विष्णुपुराण
इसका उच्चारण करते हुए दिन अथवा रात्रिमें किसी समय भी अन्धकारमें जानेसे सर्प नहीं काटता तथा इसका स्मरण करके भोजन करनेवालेका खाया हुआ विष भी घातक नहीं होता।
#विष्णुपुराण-३।४।१३
भगवान् विष्णुके चरणनखसे निकले हुए गंगा
जलका माहात्म्य - वह कामनापूर्वक केवल स्नानादि कार्यों में ही उपयोगी हो-सो नहीं, अपितु, बिना कामनाके मृतक पुरुषके अस्थि, चर्म, स्नायु अथवा केश आदिका स्पर्श हो जानेसे या उसके शरीरका कोई अंग गिरनेसे भी वह देहधारीको तुरंत स्वर्गमें ले जाता है।"
'भोगोंकी #तृष्णा उनके भोगनेसे कभी शान्त नहीं होती, बल्कि घृताहुतिसे अग्निके समान वह बढ़ती ही जाती है। सम्पूर्ण पृथिवीमें जितने भी धान्य, यव, सुवर्ण, पशु और स्त्रियाँ हैं वे सब एक मनुष्यके लिये भी सन्तोषजनक नहीं हैं, इसलिये
तृष्णाको सर्वथा त्याग देना चाहिये।जिस समय कोई पुरुष किसी भी प्राणीके लिये पापमयी भावना नहीं करता, उस समय उस समदर्शीके लिये सभी दिशाएँ सुखमयी हो जाती हैं।दुर्मतियोंके लिये जो अत्यन्त दुस्त्यज है तथा #वृद्धावस्था में भी जो शिथिल नहीं होती, बुद्धिमान् पुरुष उस तृष्णाको त्यागकर सुखसे परिपूर्ण हो जाता है।अवस्थाके जीर्ण होनेपर केश और दाँत तो जीर्ण हो जाते हैं किन्तु जीवन और धनकी आशाएँ उसके जीर्ण होनेपर भी नहीं जीर्ण
होतीं।विषयों में आसक्त रहते हुए मुझे एक सहस्र वर्ष बीत गये, फिर भी नित्य ही उनमें मेरी कामना होती है।- रजा #ययाति
#विष्णुपुराण-४/१०
पर्वदिनोंमें स्त्रीगमन करनेसे धन की हानि होती है; दिनमें करनेसे पाप होता है ,पृथिवी पर करनेसे रोग होते हैं और जलाशय में स्त्री प्रसंग करनेसे #अमंगल होता है।
#विष्णुपुराण
जिसका योग इस प्रकारके विशिष्ट धर्मसे युक्त होता हैवह #मुमुक्षु_योगी कहा जाता है। जब मुमुक्षु पहले-पहले योगाभ्यास आरम्भ करता है तो उसे #योगयुक्त_योगी कहते हैं और जब उसे परब्रह्मकी प्राप्ति हो जाती है तो वह #विनिष्पन्नसमाधि कहलाता है। यदि किसी उस #योगयुक्त योगीका चित्त दूषितहो जाता है तो जन्मान्तर में भी उसी अभ्यासको करते रहने से वह मुक्त हो जाता है । विनिष्पन्नसमाधि योगी तो योगाग्नि से कर्म समूहके भस्म हो जाने के कारण उसी जन्ममें थोड़े ही समयमें #मोक्ष प्राप्त कर लेता है।
#विष्णुपुराण
अविकाराय शुद्धाय नित्याय परमात्मने
सदैकरूपरूपाय विष्णवे सर्वजिष्णवे।
नमो हिरणगर्भाय हरये शंकराय च
वासुदेवाय ताराय सर्गस्थित्यन्तकारिणे।।
श्री विष्णुपुराण 2/1-2
जो ब्रह्मा,विष्णु और शंकर रूपसे जगत् की उत्पत्ति,स्थिति और संहारके कारण हैं तथा भक्तोंको संसार-सागरसे तारने वाले हैं,उन विकाररहित,शुद्ध,अविनाशी,परमात्मा,सर्वदा एकरस,सर्वविजयी भगवान् वासुदेव विष्णु को नमस्कार है।
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