आदिगुरू शन्कराचार्य का तत्व बोध
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अध्यात्म में जरा भी रूचि हो तो मोक्ष पद , परमात्म प्राप्ति, आत्म साक्षात्कार की जिज्ञासा होती है| ये जिज्ञासा इस अवस्था को हासिल करने से ज्यादा इसके बारे में जानने की होती है|
हम जानना चाहते हैं मोक्ष, आत्मज्ञान, तत्वज्ञान, परम पद, परमात्म साक्षात्कार अलग अलग हैं या एक ही अवस्था के आलग नाम? ये अवस्था मरने के पहले मिलती है या मरने के बाद? इस अवस्था से क्या लाभ? लाभ के बारे में जानना मनुष्य की सहज वृत्ति है| भारतीय दर्शन ने इस बारे में हमें काफी कुछ बताया है| हालाकि ये "अनुभव और प्राप्ति" का विषय है लेकिन इसकी चर्चा का भी अपना महत्व है| जैसे हिंसा की चर्चा से दिमाग में हिंसा से जुड़े विचार घर कर जाते हैं, वैसे ही अध्यात्म की चर्चा से माइंड उसी उसी के बारे में सोचता है| मोक्ष, आत्मज्ञान, तत्वज्ञान, परम पद, परमात्म साक्षात्कार वस्तुतः एक ही अवस्था के अलग अलग नाम हैं| क्यूंकि इस अवस्था में दूसरा कुछ रहता ही नहीं सब एक हो जाता है, इसलिए इसे ही अद्वैत भाव कहते हैं| तत्व ज्ञान यूँ तो बुद्धि से समझा जा सकता है लेकिन वास्तविक ज्ञान तो अनुभव से ही होगा| फिर भी तत्व ज्ञानियों ने इस अवस्था का अपने शब्दों में वर्णन कर हमें दिशा दिखाने की कोशिश की है| शंकराचार्य कहते हैं- सत, चित, आनंद, नाम और रूप से उत्पन्न हुआ है ये जगत| इनमे से 3 (सत, चित, आनंद) ईश्वर के शुद्ध लक्षण हैं और "नाम, रूप" परिवर्तनशील|जैसे हमारा शरीर.. इसके अंदर अद्भुद संरचनाये भी हैं तो मल-मूत्र रुपी गंदगी भी| इसके कुछ अंग दर्शनीय हैं तो कुछ अदर्शनीय और कुरूप भी| है एक ही शरीर, लेकिन कुछ भाग ऐसे हैं जो अपशिष्ट बन जाते हैं और उन्हें त्यागना पड़ता है| अज्ञानी नाम, रूप में फंसा है | ज्ञानी सत, चित, आनंद में रमण करता है| सत, चित, आनंद “आत्मा” नहीं “आत्मा” के लक्षण हैं| सत, चित आनंद की साक्षी "आत्मा" है| हम नाम-रूप को ही सब कुछ मान लेते हैं इसलिए नाम-रूप में ही लगे रहते हैं| जो नाम रूप होते हुए भी इनसे अंदर ही अंदर दूरी बना लेता है वो सत, चित, आनंद में प्रवेश करने लगता है| तत्व का बोध हो जाने पर नाम, रूप में मौजूद पंच-महाभूत से संलग्नता हट जाती है, जीव भाव खत्म होकर आत्म भाव हो जाता है|आत्मभाव में कैंसे पंहुचा जाए? सत, चित्त, आनंद से गुजर कर ही आत्म ज्ञान प्राप्त होगा| "सत, चित्त, आनंद" माया के (नाम, रूप) प्रभाव से जीव भाव प्राप्त करते हैं| तत्व को जानने के बाद नाम, रूप पंच महाभूत स्वयं से अलग नज़र आने लगते हैं|
मोक्ष प्राप्ति के ये साधन बताये गये हैं| 1- नित्य क्या है? अनित्य क्या है? इसकी जानकारी … नित्य यानि वो जो कभी नाश नहीं होता| नित्य कौन है वो सिर्फ ब्रम्ह है| वही आत्म है| इसके अलावा सब नाशवान हैं| जो बदल जाना है वो मिथ्या है| इसी बोध को "ग्रंथि भेद" कहते हैं| 2- वैराग्य, यहाँ वैराग्य का अर्थ है मोह की जगह प्रेम का भाव आ जाना| जहाँ मोह सिर्फ मांगता है वहाँ प्रेम सिर्फ देता है| वैराग्य का अर्थ विषय का त्याग नहीं बल्कि विषय से मोह हट जाना| वैराग्य का अर्थ सब कुछ छोड़ना नहीं बल्कि जो है उसके मानसिक बंधन से मुक्त हो जाना| मिले तो ठीक न मिले तो ठीक| न तो सुख भोग की इच्छा न अनिच्छा|
3- Sama, Dama, Uparama, Titiksha, Sraddha and Samadhana ..."सम" यानि मन का निग्रह, "दम" यानि इन्द्रियों का निग्रह, "उपरम" यानि अपने धर्म का पालन, "तितिक्षा" यानी सहनशीलता, "श्रद्धा "यानी ईश्वरीय ज्ञान और ज्ञान प्रदाता में विश्वास, "समाधान" यानि चित्त एकाग्रता|
4- मुमुक्षत्व - मोक्ष प्राप्ति, आत्मज्ञान की प्रबल इच्छा| ये चार साधन बेहद आसान हो जाते हैं यदि आंतरिक/ आत्म/ कुण्डलिनी/ देवात्म/ परा/ चेतना शक्ति जागृत हो जाए| तब जाग्रत शक्ति के सहयोग से आत्मज्ञान की यात्रा बहुत तेजी से आगे बढती है|
जब आत्मज्ञान हो जाता है तब भी व्यक्ति मैं ही बोलेगा, लेकिन उसका मैं तब उसकी आत्मा होगी, सामान्य अवस्था में मन ही “मैं” होता है| अधुरे ज्ञानी को भी मन ही आत्मा बनकर झूठे आत्मज्ञान का भान कराता है| “आत्म ज्ञान” के बाद व्यक्ति को संचित और होने वाले कर्मो के फल नहीं भोगने पड़ते, क्यूंकि तब करने और भोगने वाला स्वयम परमात्मा होता है| लेकिन उसके शरीर को प्रारब्ध के अच्छे और बुरे परिणाम तो भोगने ही पड़ते हैं|
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