भिक्षु गीता । कृष्ण - उद्वव संवाद
भिक्षु गीता भगवान कृष्ण और उनके मित्र उद्धव से कहते है किसी दुर्जन के द्वारा अपशब्द और अपमान की बाते बोले तो सज्जन पुरूष को उसे सहकर पूर्ण क्षमा कर देना चाहिये क्योंकि सुख दुख का कारण मन ही है। यही मन काम में असक्त मनुष्य को बंधन में डालता है। यदि इस मन को एकाग्र होकर भगवान में लगाना परम् योग है।भगवान कहते है इस संसार मे ऐसे महापुरुष नही मिलते जो दुर्जनो की कठोर वाणी से विधे हुए हृदय को संभाल सके। मनुष्य का हृदय मर्म वाणी से विधने पर भी उतना पीड़ा नही होता जितना दुष्ट जनो के मर्मान्तक और कठोर वचन पहुचाते है।इस विषय मे महात्मा लोग एक पवित्र इतिहास कहते है। मैं सुनाऊँगा इसे तुम मन लगाकर इसे सुनो- एक भिक्षु को दुष्टो ने बहुत सताया लेकिनउसने अपना धैर्य नही छोड़ा और उसे अपने पूर्व जन्म के कर्म समझकर कुछ अपने मानसिक उदगार प्रगट किये उन्ही का इस इतिहासमें वर्णन है। प्राचीन काल मे एक ब्राह्मण रहता उसने खेती और व्यापार करके बहुत सा संपत्ति इकठा करली थी। वह बहुत कंजूस और लोभीथा और क्रोध तो उसे बात-बात में आ जाता था। उसमें अपने बंधुओंको कभी मीठी बात से प्रसन्न नही किया और खिलाने पिलाने की तोबात भी नही थी। इस सम्पति के द्वारा अपने शरीर को भी सुखीनही करता था। उसकी कृपणता के कारण पुत्र,पुत्री,पत्नी और नौकरदुखी रहते और मन ही मन उनका अनिष्ट चिन्तन किया करते थे।कोई उसके प्रिय लगने वाला व्यहार नही करता था वह लोक और परलोक दोनो से ही गिर गया था। बस यक्षों के समान धन की रखवाली करता रहता था। उस धन से न तो धर्म कमाता न ही भोगही भोगता था। बहुत दिनों तक इस तरह का जीवन विताने के बादउस पर महायज्ञ के देवता विगड़ गए जिससे उसके पूर्व पुण्यो कासहारा जिस पर धन टिका हुआ था जाता रहा और जो धन उसने कठिन मेहनत से कमाया था उसकी आँखों के सामने नष्ट हो गया।उसका कुछ धन कुटुम्बियों ने और कुछ चोर ले गए और कुछ आग लग जाने से नष्ट हो गया। इस तरह उसकी संपत्ति जाती रही न उसने धर्म ही कमाया और न ही भोग भोगे। इधर उसके सगे सम्बन्धियों ने भी उसकी ओर मुंह मोड़ लिया इसके बाद उसको भयंकर चिंता हुई।धन के नाश से उसके हृदय में बहुत जलन हुई उसका मन खेद
से भर गया अशुवों के कारण उसका गला रुद गया। इस प्रकार चिंता करते करते उसके मन मे संसार प्रति महान दुख बुद्धि और उत्कट वैराग्य हो गया अब वह ब्राह्मण कहने लगा हाय कितनी दुख की बात है मैंने अपने आप को व्यर्थ हीसताया जिस धन को इतने परिश्रम से कमाया न तो धर्म मे लगाऔर न मेरे सुख भोग में ही काम आया प्रायः देखा गया है किकृपण को इस जीवन मे धन सुख नही मिलता क्योंकि वह उसकी रक्षा में लगा रहता है और मरने के बाद धर्म न करने से नर्क जाताहै। जिस प्रकार थोड़ा चर्म रोग सुंदरता को विगड़ देता है। उसी प्रकारथोड़ा लोभ यशसियो के यश पर पानी फेर देता है। धन के कमाने, उसकी रक्षा करने और खर्च करने जहाँ देखो वही भय, परिश्रम,चिंताका सामना करना पड़ता है। चोरी करना,हिंसा, झूठ बोलना, काम,क्रोध, गर्व, अहंकार, अविश्वासस्पर्धा, जुआ, मद, दम, वैर, भृद बुद्धि ये 15 अवगुण धन की वजहसे आते है। इसलिए कल्याण कामी पुरुषों को चाहिए स्वार्थ और परमार्थके विरोधी अर्थ नाम को दूर से छोड़ दे।