काम गीता । भगवान कृष्ण-युधिष्ठर संवाद

महाभारत के अश्वमेघपर्व में भगवान कृष्ण और युधिष्ठिर संवाद को काम गीता कहते है। भगवान श्रीकृष्ण कहते है- केवल बाहरी पदार्थो का त्याग (राज्य) का त्याग करने से सिद्धि प्राप्त नही मिलती है वल्कि शरीरिक द्रव्यों का त्याग करने से सिद्धि प्राप्त होती है अथवा नही भी होती है।

जो बाह्य पदार्थो को छोड़कर जो शरीरिक पदार्थो में अशक्ति है उसे जो धर्म और सुख की प्राप्ति होती है वो तुमसे द्वेष करने वाले को ही प्राप्त हो।

मेरा(मम) ये दो अक्षर ही मृत्यु रूप है और ये मेरा नही है ये तीन अक्षरो का पद सनातन ब्रह्म की प्राप्ति का कारण है। ममता मृत्यु है और इसका त्याग अमृत है।

राजन ये मृत्यु और अमृत दोनो आदमी के अंदर स्थित है। ये अदृश्य होकर प्राणियों को आपस मे लड़ाते है अर्थात किसी को अपना मानना और किसी को अपना न मानना ये भाव ही युध्य का कारण है।

यदि कोई जंगल मे रहकर जंगली फल मूलो से ही पेट भरता है पर उसकी द्रव्यों में ममता है तो वह मौत के मुँह मे विद्यमान है।

जो चराचर जगत को पाकर उसकी उसमे ममता नही होती तो वह इस जगत(संपत्ति) का क्या करेगा अर्थात इस संपति से उसका कोई अनर्थ नही हो सकता।

तुम केवल बाहर और अंदर के शत्रु को देखिये और समझिये ये मायामय के साथ मिथ्या है ऐसा निश्चय कीजिये जो मायिक पदार्थ को ममत्व की दृष्टि से नही देखता और महान भय से छुटकारा पा जाता है।

जिसका मन कामनाओ में आसक्त है उसे संसार के लोग प्रशंसा नही करते है। कोई प्रवृत्ति बिना कामनाओ के नही होती है और समस्त कामनाएं मन से प्रगट होती है। विद्वान पुरुष कामनाओ को दुःख का कारण जानकर उनका परित्याग कर देता है।

योगी जन कई जन्मों के अभ्यास से योग को ही मोक्ष का साधन जानकर कामनाओ का नाश कर डालते है। कामनाओ का निग्रह ही धर्म है । वही मोक्ष का मूल है।

व्रत, यज्ञ, नियम, ध्यान, तप, नियम का कामना पूरवक अनुश्ठान नही करता और जिस कर्म में कामना रखता है वह धर्म नही है।

गाथा के रूप में काम को इस प्रकार समझा जा सकता है। काम कहता है- मेरा खात्मा निर्ममता और योगाभ्यास के बिना नही कर सकता अगर कोई शास्त्र भाव से प्रयास करता है तो मैं अहंकार के रूप में आ जाता है।

जो यज्ञओ द्वारा जीतना चाहता है। मैं धर्मात्मा बन कर उसके अंदर आ जाता हूं। जो वेदों को पढ़कर जीतना चाहता है तो मैं जीव आत्मा बन कर आ जाता हूं। जो तपस्या द्वारा कोशिस करता है मै तपस्या मे प्रगट हो जाता हूं। जो विद्वान मोक्ष का सहारा लेकर मेरे विनाश का प्रयत्न करता है उसको जो मोक्ष को पाने में अशक्ति है उसी से वह बंधा हुआ है।

भगवान कृष्ण युधिष्ठर से कहते है  इसलिए आप धर्म(यज्ञओ) कार्यो में अपना काम को लगा दीजिये इससे इस लोक में कीर्ति और परलोक में उच्च पद प्राप्त करेंगे।


