पद्मपुराण
गयामें पिण्डदान से बढ़कर दूसरा कोई दान नहीं है;
क्योंकि वहाँ एक ही पिण्ड देनेसे पितर तृप्त होकर
मोक्षको प्राप्त होते हैं। कोई-कोई मुनीश्वर अन्नदानको
श्रेष्ठ बतलाते हैं और कोई वस्त्रदानको उत्तम कहते
हैं।वस्तुतः गयाके उत्तम तीर्थों में मनुष्य जो कुछ भी
दान करते हैं, वह धर्मका हेतु और श्रेष्ठ कहा
गया है।
#पद्मपुराण
एक ओर #अकिंचनता और दूसरी ओर राज्यको तराजू पर रख कर तोला गया तो राज्यकी अपेक्षा अकिंचनताका ही पलड़ा भारी रहा; इसलिये जितात्मा पुरुष के लिये कुछ भी संग्रह न करना ही श्रेष्ठ है।
#पद्मपुराण
तृष्णारूपी सूईसे संसाररूपी सूत्रका विस्तार होता है।तृष्णाका कहीं ओर-छोर नहीं है, उसका पेट भरना कठिन होता है; वह सैकड़ों दोषोंको ढोये फिरती है; उसके द्वारा बहुत-से अधर्म होते हैं। अतः #तृष्णा का परित्याग ही उचित है।
वृक्ष पुत्रहीन पुरुषको पुत्रवान् होनेका फल देते हैं। इतना ही नहीं, वे अधिदेवतारूपसे तीर्थों में जाकर वृक्ष लगानेवालोंको पिण्ड भी देते हैं।अतः भीष्म! तुम यत्नपूर्वक पीपलके वृक्ष लगाओ। वह अकेला ही तुम्हें एक हजार पुत्रोंका फल देगा।पीपलका पेड़ लगानेसे मनुष्य धनी होता है। अशोक शोकका नाश करनेवाला है। पाकड़ यज्ञका फल देनेवाला बताया गया है। नीमका वृक्ष आयु प्रदान करनेवाला माना गया है। जामुन कन्या देनेवाला कहा गया है। अनारका वृक्ष पत्नी प्रदान करता है। पीपल रोगका नाशक और पलाश ब्रह्मतेज प्रदान करनेवाला है।विद्या भी अरण्य के आँक्सीजन में ज्यादा फलीभूत होती है।
यानी ऋग्वेद से लेकर पुराण, उपनिषद और महाकाव्य सब के सब पृथ्वी, जलवायु, आकाश और मनुष्य और प्रकृति प्रेमी।
#पद्मपुराण
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