यम गीता । यम के दूत किन मनुष्यों से दूर रहते है?
यम गीता
इसमे बताया गया है कि यम के दूत किन मनुष्यो से सदा
दूर रहते है। रही स्वयं यमराज द्वारा अपने दूतो को बताया गया है। सच्चे भक्तो के लक्षण बताने के उपक्रम में जो सदाचार के विषय चर्चा इसमे की गई है। वह प्रभावी होने के साथ-साथ भगवान के किसी स्वारूप के उपासक के लिये सहज ग्राहय हो सकती है। यम दूत यमराज से बोले आप सातो द्वीप सातो लोक जो इस ब्रह्माण्ड के अंतर्गत है उसमे सुक्ष्म, अति सूक्ष्म जीवो से भरे है। एक अंगुल का आठवां भाग ऐसा नही है जहाँ कर्म बंधन से बंधा जीव न रहता हो। किंतु आयु समाप्त होने पर सभी यमराज के वशीभूत हो जाते है। उन्ही के
आदेशानुसार नरक आदि अनेको यातनायें भोगते है।
और पाप समाप्त होने पर देवादि योनियो में घूमते रहते है। सकल शस्त्रो मे यही मत है।
विष्णु में समाहित यम गीता में महात्मा नकुल द्वारा पूछे गए। इसमें नकुल भीष्म से पूछते है किन कर्मो को करके मनुष्य यम के वशीभूत नही होता। मै आपसे यही सुनना चाहता हूं। इसके उत्तर में भीष्म ने जो कहा उसे सुनो।
भीष्म ने कहा हे वत्स पूर्व काल मे मेरे पास कलिंग देशीय ब्राह्मण आया और मेरे पूछने पर उसने यम और
और यमदूतो के बीच जो संवाद हुआ था वो अति गूढ़ रहस्य मुझे सुनाया था वही कहता हूं। कलिंग बोला अपने अनुचर के हाथ मे पाश लिए देखकर यमराज ने उसके कान में भगवान मधुसूदन के शरणागत व्यक्तियो को छोड़ देना। जो विष्णु भक्त नही है ऐसे अन्य व्यक्तियो का
मै स्वामी हु। देव पूज्य विधाता ने मुझे यम नाम लोको के
पाप पुण्य विचार करने के लिये नियुक्त किया है। मै अपने गुरु श्री हरि के वशीभूत हु। स्वतंत्रता नही हु । भगवान विष्णु मेरा नियंत्रण करने में समर्थ है। जिस प्रकार स्वर्ण भेद रहित होता हुआ भी मुकुट,कटक, कर्णिका भेद से नाना रूपो मे प्रतीत होता है। इस प्रकार एक हरि का देवता ,पुरूष, पशु आदि नाना विद कल्पनाओ से निर्देश किया जाता है। जिस प्रकार वायु के
शांत होने पर उसमे उड़ते परमाणु पृथ्वी से मिलकर एक हो जाते है। उसी प्रकार सभी देवता मनुष्य पशु का अंत होने पर उस परमात्मा में लीन हो जाते है। जो भगवान के कमल रूपी चरण कमलो की परमार्थ बुद्धि से वंदना करते है। वह अग्नि के समान सभी पाप बंधनो से मुक्त हुए उस पुरूष को तुम छोड़कर निकल जाना। इस बात को सुनकर यमदूत ने पूछा प्रभु सबके विधाता भगवान हरि का भक्त कैसा होता है? यह आप मुझसे कहिये। जो पुरुष अपने वर्ण धर्म से विचलित नही होता। अपने मित्र और शत्रु से समान भाव रखता है और न बल पूर्वक किसी का धन भड़कता है। न ही हिंसा करता है। उस निर्मल चित्त व्यक्ति को भगवान विष्णु का भक्त जानो।
