हंस गीता
श्रीमद्भभागवत गीता के ग्यारहवें स्कन्द में भगवान कृष्ण द्वारा उद्धव को भक्ति मुक्ति का संदेश देते समय वर्णित हुई है । इसमें भगवान कृष्ण द्वारा उद्धव को भक्ति मुक्ति का संदेश देते समय वर्णित हुई है। इसमें भगवान के हंस अवतार द्वारा ब्रह्मा के मानस पुत्रो द्वारा योगी की पराकष्ठा अर्थात परमार्थ तत्व सम्बंधित जिज्ञासाओं को सांख्य योग और वेदांत द्वारा तत्व रहस्य को प्रस्तुत किया गया है।
भगवान कहते है- प्रिय उद्धव सत्व रज और तम ये तीनो बुद्धि प्रकृति के गुण है आत्मा के नही सत्व के द्वारा इन रज और तम पर विजय प्राप्त कर लेनी चाहिए तदन्तर सत्व गुण के शांत वृत्ति द्वारा उसकी
दया आदि वृत्तियो को शांत कर लेनी चाहिए। जब सत्व गुण की वृद्धि होती है तभी जीव को मेरे शक्ति
रूप स्वधर्म की प्राप्ति होती है। अतः उसे निरंतर सात्विक वस्तुओ का सेवन करने से ही सत्व गुण की वृद्धि होती है। तब मेरे भक्ति रूप स्वधर्म में प्रवृत्ति होने लगती है।
वह धर्म रजो और तमो गुणो को नष्ट कर देता है। जब ये दोनो नष्ट हो जाते है तब उनके कारण होने वाला अधर्म भी जल्द ही मिट जाता है। शास्त्र, जल ,
प्रजा, जन, देश, समय, कर्म, जन्म, ध्यान, मंत्र और
संस्कार ये दस वस्तुये अगर सात्विक हो तो सत्व गुण
की राजसिक हो तो रजो गुण की और तामसिक हो तो तमो गुण की वृद्धि करती है। इसमे शास्त्र यज्ञ
महात्मा जन जिनकी निन्दा करते है। वे तामसिक है और जिसकी उपेक्षा करते है वे वस्तुए राजसिक है।
जब तक अपने आत्मा का साक्षात्कार तथा सूक्ष्म, स्थूल शरीर और उनके कारण तीनो गुणो की निवृत्ति
न हो तब तक मनुष्य को चाहिए कि सत्व गुण की वृद्धि के लिए सात्विक शस्त्र आदि का ही सेवन करे
क्योकि इसमे धर्म की वृद्धि होती है और धर्म की वृद्धि से अन्तः करण शुद्व होकर आत्मा तत्व का ज्ञान होता है। जैसे वासो के रगङ से अग्नि उत्पन्न होती है और उनके सारे वनो को जलाकर शांत हो
जाती है। वैसे ये शरीर गुणो के वैषम्य से उत्पन्न हुआ है। विचार द्वारा मंथन करने पर इसमे ज्ञान की अग्नि
पैदा होती है और वो समस्त शरीर एवं गुणो को भस्म
करके स्वयं शांत हो जाती है।
उद्धव जी ने भगवान से पूछा की प्रायः सभी पुरुष जानते है कि विषय विपत्ति के घर है फिर भी वे कुत्ते, विल्लियो, गधे, बकरियो की तरह दुख भोकते हुए सहते रहते है। इसका क्या कारण है ?
