तत्व बोध-मोक्ष के साधन

मोक्ष साधन ज्ञान के देने वाले योगियो मे श्रेष्ठ वासुदेव योगीराज गुरू को प्रणाम करके मोक्ष पद की चाह करने वाले मनुष्यवो के हित मे तत्व बोध का कथन करता हू। मोक्ष पद की प्राप्ति के चार प्रकार के उपायो को साधने वाले अधिकारी जनो के लिए जो मोक्ष मे साधन उन तत्वो के विचार को कहता हू। जगत का उपादन कारण सत, चित, आनंद स्वरूप परमेश्वर है। वही माया के 
आवेश से जीव अवस्था को प्राप्त होता है और पृथ्वी, जल, तेज, वायु और आकाश मे अपना रूप देखता है। तत्व के बोध से वह पंच महाभूतो से अपने आप को अलग समझता है। इस प्रकार तत्व बोध का कथन करना अति आवश्यक है। मोक्ष के 4 साधन कौन से है। नित्य पदार्थ और अनित्य पदार्थ का भिन्न ज्ञान। इस लोक और परलोक के पदार्थ और उनसे होने वाले फलो मे वैराग्य। शम, दम, तीतीक्षा, उपरति, श्रद्धा और समाधान 6 पदार्थो का सम्पादन और मोक्ष पदार्थ की इच्छा यही चारो साधन है। नित्य और अनित्य पदार्थ का विवेक किसे कहते है। नित्य पदार्थ केवल ब्रह्म है। उसको छोडकर जितने पदार्थ है सब अनित्य मिथ्या और असत्य है। इसी ज्ञान को नित्य अनित्य वस्तु विवेक कहते है।
विराग किसे कहते है। इस लोक तथा परलोक के सुख भोग की इच्छा का त्याग करना अर्थात इस लोक तथा परलोक के सुख भोग की वासना को हटा देना इसे      विराग कहते है।
शम आदि साधनो की सम्पत्ति का क्या अर्थ है। शम, दम, उपरति, तितिक्षा, श्रद्धा और समाधान इन 6 साधनो का होना शम साधन सम्पत्ति कहलाता है। शम (शांती) ,दम (इद्रियो का रोकना ) (उपरति कर्तव्यो का अनुष्ठान) तितिक्षा(शीत आदि का सहना), श्रद्धा (गुरु आदि के वाक्यो मे विश्वास) समाधान ( चित्त की एकाग्रता) ये ही 6 साधन है। शम किसे कहते है। मन के निग्रह को शम कहते है। दम का क्या अर्थ है। नेत्र, कर्ण, जीव्हा, नाक आदि बाहरी इंद्रियो को रोकने को दम कहते है। उपरम किसे कहते है। अपने ही निज धर्म का अनुष्ठान करना अर्थात शब्द आदि विषयो से इंद्रियो को रोककर उन सब को लौकिक विचारो से हटाकर केवल आत्म विचार मे तत्पर रहना इसे उपरम कहते है। तितिक्षा किसे कहते है। शीत, उष्ण, सुख,दुःख, मान, अपमान आदि को धैर्य से सह लेना इसे तितिक्षा कहते है। श्रद्धा कौन सी वस्तु का नाम है। गुरु के वाक्यो तथा वेदांत के वाक्यो को विश्वास पूर्वक समझना श्रद्धा कहलाती है।
समाधान का क्या आशय है। चित्त की एकाग्रता को अर्थात गुरु अधिकारो को बताना ही समाधान कहलाता है। इन्हे ही 6 साधन कहते है। मुमुक्ष क्या है। मेरा मोक्ष होय ऐसी इच्छा का होना अर्थात मुझसे किसी सांसारिक दुख न हो इस इच्छा वाले को मुमुक्षु कहते है। ये चारो मोक्ष के साधन है। इनको साधना के बाद तत्व विवेक के अधिकारी होते है। अर्थात इन चारो की साधना से वह तत्व ज्ञान होता है।