कामसूत्र

तदेतद् ब्रह्मचर्येण परेण च समाधिना।
विहितं लोकयात्रार्थ न रागार्थोऽस्य संविधि:।।

#कामसूत्र की रचना अमोघ ब्रह्मचर्य और निर्विकल्प समाधि द्वारा मह्षि #वात्स्यायन ने लोकव्यवहार को सुचारु रूप से चलाने के लिये की है, इसका विधान राग के निमित्त नहीं किया गया।
कामतत्त्वज्ञ कामुक नहीं होता। इस शास्त्र के तत्त्व को समझने वाला पुरुष धर्म, अर्थ एवं काम तथा लोक में अपनी स्थिति की रक्षा करता हुआ निश्वय ही जितेन्द्रिय हो जाता है।. जो कामी पुरुष रागात्मक भाव से इस शास्त्र का अध्ययन एवं प्रयोग करता है, उसे कदापि सिद्धि नहीं मिलती; किन्तु जो विवेकवान् पुरुष धर्म और अर्थ को दृष्टि में रखकर इसका प्रयोग करता है उसे पूर्ण सिद्धि मिलती है।

जब-जब धर्मका ह्रास होता है, तब-तब प्रभु धर्मको दृढ़ रूप में स्थापित करनेके लिये अवतार ग्रहण करते हैं। उनकी एक श्रेष्ठतम सात्त्विकी मूर्ति है, जो दिव्यलोकर्मे रहकर सदा दुष्कर तप करती है। उनकी दूसरी मूर्ति प्रजाके संहार और सृष्टिके लिये योगनिद्राका आश्रय ले शेषशय्यापर शयन करती है।वह योगनिद्रा अध्यात्मचिन्तकोंकी समाधिसे भी उत्कृष्ट है। एक सहस्र चतुर्युगोंतक शयन करके वे सृष्टि-संचालन के कार्यसे पुनः विभिन्न ( देवता आदिके ) रूपों में प्रकट होते हैं ।

#हरिवंश

वेदाधीनाः सदा यज्ञा यज्ञाधीनास्तु देवताः ।
देवताः ब्राह्मणाधीनास्तस्माद् विप्रास्तु देवताः ।।

यज्ञ सदा वेदोंके अधीन हैं और देवता यज्ञों तथा ब्राह्मणोंके अधीन होते हैं, इसलिये
ब्राह्मण देवता हैं ।
अनाश्रित्योच्छ्रयं नास्ति मुख्यमाश्रयमाश्रयेत् ।

किसीका सहारा लिये बिना कोई ऊँचे नहीं चढ़ सकता, अतः सबको किसी प्रधान
आश्रयका सहारा लेना चाहिये। देवतालोग भगवान् रुद्रके आश्रयमें रहते हैं, रुद्र ब्रह्माजीके आश्रित हैं ।ब्रह्माजी मेरे आश्रयमें रहते हैं, किंतु मैं किसीके आश्रित नहीं हूँ। राजन्! मेरा आश्रय कोई नहीं है। मैं ही सबका आश्रय हूँ ।

-श्रीकृष्ण

#महाभारत



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