अपरोक्षानुभूति - आत्म बोध के लिए



  उन परमानन्द स्वरूप, उपदेष्टा, ईश्वर, व्यापक और समस्त लोको के कारण श्री हरि को मै नमस्कार करता हू।                                                                        I bow down to him -to Sri Hari(the destroyer of ignorance) the supreme Blish, the first teacher, Iswara, the all perading one and cause of all Lokas(the universe)

1. अपरोक्षानुभूति मोक्ष सिद्धि के लिये कही जाती है। सत्पुरुषो को इसे प्रयत्न पूर्वक बार -बार विचारना चाहिये।

               
 2. अपने वर्ण आश्रम, धर्म तपस्या द्वारा श्री हरि को प्रसन्न करने से मनुष्य को वैराग्य आदि साधन चतुष्टय की प्राप्ति होती है।                                                        3. ब्रह्म से लेकर स्थावर प्रयन्त सभी विषयो मे जो काक विष्ठा के समान वैराग्य होना है। वही निर्मल वैराग्य है।     4. आत्मा का स्वारूप नित्य है और दृश्य उसके विपरीत अनित्य है। ऐसा जो दृश्य निश्चित है। वही आत्म वस्तु का विवेक है।                                                              5. वासनावो का सर्वथा त्याग करना शम कहलाता है और बाहरी वित्तियो का रोकना दम कहा जाता है।          6. विषयो से विमुख होना ही परम् उपरति है। सम्पूर्ण दुखो का सहन करना तितीक्षा मानी गई है।।                  7. शास्त्र और आचार्य के वाक्यो मे विश्वास रखना श्रद्धा है और अपने वास्तविक लक्ष्य मे चित्त की एकाग्रता ही समाधान कहलाता है।                                              8. प्रभु मेरी संसार बंधन से कब मुक्ति होगी ऐसी जो दृढ़ बुद्धि है उसी को मुमुक्षा कहना चाहिए।।                       9. उपरियुक्त साधनो से युक्त अपने शुभ की इच्छा वाले पुरूष को ही ज्ञान प्राप्ति के लिये विचार करना चाहिए।  10. क्योंकि जिस प्रकार प्रकाश के बिना कभी पदार्थ का ज्ञान नही होता उसी प्रकार बिना विचार के किसी साधन से ज्ञान नही हो सकता।                                            11. मै कौन हूँ ? ये जगत किस प्रकार उत्पन्न हुआ ? इसका कर्ता कौन है ? और इसका उपादान कारण क्या है ? वह विचार इस प्रकार का होता है।                       12. मै भूतो का संघात रूप देह नही हू। न इंद्रिय समूह ही हू बल्कि इससे भिन्न कोई हू। वह विचार इस प्रकार का होता है।                                                          13. सम्पूर्ण प्रपंच अज्ञान जन्य है। ये ज्ञान होने पर लीन हो जाता है। नाना प्रकार का संकल्प इसका कर्ता है। वह विचार इस प्रकार का होता है। जैसे घट आदि का उपादान कारण मिटिका है वैसे ही यह अज्ञान और संकल्प दोनो का उपादान एक सूक्ष्म अविनाशी सत है। वह विचार इस प्रकार का है।।                                    14. मै जो कि एक सूक्ष्म, ज्ञाता, साक्षी , सत अविनासी है। वही हू इसमे संदेह नही है। वह विचार इस प्रकार का होता है।।                                                               15. आत्मा कला हीन अर्थात घटक हीन है और एक है तथा देह अनेक तत्वो से गठित है। इन दोनो की जो एकता देखते है इससे बढ़कर क्या अज्ञान होगा।।           16. आत्मा नियामक और अंतरवर्ती है तथा देह बाहर और नियमय है। इन दोनो की जो एकता देखते है। इससे बढ़कर क्या अज्ञान होगा।।                                        17. आत्मा ज्ञान स्वारूप और पवित्र है तथा देह मास मय और अपवित्र है। इन दोनो की जो एकता देखते है। इससे बढकर क्या अज्ञान होगा।                                 18. आत्मा सबका प्रकाश और निर्मल है तथा देह तमोमय कहा जाता है। इन दोनो की जो एकता देखते है। इससे बढकर क्या अज्ञान होगा।।                                19. आत्मा नित्य और सत स्वरूप है तथा देह अनित्य और असत्य है। इन दोनो मे जो एकता देखते है। इससे बढ़कर क्या अज्ञान होगा।।                                        20. पदार्थ मे जो प्रदीप्ति होती है उसमे आत्मा का ही प्रकाशत्व है। किंतु आत्मा ज्योति अग्नि आदि की ज्योति के समान नही है। क्योंकि उनके अभाव मे रात्रि के समय अंधकार हो जाता है। परन्तु आत्म ज्योति का कभी अभाव नही होता।।                                                  21. घट दृष्टा के समान सर्वथा ये जानते हुये भी कि ये मेरा है अहो मढ़ पुरूष मै देह हू ऐसा मानता रहता है।      22. मै शांत शम और सच्चिदानंद स्वारूप ब्रह्म ही हू असत्य स्वारूप देह मै नही हू। इसी को बुध्द जन ज्ञान कहते है।                                                               23. मै निर्विकार, निराकार, निर्मल और अविनाशी असत्य स्वारूप देह मै नही हू इसी को बुद्ध जन ज्ञान कहते है।।                                                              24. मै दुखहीन, अभासहीन, विकल्पहीन और व्यापक हू। असत पुरूष देह मै नही हू। इसी को बुद्ध जन ज्ञान कहते है।                                                               25. मै निर्गुण, निष्क्रिय, नित्य मुक्त, अच्चूत्य हू। असत्य स्वारूप मै देह नही हू। इसी को बुद्ध जन ज्ञान कहते है।   26. मै निर्मल, अनंत,  अजर, अमर , निश्चल हूँ। इसी को बुद्ध जन ज्ञान कहते है।

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