स्त्री,पुरुष,भाई, बहन, पिता, और पुत्र जो स्नेह के साथ एक दूसरे से जुड़े रहते है वे पैसे के लिये एक दूसरे के शत्रु बन जाते है। ये लोगथोड़े से धन के लिये क्षुब्ध और क्रुद्ध हो जाते है। बात बात सौहर्द और सम्बन्ध छोड़कर एक दूसरे के प्राण लेने के लिए उतारू हो जाते है। यहाँ तक कि एक दूसरे का सर्वनाश कर डालते है। जो देव के भी प्रार्थनीयमनुष्य शरीर को पाकर इसका अनादर करते है। अपने सच्चे स्वार्थ परमार्थका नाश करते है। वे अशुभ गति को प्राप्त करते है। ये मनुष्य शरीर स्वर्ग और मोक्ष का द्वार है। इसको पाकर कौन ऐसा मनुष्य होगा जो अनर्थोके धाम धन के चक्कर मे फसा रहेगा।जो मनुष्य देवता, भाई, कुटुम्बियों को उनके भागिदारो को उनका धनन देकर उनको संतुष्ट नही करता और न स्वयं उनका उपयोग करता हैवह कृपण अवश्य ही अधो गति को प्राप्त करता है। मैने प्रमाद (लपरवाही)से अपना आयु,बल, धन, पौरुष खो दिया। विवेकी लोग जिन साधनों से मोक्ष प्राप्त कर लेते है वही मैने धन कमाने की चेष्टा में खो दिया।मुझे मालूम नही होता बड़े बड़े विद्धवान धन की तृष्णा से क्यो दुखी रहते है।हो न हो यह संसार किसी की माया से अत्यंत मोहित हो रहा है।यह संसार मनुष्य शरीर काल के विक्राल गाल में पड़ा हुआ है।इसको धन से, धन देने वाले देवताओं, भोग वासनाओ,लोगो से, और उनको पूर्ण करने वालो से पुनः पुनः जन्म मृत्यु केडालने वाले सकाम कर्मो से लाभ ही क्या? इसमें संदेह नही की भगवानमुझसे प्रसन्न है तभी तो उन्होंने मुझे इस दशा में पहुचाया है। और मुझेदुख बुद्धि और वैराग्य दिया। वस्तुतः वैराग्य ही इस संसार से पार करने वाली नौका है सब मैं ऐसी अवस्था मे पहुच गया हूं यदि मेरी आयु शेषहो तो मैं आत्म लाभ से संतुष्ट हो कर परमार्थ लाभ से सावधान हो जाऊं और अब जो समय बच रहा है मैं उसमे अपनेशरीर को तपस्या द्वारा सुखा डालूँगा। तीनो लोको के स्वामी इसकाअनुमोदन करे। अभी निराश होने की कोई बात नही है। क्योंकि राजा खंडग्वांन ने दो घड़ी में भगवत धाम की प्राप्ति कर ली थी।इस प्रकार विचार करके मैं और मेरे पन की गांठ खोल दी इसकेबाद शांत होकर मौनी सन्यासी हो गया। अब उसके चित्त में किसीस्थान,वस्तु के प्रति अशक्ति नही रही। उसने अपने इन्द्रियों मन कोवस कर लिया। वह पृथ्वी पर स्वतंत्र विचरण करने लगा। वह भिक्षाके लिए गांव और नगर जाता था परन्तु इस प्रकार जाता था कि कोई उसे पहचान न पाता था। वह भिक्षु अवधूत बहुत बुढ़ा हो गया था। दुष्ट उसे देखकर टूट पड़ते और तरह तरह के तिरस्कारकरते कोई उसका दंड छीन लेता कोई उसका पात्र ही झटक लेताकोई कमंडल,कोई रुद्राक्ष माला लेकर भाग जाता था। जब वह भिक्षाका खाना लाता पापी लोग उस पर मूत्र और थूक देते। वे उसे बोलनेके लिये मजबूर करते। न बोलने पर पिटते, उसे बांध देते और कहतेये देखो इस कंजूस को जो सन्यास लेने का ढोंग कर रहा है।वह चुपचाप इसे सह कर लेता। उसे सर्दी गर्मी के साथ शरीरिकदुःख भी भोगने पड़ते इससे उसके मन मे कोई विकार न होता।वह सोचता ये मेरे पूर्व कर्मो का फल है। मुझे इसे अवश्य भोगनापड़ेगा। लेकिन नीच व्यक्ति इसे अपने धर्म से गिराने की कोशिसकरते लेकिन वो दृढ रहता। सात्विक धैर्य का सहारा लेकर कभीकभी ऐसे उदगार प्रगट करता और कहता मेरे इस दुःख काकारण न देवता है, न कर्म है, न काल है,न शरीर, और न ग्रहहै। श्रुतियाँ और महात्मा जन मन को ही इसका कारण बताते है।