञानदृष्टी नहीं रहती; पर पढ़ने-लिखने के कारण वह अपने तई परम चतुर समझता है और जिस तरह हठ करके तोता बहेलिये के फन्दे में आप ही फंस जाता है और पिंजरे में कैद हो जाता है तथा बन्दर छोटे मुंह की ठिलिया में रोटी के लिए हाथ डालकर बंदरवाले के कब्जे में हो जाता है; उसी तरह विषयी पुरुष, विषयों के लालच में आकर, अपने तई संसार-बन्धन में फंसा लेता है ।
मनुष्य भूख, प्यास, रोग, शोक, दरिद्रता, प्रिय-वियोग, बुढ़ापा, जन्म-मरण, चौरासी लाख योनियों में दुःख-भोग तथा नरक प्रभृति से हर तरह दुखी है, उसे ज़रा भी सुख नहीं है, पर वह मोह के मारे ऐसा अन्धा हो रहा है कि उसे कांटे में लगे चारे के लिए फंसने वाली मछली कि तरह कुछ भी नहीं सूझता । जिस तरह मछली को रोटी का टुकड़ा प्यारा है; उसी तरह मनुष्य को विषय-भोग प्यारा है । जिस तरह मछली को काँटा है, उसी तरह मनुष्य को ममता का काँटा है । मतलब यह है, अज्ञानी मनुष्य विषय रुपी चारे के लोभ से ममता के कांटे में फंसकर अपना नाश कराता है; पर मज़ा यह कि वह दुःख को दुःख नहीं समझता; तरह-तरह के भयों से घिरा हुआ नाना प्रकार के संकट झेलता है; मछली, तोते और बन्दर की तरह बन्धन में फंसता है, पर निकलना नहीं चाहता । इन दुःखों का उसे ज़रा भी ख्याल नहीं आता । रोज़ लोगों को मरते हुए देखता है, रोज़ बूढ़ों को असह्य कष्ट उठाते देखता है; पर आप नहीं समझता कि मेरी भी यही गति होनेवाली है ! उल्टा हर साल जन्मतिथि को वर्षगाँठ का उत्सव करता है । मित्रों और रिश्तेदारों को निमंत्रण देता है । गाना बजाना और नाच रंग कराता है । कैसी बात है, जहाँ रंज करना चाहिए, वहां नादान मनुष्य ख़ुशी मनाता है ! उसे समझना चाहिए कि हर सालगिरह को उसकी उम्र का एक साल काम होता है ।
महात्मा सुन्दरदास जी ने क्या खूब कहा है -
जबतें जनम लेत, तबही तें आयु घटे ।
माई तो कहत, मेरो बड़ो होत जात है ।।
आज और काल और दिन-दिन होत और ।
दौरयो दौरयो फिरत, खेलत और खात है ।।
बालपन बीत्यो, जब यौवन लाग्यो है ।
यौवनहु बीते बूढ़ो डोकरो दिखात है ।।
"सुन्दर" कहत, ऐसे देखत ही बूझिगयो ।
तेल घटी गए, जैसे दीपक बुझात है ।।
प्राणी जब से जन्म लेता है, तभी से उसकी उम्र घटने लगती है । माँ समझती है कि मेरा लाल बड़ा होता जाता है । दिन-दिन उसके रंग बदलते हैं । बचपन में खाता खेलता और भागा फिरता है । बचपन के बीतते ही जवानी आ जाती है और जवानी के बीतते ही बुढ़ापा आ जाता है और वह बूढा डोकरा सा दिखने लगता है । सुन्दरदास कहते हैं कि देखते-देखते जिस तरह तेल घट जाने से चिराग बुझ जाता है; उसी तरह वह बुझ जाता है; यानी मर जाता है ।
छप्पय
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ग्रस्यो जन्म को मृत्यु, जरा यौवन को ग्रास्यौ ।
ग्रसिवे को सन्तोष, लोभ यह प्रगट प्रकास्यो ।।
तैसहि समदृष्टि ग्रसित, बनिता बिलास वर ।
मत्सर गुण ग्रसिलेत, ग्रसत वन को भुजङ्गवर ।।
नृप ग्रसित किये इन दुर्जनन, कियौ चपलता धन ग्रसित ।
भर्तृहरि जी महाराज समझा रहे हैं कि संसार और संसार के सारे पदार्थ नाशवान और असार हैं । पाँच तत्त्वों से बनी हुई काया पाँच तत्त्वों में ही लीन हो जायेगी । जिस तरह समुद्र में बुदबुदे उठते और मिट जाते है, उसी तरह शरीर बनते और नष्ट हो जाते हैं । जिस तरह सांसारिक विषय-भोग तथा आयु अस्थिर और क्षणभंगुर हैं, उसी तरह जवानी भी क्षणभंगुर है । यह शरीर तभी तक सुंदर और मनोहर लगता है जब तक बुढ़ापा नहीं आता ।
श्रीमद्भगवद्गीता (18.38) में भी आता हैः
विषयेन्द्रियसंयोगाद्यतदग्रेऽमृतोपमम् ।
परिणामे विषमिव तत्सुखं राजसं स्मृतम् ।।
नश्वर संसार की असारता का दर्शन कराने वाली एवं परम सार अपने आत्मा-परमात्मा को पाने के पथ का मार्गदर्शन करने वाली पूज्य बापू जी की अमृतवाणी में आता हैः
पानी केरा बुलबुला. यह मानव की जात ।
उच्च कोटि का साधक जानता है कि
चातक मीन पतंग जब पिया बिन नहीं रह पाय ।
साध्य को पाये बिना साधक क्यों रह जाय ।।
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