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Showing posts from February, 2022

शिवाष्टक

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शिवाष्टक | Shivashtakam Stotram Hindi PDF Download शिवाष्टक | Shivashtakam Stotram  शिवाष्टक | Shivashtakam Stotram in Hindi शिव के प्रशंसा में अनेकों अष्टकों की रचना हुई है जिसमें शिवाष्टक का विशेष महत्व है। शिवाष्टकों की संख्या भी कम नहीं है। भगवान शिव को प्रिय शिवाष्टक आदि गुरू शंकराचार्य द्वारा रचित है। यह शिवाष्टक आठ पदों में विभाजित है जिसकी स्तुति परंब्रह्म शिव की आराधन का एक उत्तम साधन है। शिव के इस स्तोत्र की महिमा स्वयं शंकराचार्य ने भी कही है। शास्त्रों के अनुसार शिव को प्रिय शिवाष्टक स्तोत्र का पाठ और श्रवण मनुष्य को हर बुरी परिस्थितियों से शीघ्र ही मुक्ति दिलाता है। सावन के महीने में शिव की इस स्तुति का सस्वर पाठ भाग्यहीन व्यक्ति को भी सौभाग्यशाली बनाता है। शिवाष्टक पाठ विधि शिवाष्टक का पाठ करने से पूर्व भगवान शिव का गाय के दूध और गंगाजल से अभिषेक करें। फिर उनको शहद, दही, सफेद चंदन, सफेद फूल, खीर, मौसमी फल, बेलपत्र, भांग, धतूरा, शमी पत्र, अक्षत्, धूप, दीप आदि ​अर्पित करें। विधिपूर्वक पूजन के बाद पूरे मनोयोग से शिवाष्टक का पाठ करें। शिवाष्टक | Shivashtakam Stotram Lyric...

jatau prasang

https://hindi.webdunia.com/religion/religion/hindu/ramcharitmanas/AranyaKand/13.htm

naam jap krna aur prabhu pr visvas ki ve hi nirvah krege

https://youtu.be/AHI8IU34Q9o

Ram Ram lo... mukti apke mukh me he

https://youtu.be/1r21RkVTP8U

गुरु दांत, उनके शिष्य भद्रतनु और वैश्या सुमध्या

गुरु दांत, उनके शिष्य भद्रतनु और वैश्या सुमध्या https://youtu.be/n9XRJvgUNEc भद्रतनु ने कहा- “भगवन! आपको मेरी प्रसन्नता के लिये यह कार्य तो करना ही पड़ेगा।” भगवान ने कहा-“अच्छा, तुम्हारी प्रसन्नता के लिये मैं तुम्हारे गुरुदेव से मिलूँगा, तुम उन्हें ले आओ।” बस इस तरह प्रभु की विशेष कृपा के दान्त को भी भगवान का दर्शन मिला। कथानक का आशय यही है कि किसी भी स्थिति में प्राणी भगवान के चरणों में जाकर सदाचारी बनकर भगवान को प्राप्त कर लेता है, अतः प्राणी को चाहिये कि वह हर तरह से प्रभु के शरण हो।   “अपि चेत्सुदुराचारी भजते मामनन्यभाक्। साधुरेव स मन्तधव्यः सम्यग्व्यवसितो हि सः।। क्षिप्रं भवति धर्मात्मा शश्वच्छान्तिं निगच्छति।” “कोटि बिप्रबध लागहिं जाहू, आये सरन तजौं नहिं ताहू।” “विश्वदोहकृत अघ जेहि लागा, शरण गये प्रभु ताहु न त्यागा।” “जे सुनि शरण सामुहे आये, सकृत प्रणाम किये अपनाये।”

