mahabharat
ऊर्ध्वबाहुर्विरोम्येष न च कश्चित् शृणोति मे ।
धर्मादर्थश्च कामश्च स किमर्थं न सेव्यते ।।
मैं दोनों हाथ ऊपर उठाकर पुकार-पुकारकर कह रहा हूँ, पर मेरी बात कोई नहीं
सुनता। धर्मसे मोक्ष तो सिद्ध होता ही है; अर्थ और काम भी सिद्ध होते हैं, तो भी लोग
उसका सेवन क्यों नहीं करते ।-वेदव्यास
Amongst all scriptures, Gita is classic amongst all, Bhagwan Shri Hari is the superior most, Ganga is the greatest Tirthas and Manu has the complete knowledge of Vedas!
~ Mahabharat, BP 2.43 ~
गीता सर्वशास्त्रमयी है, भगवान श्रीहरि सर्वदेवमय हैं, गंगा सर्वतीर्थमयी है और मनु सर्ववेदमय हैं।
~ महाभारत,भीष्मवध पर्व २.४३ ~
येन येन शरीरेण करोत्ययमनीश्वरः ।
तेन तेन शरीरेण तदवश्यमुपाश्नुते ।
मानसं मनसाऽऽप्नोति शरीरं च शरीरवान् ।
यह पराधीन जीव जिस-जिस शरीरसे कर्म करता है, उस-उस शरीरसे उसका फल
अवश्य भोगता है। मानस कर्मका फल मनसे और शारीरिक कर्मका फल शरीर धारण
करके भोगता है ।
-महाभारत
वियोगे दोषदर्शी यः संयोगं स विसर्जयेत् ।
असङ्गे सङ्गमो नास्ति दुःखं भूवि वियोगजम् ।।
जो वियोगमें दोष देखता है, वह संयोगका त्याग कर दे; क्योंकि असंग आत्मामें संगम
या संयोग नहीं है। जो उसमें संयोगका आरोप करता उसीको इस भूतलपर वियोगका
दुःख सहना पड़ता है ।
--महाभारत
इस लोकमें परमपदकी इच्छा करनेवाले मनुष्यको महाभारतका श्रवण करना चाहिये। अष्टादश पुराणोंके रचयिता और वेद (ज्ञान)-के महान् समुद्र महात्मा श्रीव्यासदेवका यह सिंहनाद है कि 'तुम नित्य महाभारतका श्रवण करो ।’
जो अपने-परायेके ज्ञानमें ही उलझा रहता है, वह अभिमानसे ऊपर नहीं उठ
पाता। जो किसीके लिये पराया नहीं है, उस परमात्माको जाननेवाला पुरुष उत्तम बुद्धिको पाकर मोहसे मुक्त हो जाता है ।
-महाभारत
जयो नामेतिहासोऽयं श्रोतव्यो मोक्षमिच्छता ।
ब्राह्मणेन च राज्ञा च गर्भिण्या चैव योषिता ।।
मोक्षकी इच्छा रखनेवाले ब्राह्मणको, राज्य चाहनेवाले क्षत्रियको तथा उत्तम पुत्रकी
इच्छा रखनेवाली गर्भिणी स्त्रीको भी इस जय नामक इतिहासका श्रवण करना
चाहिये ।
-महाभारत
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