भगवान कृष्ण ने कहा प्रिय उद्धव जीव जब अज्ञान वश अपने स्वरूप को भूलकर हृदय मे सूक्ष्म स्थूल आदि शरीर मे आत्म बुद्धि कर बैढता है। जो कि सर्वथा भ्रम ही है। तब उसका तत्व प्रधान मन घोर
रजो गुण की ओर झुक जाता है। उससे व्याप्त हो
जाता है। बस वहाँ रजो गुण की प्रधानता हुई कि उसमे संकल्पो विकल्पो का ताता बंध जाता है।
अब वह विषयो का चिन्तन करने लगता है और अपनी दुर्बुद्धि के कारण काम के फंदे मे फस जाता
है। जिससे फिर छुटकारा पाना बहुत कठिन हो जाता है। वही अज्ञानी काम वश अनेको प्रकार के
कर्म करने लगता है और इंद्रियो के वश हो जाता है। ये जानकर की इन कर्मो का फल दुख है उन्ही को करता है। उस समय वह रजो गुण के तीव्र वेग से अत्यंत मोहित रहता है। यद्यपि विवेकी पुरूष का चित्त भी कभी कभी रजो गुण और तमो गुण के वेग से वृक्षिप्त होता है। यद्यपि उसके विषयो मे दोष दृष्टि बनी रहती है। इसलिए वह बड़ी सावधानी से अपने चित्त को एकाग्र करने की चेष्टा करता रहता है। इससे उसके विषयो मे अशक्ति नही होती। साधक को चाहिए आसन और प्राण वायु पर विजय प्राप्त कर अपनी शक्ति और समय के अनुसार बढ़ी सावधानी से धीरे धीरे मुझमे अपना मन लगाए।
इसप्रकार करते समय अपनी असफलता देख कर
थोड़ा भी उबे नही बल्कि और उत्साह के साथ उसी
मे लगा रहे। मेरे शिष्य सनकादिक परम ऋषियो ने
योग का यही स्वरूप बनाया है कि साधक सब ओर
से अपने मन को खीचकर विराट आदि नही बल्कि साक्षात मुझमे ही पूर्ण रूप से लगा दे। उद्धव बोले
आपने जिस स्वरूप मे सनकादिक ऋषियो को ज्ञान दिया था मै उस स्वरूप को जानना चाहता हू। भगवान बोले प्रिय उद्धव सनकादिक ऋषि ब्रह्मा के
मानस पुत्र है। उन्होंने एक बार अपने पिता से योग
की सूक्ष्म अन्तिम सीमा के सम्बन्ध में इसप्रकार प्रश्न
किया था।
सनकादिक परम ऋषियो ने पूछा पिता जी जो गुणो
अर्थात विषयो मे घुसा रहता है और गुण भी चित्त के एक- एक वृत्ति मे प्रविष्ट रहते है। अर्थात चित्त और गुण आपस मे मिले जुले ही रहते है। ऐसी स्थितियो मे जो पुरुष इस संसार सागर से पार होकर मुक्ति पद प्राप्त करना चाहता है। वो इन दोनो को एक दुसरे से
अलग कैसे कर सकता है?
भगवान बोले प्रिय उद्धव यद्पि ब्रह्मा स्वयमभू सर्व प्राणियो के जन्म दाता है। लेकिन सनकादिक ऋषियो के इसप्रकार के प्रश्न करने पर वो ध्यान करने पर भी इस प्रश्न का मूल कारण नही समझ सके क्योकि उनकी बुद्धि कर्म प्रवण थी। तब उन्होंने भक्ति भाव से मेरा चिंतन किया तब मै हंस का रूप मे प्रगट हुआ। मुझे देखकर सनकादिक ब्रह्म जी को
आगे करके मेरे सामने आ गए और मेरे चरणो की वंदना करके मुझसे पूछा कि आप कौन है। वे परमार्थ तत्व के जिज्ञासु थे इसलिए उनके पूछने पर
मैने जो कहा उसे सुनो यदि परमार्थ रूप वस्तु ननत्व
से सर्वथा रहित है तब आत्मा के सम्बंध मे आप लोगो का ऐसा प्रश्न कैसे युक्ति संगत हो सकता है।
