विनयपत्रिका

इस मूर्ख मनने मुझको खूब ही छकाया। हे करुणामय! सुनिये, इसीके कारण मैं बारंबार जगत्में जनम-जनमकर दुःखसे रोता फिरा।शीतल और मधुर अमृतरूप सहजसुख  जो अत्यन्त निकट ही रहता है, मैंने इस मनके फेरमें पड़कर उसे यों भुला दिया, मानो वह बहुत ही दूर हो।
मोहवश अनेक प्रकारसे परिश्रम कर मुझ मुर्खने व्यर्थ ही पानीको बिलोया। यद्यपि मनमें यह जानता था कि कर्म कीचड़ है, फिर भी चित्तको उसीमें सानकर मैं कुटिल, मलसे ही मलको धोना चाहता हूँ। प्यास लग रही है, पर मैं ऐसा दुष्ट हूँ कि गंगाजीको छोड़कर बार-बार व्याकुल हो आकाश निचोड़ता फिरता हूँ। https://t.co/UnF01WZZYm
#तुलसीदास
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