मन ही इस संसार चक्र को चलाता रहता है। सचमुच ये मन बड़ाबलवान है। इसी ने विषयो और उनसे संबंध रखने वाली वित्तियोकी सृष्टि की है। उन वित्तियो के अनुसार ही सात्विक, राजस, तामसअनेक प्रकार के कर्म होते है और कर्मो के अनुसार जीव की विविध गतियाँ होती है। मन ही समस्त चेष्ठाये करता है। मन के साथ रहने पर आत्मा निष्क्रिय ही है। वह आत्मा ज्ञान शक्ति प्रधान है औरजीव का सनातन सखा है और अपने ज्ञान से सब कुछ देखता रहता है।मन के द्वारा उसकी अभियक्ति होती है। सभी इंद्रिया मन के वस में है।मन किसी इंद्रिय के वस में नही है। मन इद्रियों का राजा है।दम,यम,नियम,वेद अध्यन,धर्म पालन, सत्कर्म, ब्रह्मचर्य आदि श्रेष्टकर्म का अंतिम फल यह है कि मन एकाग्र हो जाये और भगवान हरिमें लग जाये। मन का समाहित हो जाना परम योग है। जिसकामन शांत और समाहित है उसे दान और सत्कर्मो का फल प्राप्त हो चुका है। अब उनसे कुछ लेना शेष नही है। जिनका मन चंचलअथवा आलस्य से अवधूत हो रहा है। उनको दान आदि कर्मो सेलाभ नही हुआ। सभी इंद्रिया मन के वश में है। मन बलवान सेभी बलवान अत्यंत भयंकर देव है। जो इसे वश में कर लेता है।वही इद्रियों का विजेता है। सचमुच मन बड़ा शत्रु है। इसका आक्रमणअसह है। यह बाहरी शरीर को ही नही बल्कि हृदय को भी भेदताहै। इसे जीतना बहुत कठिन है। मनुष्य को चाहिए सर्व प्रथम इसी शत्रुपर विजय प्राप्त करे। परंतु होता यह है कि मूढ़ लोग इसे जीतने काप्रयत्न नही करते। दूसरे मनुष्य से झूठ मूठ का झगड़ा करते है औरसंसार के लोगो को ही मित्र और शत्रु बना लेते है। ज्यादातर लोगोकी बुद्धि अन्धी हो रही है तभी तो मन कल्पित शरीर को मैं औरमेरा मान बैठता है फिर इस भ्रम के फंदे में फस जाते है कि यह मैंहू और वो दूसरा। इसका परिणाम ये होता है कि वे अनंत अंधकार मेभटकते रहते है। यदि मानले की आदमी ही सुख दुःख का कारण हैतो उससे उसके आत्मा से क्या संबंध? क्योंकि सुख दुःख पहुचानेवाला शरीर है और भोगने वाला भी वही है। यदि भोजन करते समय अपनी जीभ कट जाए तो आदमी किसपे क्रोध करेगा। यदिमानले देवता ही दुख का कारण है तो वह भी दूसरे के शरीर मे भी है। ग्रहो का प्रभाव शरीर पर पड़ता है पर आत्मा ग्रहो और शरीर से परे है। तब भला वह किसपे क्रोध करे यदि कर्मो को सुख दुःख का कारण माने तो आत्मा का क्या प्रयोजन? आत्मा तोसिर्फ साक्षी मात्र है। यदि काल को सुख दुःख का कारण माने तोआत्मा पर इसका क्या प्रभाव क्योकि काल आत्मा स्वरूप ही है।जैसे बर्फ-बर्फ को नही काटता उसी प्रकार यह कोई असर नही करता।भगवान उद्धव से कहते है जो व्यक्ति इस कथा को सुनते है वह इस संसार सागर को सुख दुःख में समान होकर शेर की तरह दहाड़तारहता है।
aning, teachings of a butcher) is a part of the epic Mahabharata and consists of the teachings imparted by a vyadha (Butcher) to a brahmin sannyasin (monk). It occurs in the Vana Parva section of Mahabharata and is told to Yudhishthira, a Pandava by sage Markandeya. In the story, an arrogant sannyasin is humbled by a vyadha (butcher or hunter), and learns about dharma (righteousness). The vyadha teaches that "no duty is ugly, no duty is impure" and it is only the way in which the work is done, determines its worth. The Bhagavata Purana mentions the vyadha as an example of someone who attained perfection through satsang (association with devotees of Lord Vishnu or Krishna). Scholar Satya P. Agarwal considers