सनत्सुजातीय

विद्वान् पुरुष अपनी महत्ता को प्रकट न करते हुए जिस स्थान पर निवास करता है वहाँ यदि उसे दूसरे लोगों से अभद्रता और भय प्रा होता है तो भी वह स्थान कल्याणकारक है। क्योंकि अपनी विशेषता को न बताते हुए जो रहता है वही ज्ञानी श्रेष्ठ है। अन्य परुष नहीं ।

#सनत्सुजातीय

तात्पर्य यह है कि वह ज्ञानी पुरुष जीवन्मुक्त होकर लौकिक व्यवहारों को जानते हुए भी न जानते हुए के समांन ही व्यवहार करता है अर्थात् लोक में जड़वत् आचरण करता है।

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