माता सीता के वचन रामचरितमानस में

अजर अमर गुननिधि सुत होहू। करहुँ बहुत रघुनायक छोहू॥
करहुँ कृपा प्रभु अस सुनि काना। निर्भर प्रेम मगन हनुमाना॥

भावार्थ

हे पुत्र! तुम अजर (बुढ़ापे से रहित), अमर और गुणों के खजाने होओ। श्री रघुनाथजी तुम पर बहुत कृपा करें। 'प्रभु कृपा करें' ऐसा कानों से सुनते ही हनुमान जी पूर्ण प्रेम में मग्न हो गए॥

Hey son  You are ajar (devoid of old age), immortal and a treasure of virtues.  Shree Raghunathji be very kind to you.  Lord Hanuman became engrossed in complete love as soon as he heard 'Please God please'.

जनकसुता जग जननि जानकी। अतिसय प्रिय करुनानिधान की॥
ताके जुग पद कमल मनावउँ। जासु कृपाँ निरमल मति पावउँ॥

भावार्थ-

राजा जनक की पुत्री, जगत् की माता और करुणा निधान श्री रामचन्द्रजी की प्रियतमा श्री जानकीजी के दोनों चरण कमलों को मैं मनाता हूँ, जिनकी कृपा से निर्मल बुद्धि पाऊँ॥

I celebrate both the lotus feet of Shri Janaki ji, the daughter of King Janak, the mother of the world, and the sweetheart of compassion, Shri Ramchandraji, by whose grace I find a pure intellect.

Comments

Popular posts from this blog

धर्म के दश लक्षण (मनु के अनुसार)

शास्त्र

राम नाम का महत्व(स्वामीरामसुखदास महाराज)