जिसका मन काल मे मलिन नही हुआ। जिसने अपने हृदय मे सर्वदा हरि को बसाया हुआ है। उन मनुष्य को भगवान का अतीव भक्त समझो। जो एकांत मे पडे हुये दूसरे के सोने को देखकर भी उसे अपनी बुद्धि द्वारा तिनके के समान समझता है और निरंतर भगवान का अनन्य भाव से चिन्तन करता है। उस नर श्रेष्ट को विष्णु का भक्त जानो। जो व्यक्ति निर्मल चित्त मात्सर्य रहित प्रशांत शुध्द चरित, समस्त जीवो का हितैसी, प्रिय तथा अभिमान और माया से रहित होता है। उसके हृदय मे भगवान वसुदेव सदा विरजमान रहते है। उनके विरजमान होने पर पुरूष इस जगत के लिये शांत स्वरूप हो जाता है। जिस प्रकार नवीन शाल वृक्ष अपने सौदर्य से ही भीतर भरे अति सुंदर पार्थिव रस को बता देता है।
ये दूत जिनकी यम नियम के द्वारा जिनकी पाप राशि दूर हो गई है। जिनका हृदय निरंतर श्री हरि मे असक्त रहता है तथा जिनमे गर्व, अभिमान मात्सर्य का लेस नही रहता । उन मनुष्य को दूर से ही त्याग देना। यदि भगवान खड़ गदा शंख के साथ विरजमान है। तब उसके सारे पाप नष्ट हो जाते है। सूर्य के रहते अंधकार कैसे रह सकता है। जो पुरूष दुसरो का धन हरण करता है। जीवो की हिंसा करता है तथा मिथ्या तथा कटु वचन भाषण करता है। उनके हृदय मे भगवान अनंत नही टिक सकते। जो कुमति दूसरे के वैभव को नही देख सकता। जो दूसरो की निन्दा करता है और साधु जनो का अपकार करता है तथा सम्पन्न होकर न भगवान विष्णु की पूजा ही करता है।और न ही उनके भक्तो को दान ही देता है। उस अघम के हृदय मे श्री जनार्धन का निवास कभी नही हो सकता। जो दुष्ट बुद्धि अपने बंधु बांधव स्त्री, पुत्र, कन्या, माता पिता के प्रति अर्थ तृष्णा प्रगट करता है। उस पापीचारी को भगवान का भक्त न समझो जो दुर्बुद्धि मनुष्य असत्य कर्मो मे लगा रहता है। नीच पुरुषो के अचार उन्ही के संग मे उनमत रहता है। नित्य पाप कर्मो से बंधता जाता है। वो मनुष्य रूप मे पशु ही है। वह भगवान वासुदेव ही है। हृदय मे भगवान अनन्त के स्थित होने पर जिनकी ऐसी बुद्धि हो गई है। उन्हे तुम दूर से ही छोड़कर चले जाना। ये कमलनयन, हे वासुदेव, हे विष्णु, हे गिरिधर आप हमे शरण दीजिये। जो लोग इसप्रकार पुकारते हो। उन निष्पाप व्यक्ति को दूर से ही त्याग देना। जिस पुरूष के अंतकरण मे वे अव्यय आत्मा भगवान विराजते है। उनका जहाँ तक दृष्टि पात होता है। वहाँ तक भगवान के चक्र के प्रभाव से अपने बल वीर्य नष्ट होने के कारण तुम्हारी अथवा मेरी गति नही हो सकती। वह महापुरुष वैकुंठ लोको का पात्र है। अपने दूत को शिक्षा देने के लिये यमराज ने उससे इस प्रकार कहा। इस संसार सागर मे भगवान विष्णु को छोड़कर जीव का अन्य कोई रक्षक नही है। जिसका हृदय निरंतर भगवत परायण रहता है। उसका यमपाश,यमदूम,यमयातना कुछ भी नही विगाड़ सकते।
कलिङ्ग उवाच
स्वपुरुषमभिवीक्ष्य पाशहस्तं
वदति यमः किल तस्य कर्ममूले।
परिहर मधुसूदनप्रपन्नान्
प्रभुरहमन्यनृणामवैष्णवानाम्।।1।।
अहममरवरार्चितेन धात्रा
यम इति लोकहिताहिते नियुक्तः।।
हरिगुरुवशगोऽस्मि न स्वतन्त्रः
प्रभवति संयमने ममापि विष्णुः।।2।।
कटकमुकुटकर्णिकादिभेदैः