Vyadha Gita to be one of the popular narrations in the Mahabharat. The story has only three characters—a brahmin sannyasi, a housewife and a vyadha (butcher). The story begins with a young sannyasi going to a forest, where he meditates and practices spiritual austerities for a long time. After years of practice, one day while sitting under a tree, dry leaves fall on his head because of a fight between a crow and a crane. The angry sannyasi had developed yogic powers and burnt the birds with his mere look. This incident fills the sannyasin with arrogance.[1] Shortly thereafter, he goes to a house, begging for food. Here the housewife who was nursing her sick husband requests sannyasi to wait. To this, the sannyasi thinks, "You wretched woman, how dare you make me wait! You do not know my power yet", to which the housewife says that she is neither a crow nor a crane, to be burnt.The sannyasi is amazed and asks her how she came to know about the bird. The housewife says that she did not practice any austerities and by doing her duty with cheerfulness and wholeheartedness, she became illumined and thus could read his thoughts. She redirects him to a dharma-vyadha (meaning, the righteous butcher) in the town of Mithila and says that the dharma-vyadha would answer all his questions on dharma. The sannyasi goes to see the vyadha and overcoming his initial hesitation, listens to his teachings, which is referred to as Vyadha Gita—and even puts them into practice.द्विज उवाच ।
नायं जनो मे सुखदुःखहेतुर्न देवतात्मा ग्रहकर्मकालाः ।
मनः परं कारणमामनन्ति संसारचक्रं परिवर्तयेद्यत् ॥ ४२॥मेरे सुख-दुख का कारण न ये मनुष्य हैं, न निसर्गदेवता, न ये शरीर और न ग्रह। कर्म और काल आदि भी कारण नहीं। संसाररूप चक्र को घुमाने वाले मन को ही विद्वान तथा शास्त्र सुख-दुख का कारण बताते हैं।
For my happiness and misery, neither this mankind, nor the divine nature, nor the planets, nor (my past) deeds, nor time are the cause. They (the Wise and the Scriptures) consider that the mind, which sets in motion the wheel of worldliness, alone is the cause.
मनो गुणान्वै सृजते बलीयस्ततश्च कर्माणि विलक्षणानि ।
शुक्लानि कृष्णान्यथ लोहितानि तेभ्यः सवर्णाः सृतयो भवन्ति ॥ ४३॥
अनीह आत्मा मनसा समीहता हिरण्मयो मत्सख उद्विचष्टे ।
मनः स्वलिङ्गं परिगृह्य कामान्जुषन्निबद्धो गुणसङ्गतोऽसौ ॥ ४४॥
दानं स्वधर्मो नियमो यमश्च श्रुतं च कर्माणि च सद्व्रतानि ।
सर्वे मनोनिग्रहलक्षणान्ताः परो हि योगो मनसः समाधिः ॥ ४५॥
दान, अपने धर्म का पालन, नियम, यम, वेदाध्ययन, सत्कर्म और ब्रह्मचर्यादि श्रेष्ठ व्रत - इन सबका अंतिम फल यही है कि मन एकाग्र हो जाय, भगवान में लग जाये। मन का समाहित हो जाना ही परम योग है।
Charity, prescribed duties, observance of major and minor regulative principles, hearing from scripture, pious works and purifying vows all have as their final aim the subduing of the mind. Indeed, concentration of the mind on the Supreme is the highest yoga.
