नाम महिमा

कबिरा सब जग निर्धना ,धनवंता न कोय , धनवंता सोइ जानिये ,राम नाम धन होय।


काशी में एक दिन गंगाकिनारे भक्त कबीर जी बैठे हुए थे. एक जिज्ञासु ने उनसे जाकर पूछा कि ‘महाराज ! शास्त्रों में जहाँ-तहाँ ज्ञान की बड़ी प्रशंसा की गयी है. परन्तु किसी से अगर ज्ञान के सम्बन्ध में पूछा जाता है तो उत्तर मिलता है कि ज्ञान तो अनहद है; उसकी कोई हद ही नहीं बतलाता. इसलिए क्या करना चाहिए ?’ कबीर जी ने कहा-

“पढ़ने की हद समझ है, समझण की हद ज्ञान,
ज्ञान की हद हरिनाम है, यह सिद्धांत उर आन.”

ज्ञानी भी ज्ञान की कथा कहते-कहते अंत में भगवन्नाम-स्मरण करते हैं और तभी वे शांति पाकर विराम को प्राप्त होते हैं; अतएव तू हरिनाम में चित्त लगा.


उमा राम गुन गूढ़ पंडित मुनि पावहिं बिरति।
पावहिं मोह बिमूढ़ जे हरि बिमुख न धर्म रति॥

भावार्थ

हे पार्वती! श्री रामजी के गुण गूढ़ हैं, पण्डित और मुनि उन्हें समझकर वैराग्य प्राप्त करते हैं, परन्तु जो भगवान से विमुख हैं और जिनका धर्म में प्रेम नहीं है, वे महामूढ़ (उन्हें सुनकर) मोह को प्राप्त होते हैं।



अरब खरब लौं लच्छमी, उदय अस्त लौं राज।
तुलसी जौ निज मरन है, तौ आवै कौनै काज।।


अर्थः-सन्त तुसली साहिब का विचार है कि चाहे अरबों खरबों के मूल्य का धन एकत्र कर लिया जाये और चाहे सृष्टि के इस छोर से उस छोर तक अर्थात् जहाँ से सूर्योदय होता है, वहां से लेकर सूर्यास्त की सीमा तक का साम्राज्य भी अपने अधिकार में हो। परन्तु जबकि अपना मृत्यु के मुख में जाना निश्चित है और यह भी सिद्ध है कि मृत्यु-समय ये धन और अधिकार अपनी कुछ भी सहायता नहीं कर सकेंगे; तो फिर इनका लाभ क्या हुआ?



नमो परम् धर्मो, नमो परम् तपा, नामो परम् बंधु , नामो परम् गति, नामो परम् सुखम, नामो परम् गुरु

नामो परम् सुखम, परम् शक्ति

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