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Showing posts from June, 2022

नामों का मूल्य(28 naam )

एक बार भगवान श्रीकृष्ण से अर्जुन ने पूछा- ‘केशव ! मनुष्य बार-बार आपके एक हजार नामों का जप क्यों करता है,आप मनुष्यों की सुविधा के लिए एक हजार नामों के समान फल देने अपने दिव्य नाम बताइए ।’ किं नु नाम सहस्त्राणि जपते च पुन: पुन: ।  यानि नामानि दिव्यानि तानि चाचक्ष्व केशव ।।  भगवान श्रीकृष्ण ने कहा—‘मैं अपने ऐसे चमत्कारी 28 नाम बताता हूँ जिनका जप करने से मनुष्य के शरीर में पाप नहीं रह पाता है । वह मनुष्य एक करोड़ गो-दान, एक सौ अश्वमेध-यज्ञ और एक हजार कन्यादान का फल प्राप्त करता है ।अमावस्या, पूर्णिमा तथा एकादशी तिथि को और प्रतिदिन प्रात:, मध्याह्न व सायंकाल इन नामों का स्मरण करने या जप करने से मनुष्य सम्पूर्ण पापों से मुक्त हो जाता है । श्रीभगवानुवाच - मत्स्यं कूर्मं वराहं च वामनं च जनार्दनम् ।  गोविन्दं पुण्डरीकाक्षं माधवं मधुसूदनम् ।।  पद्मनाभं सहस्त्राक्षं वनमालिं हलायुधम् ।  गोवर्धनं हृषीकेशं वैकुण्ठं पुरुषोत्तमम् ।।  विश्वरूपं वासुदेवं रामं नारायणं हरिम् ।  दामोदरं श्रीधरं च वेदांगं गरुणध्वजम् ।। अनन्तं कृष्णगोपालं जपतोनास्ति पातकम् ।  गवां कोटिप...

अष्टांग योग या राजयोग क्या है

अष्टांग योग या राजयोग क्या है... लगभग 200 ईपू में महर्षि पतंजलि ने योग को लिखित रूप में संग्रहित किया और योग-सूत्र की रचना की। योग-सूत्र की रचना के कारण पतंजलि को योग का पिता कहा जाता है। महर्षि पतं‍जलि के योग को ही अष्टांग योग या राजयोग कहा जाता है। योग के उक्त आठ अंगों में ही सभी तरह के योग का समावेश हो जाता है। भगवान बुद्ध का आष्टांगिक मार्ग भी योग के उक्त आठ अंगों का ही हिस्सा है। हालांकि योग सूत्र के आष्टांग योग बुद्ध के बाद की रचना है। अष्टांग  योग : इसी योग का सर्वाधिक प्रचलन और महत्व है। इसी योग को हम अष्टांग योग योग के नाम से जानते हैं। अष्टांग योग अर्थात योग के आठ अंग। दरअसल पतंजल‍ि ने योग की समस्त विद्याओं को आठ अंगों में श्रेणीबद्ध कर दिया है।  यह आठ अंग हैं- (1) यम (2)नियम (3)आसन (4) प्राणायाम (5)प्रत्याहार (6)धारणा (7) ध्यान (8)समाधि। उक्त आठ अंगों के अपने-अपने उप अंग भी हैं। वर्तमान में योग के तीन ही अंग प्रचलन में हैं- आसन, प्राणायाम और ध्यान। योग सूत्र : 200 ई.पू. रचित महर्षि पतंजलि का ‘योगसूत्र’ योग दर्शन का प्रथम व्यवस्थित और वैज्ञानिक अध्ययन है। योगदर्शन इन...

सनत्सुजातीय

विद्वान् पुरुष अपनी महत्ता को प्रकट न करते हुए जिस स्थान पर निवास करता है वहाँ यदि उसे दूसरे लोगों से अभद्रता और भय प्रा होता है तो भी वह स्थान कल्याणकारक है। क्योंकि अपनी विशेषता को न बताते हुए जो रहता है वही ज्ञानी श्रेष्ठ है। अन्य परुष नहीं । #सनत्सुजातीय तात्पर्य यह है कि वह ज्ञानी पुरुष जीवन्मुक्त होकर लौकिक व्यवहारों को जानते हुए भी न जानते हुए के समांन ही व्यवहार करता है अर्थात् लोक में जड़वत् आचरण करता है।

कामसूत्र

तदेतद् ब्रह्मचर्येण परेण च समाधिना। विहितं लोकयात्रार्थ न रागार्थोऽस्य संविधि:।। #कामसूत्र की रचना अमोघ ब्रह्मचर्य और निर्विकल्प समाधि द्वारा मह्षि #वात्स्यायन ने लोकव्यवहार को सुचारु रूप से चलाने के लिये की है, इसका विधान राग के निमित्त नहीं किया गया। कामतत्त्वज्ञ कामुक नहीं होता। इस शास्त्र के तत्त्व को समझने वाला पुरुष धर्म, अर्थ एवं काम तथा लोक में अपनी स्थिति की रक्षा करता हुआ निश्वय ही जितेन्द्रिय हो जाता है।. जो कामी पुरुष रागात्मक भाव से इस शास्त्र का अध्ययन एवं प्रयोग करता है, उसे कदापि सिद्धि नहीं मिलती; किन्तु जो विवेकवान् पुरुष धर्म और अर्थ को दृष्टि में रखकर इसका प्रयोग करता है उसे पूर्ण सिद्धि मिलती है। जब-जब धर्मका ह्रास होता है, तब-तब प्रभु धर्मको दृढ़ रूप में स्थापित करनेके लिये अवतार ग्रहण करते हैं। उनकी एक श्रेष्ठतम सात्त्विकी मूर्ति है, जो दिव्यलोकर्मे रहकर सदा दुष्कर तप करती है। उनकी दूसरी मूर्ति प्रजाके संहार और सृष्टिके लिये योगनिद्राका आश्रय ले शेषशय्यापर शयन करती है।वह योगनिद्रा अध्यात्मचिन्तकोंकी समाधिसे भी उत्कृष्ट है। एक सहस्र चतुर्युगोंतक शयन करके वे सृ...