हारीत गीता । भीष्मजी - युधिष्ठिर संवाद
महाभारत शान्तिपर्व के अन्तर्गत मोक्षधर्मपर्व में महाराज युधिष्ठिर भीष्म से पूछते है की तेजोमय लोकों की प्राप्ति तथा वह अनन्त परमात्मपद को कैसे प्राप्त करे। इसके लिये भीष्म ने युधिष्ठिर को सन्यासियो के कर्तव्य बताए है जो इस प्रकार है। सन्यासी को चाहिये कि सूने घर, वृक्ष की जड़, जंगल अथवा पर्वत की गुफा में अथवा अन्य किसी गुप्त स्थान में अज्ञात भाव से रहकर आत्म चिन्तन में ही लगा रहे। लोगों के अनुरोध या विरोध करने पर भी सदा समभाव से रहे, निश्चल एवं स्थिरचित्त हो जाय तथा अपने कर्मों द्वारा पुण्य एवं पाप का अनुसरण करे। सर्वदा तृप्त और संतुष्ट रहे। मुख और इन्द्रियों को प्रसन्न रखे। भय को पास न आने दे। प्रणव आदि का जप करता रहे तथा वैराग्य का आश्रय ले मौन रहे। भौतिक देह, इन्द्रिय आदि सभी वस्तुएँ नष्ट होने वाली हैं और प्राणियों के आवागमन-जन्म और मरण-बारंबार होते रहते हैं। यह सब देख और सोचकर जो सर्वत्र नि:स्पृह तथा समदर्शी हो गया है, पके (रोटी, भात आदि) और कच्चे (फल, मूल आदि) से जीवन-निर्वाह करता है, आत्मलाभ के लिये जो शान्तचित्त हो गया है तथा जो मिताहारी और जितेन्द्रिय है, वही वास्तव में संन्यासी कहलाने योग्य है। संन्यासी तपस्वी होकर वाणी, मन, क्रोध, हिंसा, उदर और उपस्थ - इनके वेगों को सहता हुआ इन्हें वश में रखे। दूसरों द्वारा की हुई निंदा उसके हृदय में कोई विकार न उत्पन्न करे। प्रशंसा और निन्दा - दोनों में समान भाव रखकर उदासीन ही रहना चाहिये। संन्यासाश्रम में इस प्रकार का आचरण परम पवित्र माना गया है। संन्यासी को महामनस्वी, सब प्रकार से जितेन्द्रिय, सब ओर से असंग, सौम्य, मठ और कुटिया से रहित तथा एकाग्रचित्त होना चाहिये। उसे अपने पूर्व आश्रम के परिचित स्थानों में नही विचरना चाहिये। वानप्रस्थों और गृहस्थों के साथ उसे कभी संसर्ग नहीं रखना चाहिये। अपनी रुचि प्रकट किये बिना ही जो वस्तु प्राप्त हो जाय, उसी को लेने की इच्छा रखनी चाहिये तथा अभीष्ट वस्तु के मिलने पर उसके मन में हर्ष का आवेश नहीं होना चाहिये। यह सन्यासाश्रम ज्ञानियों के लिये तो मोक्षरूप है, परंतु अज्ञानियों के लिये श्रमरूप ही है। हारीत मुनि ने विद्वानों के लिये इस सम्पूर्ण धर्म को मोक्ष का विमान बताया है। जो पुरुष सबको अभय-दान देकर घर से निकल जाता है, उसे तेजोमय लोकों की प्राप्ति होती है तथा वह अनन्त परमात्मपद को प्राप्त करने में समर्थ होता है। इस प्रकार श्रीहाभारत शान्तिपर्व के अन्तर्गत मोक्षधर्मपर्व में हारीत गीता विषयक दो सौ अठहतरवाँ अध्याय पूरा हुआ ।
।।हारीतगीता॥
गीता म्हणजे प्राचीन ऋषी मुनींनी रचलेली विश्व कल्याणकारी मार्गदर्शक तत्त्वे.
Gita has the essence of Hinduism, Hindu philosophy and a guide to peaceful life and ever lasting world peace.
