आत्मा क्या है ?

 आत्मा क्या है ? आत्मा(तत्त्वमसि) सत चित आनन्द स्वारूप है।

सत -जो बदलता नही

चित- प्रकाश, ज्ञान स्वारूप

आनंद- बिना दुख के

लगभग सभी धर्म सम्प्रदायों के अध्यात्मिक ग्रंथो तथा आप्त पुरुषों ने आत्मा के अस्तित्व को स्वीकारा है । आदि शंकराचार्य के अनुसार वेदों में कहा गया है कि -

'प्रज्ञानं ब्रह्म ' अर्थात ज्ञान ही ब्रह्म है - ऋग्वेद , ऐतरेय उपनिषद ३ /१/३

'तत्वमसि ' - अर्थात वह ब्रह्म तू ही है - सामवेद, छान्दोग्य उपनिषद ६ /८ / ७

'ऐयात्मा ब्रह्म ' - अर्थात यह आत्मा ही ब्रह्म है, अथर्ववेद , मांडूक्य उपनिषद मन्त्र २

'अहम् ब्रह्मसिम ' - अर्थात मैं ब्रह्म हूँ - यजुर्वेद बृहदारण्यक उपनिषद १ / ४ ०

आत्मा को ही ब्रह्म कहा गया है तथा यह भी कि प्रतेयक  प्राणी के शारीर में व्याप्त आत्मा अजर , अमर , नित्य , अनादि अविनाशी तथा प्रकाश स्वरुप है । शारीर के मृत हो  जाने पर भी यह आत्मा नहीं मरती । आत्मा का अस्तित्व बना रहता है ।

आत्मा ( The soul ) का विचार सम्भवतः सबसे पहले आर्य ऋषियों के मन में ही आया । उन्होने  अनुभव किया कि जो कुछ भी हमारी दृष्टि में  आता है , हम देखते हैं , छूते  हैं सब परिवर्तन शील है नष्ट हो जाने वाला है । यह आज है कल नहीं रहेगा ।  उन्होंने  इन सभी पदार्थों को जड़  ( Inert )  कहा । उन्होंने यह भी अनुभव किया  कि न तो हम अपनी ईच्छा  के अनुसार जन्म ले सकते हैं , न मृत्यु को प्राप्त हो सकते हैं । ऐसा क्यों होता है ? कौन सी ऐसी  शक्ति है जो हमारे शारीर के अंगों को संचालित     ( Activate )  करती है । सम्भवतः कोई अदृश्य शक्ति शारीर में विद्यमान है , जो  शरीर  को  गतिशील तथा चैतन्य बनाये रखती है ।  तथा जब वह निकल जाती है तब यद्यपि भौतिक शरीर तो रहता है , परन्तु उसके सभी अंग , सभी इन्द्रियां काम करना बंद कर देती हैं  तथा शरीर को मृत कहा जाता है । महर्षि कपिल ने उस अदृश्य शक्ति को 'आत्मा ' का नाम दिया तथा आत्मा को एक  मूलभूत  तत्व कहा को चैतन्य तथा क्रियाशील ( Conscious ) है । समस्त ब्रह्माण्ड कि रचना इन्हीं जड़  तथा चेतन तत्वों के संयोग से हुई है ।

दक्षिण भारत के प्रसिद्ध संत महर्षि रमण कहते हैं कि यह समस्त संसार ही हमारी निराकार, अपरिवर्तनशील आत्मा का विस्तार है । “The initial position is that Atma, the self or spirit, alone is and is manifested in all the forms of the Universe and in your being, without ever ceasing from  its formless, changekess state.”

अध्यात्मिक ग्रंथों में आत्मा को एक अत्यंत सूक्ष्म , चैतन्य ,आकाश कि भांति व्यापक तत्व कहा गया है जिसके  १ ७  अंग कहे गए हैं । पञ्च ज्ञानेन्द्रियाँ जिनसे हम  ज्ञान प्राप्त करते हैं जैसे आँख , नाक , कान ,जिव्हा तथा त्वचा , पञ्च कर्मेन्द्रियाँ   जैसे  हाथ, पैर , वाणी ,लिंग और गुदा । पञ्च प्राण जैसे अपान ,व्यान ,समान , उदान  तथा प्राण । मन और बुद्धि । ऐसा कहा गया है कि आत्मा मनुष्य कि जागृत अवस्था में इस स्थूल शारीर में रहते हुए  उपर्युक्त अंगों के द्वारा  बाहरी जगत से संपर्क साधती है ।  आत्मा को  चैतन्य तथा अजर और अमर कहा गया है  और शरीर को जड़  किन्तु शरीर के बिना आत्मा पंगु है ।