जो पांचो महाभूतो से आत्मा को भिन्न सिद्ध कर देता है। इसी को तत्व विवेक कहते है। आत्मा किसे कहते है। स्थूल शरीर, सूक्ष्म शरीर और कारण शरीर से अनम्य आदि पांच कोशो से दूर स्वप्न, जगृत, शुशुप्ति, स्वप्न अवस्थावो का साक्षी होकर जो सत,चित्त, आनन्द रहता है। उसे आत्मा कहते है। अर्थात आत्मा वह है। जो स्थूल, सूक्ष्म और कारण शरीर से अलग है। जो अनम्य, प्राणमय आदि पाँच कोशो से दूर है। जो जगृत,स्वप्न, शुशुप्ति का साक्षी है और सत,चित्त,आनंद स्वारूप है। स्थूल शरीर किसे कहते है। पंचीकृत पृथ्वी, जल, तेज, वायु पाँच महाभूतो आदि पाँच महाभूतो से किया गया कर्मो द्वारा उत्पन्न सुख दुःख भोगने का प्रधान आश्रय, नाश होने वाला और स्थिति, उत्पत्ति, घटना, बढना, नाश रूप 6 विकार वाला स्थूल शरीर कहलाता है। तातपर्य यह है कि पृथ्वी तत्वो से पंचीकृत भूतो से यह शरीर उत्पन्न हुआ है। महाभूतो का पंचीकृत का यह प्रकार है की प्रथम आकार को दो भागो मे बाँट कर एक भाग को अलग रख देना फिर दूसरे भाग को चार भागो मे बाट कर अलग रखे हुये आधे भाग को किसी प्रकार बांटे गये वायु के भागो मे मिला देना। इसी भांति वायु का विभाग करके उसे तेज भाग मे मिला देना। तेज भाग को बांट कर जल भाग मे मिला देना। जल को बाँट कर पृथ्वी मे मिला देना। इन्ही भागो के मिलाव को पंचीकरण कहते है। इसी पंचीकरण अवस्था का नाम स्थूल शरीर है। तत्पश्चात पृथ्वी आदि भूतो के भागो को अलग- अलग करके अपने कारण महाभूतो मे लीन कर देते है।तब स्थूल शरीर का नाश हो जाता है। स्थूल शरीर के सहायक उपादान कारण शुभ और अशुभ कर्म है। इन कर्मो से सुख दुःख का भोग उत्पन्न होता है। स्थूल शरीर इसका भोग करता है। इस स्थूल शरीर की 6 अवस्थाये होती है।
प्रथम अवस्था अस्ति है। इसका अर्थ सत्ता है। द्वितीय अवस्था जनन अर्थात उत्पन्न होना है।तृतीय अवस्था वर्धन अर्थात बढ़ना-घटना है। चतुर्थ अवस्था विपरिगाम अर्थात क्रम से बढ़ना है। पंचम अवस्था अपक्षय अर्थात वृद्धि होने पर शरीर शिथिल हो जाना। छठवी अवस्था नाश अर्थात शरीर पाद्य होना। इसी को स्थूल शरीर कहते है। सूक्ष्म शरीर किसे कहते है। पंचीकृत पृथ्वी  आदि पांचो महाभूतो से बना कर्मो से उत्पन्न सुख दुःख भोगने का साधन पांच ज्ञानेद्रियो के पांच कर्म इद्रियो पांच प्राणो के एक मन के और एक बुद्धि के इस भांति 17 कलाओ के साथ जो रहता है। वह सूक्ष्म शरीर कहलाता है। अर्थात सूक्ष्म शरीर मे पंच महाभूतो के 25 भाग नही होते कर्म इसका सहायक है। वह सुख दुख भोगने वाला है। इसमे नेत्र, कर्ण, श्रवण ,नासिका, और स्पर्श इंद्रिया रहती है। वाक, गुदा, पाद, हस्त और उपस्थ भी रहते है। प्राण, व्यान, उदान, अपान आदि प्राण भी रहते है। मन भी रहता है और बुद्धि भी रहती है। इन्ही 17 कला वाले शरीर को सूक्ष्म शरीर कहते है। श्रोत, वाक, चतु, नेत्र, नाक, कान ये पांच इंद्रिया है। श्रोत इंद्रिय के देवता दिशा, वाक इंद्रियो के देवता वायु है। देखने वाली इंद्रिय के देवता सूर्य है। श्वासन इंद्रिय के देवता वरूण है। घ्राण इंद्रियो के देवता इंद्र कुमार है। गुदा, लिंग, पैर कर्म इंद्रिया है। कारण शरीर किसे कहते है ? आनिर्वाच्च, अविद्या रूप जो स्थूल और