समाहितं यस्य मनः प्रशान्तं दानादिभिः किं वद तस्य कृत्यम् ।
असंयतं यस्य मनो विनश्यद्दानादिभिश्चेदपरं किमेभिः ॥ ४६॥
मनोवशेऽन्ये ह्यभवन्स्म देवा मनश्च नान्यस्य वशं समेति ।
भीष्मो हि देवः सहसः सहीयान्युञ्ज्याद्वशे तं स हि देवदेवः ॥ ४७॥
तम्दुर्जयं शत्रुमसह्यवेगमरुन्तुदं तन्न विजित्य केचित् ।
कुर्वन्त्यसद्विग्रहमत्र मर्त्यैर्मित्राण्युदासीनरिपून्विमूढाः ॥ ४८॥
देहं मनोमात्रमिमं गृहीत्वा ममाहमित्यन्धधियो मनुष्याः ।
एषोऽहमन्योऽयमिति भ्रमेण दुरन्तपारे तमसि भ्रमन्ति ॥ ४९॥
जनस्तु हेतुः सुखदुःखयोश्चेत्किमात्मनश्चात्र हि भौमयोस्तत् ।
जिह्वां क्वचित्सन्दशति स्वदद्भिस्तद्वेदनायां कतमाय कुप्येत् ॥ ५०॥
दुःखस्य हेतुर्यदि देवतास्तु किमात्मनस्तत्र विकारयोस्तत् ।
यदङ्गमङ्गेन निहन्यते क्वचित्क्रुध्येत कस्मै पुरुषः स्वदेहे ॥ ५१॥
आत्मा यदि स्यात्सुखदुःखहेतुः किमन्यतस्तत्र निजस्वभावः ।
न ह्यात्मनोऽन्यद्यदि तन्मृषा स्यात्क्रुध्येत कस्मान्न सुखं न दुःखम् ॥ ५२॥
ग्रहा निमित्तं सुखदुःखयोश्चेत्किमात्मनोऽजस्य जनस्य ते वै ।
ग्रहैर्ग्रहस्यैव वदन्ति पीडां क्रुध्येत कस्मै पुरुषस्ततोऽन्यः ॥ ५३॥
कर्मास्तु हेतुः सुखदुःखयोश्चेत्किमात्मनस्तद्धि जडाजडत्वे ।
देहस्त्वचित्पुरुषोऽयं सुपर्णः क्रुध्येत कस्मै न हि कर्म मूलम् ॥ ५४॥
कालस्तु हेतुः सुखदुःखयोश्चेत्किमात्मनस्तत्र तदात्मकोऽसौ ।
नाग्नेर्हि तापो न हिमस्य तत्स्यात्क्रुध्येत कस्मै न परस्य द्वन्द्वम् ॥ ५५॥
न केनचित्क्वापि कथञ्चनास्य द्वन्द्वोपरागः परतः परस्य ।
यथाहमः संसृतिरूपिणः स्यादेवं प्रबुद्धो न बिभेति भूतैः ॥ ५६॥
एतां स आस्थाय परात्मनिष्ठामध्यासितां पूर्वतमैर्महर्षिभिः ।
अहं तरिष्यामि दुरन्तपारं तमो मुकुन्दाङ्घ्रिनिषेवयैव ॥ ५७॥नमः, नमः करते हुए भगवान को नमस्कार करने से, उनके सामने झुकने से, यह मन समाप्त हो जाता है। नमस्कार से, नमन से मन नम हो जाता है। यही उपाय है मन को समाप्त करने का। तो वह ब्राह्मण आत्म दृष्टि से सबको देखने लगा। अन्य लोग उसे देह दृष्टि से देखते थे। वह भली प्रकार से जानता था कि मैं देह नहीं हूँ। इसलिए, जब दुष्ट लोग उस पर कुछ फेंकते थे, तो वह यही कहता कि जहाँ कूड़ादान होता है, वहाँ कूड़ा ही तो फेंकते हैं। यह शरीर भी तो कचरे की ही पेटी है। लेाग इस पर कचरा डाल रहे हैं तो क्या बिगड़ गया? वह तो बड़ी अच्छी बात है कि भगवान ने ऊपर से इस शरीर को बहुत संवार कर भेजा है, अन्यथा (अंदर से देखने पर) हमें स्वयं घृणा होने लग जाती। ऐसा विवेक कर उस ब्राह्मण ने जाना कि मुझे कोई दुःख नहीं है।