श्रीमद्भागवत गीता में भगवन श्री कृष्ण कहते हैं " समोहम सर्व भूतेषु ........." अ ९/२ ९ मैं सभी जीवधारियों में समान  रूप से व्याप्त हूँ ।

ब्रह्मसूत्र ( वेदांत दर्शन ) अ २ पाद ३ के १ ६ वें सूत्र में कहा गया है कि यह  जीवात्मा वास्तव में परमेश्वर का अंश , जीवन मरण से  रहित , विज्ञानं स्वरुप , नित्य अविनाशी है , इसमें कोई शंका नहीं है । तो भी यह अनादि परम्परागत अपने कर्मों के अनुसार प्राप्त हुए  स्थावर अर्थात वृक्ष , पहाड़  आदि तथा जंगम अर्थात देव , मनुष्य तथा पशु - पक्षी आदि शरीरों के आश्रित हैं ।

यदि यह चेतन तत्व आत्मा - देव ,मनुष्य , पशु -पक्षी , पहाड़  आदि समस्त में व्याप्त है तो फिर समस्त संसार चेतनामय हुआ । फिर जड़ पदार्थ क्या हैं ? वास्तव में भूल वहीँ होती है जब चैतन्य आत्मा को जड़ से अलग सिद्ध करने की कोशिश होती है । विज्ञानं की  दृष्टि से सभी पदार्थ ऊर्जा का रूप हैं अतः यह समस्त संसार ही चेतनामय है , जड़ कुछ भी नहीं । 

आदि शंकराचार्य ने भी कहा है - न यहाँ कुछ है, न वहाँ कुछ है । जहाँ जहाँ जाता हूँ न वहाँ कुछ है । विचार करके देखता हूँ तो न जगत ही कुछ है। अपनी आत्मा (चैतन्यता ) के ज्ञान के परे कुछ भी नहीं है ।

आत्मा का स्वरुप तथा गुण

यदि हम आत्मा के परमाणु से भी सूक्ष्म स्वरुप को समझ सकें तो विज्ञानं के नियमों के अंतर्गत   उसके अदृश्य , चैतन्य ,अविनाशी ,प्रकाश स्वरुप का होना जिसमें असीमित ऊर्जा समाहित होती है, भी सरलता से समझ सकते हैं ।

    कठोपनिषद के प्रथम अध्याय कि द्वितीय वल्ली में आत्मा के स्वरुप को बतलाते हुए कहा गया है कि प्रक्रित पर्यन्त जो भी सुक्चमतिसूक्ष्म तत्व है , यह आत्म तत्व उससे भी सूक्ष्म है । यह इतना सूक्ष्म है कि जब तक इसको समझाने वाला कोई महापुरुष न हो , तब तक मनुष्य का इसे समझ पाना कठिन है ।

आत्मा कि सूक्ष्मता के संभंध में   शेवताश्वरुपनिषद   के अध्याय पांच में कहा गया है कि -

"बालाग्रस्तभागस्य  शतभा  कल्पितस्य च ।

भागो जीवः स विज्ञहएः स चनंत्याय  कल्पते । । ( ५ -९  )

अर्थात एक बाल की नोक के हम सौ टुकड़े कर लें , फिर उनमें से एक टुकड़े के पुनः सौ टुकड़े कर लें । उनमें से एक टुकड़ा जितना सूक्ष्म हो सकता है , उसके सामान आत्मा का स्वरुप समझना चाहिए । यह कहना भी केवल उसकी सूक्ष्मता का बोध कराने के लिए  ही है । वास्तव में चेतन और सूक्ष्म वस्तु के स्वरुप को जड़ और स्थूल कि उपमा से नहीं समझाया सकता  क्योंकि बाल  कि नोक के १ ० हज़ार  भागों में से एक भाग भी आकाश में जितने आकाश को रोकता है , अर्थात उससे भी सूक्ष्म है यह आत्मा ।



नित्यं ब्रह्मरसं पीत्वा तृप्तो यः परमात्मनि

इन्द्रं च मन्यते रंकं नृपाणां तत्र का कथा..!!

अर्थात्

हमेशा ब्रह्मरस का पान करके जो परमात्मा में तृप्त हो गया है वह इन्द्र को भी गरीब मानता है तो राजाओं की तो बात ही क्या..!!


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