अवधूत गीता
अवधूत गीता भगवान् दत्तात्रेय के अपूर्व वचनो का ग्रन्थ है। जिसमे जीव के वास्तविक मूल स्वरुप का उपदेश किया गया है। आज से हम 10 श्लोको का प्रतिदिन हिंदी अनुवाद देने जा रहे है। आशा है की सभी मुमुक्षु जन इससे लाभ उठावेंगे।।
महान् भय से रक्षा करने वाली अद्वैत की वासना मनुष्यों में, विप्रों में ईश्वर के अनुग्रह (कृपा) से ही उत्पन्न होती है॥२॥
यह दृश्यमान सम्पूर्ण जगत जिस आत्मा द्वारा आत्मा से आत्मा में ही पूर्ण हो रहा है उस निराकार (ब्रह्म) का मैं किस प्रकार वन्दन करूँ क्योंकि वह (जीव से) अभिन्न है, कल्याण स्वरूप है, (तथा) अव्यय है॥३॥
यह विश्व पाँच भूतों का समुदाय हैं जो मृगतृष्णा के जल के समान मिथ्या भी है। मैं एक ही निरन्जन (निर्दोष) हूँ। फिर मैं किसको नमस्कार करूँ॥४॥
यह आत्मा ही सर्वरूप है तथा केवल है जिसमें भेद और अभेद विद्यमान नहीं है- इसे मैं ‘है’ अथवा ‘नहीं है’ किस प्रकार कहूँ। मुझे यह आश्चर्य रूप प्रतीत होता है॥५॥
वेदान्त का सार ही हमारा सर्वस्व है और वही ज्ञान एवं विज्ञान है। मैं आत्मा हूँ, निराकार हूँ तथा स्वभाव से ही सर्वव्यापी हूँ॥६॥
जो सर्वस्वरूप देव ( ब्रह्म) है वह अवयव रहित,आकाश के सदृश, स्वभाव से निर्मल एवं शुद्ध है। वही मैं हूँ, इसमें संशय नहीं है॥७॥
मैं निश्चय ही नाश रहित, अनन्त एवं शुद्ध विज्ञान स्वरूप हूँ। मैं सुख-दु:ख को नहीं जानता हूँ कि ये किसको व किस प्रकार होते हैं॥८॥
मन के द्वारा किये गये शुभ व अशुभ कर्म मेरे नहीं हैं, न शरीर द्वारा किये गये शुभाशुभ कर्म मेरे हैं, वाणी द्वारा किये गये शुभाशुभ कर्म भी मेरे नहीं हैं। मैं शुद्ध, ज्ञानामृत एवं इन्द्रियों का अविषय हूँ॥९॥
निश्चय ही यह मन गगन के आकार वाला है तथा इसके सभी ओर मुख हैं, मन से पार कुछ भी नहीं है, मन ही सब कुछ है किन्तु यह मन भी परमार्थ से सत्य नहीं है॥१०
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