बोले, मेरे लिए तो पूर्व-पूर्व के आचार्यों ने यह मार्ग बता दिया है। देह के साथ तादात्मय हटा दो, यह देह तुम हो ही नहीं। फिर कौन तुम्हें दुःख दे सकता है? कोई कहे कि तुम मोटे या दुबले हो, तो मुझे दुःख क्यों हो? जब मैं शरीर हूँ ही नहीं, तो उसके मोटा या दुबला होने से मुझे क्या अन्तर पड़ता है? यह भिक्षुगीत बड़ा सुन्दर है, इसे सबको गाना चाहिये। वह ब्राह्मण इस प्रकार विरक्त होकर घूमने लगा। भगवान स्वयं कहते हैं -https://hi.krishnakosh.org/
श्रीभगवानुवाच ।
निर्विद्य नष्टद्रविणे गतक्लमः प्रव्रज्य गां पर्यटमान इत्थम् ।
निराकृतोऽसद्भिरपि स्वधर्मादकम्पितोऽमूं मुनिराह गाथाम् ॥ ५८॥गौरवशाली भगवान आगे बढ़े: इंद्रियों के सुखों से निराश होकर और अपने घर को छोड़कर पृथ्वी पर घूमते हुए, तपस्वी - जिनकी आत्माओं का अवसाद दूर हो गया, भले ही उन्होंने अपना भाग्य खो दिया, और जो अपने धर्म के मार्ग से नहीं हटे दुष्टों द्वारा पूर्वोक्त व्यवहार के बावजूद आचरण - पूर्वगामी गीत का जाप किया।The glorious Lord went on: Getting disgusted with the pleasures of sense and leaving his home and wandering over the earth, the ascetic – whose depression of spirits was gone even though he had lost his fortune, and who did not budge from his righteous course of conduct though ill-treated as aforesaid by the wicked – chanted the foregoing song.”
सुखदुःखप्रदो नान्यः पुरुषस्यात्मविभ्रमः ।
मित्रोदासीनरिपवः संसारस्तमसः कृतः ॥ ५९॥
भवार्थ:-दूसरा कोई भी किसी को दुख सुख नही देता। पुरुष का आत्म- विभ्रम ही दुख का मूल है। मित्र, सामान्यजन और शत्रुरूप संसार अज्ञान अन्धकार से ही बना है।तस्मात्सर्वात्मना तात निगृहाण मनो धिया ।
मय्यावेशितया युक्त एतावान्योगसङ्ग्रहः ॥ ६०॥
य एतां भिक्षुणा गीतां ब्रह्मनिष्ठां समाहितः ।
धारयञ्छ्रावयञ्छृण्वन्द्वन्द्वैर्नैवाभिभूयते ॥ ६१॥जो कोई भी संन्यासी के इस गीत को सुनता या सुनाता है, जो निरपेक्ष के वैज्ञानिक ज्ञान को प्रस्तुत करता है, और जो इस पर पूर्ण ध्यान से ध्यान करता है, वह फिर कभी भौतिक सुख और संकट के द्वंद्व से अभिभूत नहीं होगा।Anyone who listens to or recites to others this song of the sannyāsī, which presents scientific knowledge of the Absolute, and who thus meditates upon it with full attention, will never again be overwhelmed by the dualities of material happiness and distress.
इति श्रीमद्भागवतपुराणान्तर्गतम् अध्याय २३ स्कंध ११ भिक्षुगीता ॥

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