शिव मानस पूजा

 (भगवान शिव योग मुद्रा)

आदि गुरु शंकराचार्यद्वारा रचित शिव मानस पूजा शिवकी एक अनूठी स्तुति है । यह स्तुति शिव भक्ति मार्गको अत्यधिक सरलताके साथ ही एक अत्यंत गूढ रहस्यको समझाता है । शिव मात्र भक्तिद्वारा प्राप्त हो सकते हैं, उनकी भक्ति हेतु बाह्य आडम्बरकी कोई आवश्यकता नहीं है । इस स्तुतिमें हम प्रभूको भक्तिद्वारा मानसिक रूपसे कल्पनाकी हुई वस्तुएं समर्पित करते हैं । हम उन्हें रत्न जडित सिहांसनपर आसीन करते हैं, वस्त्र, नैवेद्य तथा भक्ति अर्पण करते हैं; परन्तु ये सभी हम स्थूल रूपमें नहीं अपितु मानसिक रूपमें अर्पण करते हैं । इस प्रकार हम स्वयंको शिवको समर्पित कर शिव स्वरूपमें विलीन हो जाते हैं ।

Shiva Manas Puja composed by Adi Guru Shankaracharya is a unique praise of Shiva. This hymn explains the path of Shiva-bhakti with great ease and a very deep secret. Shiva can be attained only by devotion, there is no need for outward pomp for his devotion. In this praise we offer things conceived mentally to the Lord by devotion. We make him sit on a stone studded throne, offer clothes, naivedya and devotion; But all these we offer not in physical form but in mental form. In this way we surrender ourselves to Shiva and merge into the form of Shiva.

रत्नैः कल्पितमासनं हिमजलैः स्नानं च दिव्याम्बरं ।
नानारत्नविभूषितं मृगमदामोदाङ्कितं चन्दनम् ।।
जातीचम्पकबिल्वपत्ररचितं पुष्पं च धूपं तथा ।
दीपं देव दयानिधे पशुपते हृत्कल्पितं गृह्यताम् ।। १

अर्थ : हे दयानिधे, हे पशुपते, मैंने आपके लिए एक रत्नजडित सिहांसनकी कल्पना की है, स्नानके लिए हिमालय सम शीतल जल, नाना प्रकारके रत्नजडित दिव्य वस्त्र  तथा कस्तूरी, चन्दन, बिल्व पत्र एवं जूही, चम्पा इत्यादि पुष्पांजलि तथा धूप-दीप ये सभी मानसिक पूजा उपहार ग्रहण   करें ।

Meaning: O Dayanidhe, O Pashupete, I have conceived for you a gem-encrusted throne, Himalaya-like cold water for bathing, divine clothes studded with various types of gems, and musk, sandalwood, bilva leaves and Juhi, Champa etc. Wreaths and incense-lamps all these mental Receive worship gifts.


सौवर्णे नवरत्नखण्डरचिते पात्रे घृतं पायसं ।
भक्ष्यं पञ्चविधं पयोदधियुतं रम्भाफलं पानकम् ।।
शाकानामयुतं जलं रुचिकरं कर्पूरखण्डोज्ज्वलं ।
ताम्बूलं मनसा मया विरचितं भक्त्या प्रभो स्वीकुरु ।। २

अर्थ : हे महादेव ! मैंने अपने मनमें नवीन रत्नखण्डोंसे जडित स्वर्ण पात्रोंमें घृतयुक्त खीर, दूध एवं दहीयुक्त पांच प्रकारके व्यंजन, रम्भा फल एवं शुद्ध मीठा जल ताम्बुल और कर्पूरसे सुगन्धित धूप आपके लिए प्रस्तुत किया है । हे प्रभू ! मेरी इस भक्तिको स्वीकार करें ।

Meaning: O Mahadev! I have presented to you in my mind five types of dishes containing ghee, milk and curd in golden vessels studded with new gemstones, Rambha fruit and pure sweet water, tambul and incense scented with camphor. O Lord! Accept this devotion of mine.

छत्रं चामरयोर्युगं व्यजनकं चादर्शकं निर्मलम् ।
वीणाभेरिमृदङ्गकाहलकला गीतं च नृत्यं तथा ।।
साष्टाङ्गं प्रणतिः स्तुतिर्बहुविधा ह्येतत्समस्तं मया ।
सङ्कल्पेन समर्पितं तव विभो पूजां गृहाण प्रभो ।। ३

अर्थ : हे प्रभो ! मैंने सकंल्पद्वारा आपके लिए एक छ्त्र, दो चंवर, पंखा एव निर्मल दर्पणकी कल्पना की है । आपको साष्टाङ्ग प्रणाम करते हुए तथा वीणा, भेरी एवं मृदङ्गके साथ गीत, नृत्य एवं बहुदा प्रकारकी स्तुति प्रस्तुत करता हूं । हे प्रभो ! मेरी इस पूजाको ग्रहण करें ।

Meaning: O Lord! I have imagined for you one umbrella, two chanvars, fan and pure mirror through sankalp. I offer you songs, dances and many types of praise with veena, bheri and mridang while bowing down to you. Oh, Lord ! Receive this worship of mine.

आत्मा त्वं गिरिजा मतिः सहचराः प्राणाः शरीरं गृहं ।
पूजा ते विषयोपभोगरचना निद्रा समाधिस्थितिः ।।
सञ्चारः पदयोः प्रदक्षिणविधिः स्तोत्राणि सर्वा गिरो ।
यद्यत्कर्म करोमि तत्तदखिलं शम्भो तवाराधनम् ।। ४

अर्थ : हे शम्भो ! आप मेरी आत्मा हैं, मां भवानी मेरी बुद्धि हैं, मेरी इन्द्रियां आपके गण हैं एवं मेरा शरीर आपका गृह है । सम्पूर्ण विषय-भोगोंकी रचना आपकी ही पूजा है । मेरी निद्राकी स्थिति समाधि स्थिति है, मेरा चलना आपकी ही परिक्रमा है, मेरे शब्द आपके ही स्तोत्र हैं । वस्तुतः मैं जो भी करता हूं, वह सब आपकी आराधना ही है ।

Meaning: O Shambho! You are my soul, Maa Bhavani is my intellect, my senses are yours and my body is your home. The creation of all the objects and pleasures is your worship. My state of sleep is the state of samadhi, my walk is your circumambulation, my words are your hymns. In fact, whatever I do, it is all your worship.

करचरण कृतं वाक्कायजं कर्मजं वा ।
श्रवणनयनजं वा मानसंवापराधम् ।।
विहितमविहितं वा सर्वमेतत्क्षमस्व ।
जय जय करुणाब्धे श्रीमहादेवशम्भो ।।  ५

अर्थ : हे प्रभो ! मेरे हाथ या पैरद्वारा, कर्मद्वारा, वाक्य या श्रवणद्वारा या मनद्वारा हुए समस्त विहित अथवा अविहित अपराधोंको क्षमा करें । हे करुणामय महादेव ! शम्भो ! आपकी सदा जय हो ।

Meaning: O Lord! Forgive me by my hand or foot, by action, by sentence or by hearing or by mind, for all the offenses prescribed or unspecified. O merciful Mahadev! Shambho! Glory to you always

.. इति श्रीमच्छङ्कराचार्यविरचिता शिवमानसपूजा समाप्ता ।

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