२६९
य्
किं शीलः किं समाचारः किं विद्यः किं परायनः ।
प्राप्नोति ब्रह्मणः स्थानं यत्परं प्रकृतेर्ध्रुवम् ॥१॥
भी
मोक्षधर्मेषु निरतो लघ्वाहारो जितेन्द्रियः ।
प्राप्नोति परमं स्थानं यत्परं प्रकृतेर्ध्रुवम् ॥२॥
स्वगृहादभिनिःसृत्य लाभालाभे समो मुनिः ।
समुपोधेषु कामेषु निरपेक्षः परिव्रजेत् ॥३॥
न चक्षुषा न मनसा न वाचा दूसयेदपि ।
न प्रत्यक्षं परोक्षं वा दूसनं व्याहरेत्क्व चित् ॥४॥
न हिंस्यात्सर्वभूतानि मैत्रायण गतिश् चरेत् ।
नेदं जीवितमासाद्य वैरं कुर्वीत केन चित् ॥५॥
अतिवादांस्तितिक्षेत नाभिमन्येत्कथं चन ।
क्रोध्यमानः प्रियं ब्रूयादाक्रुष्टः कुशलं वदेत् ॥६॥
प्रदक्षिणं प्रसव्यं च ग्राममध्ये न चाचरेत् ।
भैक्ष चर्यामनापन्नो न गच्छेत्पूर्वकेतितः ॥७॥
अविकीर्णः सुगुप्तश्च न वाचा ह्यप्रियं वदेत् ।
मृदुः स्यादप्रतिक्रूरो विस्रब्धः स्यादरोषणः ॥८॥
विधूमे न्यस्तमुसले व्यङ्गारे भुक्तवज्जने ।
अतीते पात्रसञ्चारे भिक्षां लिप्सेत वै मुनिः ॥९॥
अनुयात्रिकमर्थस्य मात्रा लाभेष्वनादृतः ।
अलाभे न विहन्येत लाभश्चैनं न हर्षयेत् ॥१०॥
लाभं साधारणं नेच्छेन्न भुञ्जीताभिपूजितः ।
अभिपूजित लाभं हि जुगुप्सेतैव तादृशः ॥११॥
न चान्न दोषान्निन्देत न गुणानभिपूजयेत् ।
शयासने विविक्ते च नित्यमेवाभिपूजयेत् ॥१२॥
शून्यागरं वृक्षमूलमरण्यमथ वा गुहाम् ।
अज्ञातचर्यां गत्वान्यां ततोऽन्यत्रैव संविशेत् ॥१३॥
अनुरोध विरोधाभ्यां समः स्यादचलो ध्रुवः ।
सुकृतं दुष्कृतं चोभे नानुरुध्येत कर्मणि ॥१४॥
वाचो वेगं मनसः क्रोधवेगं
विवित्सा वेगमुदरोपस्थ वेगम् ।
एतान्वेगान्विनयेद्वै तपस्वी
निन्दा चास्य हृदयं नोपहन्यात् ॥१५॥
मध्यस्थ एव तिष्ठेत प्रशंसा निन्दयोः समः ।
एतत्पवित्रं परमं परिव्राजक आश्रमे ॥१६॥
महात्मा सुव्रतो दान्तः सर्वत्रैवानपाश्रितः ।
अपूर्व चारकः सौम्यो अनिकेतः समाहितः ॥१७॥
वान प्रस्थगृहस्थाभ्यां न संसृज्येत कर्हि चित् ।
अज्ञातलिप्सां लिप्सेत न चैनं हर्ष आविशेत् ॥१८॥
विजानतां मोक्ष एष श्रमः स्यादविजानताम् ।
मोक्षयानमिदं कृत्स्नं विदुषां हारितोऽब्रवीत् ॥१९॥
अभयं सर्वभूतेभ्यो दत्त्वा यः प्रव्रजेद्गृहात् ।
लोकास्तेजोमयास्तस्य तथानन्त्याय कल्पते ॥२०॥
॥ इति हारीतगीता समाप्ता ॥
Gita has the essence of Hinduism, Hindu philosophy and a guide to peaceful life and ever lasting world peace.
