भगवत गीता - संक्षेप मे

भगवान कहते हैं-
अंतःकरण का निग्रह,इंद्रियों को वश में करना,धर्मपालन के लिए कष्ट सहना,बाहरभीतर से शुद्ध रहना,दूसरों के अपराधों को क्षमा करना, सरलता रखना,वेद का ज्ञान,ईश्वर में श्रद्धा,परमात्मा के तत्त्व का अनुभव-ये सबकेसब ही ब्राह्मण के स्वाभाविक कर्म हैं।
-गीता१८.४२

#जयश्रीकृष्ण 
God says-
 The conscience of conscience, subdue the senses, suffer suffering for piety, remain pure from outside, forgive the transgressions of others, keep it simple, knowledge of the Vedas, reverence in God, experience of the essence of God - all these are the Brahmin  Are natural deeds.

भगवान तामस सुख का वर्णन करते हैं-
जो सुख भोगकाल में तथा परिणाम में भी आत्मा को मोहित करने वाला है, वह निद्रा, आलस्य और प्रमाद से उत्पन्न होनेवाला सुख तामस कहा गया है। (तामस पुरुष को निद्रा,आलस्य और प्रमाद से सुख मिलता है ) 
-गीता१८.३९ 

#जयश्रीकृष्ण 
Lord Tamas describes happiness -
 The pleasure which enchants the soul in the time of enjoyment and also in the result, that pleasure arising out of sleep, laziness and delusion is said to be tamas.  (Tamas Purush gets pleasure from sleep, laziness and happiness)

भगवान सुख के भेद बताते हैं-
हे भरतश्रेष्ठ अर्जुन! अब तीन प्रकार के सुख को भी तू मुझसे सुन। जिस सुख में साधक मनुष्य भजन, ध्यान और सेवादि के अभ्यास से रमण करता है और जिससे दुःखों के अंत को प्राप्त हो जाता है,वह सुख सात्त्विक कहा गया है। 
 -गीता१८.३६ 

#जयश्रीकृष्ण 
God explains the secrets of happiness -
 O Bharatshrestha Arjuna!  Now you also hear from me three types of happiness.  The happiness in which a seeker makes Ramana through the practice of hymns, meditation and sevadi, and thereby attains the end of sorrows, is said to be happiness sattvik

भगवान सात्त्विकीबुद्धि के लक्षण बतारहे हैं-
हे पार्थ !जो बुद्धि प्रवृत्तिमार्ग(गृहस्थ में फल-आसक्ति त्यागकर)और निवृत्तिमार्ग को(देहाभिमान त्यागकर परमात्मा में एकीभाव),कर्तव्य और अकर्तव्य को,भय और अभय को, बंधन और मोक्ष को जानती है-वह बुद्धि सात्त्विकी है।
-गीता१८.३०

Lord Sattvika shows the signs of intelligence -
 O Partha! The one who knows the wisdom instinct (by renouncing fruit and attachment in the householder) and the nivitti marg (renunciation of the deity and unification of God), duty and non-sense, fear and fear, bondage and salvation - that intellect is sattvikti.

भगवान सात्त्विक ज्ञान का वर्णन कहते हैं-
जिस ज्ञान के द्वारा साधक पृथक-पृथक सब प्राणियों  में विभागरहित  एक अविनाशी परमात्मभाव (सत्ता)  को  समभाव से स्थित देखता है, उस ज्ञान को तुम  सात्त्विक समझो। 
-गीता१८.२० 

#जयश्रीकृष्ण 
The description of Lord Sattvic knowledge says-
 The knowledge through which a seeker sees an indestructible divine spirit (power) in all the separate beings without department, is situated in a sense, that knowledge should be considered as sattvik.

भगवान कहते हैं-
जिस पुरुष के अन्तःकरण में अहंकृतभाव (  'मैं कर्ता हूँ' ऐसा भाव)  नहीं है तथा जिसकी बुद्धि सांसारिक पदार्थों में और कर्मों में लिपायमान नहीं होती, वह पुरुष इन सब लोकों को मारकर भी वास्तव में न तो मारता  है और न पाप से बँधता है। 
-गीता १८.१७  

God says-
 A man whose conscience does not have egoism ('I am the doer' such a sense) and whose wisdom is not present in worldly things and in deeds, that man does not actually kill and kill all these realms, nor is he bound by sin.

भगवान कहते हैं-
कर्मफल का त्याग न करने वाले मनुष्यों के कर्मों का तो इष्ट, अनिष्ट और मिश्रित- ऐसे तीन प्रकार का फल मरने के पश्चात अवश्य होता है, किन्तु कर्मफल का त्याग कर देने वाले मनुष्यों के कर्मों का फल किसी काल में भी नहीं होता। 

-गीता १८.१२   
Bhagvan said ,The deeds of human beings who do not renounce their karma are favored, forbidden and mixed - three such fruits do happen after death, but the deeds of human beings who renounce their karma do not have any fruit in any time.

