अच्छी चौपाइयां और दोहे

तुम्ह समरूप ब्रह्म अबिनासी। सदा एकरस सहज उदासी॥
अकल अगुन अज अनघ अनामय। अजित अमोघसक्ति करुनामय॥3॥

भावार्थ

आप समरूप, ब्रह्म, अविनाशी, नित्य, एकरस, स्वभाव से ही उदासीन (शत्रु-मित्र-भावरहित), अखंड, निर्गुण (मायिक गुणों से रहित), अजन्मे, निष्पाप, निर्विकार, अजेय, अमोघशक्ति (जिनकी शक्ति कभी व्यर्थ नहीं जाती) और दयामय हैं॥3॥


जीवनमुक्त ब्रह्मपर चरित सुनहिं तजि ध्यान।

जे हरि कथाँ न करहिं रति तिन्ह के हिय पाषान॥42॥


भावार्थ

सनकादि मुनि जैसे जीवन्मुक्त और ब्रह्मनिष्ठ पुरुष भी ध्यान (ब्रह्म समाधि) छोड़कर श्री रामजी के चरित्र सुनते हैं। यह जानकर भी जो श्री हरि की कथा से प्रेम नहीं करते, उनके हृदय (सचमुच ही) पत्थर (के समान) हैं॥42॥



🌹 श्री भगवान से प्रकट होने की प्रार्थना 🌹

 जय जय अबिनासी सब घट बासी ब्यापक परमानंदा । अबिगत गोतीतं चरित पुनीतं मायारहित मुकुंदा ॥ जेहि लागि बिरागी अति अनुरागी बिगत मोह मुनिबृंदा । निसि बासर ध्यावहिं गुनगन गावहिं जयति सच्चिदानंदा ॥ 
जेहिं सृष्टि उपाई त्रिबिध बनाई संग सहाय न दूजा । 

भावार्थ : - हे अविनाशी , सबके हृदयमें निवास करनेवाले ( अन्तर्यामी ) , सर्वव्यापक परम आनन्दस्वरूप , अज्ञेय , इन्द्रियोंसे परे , पवित्रचरित्र , मायासे रहित मुकुन्द ( मोक्षदाता ) ! आपकी जय हो ! जय हो !!
इस लोक और परलोकके सब भोगोंसे ) विरक्त तथा मोहसे सर्वथा छूटे हुए ( ज्ञानी ) मुनिवृन्द भी अत्यन्त अनुरागी ( प्रेमी ) बनकर जिनका रात - दिन ध्यान करते हैं और जिनके गुणोंके समूहका गान करते हैं , उन सच्चिदानन्दकी जय हो ॥ २ ॥
भावार्थ : जिन्होंने बिना किसी दूसरे संगी अथवा सहायकके अकेले ही या स्वयं अपनेको त्रिगुणरूप ब्रह्मा विष्णु  शिवरूप  बनाकर अथवा बिना किसी उपादान कारणके अर्थात् स्वयं ही सृष्टिका अभिन्ननिमित्तोपादान कारण बनकर ) तीन प्रकारकी सृष्टि उत्पन्न की

 ॐ नमो नारायणाय - ॐ नमो भगवते वासुदेवाय🌹

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