लक्ष्मी और नारायण के अभेद होने का सुन्दर वर्णन
विष्णुपुराण में श्री मैत्रेय जी के पूछने पर पराशर ऋषि श्री लक्ष्मी और नारायण के अभेद होने का सुन्दर वर्णन करते हैं।
अर्थो विष्णुरियं वाणी नीतिरेषा नयो हरिः ।
बोधो विष्णुरियं बुद्धिर्मोऽसौ सत्क्रियात्वियम् ॥
अर्थात-विष्णु अर्थ हैं लक्ष्मी वाणी हैं, हरि
नियम हैं तो ये नीति है, भगवान् विष्णु बोध है और माता बुद्धि हैं तथा वे धर्म है और ये सत्क्रिया हैं।
सृष्टा विष्णुरियं सृष्टिः श्रीभूमिभूधरो हरिः ।
सन्तोषो भगवाल्लक्ष्मीस्तुष्टिमैत्रेय शाश्वती ॥
अर्थात- हे मैत्रेय ! भगवान् जगत के सृष्टा हैं और लक्ष्मी जी सृष्टि है,श्रीहरि भूधर (पर्वत अथवा राजा) है और लक्ष्मीजी भूमि हैं। ऐसे ही भगवान् सन्तोष है और लक्ष्मी जी नित्य-तुष्टि हैं।
इच्छा श्रीभगवान्कामो यज्ञोऽसौ दक्षिणा त्वियम्।
आज्याहुतिरसौ देवी पुरोडाशो जनार्दनः ।।
अर्थात- भगवान काम हैं और लक्ष्मी जी इच्छा है, श्रीहरि यज्ञ हैं तो ये दक्षिणा है, श्रीजनार्दन पुरोडाश हैं तो देवी आज्याहुति अर्थात घी की आहुति हैं।
इस प्रकार ये दोनों भेदरहित अर्थात एक ही हैं।
नारायण के हर अवतार में श्रीदेवी ही उनकी संगिनी के रूप में अवतरित होती हैं। रामअवतार में वे सीता तो कृष्णावतार में रुक्मिणी थी इसी प्रकार वे हर अवतार में प्रभु के साथ हैं।
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