कनकमभेदमपीष्यते यथैकम्।।
सुरपशुमनुजादिकल्पनाभि-
हरिरखिलाभिर्रुदीर्यते तथैकः।।3।।
हरिरखिलाभिर्रुदीर्यते तथैकः।।3।।
क्षितितलपरमाणवोऽनिलान्ते
पुनरुयान्ति यथैकतां धरित्र्याः।।
सुरपशुमनुजादयस्तथान्ते
गुणकलुषेण सनातनेन तेन।।3।।
पुनरुयान्ति यथैकतां धरित्र्याः।।
सुरपशुमनुजादयस्तथान्ते
गुणकलुषेण सनातनेन तेन।।3।।
हरिममरवरार्चिताङ्घ्रिपद्मं
प्रणमति यः परमार्थतो हि मर्त्यः।।
तमपगतसमस्तपापबन्धं
व्रज परिहृत्य यथाग्निमाज्यसिक्तम्।।4।।
इति यमवचनं निशम्य पाशी
यमपुरुषस्तमुवाच धर्मराजम्।।
कथय मम विभो समस्तधातु-
र्भवति हरेः खलु यादृशोऽस्य भक्तः।।5।।
यम उवाच
न चलति निवर्णधर्मतो यः
सममतिरात्मसुहृद्विपक्षपक्षे।।
न हरति न च हन्ति किञ्चिदुच्चैः
सितमनसं तमवेहि विष्णुभक्तम्।।6।।
कलिकलुषमलेन यस्य नात्मा
विमलमतेर्मलिनीकृतस्तमेनम्।।
मनसि कृतजनार्दनं मनुष्यं
सततमवेहि हरेरतीवभक्तम्।।7।।
कनकमपि रहस्यवेक्ष्य बुद्ध्या
तृणमिव यस्समवैति वै परस्वम्।।
भवति च भगवत्यनन्यचेताः
पुरुषवरं तमवेहि विष्णुभक्तम्।। 8।।
स्फटिकगिरिशिलामलः क्व विष्णु-
मनसि नृणां क्व च मत्सरादिदोषः।।
न हि तुहिनमयूखरश्मिपुञ्जे
भवति हुताशनदीप्तिजः प्रतापः।।9।।
विमलमतिरमत्सरः प्रशान्त-
श्शुचिचरितोऽखिलसत्त्वमित्रभूतः।।
प्रियहितवचनोऽस्तमानमायो
वसति सदा हृदि तस्य वासुदेवः।।10।।
वसति हृदि सनातने च तस्मिन्
भवति पुमाञ्जगतोऽस्य सौम्यरूपः।।
क्षितिरसमतिरम्यमात्मनोऽन्तः
कथयति चारुतयैव शालपोतः।।11।।
यमनियमविधूतमल्मषाणा-
मनुदिनमच्युतसक्तमानसानाम्।।
अपदगतमदमानमत्सराणां
त्यज भट दूरतरेण मानवानाम्।।12।।
हृदि यदि भगवाननादिरास्ते
हरिरसिशङ्खगदाधरोऽव्ययात्मा।।
तदघमघविघातकर्त्तृभिन्नं
भवति कथं सति चान्धकारमर्के।।13।।
हरति परधनं निहन्ति जन्तून्
वदति तथाऽनृतनिष्ठुराणि यश्च।।
अशुभजनितदुर्मदस्य पुंसः
कलुमतेर्हृदि तस्य नास्त्यनन्तः।।14।।
न सहति परसम्पदं विनिन्दां
कलुषमतिः कुरुते सतामसाधुः।।
न यजति न ददाति यश्च सन्तं
मनसि न तस्य जनार्दनोऽधमस्य।।15।।
परमसुहृदि बान्धवे कलत्रे
सततनयापितृमातृभृत्यवर्गे।।
शठमतिरुपयाति योऽर्थतृष्णां
तमधमचेष्टमवेहि नास्य भक्तम्।।16।।
अशुभमतिरसत्प्रवृत्तिसक्त-
स्सततमनार्यकुशीलसंगमत्तः।।
अनुदिनकृतपापबन्धयुक्तः
पुरुषपशुर्न हि वासुदेवभक्तः।।17।।
सकलमिदमहं च वासुदेवः
परमपुमान्परमेश्वरस्स एकः।।
इति मतिरचला भवत्यनन्ते
हृदयगते व्रज तान्विहाय दूरात्।।18।।
कमलनयन वासुदेव विष्णो
धरणिधराच्युत सङ्खचक्रपाणे।।
भव शरणमितीरयन्ति ये वै
त्यज भट दूरतरेण तानपापान्।।19।।
वसति मनसि यस्य सोऽव्ययात्मा
परुषवरस्य न तस्य दृष्टिपाते।।
तव गतिरथ वा ममास्ति चक्र-
प्रतिहतवीर्यबलस्य सोऽन्यलोक्यः।।20।।
कलिङ्ग उवाच
इति निजभटशासनाय देवो
रवितनयस्स किलाह धर्मराजः।।
मम कथितमिदं च तेन तुभ्यं
कुरुवर सम्यगिदं मयापि चोक्तम्।।21।।
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