अथवा मै यदि उत्तर देने के लिये बोलू भी तो किस गुण जाति क्रिया सम्बन्ध आदि का आश्रय लेकर उत्तर दू। देवता, मनुष्य,पशु, पक्षी आदि का शरीर
पंच भुतात्मक होने के कारण अभिन्न है। ऐसी स्थिति मे आप कौन है? आप लोगो का यह प्रश्न ही वाणी का व्यवहार है। विचार पूर्वक नही है अतः नियर्थक है। मन से , वाणी से, दृष्टि से तथा अन्य इंद्रियो से जो कुछ ग्रहण किया जाता है। वह सब मै ही हू मुझसे भिन्न और कुछ नही है। यह सिद्धांत आप लोग तत्व विचार द्वारा समझ लीजिये। ये चित्त
चिंतन करते- करते विषय आकार हो जाता है। और विषय चित्त मे प्रविष्ट हो जाता है। ये बात सत्य है तथापि विषय और चित्त दोनो मेरे स्वारूप भूत जीव के देह है। उपाधि है। अर्थात आत्मा का चित्त और विषय के साथ कोई सम्बन्ध ही नही है। इसलिए बार-बार विषयो का चिंतन करने से जो चित्त विषयो
मे असक्त हो गया है और विषय भी चित्त मे प्रविष्ट हो
गए है। इन दोनो को अपने वास्तविक से अभिन्न मुझ
आत्मा का साक्षात्कार करके त्याग देना चाहिए।
जगृत स्वप्न और सुषुप्ति ये तीनो अवस्थाये सात्विक गुणो के अनुसार होती है और बुद्धि की वृत्तियाँ है।
सच्चिदानंद का स्वभाव नही। इन वृत्तियो का साक्षी होने के कारण जीव उनसे विलक्षण है। यह सिद्धांत
श्रुति युक्त और अनुभूति से युक्त है। क्योंकि बुद्धि वृत्तियो द्वारा होने वाला बंधन ही आत्मा मे त्रिगुण मयी वृत्तियो का दान करता है। इसलिए तीनो अवस्थावो से विलक्षण और उनमे अनुगत मुझमे तुरीय तत्व मे स्थित होकर इस बुद्धि का परित्याग कर दे। तब विषय और चित्त दोनो का त्याग हो जाता है। ये बंधन अहंकार की ही रचना है और यही आत्मा के परिपूर्णतम सत्य और अखण्ड ज्ञान और
परमानंद स्वरूप को छिपा देता है और अपने तीन अवस्थावो मे अनुगत तुरीय स्वरूप मे होकर संसार की चिंता को छोड़ दे जब तक मनुष्य के भिन्न भिन्न पदार्थो मे सतत्व बुद्धि, अहम बुद्धि और मम बुद्धि के द्वारा निवृत्ति नही हो जाती जब तक की अज्ञानी यद्पि जागता है तथापि सोया हुआ रहता है। जैसे स्वप्न अवस्था मे जान पड़ता है कि मै जाग रहा हू।
आत्मा से अन्य देह आदि प्रतीयमान नाम रूप देह
आदि का कोई अस्तित्व नही है। इसलिये उनके कारण होने वाले वर्णभेद स्वर्गादीय फल और उसके कारण भूत कर्म ये सब आत्मा के लिए वैसे ही मिथ्या है जैसे कि स्वप्न दर्शी पुरुष के द्वारा देखे गए सब पदार्थ जो जगृत अवस्थावो मे समस्त इंद्रियो के द्वारा बाहर दिखने वाले सम्पूर्ण क्षण भंगुर पदार्थो का अनुभव करता है और स्वप्न अवस्था मे हृदय मे ही जगृत मे देखे गए पदार्थो के समान ही वासना मय