सूक्ष्म शरीर का केवल कारण है। जो सत स्वरूप अज्ञान है। जिसमे किसी विशेषता का ज्ञान नही होता उसे कारण शरीर कहते है। अतः कह सकते है मायाकार शरीर है। माया अनिर्वचनीय है अर्थात उसका स्पष्ट अर्थ नही हो सकता न तो उसे सत कह सकते है। क्योंकि ब्रह्म ज्ञान होने पर उसका नाश हो जाता है। न उसे मिथ्या कह सकते है। फिर तो उससे जगत की उत्पत्ति भी नही होती। यही माया स्थूल शरीर और सूक्ष्म शरीर का कारण है। इसे सत स्वारूप अज्ञान कहते है। उसमे किसी प्रकार का सम्बंध नही होता। यही कारण शरीर है। अर्थात माया ही कारण शरीर है।
अवस्था तीन प्रकार की है। जगृत, स्वप्न शुशुप्ति अवस्था
जगृत अवस्था- श्रोत, नेत्र, रसना और घ्राण इद्रिय से जब स्पर्श, शब्द, रूप, रंग का ज्ञान होता है। उसे जगृत अवस्था कहते है।
स्थूल शरीर मेरा है यह अभिमान करने वाला आत्मा विश्व कहलाता है। यद्धपि स्थूल शरीर अभिमानी आत्मा अपनी अवस्था से भिन्न ही है। क्योंकि वह नित्य है जबकि अवस्था और स्थूल मिथ्या फिर भी शरीर का अभिमान करने से आत्मा का नाम विश्व पड़ जाता है।
स्वप्न अवस्था- जागते हुये जो कुछ दिखता है। वह जो कुछ जाना जाता है। उससे आत्मा मे एक प्रकार की वासना उत्पन्न हो जाती है। निंद्रा लग जाने से इसी वासना के प्रभाव से जो संसार दिखाई देता है। वही स्वप्न अवस्था है। उसी को कोई सूक्ष्म शरीर के अभिमान करने वाले प्रकाश मान भोक्ता और साक्षी आत्मा का तेजस कहते है। सुसुप्ति अवस्था किसे कहते है। मै कुछ नही जानता मैने सुख से निंद्रा की यह ज्ञान जिस अवस्था मे होता है। वह अवस्था सुसुप्ति अवस्था कहते है। अतः कह सकते यह है कि सुसुप्ति अवस्था मे निंद्रा के सिवाय किसी पदार्थ का ज्ञान नही रहता तब भी आत्मा का प्रकाश बना रहता है इससे सुसुप्ति के बाद कहता है की मै सुख से सोया मुझे कुछ जान पड़ता था किंतु निद्रा के वेग से वह स्पष्ट किसी वस्तु का ज्ञान नही कर सकता था। सुसुप्ति के बाद फिर पूर्व ज्ञान लौट आता है। इससे समय विशेष ज्ञान न हो केवल ज्ञान ही हो उस समय को सुसुप्ति अवस्था कहते है। इस अवस्था को कारण शरीर और आनंदमय कोष कहते है। कारण शरीर के अभिमानी आत्मा को प्राज्ञ अर्थात इंद्रियो के सहायक के बिना ही स्वप्न कथा से इंद्रीयओ के बिना ही स्वप्न कथा से वासना रूप विषयो को भोगने वाला आत्मा कहते है। पांच कोष कौन से है।
1. अन्न मय कोष
2. प्राणमय कोष
3. मनोमय कोष
4. विज्ञानमय कोष
5. विज्ञानमय कोष
कोष शब्द का अर्थ है अच्छादन करना। ये पांचो आत्मा का अच्छादन करने वाले है। इसलिए कोष कहलाते है।
अन्यमय कोष किसे कहते है। अन्य के रस से ही जो उत्पन्न होता है अन्य के रस मे ही जो बढ़ता है। अन्यमय रूप पृथ्वी मे जो लीन हो जाता है उसे अन्यमय कोश अर्थात स्थूल शरीर कहते है।
