गुरु दांत, उनके शिष्य भद्रतनु और वैश्या सुमध्या
गुरु दांत, उनके शिष्य भद्रतनु और वैश्या सुमध्या
https://youtu.be/n9XRJvgUNEcभद्रतनु ने कहा- “भगवन! आपको मेरी प्रसन्नता के लिये यह कार्य तो करना ही पड़ेगा।” भगवान ने कहा-“अच्छा, तुम्हारी प्रसन्नता के लिये मैं तुम्हारे गुरुदेव से मिलूँगा, तुम उन्हें ले आओ।” बस इस तरह प्रभु की विशेष कृपा के दान्त को भी भगवान का दर्शन मिला।
कथानक का आशय यही है कि किसी भी स्थिति में प्राणी भगवान के चरणों में जाकर सदाचारी बनकर भगवान को प्राप्त कर लेता है, अतः प्राणी को चाहिये कि वह हर तरह से प्रभु के शरण हो।
“अपि चेत्सुदुराचारी भजते मामनन्यभाक्।
साधुरेव स मन्तधव्यः सम्यग्व्यवसितो हि सः।।
क्षिप्रं भवति धर्मात्मा शश्वच्छान्तिं निगच्छति।”
“कोटि बिप्रबध लागहिं जाहू, आये सरन तजौं नहिं ताहू।”
“विश्वदोहकृत अघ जेहि लागा, शरण गये प्रभु ताहु न त्यागा।”
“जे सुनि शरण सामुहे आये, सकृत प्रणाम किये अपनाये।”
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