गीता (अध्याय १०)-
अहमात्मा गुडाकेश सर्वभूताशयस्थित:।
अहमादिश्च मध्यं च भूतानामन्त एव च।। २०।।
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हे नींद को जीतनेवाले अर्जुन ! मैं सब जीवोंके हृदय में स्थित सबका आत्मा हूँ। तथा सम्पूर्ण जीवोंका आदि, मध्य और अन्त भी मैं ही हूँ।
O Arjuna, the conqueror of sleep!  I am the soul of everyone located in the heart of all living beings.  And I am the beginning, middle and end of all living beings.
-भगवान श्रीकृष्ण।

श्रुतिविप्रतिपन्ना ते यदा स्थास्यति निश्र्चला |
समाधावचला बुद्धिस्तदा योगमवाप्स्यसि ||

अर्थ – हे पार्थ, जब तुम्हारा मन कर्मों के फलों से प्रभावित हुए बिना वेदों के ज्ञान से विचलित हुए बिना आत्मसाक्षात्कार की समाधि में स्थिर हो जायेगा तब तुम्हें दिव्य चेतना की प्राप्ति हो जायेगी| 



योगस्थः कुरु कर्माणि सङ्गं त्यक्त्वा धनञ्जय |
सिद्धयसिद्धयोः समो भूत्वा समत्वं योग उच्यते ||

अर्थ – श्री कृष्ण कहते हैं कि हे अर्जुन सफलता और असफलता की आसक्ति को त्यागकर सम्पूर्ण भाव से समभाव होकर अपने कर्म को करो| यही समता की भावना योग कहलाती है|

श्रीभगवानुवाच
प्रजहाति यदा कामान्सर्वान्पार्थ मनोगतान् |
आत्मन्येवात्मना तुष्टः स्थितप्रज्ञस्तदोच्यते ||
भवार्थ:-
हे पार्थ, जब कोई मानव समस्त इन्द्रियों की कामनाओं को त्यागकर उन पर विजय प्राप्त कर लेता है मन आत्मा में संतोष की प्राप्ति कर लेता है तब उसे दिव्य चेतना की प्राप्ति हो जाती है| 
 O Partha, when a man renounces the desires of all the senses and overcomes them, the mind attains contentment in the Self, then he attains the divine consciousness.


ध्यायतो विषयान्पुंसः सङ्गस्तेषूपजायते।
सङ्गात्संजायते कामः कामात्क्रोधोऽभिजायते॥

अर्थ : - विषयों (वस्तुओं) के बारे में सोचते रहने से मनुष्य को उनसे आसक्ति हो जाती है। इससे उनमें कामना यानी इच्छा पैदा होती है और कामनाओं में विघ्न आने से क्रोध की उत्पत्ति होती है।
By thinking about the subjects (objects) one gets attached to them.  This creates desire in them, and the disturbance in desires gives rise to anger.


श्रद्धावान्ल्लभते ज्ञानं तत्पर: संयतेन्द्रिय:।
ज्ञानं लब्ध्वा परां शान्तिमचिरेणाधिगच्छति॥
अर्थ:-
श्रद्धा रखने वाले अपनी इन्द्रियों पर संयम रखने वाले मनुष्य, साधनपारायण हो अपनी तत्परता से ज्ञान प्राप्त कते हैं, फिर ज्ञान मिल जाने पर जल्द  भगवत्प्राप्तिरूप परम शान्ति को प्राप्त होते हैं। 

त्रिविधं नरकसयेदँ  द्वारं नाशनमात्मनः।
कामः क्रोधस्तथा लोभस्तस्मादेतत्रयं त्यजेत।।
अर्थ:-
श्री कृष्ण कहते हैं कि नरक के तीन द्वार हैं काम,क्रोध,लोभ।आत्मा को अधोगति में ले जाने वाले ये तीनों विकार हैं। काम, क्रोध व लोभ आत्मा का नाश कर देते हैं। इसलिए इन तीनों दोषों का नाश कर देना चाहिए।

 अपि चेत्सुदुराचारो भजते मामनन्यभाक।
साधुरेव स मन्तव्यः सम्यग्ववसितो हि सः।।

भावार्थ: भगवान श्री कृष्ण अर्जुन से कहते हैं कि यदि कोई बहुत ही दुराचारी व्यक्ति भी प्रेम व भक्ति के अनन्य भाव से हमको भजता है तो वह साधु है। क्योंकि उसने निश्चय कर लिया है कि कृष्ण भजन के समान कुछ नहीं।
Lord Shri Krishna tells Arjuna that if even a very evil person worships us with an exclusive feeling of love and devotion, then he is a sage.  Because he has decided that there is nothing like Krishna Bhajan.

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