विषयो का अनुभव करता है। वो एक ही है। जगृत अवस्था अवस्था के इंद्रिय स्वप्न अवस्था के मन सुसुप्ति की संस्कार वती बुद्धि का वही स्वामी है। जो मै सोया वही मै जाग रहा हू। इस स्मृति के बल से ही आत्मा का सभी अवस्थावो मे होना सिद्ध होता है। ऐसा विचार कर मन की तीनो अवस्थाये गुणो के द्वारा मेरी माया से मेरे अंश स्वरूप जीव मे कल्पित की गई है। और आत्मा मे ये नितांत असत्य है। ऐसा निश्चय करके तुम लोग सत पुरुषो द्वारा किये गए उपनिषदो के श्रवण और तीक्ष्ण ज्ञान खड़ग के द्वारा
सकल संशयो के आधार अहंकार का छेदन करके हृदय मे स्थित मुझ परमात्मा का भजन करो। यह जगत मन का विलास है । देखने पर भी नष्ट प्राय है। ये अलात चक्र लुकारियो की वीनेठी के समान अत्यन्त चंचल और भ्रम मात्र है। ऐसा समझे । ज्ञाता और ज्ञेय के अभेद से रहित एक ज्ञान रूपी आत्मा ही अनेक सा प्रतीत हो रहा है। ये स्थूल शरीर इंद्रिय और अंतः करण रूप तीन प्रकार का विकल्प गुणो के परिणाम की रचना है और स्वप्न के समान माया का खेल है। अज्ञान से कल्पित है। इसलिय उस देहादी रूप दिष्ट से हटा कर इच्छा रहित इंद्रियो के व्यापार से हीन और निरीह होकार आत्मानंद अनुभव मे मग्न हो जाये यद्यपी कभी कभी आहार आदि के समय ये देहादिक प्रपंच देखने मे आता है। तथापि ये पहले ही आत्म वस्तु के अतिरिक्त मिथ्या समझकर छोडा जा चुका है। इसलिय वह दोबारा भ्रांति मूलक मोह उत्पन्न करने मे समर्थ नही हो सकता देह पात के बाद केवल संस्कार मात्र उसकी प्रतिप्ती होती है। जैसे मदिरा पान किया हुआ मनुष्य यह नही देखता की मेरे द्वारा पाहना हुआ वस्त्र शरीर पर है या गिर चुका है । वैसे सिध्द पुरूष जिस शरीर से अपना साक्षात्कार किया है। वो प्रारब्ध वश खडा है अथवा गिर गया है। नाश्वर शरीर संबंधित इन बातो पर नजर नही डालता। प्राण और इंद्रियो के साथ ये शरीर भी प्रारब्ध के अधीन है। इसलिय अपने प्राथमिक कर्म जब तक है। उसकी प्रतीक्षा करता रहता है। परंतु आत्म वस्तु का साक्षात्कार करने वाला और समाधि प्रयन्त योग मे रहने वाला पुरुष, धन , पुत्र आदि प्रापंचो के रहित उस शरीर को कभी स्वीकार नही करता अपना नही मानता।
जैसे जगा हुआ मनुष्य स्वप्न अवस्था के शरीर को नही मानता। संकादिक परम ऋषीयो मैने जो कुछ तुमसे कहा वह संख्या और योग दोनो का गोपनीय रहस्य है। मै स्वयं तुम लोगो को तत्व ज्ञान का उपदेश
करने के लिये आया हू। ऐसा समझो । मै योग, सांख्य, सत्य, तेज, शय,कीर्ति, और दम इन सबका
परम गति परम अधिसठन हू। मै समस्त गुणो से रहित, किसीं पर अपेक्षा नही रखता फिर भी साम्य, असंगत आदि सभी गुण मेरा ही सेवा करते है। मेरे मे ही प्रतिष्ठित है। क्योकि मै सबका हितैसी, प्रियतम और आत्मा हू। सच पुछो उनका गुण कहना ठीक नही है। क्योकि वे सत्व गुणो का परिणाम नही है। और अनित्य है। प्रिय उद्धव इसप्रकार मैने संकदिक मुनियो के संशय मिटा दिये। फिर वे परम भक्ती से मेरी पूजा की और मेरी महिमा का गान किया। तब मैने ब्रह्म जी के सामने अदृश्य होकार अपने धाम मे वापस आ गया।
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