सर्व श्रेष्ट चौपाई जप के लिये
तब लगि कुसल न जीव कहुँ सपनेहुँ मन बिश्राम। |
- भावार्थ
तब तक जीव की कुशल नहीं और न स्वप्न में भी उसके मन को शांति है, जब तक वह शोक के घर काम (विषय-कामना) को छोड़कर श्री रामजी को नहीं भजता॥46॥
बारि मथें घृत होइ बरु सिकता ते बरु तेल। |
- भावार्थ
जल को मथने से भले ही घी उत्पन्न हो जाए और बालू (को पेरने) से भले ही तेल निकल आवे, परंतु श्री हरि के भजन बिना संसार रूपी समुद्र से नहीं तरा जा सकता, यह सिद्धांत अटल है॥122 (क)॥
यह कलिकाल मलायतन मन करि देखु बिचार। |
- भावार्थ
अरे मन! विचार करके देख! यह कलिकाल पापों का घर है। इसमें श्री रघुनाथजी के नाम को छोड़कर (पापों से बचने के लिए) दूसरा कोई आधार नहीं है॥121 (ख)॥
बिनु सतसंग न हरि कथा तेहि बिनु मोह न भाग। |
- भावार्थ
सत्संग के बिना हरि की कथा सुनने को नहीं मिलती, उसके बिना मोह नहीं भागता और मोह के गए बिना श्री रामचंद्र जी के चरणों में दृढ़ (अचल) प्रेम नहीं होता॥61॥
https://youtu.be/IiPxjhDyl4Y
https://youtu.be/1k_XvlavjOY

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