प्राणमय कोश किसे कहते है। प्राण, अपान, उदान, व्यान, समान और उद रूप पांचो प्राण रूप वायु समूह को और वाक, पाद, प्राणी, उपस्थ रूप पांचो कर्मेंद्रियो को प्राण मय कोश कहते है। इसका दूसरा नाम क्रिया शक्ति है। क्योंकि इसके सहारे ही शरीर की सारी क्रियाए होती है। उसे मनोमय कोश कहते है। इसे इच्छा शक्ति कहते है। इसकी सहायता से आत्मा मे इच्छा उत्पन्न होती है। तातपर्य यह है कि मन का स्वारूप ही कल्प विकल्प वाला है और संकल्प विकल्प का इच्छा रूप है। इसलिए आत्मा मे इच्छा का होना मनोमय कोश की सहायता से होता है। विज्ञान मय कोश किसे कहते है। बुद्धि ,वाक, नेत्र, जीवह और घ्राण रूप पांचो ज्ञानेद्रियो से मिलने से जो प्रकाश उत्पन्न होता है। उसे ज्ञानमय कोश कहते है। इसका दूसरा नाम ज्ञान शक्ति है। क्योंकि बुद्धि एक पांचो ज्ञानेद्रियो की सहायता से आत्मा को सब पदार्थो का ज्ञान होता है। आनंदमय कोष किसे कहते है। इसी भांति करण शरीर रूप अविद्या मे रहने वाला रज और तम गुण के संयोग से मिलन और प्रिय तथा मोद आदि वित्तियो वाला जो कोश है। उसे आनंद कोष कहते है।
इस कोश को आनन्द मय कोश नाम इसी से हुआ कि इससे प्रिय और इष्ट पदार्थ की प्राप्ति से मुदित और सुखित होता है। तो आनंद की मात्रा अधिक मालूम पड़ती है। बस यही कारण है कि इसे आनन्द मय कोश अर्थात अधिक आनंद वाली अवस्था कहते है। पहले कहे हुये पांचो कोश पंच कोश कहे जाते है। आत्मा स्वयं मेरा शरीर, मेरा प्राण, मेरी बुद्धि और मेरा ज्ञान यह जानता है। यही ज्ञान आत्मा को शरीर से भिन्न करता है। जैसे मेरा गृह, मेरा कंगन यह ज्ञान ज्ञाता को भिन्न करता है। न की वे स्वयं ज्ञाता बन जाते है। वैसे ही मेरा शरीर इत्यादि ज्ञान भी अपने को ज्ञाता से भिन्न सिद्ध करते है। यह सिद्धि मम शब्द के प्रभाव से होती है। कोई भी कदापि एकत्व होने पर मेरा शब्द नही कहता। जहां अलग रहकर अपना सम्बंध जानना चाहता है। वही मेरा शब्द बोला जाता है। मेरी पुस्तक, मेरी लेखनी इत्यादि शब्दो का अर्थ यही है कि लेखनी मुझसे भिन्न नही है। परन्तु मेरा इसका स्वामीपन का सम्बंध है। मम शब्द के उच्चारण करने वाले के सम्बन्धी समझे जाते है। वैसे ही मेरे पांचो कोश किस प्रकार से ज्ञाता से सम्बन्ध वाले पंचकोश आत्मा उनसे भिन्न है। उसका साक्षी है और  पांचकोश उन माया के खिलवाड़ है। यह सिद्ध हो गई तब आत्मा किसे कहते है। जो सत्य रूप पित्त रूप और आनंद रूप है उसे आत्मा कहते है।
सत रूप किसे कहते है। भूत, भविष्य, और वर्तमान काल मे जो विगड़ता नही किंतु सदा एक रूप रहता है। उसे सत कहते है। चित शब्द का क्या अर्थ है। जो ज्ञान स्वारूप है। उसे चित कहते है। चित का अर्थ है प्रकाश और प्रकाश ज्ञान मे रहता है। इसलिये ज्ञान स्वारूप जो सबका अनुभव करने वाला है। वही चित्त शब्द का अर्थ है। आनंद शब्द का क्या अर्थ है? जो कभी दुख से छुपा नही जाता वही परमानंद स्वारूप है। और उसे ही दूसरे शब्द मे सुख रूप कहते है। इस भाँति आत्मा को सत रूप, चित्त रूप और आनंद रूप जाने तात्पर्य यह है कि आत्मा को नित्य ज्ञान स्वारूप समझकर जगत को मिथ्या समझे। जब मै माया से उत्पन्न होने वाले 24 तत्वो की उत्पत्ति के उपायओ को कहता हूँ।
