सन्यासी के लिए
विजानन्ति महावाक्यं गुरोश्चरणसेवया
ते वै संन्यासिनः प्रोक्ता इतरे वेषधारिणः.!!
अर्थात्
गुरुदेव के श्रीचरणों की सेवा करके महावाक्य के अर्थ को जो समझते हैं, वे ही सच्चे संन्यासी हैं, अन्य तो मात्र वेशधारी है।
उद्धरेदात्मनात्मानं नात्मानमवसादयेत्।
आत्मैं ह्यात्मनों बन्धुरात्मैव रिपुरात्मनः ॥
आत्मा ही आत्मा का सबसे प्रिय मित्र है और आत्मा ही आत्मा का परम शत्रु भी है इसलिए आत्मा का उद्धार करना चाहिए, विनाश नहीं| जिस व्यक्ति ने आत्मज्ञान से इस आत्मा को जाना है उसके लिए आत्मा मित्र है |
The soul is the dearest friend of the soul and the soul is also the ultimate enemy of the soul, so the soul should be saved, not destroyed. The soul is a friend for the person who has come to know this soul through self-knowledge.
यदा ते मोहकलिलं बुद्धिर्व्यतितरिष्यति |
तदा गन्तासि निर्वेदं श्रोतव्यस्य श्रुतस्य च ||
अर्थ – श्री कृष्ण कहते हैं कि हे अर्जुन जब तुम्हारी बुद्धि इस मोहमाया के घने जंगल को पार कर जाएगी तब सुना हुआ या सुनने योग्य सब कुछ से तुम विरक्त हो जाओगे|
Shri Krishna says that O Arjuna, when your intellect crosses this dense forest of illusion, then you will become detached from everything that is heard or heard.
समं पश्यन्हि सर्वत्र समवस्थितमिश्र्वरम् |
न हिनस्त्यात्मनात्मानं ततो याति परां गतिम् |
भावार्थ:-
जो व्यक्ति परमात्मा को सर्वत्र तथा प्रत्येक जीव में समान रूप से वर्तमान देखता है, वह अपने मन के द्वारा अपने आपको भ्रष्ट नहीं करता | इस प्रकार वह दिव्य गन्तव्य को प्राप्त करता है |
One who sees God as present everywhere and equally present in every living being, he does not corrupt himself by his mind. Thus he attains the divine destination.
उद्धरेदात्मनात्मानं नात्मानमवसादयेत्।
आत्मैं ह्यात्मनों बन्धुरात्मैव रिपुरात्मनः ॥
भवार्थ:-अपने द्वारा अपना संसार-समुद्र से उद्धार करे और अपने को अधोगति में न डाले क्योंकि यह मनुष्य आप ही तो अपना मित्र है और आप ही अपना शत्रु है॥
Elevate yourself through the power of your mind, and not degrade yourself, for the mind can be the friend and also the enemy of the self.
प्रजहाति यदा कामान्सर्वान्पार्थ मनोगतान् |
आत्मन्येवात्मना तुष्टः स्थितप्रज्ञस्तदोच्यते ||
जब कोई मानव समस्त इन्द्रियों की कामनाओं को त्यागकर उनपर विजय प्राप्त कर लेता है| जब मनुष्य का मन आत्मा में संतोष की प्राप्ति कर लेता है तब उसे विशुद्ध दिव्य चेतना की प्राप्ति हो जाती है|
When a man gives up the desires of all the senses and gets victory over them. When a man's mind attains contentment in the soul, then he attains pure divine consciousness.
कर्मजं बुद्धियुक्ता हि फलं त्यक्त्वा मनीषिणः |
जन्मबन्धविनिर्मुक्ताः पदं गच्छन्त्यनामयम् ||
अर्थ -हे अर्जुन, ईश्वरभक्ति में बड़े बड़े ऋषि व मुनि खुद को इस भौतिक संसार के कर्म और फल के बंधनों से मुक्त कर जीवन और मरण के बंधनो से भी मुक्ति पा लेते है| जो समस्त दुःखों से परे है|
Meaning - O Arjuna, great sages and sages in devotion to God free themselves from the shackles of karma and fruits of this material world and also get freedom from the shackles of life and death. One who is beyond all sorrows.
एवं प्रवर्तितं चक्रं नानुवर्तयतीह यः ।
अघायुरिन्द्रियारामो मोघं पार्थ स जीवति ॥
जो पुरुष इस लोक में सृष्टिचक्र के अनुकूल अपने कर्तव्य का पालन नहीं करता इन्द्रिय भोगों में रमण करने वाला पुरुष व्यर्थ ही जीता है। आपके इस धरती के प्रति बहुत से कर्तव्यों का निश्चय ही पालन होना चाहिए।
The man who does not perform his duty in this world according to the world cycle, a person who enjoys the pleasures of the senses, lives in vain. You definitely have to perform many duties towards this earth.
अक्षयं गतसन्ताप-मात्मानं पश्यतो मुनेः।
क्व विद्या च क्व वा विश्वंक्व देहोऽहं ममेति वा॥
भावार्थ:- जो मुनि संताप से रहित अपने अविनाशी स्वरुप को जानता है,उसके लिए विद्या कहाँ और विश्व कहाँ अथवा देह कहाँ और मैं-मेरा कहाँ॥
Where is the knowledge and where is the world or where is the body and where is the I-mine for the sage who knows his imperishable form without suffering?
यो न हृष्यति न द्वेष्टि न शोचति न काङ्क्षति।
शुभाशुभपरित्यागी भक्तिमान्यः स मे प्रियः।।
~"जो न हर्षित होता है और न द्वेष करता है न शोक करता है और न आकांक्षा तथा जो शुभ और अशुभ को त्याग देता है वह भक्तिमान् पुरुष मुझे प्रिय है"
श्रीमद्भागवद्गीता
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