सदन नामक कसाई जाति के एक भक्त हुए थे। बचपन से भगवन्नाम-जप और हरि कीर्तन इन्‍हें प्रिय था। भगवान का नाम तो इनकी जीभ पर सदा ही नाचता रहता था।

परिचय

प्राचीन समय में सदन नामक कसाई जाति के एक भक्त हुए थे। बचपन से भगवन्नाम-जप और हरि कीर्तन इन्‍हें प्रिय था। भगवान का नाम तो इनकी जीभ पर सदा ही नाचता रहता था। यद्यपि ये जाति से कसाई थे, फिर भी इनका हृदय दया से पूर्ण था। जीव-वध के नाम से ही इनका शरीर काँपने लगता था। आजीविका के लिये और कोई उपाय न होने से दूसरों के यहाँ से मांस लाकर बेचा करते थे, स्‍वयं अपने हाथ से पशु-वध नहीं करते थे। इस काम में भी इनका मन लगता नहीं था, पर मन मारकर जाति-व्‍यवसाय होने से करते थे। सदा नाम-जप, भगवान के गुण-गान और लीलामय पुरुषोत्तम के चिन्‍तन में लगे रहते थे। सदन का मन श्री हरि के चरणों में रम गया था। रात-दिन वे केवल ‘हरि-हरि’ करते रहते थे।

भगवान अपने भक्त से दूर नहीं रहा करते। भक्त को जैसे उनके बिना चैन नहीं, वैसे ही उन्‍हें भी भक्त के बिना चैन नहीं। सदन के घर में भगवान शालग्राम रूप में विराजमान थे। सदन को इसका पता नहीं था। वे तो शालग्राम को पत्‍थर का एक बाट समझते थे और उनसे मांस तौला करते थे।[1]

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