तीसरा पुरुषार्थ ‘काम’ है। काम का अर्थ व्यापक है संकीर्ण नहीं, उपभोग करना। विषय सुख इस का मूल तत्व है। विषय सुख यदि विधि पूर्वक किया जाये तो वह धर्म आधारित कहलाता है।  अंतिम पुरुषार्थ है मोक्ष। यह मानव जीवन का अंतिम पुरुषार्थ है। हर आदमी जो इस दुनिया में जन्म लेता है वह जीवन के अंत में मोक्ष की इच्छा रखता है।

मोक्ष का अर्थ है सभी प्रकार के सांसारिक बंधनों से मुक्ति। बंधन वे जो मनुष्य को संसार से बांध कर रखते हैं, जो सांसारिक सुखों और सुविधाओ के प्रति आसक्ति पैदा करते हैं । इस में जीवन ‘मैं’ और ‘मेरा’ तक सीमित हो जाता है। इस आसक्ति के कारण हम अनेक तरह की चिंता, दुःख, अशांति, अभाव, निराशा, हताशा, जीवन के प्रति अवसाद और उदासीनता से घिरे रहते हैं। ये दुःख और चिंता जीवन पर्यन्त चलती रहती हैं। इन से मुक्ति का एक मात्र साधन है ज्ञान की प्राप्ति अथवा विवेकशीलता क्योंकि इन का मूल कारण है अज्ञान ।

सन्यासः कर्मयोगश्च नि:श्रेयसक़रावुभौ।

तयोस्तु कर्मसन्यासात्कर्मयोगो विशिष्यते।।५ / २।। .

 

भगवान ने कहा – हे अर्जुन संन्यास और कर्म योग दोनों ही यद्यपि मोक्ष के साधन हैं तथापि दोनों में संन्यास की अपेक्षा कर्म योग ही श्रेष्ठ है। लेकिन अर्जुन की शंका का पूर्णतः समाधान नहीं हुआ। इस लिए यहाँ अंत में – अंतिम अध्याय में फिर कहता है –

 

 सन्यासस्य महाबाहो तत्वमिच्छामि वेदितुम।

त्यागस्य च हृषीकेश पृथक्केशिनिषूदन। । (१८. १)

 

हे महाबाहो, हे हृषिकेश हे केशी दैत्य के संहारक श्रीकृष्ण, मैं आप से संन्यास और त्याग – दोनों के तत्व को अलग अलग जानना चाहता हूँ। अलग अलग अर्थात विश्लेषण करके। अब सबसे अधिक अनूठी बात यह है कि भगवान भी अपनी बात कहने से पूर्व संन्यास और त्याग के बारे में विभिन्न विद्वानों का मत प्रकट करते हैं।

काम्यानां कर्मणां न्यासं सन्यासं कवयो विदुः।

सर्वकर्मफलत्यागं प्राहुस्त्यागं विचक्षणाः।।१८ / २ ||

 

त्याज्यं दोषवदित्येके कर्म प्राहुर्मनीषिणः

यज्ञदानतपः कर्म न त्याज्यमिति चापरे ।।१८ /३ ||

 

भगवान कहते हैं –

1. कुछ विद्वान कामना के लिए किये जाने वाले कर्मों के त्याग को संन्यास कहते हैं और

2. कुछ पंडित कर्मों के फल के त्याग को त्याग अर्थात सन्यास कहते हैं।

3. कुछ विद्वान् ऐसे हैं जिन्हें सभी कर्मों में दोष की आशंका रहती है इस कारण से वे सभी कर्मों के त्याग की बात करते हैं। इन के अनुसार कोई कर्म दोषरहित नहीं हो सकता। अच्छे कर्म करते समय भी कुछ न कुछ उस से जुड़ा बुरा काम हो ही जाता है जैसे हवन करते समय लकड़ी के साथ छोटे छोटे जीव जंतु मर जाते हैं। खेत में हल चलाते समय कोई न कोई जीव अवश्य मर जाते हैं। युद्ध के समय अनेक अनजानी मृत्यु हो जाती हैं। अतः सभी कर्मों का त्याग कर देना चाहिए।

4. कुछ विद्वान ऐसे हैं जो यज्ञ, दान, तप आदि कर्मों को न छोड़ने की बात कहते हैं।

https://youtu.be/x8iV-izAN7s

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