२६९
य्
किं शीलः किं समाचारः किं विद्यः किं परायनः ।
प्राप्नोति ब्रह्मणः स्थानं यत्परं प्रकृतेर्ध्रुवम् ॥१॥
भी
मोक्षधर्मेषु निरतो लघ्वाहारो जितेन्द्रियः ।
प्राप्नोति परमं स्थानं यत्परं प्रकृतेर्ध्रुवम् ॥२॥
स्वगृहादभिनिःसृत्य लाभालाभे समो मुनिः ।
समुपोधेषु कामेषु निरपेक्षः परिव्रजेत् ॥३॥
न चक्षुषा न मनसा न वाचा दूसयेदपि ।
न प्रत्यक्षं परोक्षं वा दूसनं व्याहरेत्क्व चित् ॥४॥
न हिंस्यात्सर्वभूतानि मैत्रायण गतिश् चरेत् ।
नेदं जीवितमासाद्य वैरं कुर्वीत केन चित् ॥५॥
अतिवादांस्तितिक्षेत नाभिमन्येत्कथं चन ।
क्रोध्यमानः प्रियं ब्रूयादाक्रुष्टः कुशलं वदेत् ॥६॥
प्रदक्षिणं प्रसव्यं च ग्राममध्ये न चाचरेत् ।
भैक्ष चर्यामनापन्नो न गच्छेत्पूर्वकेतितः ॥७॥
अविकीर्णः सुगुप्तश्च न वाचा ह्यप्रियं वदेत् ।
मृदुः स्यादप्रतिक्रूरो विस्रब्धः स्यादरोषणः ॥८॥
विधूमे न्यस्तमुसले व्यङ्गारे भुक्तवज्जने ।
अतीते पात्रसञ्चारे भिक्षां लिप्सेत वै मुनिः ॥९॥
अनुयात्रिकमर्थस्य मात्रा लाभेष्वनादृतः ।
अलाभे न विहन्येत लाभश्चैनं न हर्षयेत् ॥१०॥
लाभं साधारणं नेच्छेन्न भुञ्जीताभिपूजितः ।
अभिपूजित लाभं हि जुगुप्सेतैव तादृशः ॥११॥
न चान्न दोषान्निन्देत न गुणानभिपूजयेत् ।
शयासने विविक्ते च नित्यमेवाभिपूजयेत् ॥१२॥
शून्यागरं वृक्षमूलमरण्यमथ वा गुहाम् ।
अज्ञातचर्यां गत्वान्यां ततोऽन्यत्रैव संविशेत् ॥१३॥
अनुरोध विरोधाभ्यां समः स्यादचलो ध्रुवः ।
सुकृतं दुष्कृतं चोभे नानुरुध्येत कर्मणि ॥१४॥
वाचो वेगं मनसः क्रोधवेगं
विवित्सा वेगमुदरोपस्थ वेगम् ।
एतान्वेगान्विनयेद्वै तपस्वी
निन्दा चास्य हृदयं नोपहन्यात् ॥१५॥
मध्यस्थ एव तिष्ठेत प्रशंसा निन्दयोः समः ।
एतत्पवित्रं परमं परिव्राजक आश्रमे ॥१६॥
महात्मा सुव्रतो दान्तः सर्वत्रैवानपाश्रितः ।
अपूर्व चारकः सौम्यो अनिकेतः समाहितः ॥१७॥
वान प्रस्थगृहस्थाभ्यां न संसृज्येत कर्हि चित् ।
अज्ञातलिप्सां लिप्सेत न चैनं हर्ष आविशेत् ॥१८॥
विजानतां मोक्ष एष श्रमः स्यादविजानताम् ।
मोक्षयानमिदं कृत्स्नं विदुषां हारितोऽब्रवीत् ॥१९॥
अभयं सर्वभूतेभ्यो दत्त्वा यः प्रव्रजेद्गृहात् ।
लोकास्तेजोमयास्तस्य तथानन्त्याय कल्पते ॥२०॥
॥ इति हारीतगीता समाप्ता ॥
भीष्मजी कहते हैं-युधिष्ठिर!
संन्यासी को चाहिये कि वह मन और इन्द्रियोंको संयममें रखते हुए मुनिवृत्तिसे रहे। किसी वस्तुकी कामना न करे। अपने लिये मठ या कुटी न बनवाये।निरन्तर घूमता रहे और जहाँ सूर्यास्त हो वहीं ठहर जाय।प्रारब्धवश जो कुछ मिले, उसीसे जीवन-निर्वाह करे।
शान्तिपर्व
Bhishma ji says - Yudhishthira!
The ascetic should keep his mind and senses in abstinence, and remain in a mental state. Do not wish for anything. Do not build a monastery or a hut for yourself. Continue to roam continuously and stay where the sunset is. Do whatever you can with the help of your life.
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