भक्ति बढ़ाने वाले भगवत गीता के श्लोक

अश्रद्दधानाः पुरुषा धर्मस्यास्य परन्तप। अप्राप्य मां निवर्तन्ते मृत्युसंसारवर्त्मनि।।9.3।। ---भगवत गीता हे परंतप! इस धर्मकी महिमापर श्रद्धा न रखनेवाले मनुष्य मेरे प्राप्त न होकर मृत्युरूप संसारके मार्गमें लौटते रहते हैं अर्थात् बार-बार जन्मते-मरते रहते हैं। O Parantap!  People who do not have faith in the glory of this religion, without attaining Me, keep returning to the path of the world in the form of death, that is, they keep on taking birth and dying again and again. 'मनसा परमात्मानं ध्यात्वा तद्रूपतामियात्।' अर्थ - मन के द्वारा परमात्मा का चिन्तन करते हुए तदनुरूप बनने का प्रयत्न करना चाहिए। - त्रिशिखब्राह्मणोपनिषद् (मंत्रभाग १२९) 

राजा प्रियव्रत कथा

श्रीमद्भागवत पुराण में वर्णित कथा के अनुसार स्वायंभुव मनु के दो पुत्र थे- प्रियव्रत और उत्तानपाद। उत्तानपाद के वंश में ही भगवान विष्णु के परम भक्त ध्रुव पैदा हुए। प्रियव्रत बड़े आत्मज्ञानी थे। उन्होंने नारद से परमार्थ तत्व का उपदेश ग्रहण करके ब्रह्माभ्यास में जीवन बिताने का दृढ़ संकल्प कर लिया। इससे ब्रह्या को चिंता हुई कि प्रियव्रत के इस परमार्थ तत्व के आग्रह से तो सृष्टि का विस्तार ही रुक जाएगा। स्वायंभुव मनु की आज्ञा का भी इस आत्मयोगी राजकुमार ने सम्मान नहीं किया। वह हंस पर सवार होकर राज कुमार प्रियव्रत के पास आए। देवर्षि नारद भी वहीं थे। ब्रह्मा को देखते ही नारद, स्वायंभुव मनु तथा प्रियव्रत उठ खड़े हुए और प्रणाम-सत्कार किया। ब्रह्मा ने सभी को आशीर्वाद देकर आसन ग्रहण किया। ब्रह्मा ने प्रियव्रत से कहा, ‘‘पुत्र! मैं तुमसे सत्य सिद्धांत की बात कहता हूं। हम सब तुम्हारे पिता, तुम्हारे गुरु यह नारद, भगवान महादेव तथा मैं स्वयं भी भगवान श्रीहरि की ही आज्ञा मानकर सारे कर्म करते हैं। उनके विधान को कोई नहीं जान सकता। उनकी इच्छानुसार ही सब कर्मों को भोगते हुए हम अपना जन्म सफल करने के लिए निस्सं...

नील सरस्वती स्तोत्र

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शत्रुओं से परेशान हैं तो पढ़ें नील सरस्वती स्तोत्र   हर व्यक्ति की जिंदगी में कोई ना कोई शत्रु अवश्य होता है। कोई शत्रु प्रत्यक्ष रूप से तो कोई अप्रत्यक्ष रूप से परेशान करता रहता है और हम परेशान हो जाते हैं। हर कोई चाहता है कि उसे उसके शत्रु से छुटकारा मिले तथा जीवन में सबकुछ अच्छा हो, लेकिन ऐसा होता नहीं है।    अगर आप भी अपने शत्रु के कारण परेशानियों का सामना कर रहे है तो आपके लिए यह नील सरस्वती स्तोत्र बहुत ही मददगार साबित होगा, इसके पाठ से हम अपने शत्रु पर विजय प्राप्त कर सकते हैं। यह स्तोत्र हमारे शत्रुओं का नाश करने में सक्षम है। इस स्तोत्र को जो व्यक्ति अष्टमी, नवमी तथा चतुर्दशी के दिन अथवा प्रतिदिन इसका पाठ करता है उसके सभी शत्रुओं का नाश हो जाता है। आइए पढ़ें पवित्र नील सरस्वती स्तोत्र नील सरस्वती स्तोत्र   भक्तेभ्यो वरदे देवि त्राहि मां शरणागतम्।।1।।   ॐ सुरासुरार्चिते देवि सिद्धगन्धर्वसेविते। जाड्यपापहरे देवि त्राहि मां शरणागतम्।।2।।   जटाजूटसमायुक्ते लोलजिह्वान्तकारिणि। द्रुतबुद्धिकरे देवि त्राहि मां शरणागतम्।।3।।   सौम्यक्रोधधरे रूपे चण्डरू...