सत्व गुण, रजो गुण और तमो गुण वाली और परमब्रह्म के आधार पर रहने वाली माया है। अर्थात जब सत रज तम गुण की अधिकता और न्यूनता नही जान पड़ती किन्तु केवल समानता मालूम पड़ती है। इसी का नाम माया है। संख्या मत वाले इसे मूल प्रकृति प्रधान स्वाभाव से प्रगट करते है। इसी माया के सहायक ब्रह्म के प्रभाव से आकाश उत्पन्न होता है। आकाश से वायु उत्पन्न होता है। वायु से तेज, तेज से जल, जल से पृथ्वी उत्पन्न होता है। अर्थात माया एक शक्ति है। जिसमे शक्ति ब्रह्म से परमात्मा मे एक प्रकार की कर्ता जान पड़ती है। वह कत्रियता का सम्बंध भ्रम से जान पड़ती है। इससे प्रथम आकाश उत्पन्न होता है। आकाश एक पीला पदार्थ है। इसमे वायु उत्पन्न होती है। वायु और आकाश की रगड़ से तेजस उत्पन्न होता है। जो अग्नि रूप है। अग्नि की ऊष्मा से वायु रूप जल उत्पन्न होती है। जल की परस्पर रगड़ से पृथ्वी उत्पन्न होती है। इन पांचो तत्वो से आकार के सत गुण भाग से कान इद्रिय उत्पन्न हुई है। वायु से स्पर्श इंद्रिय हुई है। अग्नि के सतगुण भाग से नेत्र इन्द्रिय उत्पन्न हुई है। जल के सत गुण भाग से जीवह इंद्रिय उत्पन्न हुई है। इन आकाश और पांचो तत्वो से मिले हुये तत्व के गुण के भाग से मन,बुद्धि,अहंकार और चित्त रूप चार अन्तःकरण उत्पन्न हुये है। चार प्रकार के अन्तःकरण मे मन उसे कहते है। जिससे यह काम करू ऐसा संदेश उत्पन्न होता है। उसे बुद्धि कहते है। यह कार्य किया यह अहंकार रूप ज्ञान जिससे उत्पन्न होता उसे अहंकार कहते है। सम्पूर्ण पदार्थ जिससे चिंता और विचार होता है। उसे चित्त कहते है। यद्यपि अन्तःकरण एक ही है तो भी संकल्प, निश्चय, अहंकार और चिन्तन रूप कार्य के भिन्न होने से चार प्रकार का कहा जाता है। मन के देवता चंद्रमा है। बुद्धि के देवता ब्रह्मा है। अहंकार के देवता रूद्र, चित्त के देवता विष्णु है। इन पांचो तत्वो के मध्य मे से अकाश के रजो गुण के भाग से वाणी इंद्रिय उत्पन्न हुई है। वायु के रजो गुण भाग से पाणि (हाथ) इंद्रिय उत्पन्न हुई है। अग्नि के रजो गुण भाग से पाद(पैर) इंद्रिय उत्पन्न हुई है। जल के रजो गुण भाग से उपस्थ(पुरूष) इद्रिय उत्पन्न हुई है। पृथ्वी के रजो गुण भाग से गुदा इंद्रिय उत्पन्न हुई है। इन आकाश आदि पांच भूतो के मिले हुए रजो गुण के भाग से प्राण, अपान, व्यान, समान, उदान नाम के पांच प्राण उत्पन्न हुये है। आकाश आदि पाँच महाभूतो के तमो गुण के भाग से पंचीकृत किये गए पांच तत्व उत्पन्न होते है। इस भांति 24 तत्वो की उतपति होती है। इसमे आकाश आदि पाँच महाभूतो के सत्व गुण के भाग से पाँच ज्ञानेंद्रिया और 4 अग्रकरण उत्पन्न होते है। सब के योग से 9 तत्व होते है। इसीप्रकार आकाश आदि के 5 के रजोगुण के भाग से 5 कर्म इंद्रिया और 5 प्राण उत्पन्न है। इसे जोड़ने से 10 तत्व हुये इसी भांति पांचो भूतो के तमो गुण के भाग 5 पंचीकृत तत्व उत्पन्न हुये है। अब सब की संख्या जोड़ने से 24 हो जाती है।

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